शुक्रवार, 22 अप्रैल 2016

करप्शन को कौन देता है शह ?

न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के मसले पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस हैदर अब्बास रज़ा से बातचीत के मुख्य अंश
वासिंद्र मिश्र:- पहले हमारे दर्शकों को बताएं कि जज बनने के पहले ज़िंदगी कितनी खुशनुमा थी और जज बनने के बाद उसमें कितने प्रतिबंध गए थे?
जस्टिस हैदर अब्बास रज़ा:- जज बनने से पहले आदमी फ्री बर्ड होता है.. वकालत एक ऐसा पेशा है जिसमें आप आज़ाद हैं और आप के ऊपर किसी तरह का प्रतिबंध नहीं होता है.. लेकिन जज बनने के बाद जब और जज की कुर्सी पर बैठते हैं तो आपके ऊपर बहुत प्रतिबंध लग जाते हैं.. जजों का सबसे बड़ा दुश्मन उसका परिवार और उसके दोस्त होते हैं.. जिनसे उनकी जान पहचान होती है.. इसलिए जजों को एक जो हिंदू बेवा होती है उस तरह से जीवन व्यतीत करना होता है.. और समाज से उसे अलग होकर रहना पड़ता है ताकि किसी का उसके ऊपर कोई प्रभाव ना पड़े.. उस हिसाब से काम करना पड़ता है.. इसीलिए हमलोगों की जो शपथ होती है वो कबीर के दोहे की तरह है.. कबीरा खड़ा बाज़ार में.मांगे सबकी ख़ैर, ना काहु से दोस्ती ना काहु से बैर...
वासिंद्र मिश्र:- सबसे बड़ी बात जो आज आपने कही है कि बिना किसी भय के, बिना किसी पक्षपात के संविधान के अनुरूप जज साहब लोग अगर काम करते रहेंगे तो आम लोगों की आस्था उनके ऊपर बनी रहेगी.. आप जब वकालत करते थे तब भी और जब जज की कुर्सी पर थे तब भी.. आपकी एक अलग छाप थी.. अलग एक image थी.. और वो image pro peoples की... pro labour की.. आपने जज रहते हुए भी तमाम ऐसे फैसले सुनाए थे जो कि आम जनता के हित में था.. और आम मजदूरों के हित में था.. और उसके लिए आप पर कई दबाव भी डाले गए.. कॉर्पोरेट घरानों की तरफ से भी और पॉलिटिकल लोगों की तरफ से भी.. लेकिन आपने जनता के हित को ध्यान में रखा.. मजदूरों के हित को ध्यान में रखा.. और ऐसे घरानों के खिलाफ भी फैसले सुनाए जो देश के नामी-कॉर्पोरेट घरानों में थे.. आज क्या हो गया है कि पूरी की पूरी judiciary की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं.. और कहा जा रहा है कि judges की नियुक्ति से लेकर उनकी functioning तक में interference है political और legislature का.. इसे आप कितना सही मान रहे है.. और क्या इस तरह के आरोपों में सच्चाई है..
जस्टिस हैदर अब्बास रज़ा: असल बात ये है कि जहां तक judiciary का सवाल है.. नीचे की judiciary का.. अधीनस्थ न्यायालयों का.. यहां जो प्रक्रिया होती है जिसमें जज लोग चुने जाते हैं..उसके लिए एक इम्तिहान होता है.. उसको पास करने के बाद आदमी सिविल जज हो जाता है.. और अगर वो 15 साल की सेवा पूरी कर लेता है और 45 साल की age तक पहुंच जाता है तो एक इम्तिहान जो कि हाईकोर्ट लेता है.. उसे पास करने के बाद वो डिस्ट्रिक्ट जज बन जाता है.. ये 15 फीसदी का कोटा होता है.. जजेज का Appointment दो तरह से होता है.. एक जो सिविल जजेज से शुरु होते हैं और एक जो एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज से शुरू होता है.. अब पहले जहां तक संबंध है इस बात का कि जो ज्यूडिशियल सिस्टम हमारे मुल्क में था.. जैसे कि हमलोगों ने वकालत शुरू की.. सन 1962 की बात बताता हूं.. उस समय निचली अदालतों में इक्का-दुक्का ऐसे अफसर होते थे.. जिनकी प्रतिष्ठा या गरिमा के ऊपर अंगुली उठ सकती थी.. लेकिन आम तौर पर ज्यूडिशियरी में ईमानदारी बरकरार थी.. और उसी के अनुसार जज लोग फैसले किया करते थे.. और जो दो-चार ऐसे लोग दिखाई देते थे.. जो चिन्हित हो जाते थे.. ऐसे लोगों के ख़िलाफ़ हाईकोर्ट अपना फ़ैसला करता था.. लेकिन जब समाज में परिवर्तन होता है और भौतिकतावाद का प्रवाह जिस तेजी से बढ़ा है.. तो उस सामाजिक परिवर्तन से समाज में एक होड़ लग गई है.. कि जितनी भी संपत्ति वो अर्जित कर सके वो कर ले ताकि समाज में उसकी प्रतिष्ठा बनी रहे.. और बदकिस्मती की बात ये है कि आज समाज में उन्हीं लोगों की प्रतिष्ठा होती है जो धनवान हैं.. जिनके पास पैसा होता है वहीं अच्छी शिक्षा बच्चों को दिला पाते हैं.. वही अपना जीवन आराम से व्यतीत करते हैं.. तो इस प्रतिस्पर्धा में हमारे जज लोग भी गुमराह हो जाते हैं.. और अब ये बात कही जा सकती है कि जहां पहले भ्रष्टाचार एक अपवाद था वहां अब ईमानदारी खासकर अधीनस्थ न्यायालयों में एक अपवाद बन गई है.. हाईकोर्ट का जहां तक संबंध है ...हाईकोर्ट का अधीनस्थ न्यायालयों के ऊपर पूरा कंट्रोल होता है.. हर जिले के लिए हाईकोर्ट का एक जज इंस्पेक्टिंग जज बनाया जाता है.. और हाईकोर्ट की एक administrative कमेटी होती है.. जब किसी अफसर के खिलाफ कोई शिकायत कोई आम आदमी करता है तो उसके लिए तरीका ये है कि चाहे वो litigant हों या non litigant हों.. कोई अगर शिकायत direct हाईकोर्ट को करता है या इंस्पेक्टिंग जज को करता है तो हाईकोर्ट की कमेटी उसकी enquiry करती है.. तो उस enquiry के बाद अगर प्रथम दृष्टया कोई मामला ऐसा मालूम होता है कि इसमें भ्रष्टाचार है.. या अदालत ने ग़लत फ़ैसले दिए हैं तो उसके ऊपर इंस्पेक्टिंग जज अपनी रिपोर्ट देता है.. या administrative कमेटी उसके ऊपर विचार करती है.. हाईकोर्ट की administrative कमेटी सीनियर मोस्ट जजेज की होती है..administrative कमेटी में जिसके खिलाफ आरोप होता है ..उससे जवाब तलब किया जाता है उसे अपनी बात रखने का मौका दिया जाता है.. इसके बाद administrative कमेटी अपनी सिफारिश फुल कोर्ट को कर देती है.. अब जहां तक सवाल है कि उसके ऊपर एक्शन होना चाहिए.. या नहीं होना चाहिए.. इसका फैसला हाईकोर्ट के फुल कोर्ट में होता है.. फुल कोर्ट अपना निर्णय लेने के बाद उसे चीफ़ जस्टिस के पास भेज देती है.. और फिर इसे सरकार को भेज दिया जाता है.. कि अगर कोई आरोप सिद्ध हुआ है तो सरकार की ओर से उसका नोटिफिकेशन कर दिया जाता है.. और उस अफ़सर के खिलाफ सरकार के नोटिफिकेशन के अनुसार कार्रवाई होती है..
वासिंद्र मिश्र: आपने जो कार्रवाई की प्रक्रिया बतायी.. बहुत अच्छी है.. हम जानना चाहते हैं कि नियुक्ति को लेकर आजकल जो आरोप लगता है कि political interference से नियुक्तियां होती है.. और देश के जो क़ानून मंत्री होते हैं उसकी तरफ से लिस्ट जाती है.. और उस लिस्ट के अनुसार चीफ जस्टिस और collegium पर दबाव बनाया जाता है..इसमें कितनी सच्चाई है.. आप लंबे समय तक हाईकोर्ट में रहे हैं और ज्यूडिशियरी के अलग-अलग पदों पर भी रहे हैं.. क्या ये सच है कि क़ानून मंत्रियों की ओर से सूची जाती है?
जस्टिस हैदर अब्बास रज़ा: इसमें कुछ हद तक सच्चाई है.. पहले ऐसा होता था.. क्योंकि पहले जो नियुक्तियां होती थी हम लोगों के ज़माने में.. उस वक्त हाईकोर्ट का जो चीफ़ जस्टिस होता था.. वो नाम recommend करके गवर्नमेंट को भेज देता था.. गवर्नमेंट का मतलब है गवर्नर साहब के पास.. और स्टेट गवर्नमेंट उस पर इनक्वायरी करके उस मामले को भेज देती थी होम मिनिस्ट्री को.. फिर सीआईडी इनक्वायरी होती थी आईबी की इनक्वायरी होती थी.. और फिर हाईकोर्ट के अंदर appointment होता था.. लेकिन वो जो नियुक्तियां होती थी वो सरकार की तरफ से होता था.. और appointment की जो प्रक्रिया थी उसमें भी सरकार ये ख्याल रखती थी कि चीफ जस्टिस के recommendation के अनुसार ही नियुक्तियां की जाए.. लेकिन यहां ये बात सही है कि कोई अगर लॉ मिनिस्टर है तो वो अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर सकते थे.. और अक्सर ये भी होता था कि अगर किसी स्टेट का कोई चीफ जस्टिस है जो कि सुप्रीम कोर्ट के अंदर है.. तो वो भी यहां के चीफ जस्टिस से कहकर नामों को भिजवा देते थे.. तो ये गड़बड़ थी.. लेकिन पिछले दिनों कुछ इल्जाम जो कुछ लोगों के खिलाफ लगे हैं कुछ मंत्रियों के खिलाफ.. लॉ मिनिस्टर्स के खिलाफ..कि उन्होंने बेजा दबाव बनाकर एप्वाइंटमेंट कराए थे इसीलिए जो कॉलेजियम का सिस्टम बनाया गया.. उसमें कहा गया कि हाईकोर्ट का कॉलेजियम जो नियुक्ति को लेकर जो फैसला करके भेज दे.. और सुप्रीम कोर्ट उसे approve कर दे.. तो उसे सरकार को मानना पड़ेगा.. लेकिन अगर सरकार उसे नहीं करना चाहे तो कॉलेजियम के पास उसे दोबारा भेज सकती है.. लेकिन अगर सुप्रीम कोर्ट पूरी पड़ताल के बाद अगर उसे दोबारा भेज देता है तो फिर सरकार को इसे राष्ट्रपति के पास भेजनी पड़ती है.. system tranparent जरूर है लेकिन इसमें गड़बड़ी भी आई है कि judges के लड़के, उसके रिश्तेदार की जज के तौर पर बड़ी तादाद में नियुक्ति होने लगी है.. पारदर्शिता की जो उम्मीद की जाती है..वो पारदर्शिता रही नहीं.. पहले जजों की नियुक्तियों में सरकार के दखल की संभावना थी और अब judges अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर अपने रिश्तेदारों को जज बनाने की कोशिश करते हैं.. चुंकि हाईकोर्ट में भी तीन जजों का कॉलेजियम होता है.. सुप्रीम कोर्ट में भी तीन या चार जजों का कॉलेजियम होता है.. तो ऐसी संभावना हो सकती है कि जजों की नियुक्ति में गड़बड़ी हो सकती है..
वासिंद्र मिश्र: माना जाता है कि कांग्रेस का जब शासन रहता है तो ज्यादा interference रहता है.. हंसराज भारद्वाज कांग्रेस की सरकारों में लंबे समय तक क़ानून मंत्री रहे हैं.. वे अपने चहेतों को हाईकोर्ट का जज बनवाते रहे.. इसमें कितनी सच्चाई है.. आपका इसमें क्या अनुभव है?
जस्टिस हैदर अब्बास रज़ा: देखिए.. उनकी reputation उस बारे में अच्छी नहीं रही है.. इसमें कोई शक नहीं है..लेकिन एक बात में आपको बता दें कि सिर्फ कांग्रेस को लोगों को appointment कराने में उनकी दिलचस्पी नहीं होती थी.. उनकी दिलचस्पी जो है दूसरे जरियों से होती थी.उनमें बहुत से नॉन कांग्रेसी लोगों के भी appointment हुए हैं.. उनके ज़माने में कांग्रेसी लोगों की नियुक्ति कम हुई जबकि नॉन कांग्रेसी की नियुक्तियां ज्यादा हुई हैं..
वासिंद्र मिश्र: हैदर साहब एक व्यक्तिगत सवाल आपसे है.. और वो ये है कि आपके कांग्रेस और लेफ्ट से करीबी रिश्ते रहे.. आपको जज बनाने में भी कहा जाता है कि इन दोनों पार्टियों का काफी रोल रहा है.. इसमें कितनी सच्चाई है..
जस्टिस हैदर अब्बास रज़ा: देखिए.. जिस ज़माने में मेरा अप्वाइंटमेंट हुआ था.. तीन चीफ़ जस्टिस ने लगातार मेरे नाम का recommendation किया था.. और चुकिं मैं बहुत दिनों तक कांग्रेस के अंदर रहा था.. तो आपस की जो गुटबाजी होती थी.. उसकी वजह से मेरे appointment में पांच-सात साल की देर हो गई.. तो वो देरी की वजह ये नहीं थी कि कुछ लोग मुझे करना चाहते थे.. बल्कि आपसी गुटबाजी की वजह से लोग मुझे ब्लॉक करना चाहते थे.. लेकिन जब चीफ़ जस्टिस ने लगातार मेरे नाम भेजे तो उसके बाद मेरा अप्वाइंटमेंट हो गया.. लेकिन आप ये गौर कीजिए कि जब एक आदमी जज की कुर्सी पर बैठ जाता है तब उसकी ईमानदारी, उसकी निष्ठा, उसकी विचारधारा जो है वो जनता के सामने होती है... open कोर्ट में फ़ैसले होते हैं.. लेकिन भगवान की कृपा से मेरे ऊपर कभी कोई इल्जाम नहीं लगा कि मैनें किसी पार्टी को या किसी व्यक्ति को फेवर किया हो.. या उनके साथ मैंने कोई बेइंसाफी की हो..
वासिंद्र मिश्र: हमारी बातचीत की जब शुरुआत हुई तभी हमने कहा कि आपकी इमेज एक जज के रूप में pro peoples और pro labour रही है.. और आपने हमेशा आम लोगों और मजदूरों के हितों को ध्यान में रखकर फैसले किए.. जज के रूप में आपका जो ट्रैक रिकॉर्ड रहा है वो बेदाग रहा है.. और हम सबको इस बात को लेकर फक्र है.. क्योंकि हम सब आपको पहले से जानते रहे हैं.. एक सवाल जो अब उठा है कि करप्शन को लेकर judiciary में दो तरह का parameter क्यों है? वही भ्रष्टाचार का आरोप जब lower judiciary के किसी अधिकारी पर लगता है तो उसके विरुद्ध तुरंत कार्रवाई हो जाती है.लेकिन हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों के खिलाफ जब भ्रष्टाचार का आरोप लगता है तो उनके विरुद्ध कार्रवाई नहीं होती है किसी किसी तरह उसे ठंडे बस्ते में डाल दी जाती है.. तो morality ये डिमांड नहीं करती है कि जिस तरह से lower judiciary के खिलाफ कार्रवाई होती है वैसे ही हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जजों के खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए..
जस्टिस हैदर अब्बास रज़ा: देखिए-- उसके कई तरीके हैं उसको कंट्रोल करने के.. एक तरीका तो आपस में संवाद करने का है..जैसे हमारे इलाहाबाद हाईकोर्ट के सम्मानीय जज साहब थे एक सम्मानीय खानदान से उनका संबंध था.. उनका appointment होने के बाद उसका बॉम्बे ट्रांसफर कर दिया गया.. और बॉम्बे ट्रांसफर करने के बाद उसके खिलाफ कुछ कंपनी एक्ट के तहत केसों में खबरें आई.. और सबूत चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के पास पहुंचे कि उन्होंने मामलात में गड़बड़ी किया है.. तो चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया खुद मुंबई गए.. और उनको कहा कि आपको पास दो option है.. या तो आपका ट्रांसफर सिक्किम कर रहे हैं वहां चला जाइए.. या आप इस्तीफा दे दीजिए.. चुकिं वो राजनीति में रहना चाहते थे.. और राजनीतिक फैमिली से उसका संबंध था.. तो उन्होंने कहा कि मैं इस्तीफा देना पसंद करूंगा.. उन्होंने इस्तीफा दे दिया.. और फिर वो राजनीति में रहे और बड़े-बड़े पदों पर भी रहे.. तो एक तो ये तरीका है जिसमें चीफ़ जस्टिस ऑफ़ इंडिया अपने अधीनस्थों से इस्तीफा दिलवा देते थे.. या उनका ट्रांसफर दूसरे जगहों पर कर देते थे.. अब जो सवाल है कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज के खिलाफ क्या कार्रवाई होती है.. तो हमारे संविधान में कहा गया है कि न्यायालय की जो सार्वभौमिकता है वो बनी रहे उसके ऊपर कोई हस्तक्षेप ना हो.. तो किसी हाईकोर्ट के जज के ऊपर या सुप्रीम कोर्ट के जज के ऊपर कोई आरोप लगता है तो उनकी इनक्वायरी सुप्रीम कोर्ट की एक कमेटी करती है.. और इसकी रिपोर्ट जब सरकार के पास भेजती है तब impeachment की कार्रवाई उसके खिलाफ होती है.. judiciary को एक independent organisation के रूप में फंक्शन करने के लिए संविधान में रखा गया था.. और यही कारण है कि आज भी हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट की जो प्रतिष्ठा है.. और लोगों की उसके ऊपर जो आस्था है.. जो विश्वास है कि यहां उन्हें इंसाफ मिल सकता है.. वो अभी जनता में बरकरार है.. कोर्ट की प्रतिष्ठा जरूर कुछ धूमिल हुई है.. लेकिन impeachment के तरीके को अगर बदल दिया जाए तो फिर उसके अंदर गड़बड़ी होगी इसलिए ये कोशिश हो रही है कि एक ऐसा कमीशन बने जो कि appointment और ट्रांसफर जैसी बातों का फ़ैसला कर सके.. ताकि लोगों का विश्वास हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट पर बना रहे..
वासिंद्र मिश्र: हैदर साहब मुझे लगता है कि आप महाराष्ट्र के जिस जज साहब की बात कर रहे थे.. शायद विजय बहुगुणा जी का बात कर रहे थे.. उनका नाम आप नहीं ले रहे थे..विजय बहुगुणा जी बाद में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री भी बने.. उसी कांग्रेस पार्टी की कृपा से.. और आजकल कांग्रेस पार्टी के सबसे बड़े नासूर बने हुए हैं उत्तराखंड में.. और सरकार गिरवाने में भी उनकी अहम भूमिका रही है.. आपसे बातचीत में एक बात जो उभर कर रही है कि impeachment लोकसभा में गिर गया पार्लियामेंट के अंदर.. तो क्या जो आरोप लगते रहे हैं समय-समय पर कि विधायिका और न्यायपालिका के बीच में एक बहुत बड़ा वर्ग है जो करप्शन को संरक्षण देता रहा है.. प्रमोट करते रहा है..और इन लोगों को गठजोड़ है.. जो इन मुद्दों को कारपेट के अंदर रखना चाहते है या करप्ट लोगों को संरक्षण देकर बचाते रहा जाए.. यही कारण था कि impeachment मोशन भी पार्लियमेंट में गिर गया..
जस्टिस हैदर अब्बास रज़ा:-Impeachment मोशन जो गिरा.. उस जज साहब के ख़िलाफ़ कोई सीरियस इल्जाम नहीं थे.. एक बात तो जरूर था कि उनका संबंध एक बड़े परिवार से था.. और तमिलनाडु के जो बड़े नेता लोग थे.. उससे संबंधित भी थे इसमें कोई शक नहीं है.. लेकिन उस ज़माने में पंजाब terrorist stateथा.. और वहां के चीफ़ जस्टिस को कुछ खास रियायतें दी गई थी.. तो उन रियायतों का उन्होंने बेजा इस्तेमाल करने का उसके ऊपर आरोप था.. जिसकी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने उसके खिलाफ फैसला लिया.. और ज्यूडिशियल कमेटी ने उस फैसले को impeachment के लिए भेजा.. लेकिन impeachment की मुखालफत कांग्रेस की ओर से की गई जिसकी वजह से impeachment मोशन गिर गया...
वासिंद्र मिश्र:- सवाल उठते रहता है कि जाति के आधार पर संप्रदायिकता के आधार पर ज्यूडिशियरी में रिप्रजेंटेशन होना चाहिए.. और खासकर मंडल फोर्सेस है जो. सोशल जस्टिस की बात करने वाले लोग हैं.. जो अल्पसंख्यकों को empower करने के हिमायती लोग हैं.. उनकी तरफ से अक्सर ये सुनने को मिलता है कि ज्यूडिशियरी में उनके क्लास,कास्ट का रिप्रजेंटेशन नहीं है.. इसलिए उनके साथ नाइंसाफी होती है.. क्या आप इस बात के हिमायती है.. पक्षधर है कि न्यायपालिका में जाति या संप्रदाय के आधार पर रिप्रजेंटेशन होना चाहिए..
जस्टिस हैदर अब्बास रज़ा: देखिए democracy के बारे में दो विचारधाराएं हैं.. एक तो विचारधारा ये है कि majority के फैसले पर अमल होना चाहिए.. और दूसरा डेमोक्रेसी का सवाल है कि रिप्रजेंटेटिव डेमोक्रेसी होनी चाहिए.. ऐसा डेमोक्रेसी होनी चाहिए जिसमें हर जात, धर्म और संप्रदाय को लोग होनी चाहिए.. हमारे मुल्क में पहले ऊंचे तबके के लोक वकालत करते थे और ज्यादातर वही लोग जज बनते थे.. तो उसके अंदर एक complex होता था ..लेकिन जब हमारा देश आजाद हुआ और एक नया संविधान बना.. और ये विचार हुआ कि हर वर्ग बराबर है.. और हरेक को हिस्सा मिलना चाहिए तो मांग उठने लगी कि जो नीचे तबके के लोग हैं जो पिछड़ गए है्ं जो दलित हैं.. उनको भी रिप्रजेंटेशन मिले.. तो कहने का मतलब ये है कि उसमें एक सामंजस्य रखने की जरूरत है...
वासिंद्र मिश्र : धन्यवाद

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