बुधवार, 13 अप्रैल 2016

राष्ट्रवादी बाबा साहेब

बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर...एक ऐसी शख्सियत जिनके व्यक्तित्व को लेकर जितनी बार बहस की जाए वो कम होगी...बाबा साहेब की शख्सियत के कई रंग हैं...एक अर्थशास्त्री, एक इतिहासकार, एक कानूनविद्, एक सामाजिक कार्यकर्ता, एक नेता, एक आंदोलनकारी....ऐसे कई और रंग जोड़े जा सकते हैं बाबा साहेब के व्यक्तित्व के कैनवास में...जिस दौर में बाबा साहेब ने जन्म लिया उस दौर में संघर्ष करना और फिर संघर्षों के बलबूते अपनी प्रतिभा के दम पर दुनियाभर में मुकाम स्थापित करना आसान न था...मगर बाबा साहेब ने ये किया...मुश्किलें झेली, अपमान सहा...मगर उनके दिल में ताउम्र हिन्दुस्तान ही धड़कता रहा...राष्ट्रवाद की जो लौ बाबा साहेब ने जलाई उसकी रौशनी में देखा गया सपना सिर्फ स्वतन्त्रता भर का नहीं था बल्कि समानता के साथ स्वतन्त्रता का था...

14 अप्रैल 1891...संयुक्त प्रांत का महू शहर...सैनिक छावनी में गूंजी थी सूबेदार रामजी सकपाल के 14वीं संतान की किलकारी...कौन जानता था कि सैनिक छावनी में गूंजी ये आवाज आने वाले वक्त में पूरे हिन्दुस्तान में बदलाव का नारे का पर्याय बन जाएगी...महार जाति में जन्मे भीमराव का ना बचपन आसान था ना युवावस्था...प्राथमिक स्कूल में बाकी बच्चों से अलग लाइन में बैठने का दंश...ऊपर से गिराया हुआ पानी पीने का अपमान...और भी बहुत कुछ...मगर एलफिंस्टन रोड के राजकीय हाईस्कूल से निकलकर बंबई यूनिवर्सिटी के कैम्पस तक पहुंचना और फिर अमेरिका लंदन तक पढ़ाई करके वापस हिन्दुस्तान आकर संघर्ष करना....ये सबकुछ बाबा साहेब का वो व्यक्तित्व दिखाता है जिसने उन्हें मजबूत बनाया...उन्हें अपनी प्रतिभा को कई दिशाओं में विकसित करने का मौका दिया...जो भुगता, जो अनुभव किया उसके खिलाफ लड़ने की मजबूत संकल्पशक्ति प्रदान की...
दरअसल बाबा साहेब की शख्सियत के बारे में जो कुछ भी सरसरी तौर पर अब तक बताया जाता रहा है वो शायद उनकी समग्रता के साथ न्याय नहीं है...बाबा साहब का जीवन ही सामाजिक परिवर्तन का प्रतीक रहा है...उस दौर में अश्पृश्य समाज से  बाबा साहब एकमात्र ऐसी शख्सियत रहे जिन्होने कॉलेज और यूनिवर्सिटी की पढ़ाई पूरी की...मगर विदेशों में उच्च शिक्षा लेते वक्त भी हिन्दुस्तान एक पल के लिए भी दिल से अलग नहीं हुआ....असमानता और अपमान का दर्द...उसकी टीस हमेशा ही बनी रही...सो बाबा साहब ने जब अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी से पीएचडी शुरु की तो विषय रखा...इवोल्यूशन ऑफ प्रोविन्शियल फिनान्स इन ब्रिटिश इंडिया...जो बाद में किताब के तौर पर भी सामने आई...
बाबा साहेब की मुहिम और उनके आंदोलन का मूल ही दरअसल असमानता के खिलाफ संघर्ष था...बाबा साहब मानते थे कि बगैर समानता के पूरी स्वतन्त्रता नहीं मिल सकती...बगैर जाति को मिटाए हिन्दू धर्म को पूर्ण नहीं माना जा सकता...अपनी किताब Who is Shudra में बाबा साहेब सवाल करते हैं
कहा जाता है कि शूद्र अनार्य थे, आर्य विरोधी थे...आर्यो ने उन्हें हराया था...गुलाम बनाया था अगर ये सच है तो क्या कारण है कि यजुर्वेद और अथर्ववेद को रचने वाले ऋषियों ने शूद्रों का यशोगान किया है...
यह भी कहा जाता है कि शूद्रों को विद्या अर्जित करने और वेद पढ़ने का अधिकार नहीं था फिर शूद्र सुदास ने ऋग्वेद के मंत्रों की रचना कैसे की
कहा जाता है कि शूद्र यज्ञ नहीं कर सकते थे...फिर सुदास ने अश्वमेध यज्ञ कैसे किया...अगर ऐसा है तो शतपथ ब्राह्मण में यज्ञ करने वाले शूद्र को संबोधित करने की विधि क्यों लिखी है
ये मानने वालों की कमी नहीं है कि बाबा साहेब की हिन्दू धर्म में गहरी आस्था थी...इतनी गहरी कि उन्होने हिन्दू धर्म से जुड़े तमाम ग्रंथों का अध्ययन किया और उसमें से ही ऐसे तर्क तलाशे जिसमें शूद्रों को लेकर स्थापित ब्राह्मणवादी पाखंडों का विरोध मिलता है...बाबा साहब की किताब हू इज शूद्रा में ऋग्वेद के पुरुषसूक्त, शतपथ ब्राह्मण और मनुस्मृति समेत कई ग्रंथों के अध्ययन के बाद जो निष्कर्ष देते हैं उसके मुताबिक
शूद्र असल में आर्यों के सूर्यवंशी समुदाय से ही थे...उस दौर में आर्य समुदाय ने केवल तीन वर्ण ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य को मान्यता दी थी...शूद्रों का अलग से कोई वर्ण नहीं था..दरअसल उस दौर में शूद्र राजाओं और ब्राह्मणों के बीच कई बार संघर्ष हुए...जिसमें ब्राह्मणों को शूद्र राजाओं के हाथों काफी कष्ट और अपमान झेलना पड़ा...नाराज ब्राह्मणों ने शूद्रों का जो कि मूलतः क्षत्रिय थे उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया...नतीजा शूद्रों की सामाजिक स्थिति में ह्रास हुआ और वो चौथे वर्ण के रुप में गिने गए...
बाबा साहेब ने अपनी पुस्तक में इसे प्रमाणित करने के अनेक तर्क दिए हैं...बाबा साहेब ने ये समझाने की कोशिश की...कि दरअसल हिन्दू धर्म के मूल में भेदभाव के लिए कोई जगह नहीं है...ये भेदभाव दरअसल सामाजिक संघर्ष का परिणाम है जिसे दूर किया जाना चाहिए..मगर पोंगापंथियों की गुटबंदी और उनकी उपेक्षा ने बाबा साहेब की आवाज को ना समझा ना ही दूसरों को समझने देना चाहा...नतीजा बाबा साहेब ने वही किया जो छठी शताब्दी ईसा पूर्व में कपिलवस्तु के राजकुमार सिद्धार्थ ने किया था...साल 1935 में बाबा साहब ने ऐलान कर दिया कि वो पैदा जरूर हिन्दू धर्म में हुए हैं मगर उनकी मृत्यु हिन्दू धर्म में नहीं होगी...
बाबा साहेब के राष्ट्रवाद का ये एक ऐसा पहलू है जो ये बताता है कि दरअसल उनका पूरा जीवन इस द्वंद्व में बीता कि कैसे हिन्दू समाज को एकजुट किया जाए...कैसे भारत की मूल संस्कृति को बचाकर रखा जाए...वो संस्कृति जिसके मूल में वेद हैं...वो वेद जो महिलाओं और शूद्रों तक को भी यज्ञ का अधिकार देते हैं....वो वेद जिनकी गलत व्याख्याओं ने समाज की मूल धारा में चल रहे एक समुदाय को हाशिए पर डाल दिया...बाबा साहब अपनी किताब फिलॉस्फी ऑफ हिन्दुइज्म में भी इस तर्क को रख चुके हैं...इसके लिए उन्होने ईसापूर्व 200 में अस्तित्व में आई मनुस्मृति को जिम्मेदार माना है...बाबा साहेब के इस चिन्तन का ही परिणाम है कि उनके महात्मा गांधी से भी अछूत उद्धार के मुद्दे पर गंभीर मतभेद रहे...महात्मा गांधी का प्राथमिक लक्ष्य स्वतन्त्रता थी जबकि अम्बेडकर समानता के साथ स्वतन्त्रता चाहते थे...
ब्राह्मण गुरु के चहेते शिष्य, ऊंची जाति के राजाओं के प्रिय छात्र और अमेरिका, लंदन की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटीज के स्कॉलर रहे बाबा साहेब को घोर तर्कवादी कहना शायद ज्यादा वाजिब होगा...क्योंकि बाबा साहेब ने सनातन संस्कृति की उस मूल चेतना से देश को रूबरू कराने के लिए पूरा जीवन बिता दिया...
अगर ये सवाल किया जाए कि क्या वाकई बाबा साहेब की शख्सियत के साथ न्याय हुआ...तो यकीन मानिए ईमानदार जवाब यही होगा कि नहीं...बाबा साहब राजनीतिक प्रतीक तो बन गए मगर उनकी उस पहचान को स्थापित करने की कोशिश ही नहीं हुई जो उनकी वास्तविक पहचान थी...जो राजनीति से दूर एक ऐसे चिन्तक की पहचान थी...ऐसे दार्शनिक की पहचान थी जिसकी दूर दृष्टि और सोच का दायरा तत्कालीन नेतृत्व से कई गुना आगे था...वरना 1947-48 के दशक में जम्मू कश्मीर से हिन्दुओं के संभावित पलायन की आशंका सिर्फ धारा 370 के प्रस्ताव पर कर देने वाला और कौन था...दरअसल बाबा साहेब ने सामाजिक परिवर्तन की जो भी मुहिम चलाई वो भारतीयता के दायरे में रहकर चलाई...ऐसा नहीं था कि डॉ अम्बेडकर को फ्रांस की क्रांति याद नहीं थी ऐसा नहीं था कि उन्हें यूरोप के हिंसक श्रमिक आंदोलन याद नहीं थे...मगर बाबा साहेब का रास्ता ऐसे कट्टर राष्ट्रवाद का रास्ता था...जिसके जरिए वो हिन्दुस्तान को एक सुखी समृद्ध समतामूलक समाज के रुप में देखना चाहते थे...
बौद्ध धर्म के स्वीकार करने का ऐलान कर दरअसल बाबा साहेब ने हिन्दू धर्म की वर्णव्यवस्था पर एक ऐसी कड़ी चोट की थी जिसका दंश उन्होने खुद सहा था...बाबा साहेब दरअसल बिल्कुल उसी दौर में जी रहे थे...जिस दौर से राजकुमार सिद्धार्थ गुजरे थे...सो धम्म संघ में शामिल होने से पहले गांधी जी से चर्चा के दौरान बाबा साहेब ने कहा था
अस्पृश्यता के सवाल पर मेरे आप से भेद हैं, फिर भी जब अवसर आएगा, तब मैं उस मार्ग को स्वीकार करूंगा जिससे इस देश को कम से कम धक्का लगे। इसलिए बौद्घ धर्म स्वीकार कर इस देश का अधिकतम हित साध रहा हूं, क्योंकि बौद्घ धर्म भारतीय संस्कृति का ही एक भाग है, 
दरअसल बाबा साहेब की महात्मा गांधी से अछूत उद्धार के मुद्दे पर मतभेद की वजह बिल्कुल साफ थी...महात्मा गांधी अगर छुआछूत को एक बुराई मानते थे ....तो अम्बेडकर इसे हिन्दू धर्म का नासूर...यही वजह रही कि बाबा साहेब ने पहले महाड़ आंदोलन, मंदिर प्रवेश आंदोलन, पीने के पानी के अधिकार आंदोलनों के जरिए दलितों के अधिकार की लड़ाई लड़ी...मगर हालात बदलने नहीं दिखे तो फिर नया रास्ता चुनने की ओर बढ़ चले...

बाबा साहब सिर्फ समानता के मुद्दे पर ही मुखर नहीं थे बल्कि राजनीतिक तौर पर भी पक्के राष्ट्रवादी नजर आते हैं...उस दौर में जबकि मोहम्मद जिन्ना साम्प्रदायिक नीति के जरिए विभाजन की हवा बना रहे थे उनके सबसे कट्टर आलोचक बाबा साहेब ही बनकर उभरे...उन्होने विभाजन की स्थिति में हिंसा  की आशंका जाहिर की जो अक्षरशः सत्य साबित हुई...हालांकि बाद में अपनी किताब माई थॉट्स ऑन पाकिस्तान में उन्होने विभाजन के पक्ष में तर्क दिए...स्पष्ट तौर पर बाबा साहेब ने भारतीयता से ताउम्र कभी समझौता नहीं किया...

बाबा साहेब के व्यक्तित्व के कई रंग हैं...अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ, कानूनविद्, सामाजिक कार्यकर्ता, समाज सुधारक, और आखिरकार धर्म प्रचारक का स्वरूप भी है बाबा साहेब का...मगर इन तमाम विविधताओं में एक बात कॉमन है...वो है राष्ट्रवादी सोच और भारतीयता के प्रति बाबा साहेब का अटूट विश्वास...बाबा साहेब अगर अर्थशास्त्र पर कुछ लिखते हैं तो रुपए की समस्या उन्हें याद आती है...ग्रामीण भारत की आर्थिक विसंगति की ओर उनका ध्यान जाता है...उनके गरीब की परिभाषा में तब सिर्फ अछूत नहीं होते बल्कि किसान, कामगार श्रमिक और महिलाएं सब होते हैं...राजनीतिज्ञ के तौर पर बाबा साहेब अगर दलितों के लिए अलग निर्वाचन की वकालत करते हैं तो वहीं हिन्दू कोड बिल के जरिए सभी वर्ग की महिलाओं की सामाजिक बराबरी की चिन्ता भी करते है...कानूनविद् के तौर पर बाबा साहब संविधान की रचना करते हैं जिसमें सभी वर्गों के लिए समानता का सपना देखते है...समाज सुधारक के तौर पर हिन्दू धर्म को वैदिक धर्म से अलग करके देखते हैं और ये बताते हैं कि आखिर शूद्रों को दास मानना क्यों गलत है...
समग्र तौर पर देखा जाए तो बाबा साहेब का पूरा दर्शन एक ऐसे भारत की रचना पर केन्द्रित नजर आता है जो भारत आर्थिक तौर पर सशक्त है, मजबूत लोकतन्त्र का केन्द्र है...जहां समतामूलक समाज में अगड़े पिछड़े का कोई भेद नहीं है...जरा ठीक से समझें तो एक आदर्श हिन्दुस्तान का मैप है बाबा साहेब का दर्शन...जो उन्हें किसी भी राष्ट्रवादी से बड़ा राष्ट्रवादी बनाता है...किसी भी संस्कृति के संरक्षक से बड़ा संरक्षक बनाता है....बाबा साहब का दर्शन ही दरअसल सच्चा राष्ट्रवाद है जिसे आज की पीढ़ियों की समझने की जरूरत है क्योंकि बाबा साहेब की शख्सियत एक इतिहास नहीं एक किताब है जिसके हर पन्ने पर हिन्दुस्तान गर्व कर सकता है

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