शनिवार, 30 अप्रैल 2016

2019: मोदी को लग ना जाए नीतीश का तीर


चुनावी सियासत भी बड़ी दिलचस्प चीज है... कभी बयानों से सियासी पारा चढ़ता है तो कभी वादे इस पारे को चढाते गिराते रहते हैं .....कुछ ऐसा ही माहौल बना जब शरद पवार ने 2019 की लड़ाई नीतीश बनाम मोदी होने की बात कही..हालांकि बाद में वो कुछ संभले भी लेकिन बात निकली तो दूर तलक चली गई..और एक बार फिर सियासी गलियारों में गैर कांग्रेसी-गैर बीजेपी गठबंधन का शिगूफा तैरने लगा ..लेकिन सवाल ये कि कितना कारगर है ये फॉर्मूला वो भी तब जबकि महज एक दबाव है वो भी सिर्फ सीबीआई का ...ये ऐसा दवाब है जो पूरे गठबंधन को बिखेर कर रख देता है... confrontation और compromise के बीच झूलते सियासी दौर में क्या 2019 में चुनाव मोदी बनाम नीतीश होगा ?

2019 की जंग में अभी तीन साल का वक्त बाकी है...लेकिन अभी से इसकी ज़मीन तैयार करने की कोशिशें तेज़ हो गई हैं.. गैर बीजेपी-गैर कांग्रेसी गठजोड़ की ये चर्चा नई नहीं है लेकिन दिलचस्प इस बार ये है कि गठजोड़ में कौन शामिल होगा कौन नहीं... इससे पहले ही...ये तय करने की कवायद तेज हो गई है कि इसका नेता कौन होगा...औऱ सबसे आगे निकले हैं नीतीश कुमार ...तो क्या NDA के खिलाफ विपक्षी दलों को एकजुट करने की बिहार के सीएम नीतीश कुमार की अपील असर दिखाने लगी है ...क्यों NCP के अध्यक्ष शरद पवार ने इशारों-इशारों में नीतीश को मोदी का विकल्प बता दिया .. बाद में उन्होने संभलते हुए अपना बयान बदला भी लेकिन सियासत की एक और नई दिशा का संकेत तो दे ही गए

कहते हैं सियासत में हर रिश्ता नफे नुकसान की कसौटी पर ही कसा जाता है...और शरद से बेहतर इसका उदाहरण देश की राजनीति में शायद ही कहीं मिले....जानकार भी मानते हैं कि शरद पवार की political bargaining का कोई सानी नहीं...नीतीश का समर्थन भी उनकी इसी रणनीति की एक झलक भर है ..लेकिन ये pressure politics कितनी कारगर होगी ये 2019 में ही साफ होगा


वैसे तो देश में लगभग हर चुनाव से पहले गैर कांग्रेस-गैर बीजेपी गठबंधन की बात अब फैशन सी बनती जा रही है ..ये और बात है कि हर बार बात बनते बनते ही रह जाती है..अब एक बार फिर शरद पवार ने तमाम सियासी दलों को आगाह करने की कोशिश की है कि अगर एकजुट नहीं हुए तो फिर मौका नहीं है ... ये सुगबुगाहट इस बार नीतीश के बयान से तेज हुई थी जब नीतीश ने संघमुक्त भारत बनाने की बात की थी .. इसके बाद बयानों की बाढ आ गई ... 2019 को ध्यान में रखते हुए बात गैर बीजेपी गठबंधन की हो रही है .. देश की कमान संभालने की हो रही है और जाहिर है जब बात देश का नेतृत्व करने की निकली है जो जितने दल उतने ही नेतृत्व भी आकर खड़े गए हैं ...और शायद यही देश के इस तीसरे मोर्चे की सबसे बड़ी कमजोरी रही है जिसका फायदा बीजेपी और कांग्रेस को मिलता रहा है ..

वहीं ऐसे फॉर्मूले के फेल होने की कई और वजहें भी हैं...सबसे अहम तो है गैर बीजेपी दलों के नेताओं के दागदार दामन ...जिसपर किसी न किसी तरह के भ्रष्टाचार के छीटें हैं...जाहिर है जैसे ही गठबंधन शक्ल लेने की कोशिश में होता है या फिर कोई केन्द्र को confront करने की कोशिश करता है तो सीबीआई का डंडा ऐसा घूमता है कि उसे compromise करना पड़ जाता है और गठबन्धन बनने से पहले ही बिखराव हो जाता है

हालांकि नरेन्द्र मोदी के खिलाफ नीतीश कुमार का कार्ड दूसरे नेताओं के मुकाबले कहीं ज्यादा
कारगर साबित हो सकता है क्योंकि मोदी की तरह ही नीतीश के पास खोने के लिए कुछ नहीं है ...न ही पारिवारिक दबाव औऱ न ही छवि पर सवाल ... आज तक नीतीश अपना दामन पाक साफ बनाए रखने में कामयाब रहे हैं .. दूसरी सबसे अहम बात है कि लालू औऱ मुलायम की तरह उन्हें भी पारिवारिक दवाब से नहीं जूझना पड़ता ... ये लोग अपने कुनबे को संयोजित और समायोजित करने में ही परेशान हैं .. इनके political ambition पर इनका अपना कुनबा ही भारी पड़ता है .. कुनबा सिंड्रोम में रहने वाले कभी confront नहीं कर पाते चाहे वो करुणानिधि हों या फिर मुलायम या लालू यादव.. जो कुनबा सिंड्रोम से बाहर हैं वो confront कर रहे हैं फिर चाहे वो ममता हों, जयललिता हों या मायावती.. नीतीश हों या नवीन पटनायक

आज की तारीख में नीतीश का कुछ भी stake पर नहीं है .. शायद इसीलिए नीतीश ने बड़े दल के साथ गठबंधन में रहते रहते राजनैतिक तौर पर पहचान की लड़ाई लड़ने से खुद को अलग करना बेहतर समझा ... कभी धुर विरोधी रहे लालू के साथ आने का रिस्क लिया और इसमें कामयाबी भी हासिल की .. अब नरेंद्र मोदी की ही तरह नीतीश regional leader के तौर पर जो achieve कर सकते थे वो कर चुके हैं ... लेकिन नीतीश की जो संघमुक्त भारत की महात्वाकांक्षा है वो देश में बड़े राजनीतिक आंदोलन की ओर इशारा करता है .. हालांकि देश में अभी ये माहौल नहीं है ... राजनैतिक इतिहास में जब भी ऐसे बदलाव हुए हैं वो परिस्थिजन्य हुए हैं ... कैसे भी बदलाव के लिए उस तरह के माहौल की जरूरत होती है .. और ऐसे में इस वक्त सिर्फ लिप सर्विस की जा रही है ..
 

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