बुधवार, 30 मार्च 2016

क्या बेदाग हैं अमिताभ बच्चन ?

राजनीति के सबसे माहिर खिलाड़ियों में से एक पूर्व राज्यसभा सांसद अमर सिंह
के साथ इंडिया 24x7 के संपादक वासिंद्र मिश्र की सियासत की बात

वासिंद्र मिश्र- नमस्कार आज के इस खास प्रोग्राम में आपका स्वागत है,  आज हमारे खास मेहमान हैं अमर सिंह जी, अमर सिह जी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं इन्हें पूरा देश जानता है। दुनिया के कई अलग-अलग देशों में रहने वाले लोग इनको जानते हैं, भारत से जिनका सरोकार रहा है। अमर सिंह एक ऐसी शख्सियत हैं जिन्हें कॉर्पोरेट, मीडिया और राजनीति इन तीनों क्षेत्रो की गहराई से जानकारी है, और इन क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों के बारे में भी खासी जानकारी है। तो, आज हम इनसे इन्हीं तीन क्षेत्रों के बारे में जानेंगे कि इनका क्या अनुभव रहा है और अभी जो सरकार चल रही है उसकी पॉलिसी को लेकर इनका अभी तक का क्या अनुभव है? अभी पिछले 2 -ढाई सालों में । अमर सिंह जी, सबसे पहले जो मीडिया, कॉर्पोरेट और पॉलिटिक्स का गठजोड़ रहा है उसके बारे में आपकी राय जानना चाहते हैं,  कि ये जो नेक्सस है हमारे देश में किस तरीके से काम कर रहा है और ये कितना प्रभावित करता है गवर्नेंस को या सरकार को ?
अमर सिंह- देखिए, ताकत दो तरह की होती है, मनी की और मसल्स की। लेकिन जब देश का संविधान बना तो इन्होंने मनी और मसल्स की जगह तीन ताकतों की निर्मिति की। विधायिका, न्यायपालिका और फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन कह लीजिए, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कह लीजिए.. उसकी व्यापकता में मीडिया आ गया । तो फिर मनी और मसल को लगा कि हमारा क्या होगा। तो मनी और मसल की विधायिका और मीडिया में प्रविष्टि हुई। विजय माल्या हों या फिर दूसरे कोई उद्योगपति हों, बड़े उद्योगपतियों की हम बात कर रहे हैं। धन कमाने के बाद उनकी अदम्य इच्छा होती है, अभिलाषा होती है कि हमारा राज्यसभा में नामांकन हो जाए या हमको राज्यसभा मिल जाए, और मीडिया और कॉर्पोरेट के बारे में आप पूछना चाहते हैं, तो आप जानिए कि, एक चैनल के कार्यक्रम में किसी दूसरे चैनल के बारे में बात करना उचित नहीं होता
वासिंद्र मिश्र- नहीं बगैर नाम के ही आप बताईए।
अमर सिंह- बगैर नाम लिए इसलिए बताना चाहूंगा कि, इस देश के 2 बड़े अखबार हैं, एक अख़बार अब स्वतंत्र हो गया है, क्योंकि उसके पास उस अख़बार के अलावा कुछ है ही नहीं। लेकिन, मूल रूप से बहुत बड़ा एक औद्योगिक समूह था उसकी ढाल के रूप में वो अखबार शुरू हुआ। दूसरे अखबार की भी कहानी यही है। देश में बहुत बहुत कम मीडिया वाले हैं, जिनका कोई उद्योग नहीं है। उत्तर प्रदेश के एक बहुत बड़े मीडिया ग्रुप के मालिक, कानपुर से जिनका संबंध है, हमारे दल में सांसद रहे और उनके परिवार के कुछ लोग बीजेपी से भी रहे, एक चीनी मिल लगाकर परेशान हो गए। क्योंकि राजनेताओं ने उस चीनी मिल की तुला पर उनको कई बार तोलने का प्रयत्न किया, तो वो चीनी मिल बेच-बांचकर अलग हो गए। अब वो मीडिया में बढ़ रहे हैं, मेरा बचपन कलकत्ते में बीता है वहां, एक बहुत बड़ा मीडिया समूह है, बंगाल का, नाम नहीं लूंगा। उन्होंने भी टीवी चैनल और मीडिया में ही काम किया । मीडिया के अलावा किसी उद्योग में वो नहीं गए। ममता बनर्जी के उत्थान में भी उनका हाथ रहा, ज्योति बसु से लड़ पड़े और ब्रह्मा के रुप में जिस तरीके से ममता बनर्जी की पूरी छवि की निर्मिति की, शिव के रूप में उसके पूरे तांडव में लगे रहे। ऐसा वो इसलिए कर पा रहे हैं क्योंकि उनका कोई धंधा नहीं है, उनका कोई अस्पताल नहीं है या ऐसा कोई उनका मिल कारखाना नहीं है जिसमें प्रदूषण के नाम पर कुछ किया जा सके। अब अखबार का क्या करेंगे? अगर आपका सर्कुलेशन है, अगर आपका पाठक हैं तो उनका क्या करेंगे ? तो, मूल रूप से मैंने जो अपने उत्तर के आरंभ में कहा था कि मनी और मसल....इसने जो भारत के संविधान ने, जहां आप साक्षात्कार ले रहे हैं उसको मैंने पीछे लगा रखा है और रोज पढ़ता हूं उसको अपने जीवन के मंत्र के रूप में।  तो उस प्रारुप के अंदर प्रविष्टि के लिए लोगों ने इसमें प्रवेश किया है। इसके लिए हम लोग भी गुनहगार हैं, अगर आप कहें कि अमर सिंह आप साधु हैं, तो बिल्कुल नहीं। हमसे भी गलती हुई है, हमने भी क्रोनी कैपिटलिज्म किया है। अनिल अंबानी हमारे दोस्त थे, उन्होंने मदद ली तो हमने मदद की। ये अलग बात है कि गलत काम नहीं किया। उत्तर प्रदेश में अनपारा नाम का एक प्रोजेक्ट वो चाहते थे, मैंने बहुत कोशिश की उनको दे दें। लेकिन, बिडिंग हुई तो उसमें लैंको जीत गया वो हार गए। तो उन्होंने कहा कि लैंको का कैंसिल कर दीजिए और हमको फिर मौका दीजिए तो हम बोले, ये हम नहीं करेंगे। क्योंकि हम तो चाहते थे कि आपको मिल जाए। 
वासिंद्र मिश्र- यूपी के बारे में और बाकी इंडस्ट्रियलाइजेशन के बारे में अभी बात करेंगे विस्तार से। हम थोड़ा मीडिया को और आगे ले चलते हैं इस डिस्कशन में, हम ये जानना चाहते हैं कि ये जो मीडिया का कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंट्रेस्ट होता है कॉर्पोरेट्स का, जब वो मीडिया में आते हैं तो उनका एक वेस्टेड एजेंडा होता है, एक टारगेट होता है।
अमर सिंह- जितने मीडिया हैं अभी, आप लोगों का समूह छोड़कर। अगर सार्वभौमिकता से कह दें की जितने मीडिया हैं, क्योंकि आपके मीडिया का जो मालिकाना है,वो बिल्कुल स्पष्ट है, एकदम पारदर्शी हैं और उनके कृत्य भी पारदर्शी हैं। अगर वो मीडिया में हैं,  तो हैं, और मूल रूप से उनकी पहचान मीडिया के रूप में है वो कम से कम  जो प्राइवेट चैनल देश में आए, उसके सबसे बड़े प्रणेता वो रहे हैं और उसके पहले कोई नहीं रहा। दूसरे लोग आए और बुल्ले की तरह बैठ गए और घाटा हो गया या बैंकों का ऋण लिया या इक्विटी के नाम पर बड़े-बड़े औद्योगिक समूहों को ....फिर वो मजबूरी है कि हम उनका नाम नहीं ले सकते। ना उन उद्योगपतियों का, ना उन मीडिया चैनलों का। लेकिन बता दीजिए, कि एक भी ऐसा मीडिया चैनल हो जहां बड़े-बड़े जो नाम हैं, चाहे अडानी हों, अंबानी हों या बिरला हों, जो खुलेआम जिसमें इक्विटी के रूप में या किसी रूप में शामिल ना हों। 
वासिंद्र मिश्र- तो, इसका मतलब साफ है कि पहले वो लोग मीडिया के बिजनेस में आते हैं बैकडोर से और फिर सरकारों को प्रभावित करते हैं और अपने मुताबिक नीतियां बनवाते हैं सरकारों से।
अमर सिंह- देखिए, यहां पर मैं ये कहूंगा कि, ये एक पक्ष है, वो कई चीजों के लिए मीडिया में आते हैं।  वो इसलिए भी आते हैं कि अगर उनपर हमला हो तो वो उस हमले का भी जवाब दे सकें। एक प्रसिद्ध उद्योगपति भले ही एक मीडिया चैनल खोलकर बैठे हों और उसे कोई ना देखता हो, जीरो टीआरपी हो, लेकिन वो इसलिए खोलकर बैठे हैं कि वो जवाब दे सकें। कुछ लोग हथियार के रूप में मीडिया की निर्मिति करते हैं। और तो और अभी कई अधिकारी हैं जो गलत तरीके से पैसा कमा लेते हैं, कई चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं जिनके आयकर विभाग में जिनके संबंध होते हैं और जो सूचना देते हैं बड़े-बड़े उद्योगपतियों को कि आपके यहां आयकर विभाग की रेड होने वाली है  हटा लो। तो, ऐसे लोग उस सटीक सूचना के बदले में लंबा पैसा लेते हैं। वो भी मीडिया टायकून हैं। तो, हर आदमी जो है वो नंगा है किसी ना किसी रूप में, उसके लिए मीडिया एक कपड़ा है, एक आवरण है उसके नंगेपन को, उस भौंडेपन को ढकने के लिए, छुपाने के लिए।
वासिन्द्र मिश्र - जो लोग सरकार में बैठे हैं, अगर वो भी ऐसी ताकतों से मदद लेकर सत्ता तक पहुंचते हैं तो उनसे कितनी उम्मीद की जाए इस बारे में ?
अमर सिंह- देखिए, इस बारे में मै आपको बताऊं, कि मैं पिछले 15 सालों से नरेंद्र मोदी को बहुत अच्छी तरह से जानता हूं और मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मेरा ये अनुभव रहा है कि अगर आप उन्हें 12 बजे फोन कीजिए तो 1 बजे उनका उत्तर आ जायेगा। अगर आप कुछ बात उनसे कहें तो करने लायक होगा तो वो डेढ़ बजे तक कर देंगे और नहीं करने लायक होगा तो वो 2 बजे तक बता देंगे कि हमसे नहीं होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सिर्फ एक बार मेरी उनसे फोन पर बात हुई नवंबर के महीने में, उसके बाद से वह नरेंद्र मोदी जिन्हें मैं जानता था उनसे मेरा 
दूर-दूर तक कोई संपर्क नहीं है। अपने स्तर पर अगर मैं इतना व्यस्त हूं तो उनकी मैं व्यस्तता समझ सकता हूं। पहले बात होती थी इसलिए वो अच्छे थे और अब बात नहीं होती इसलिए वो बुरे हैं, तो ये एक निषेधात्मक सोच हो गई।  मैं ये कहना चाहूंगा कि ऐसा मुझे पहली बार लगता है कि देश का जो तलपट है, देश की जो बैलेंसशीट है उसका धन किसी बड़े धनपशु के तलपट में ट्रांसफर नहीं हो रहा है। एक बड़े औद्योगिक समूह के गैस के दाम को यूपीए सरकार ने अपने जाते-जाते 8 डॉलर कर दिया था चुनाव के समय। दिल्ली के नेता अरविंद केजरीवाल वगैरह 2 उद्योगपतियों का नाम लेते थे कि आगे वो पीछे वो। तो, उनके अस्पताल का उद्घाटन करने तो मोदी जी चले गए लेकिन उसके दूसरे दिन 8 डॉलर का जो रेट तय किया था यूपीए की सरकार ने....उसे 5 से दशमलव 12 डॉलर कर दिया और उसका भी लाभ उनको नहीं मिला। क्योंकि कहा कि आपको जो ठेका दिया गया है जितने गैस उत्खनन का वो गैस उत्खनन भी उसी पुराने मूल्य पर ही होगा। और जो पूरे देश-दुनिया में जो छवि थी उस औद्योगिक समूह की...  कि ये औद्योगिक समूह इनडिसिपल है, अपरिहार्य है, सरकार ये बनाता है, सचिव उसको रिपोर्ट करते हैं। अपने से संबंधित विभाग में मंत्री की नियुक्ति यही करता है, सचिव भी इसकी जेब का व्यक्ति आता है, इसको चकनाचूर इस सरकार ने किया। बजट से पहले औद्योगिक घरानों के लोग संवेदनशील कागजों की चोरी करते थे, जासूसी करते थे। पहली बार इस बात से बेखबर, बेपरवाह कि कितने बड़े-बड़े लोग इस दायरे में आएंगे और पकड़े गए। एक दूसरे अहमदाबाद के उद्योगपति जो ये दावा करते थे कि रोज सबेरे, दोपहर, शाम हमारा कलेवा और नाश्ता होता है। स्टेट बैंक का 1 लाख करोड़ का ऋण दिया गया है,उसका प्रचार हुआ तो वो ऋण भी निरस्त हो गया। तो, नरेंद्र मोदी की आप सौ बुराई कर लें, लेकिन हमारे यहां यूपी में जो कहावत है कि ना मेहरारू ना लइका, चली द्वारिका। तो, जिसकी मां एक छोटे कमरे में रहती हो, पत्नी भले ही बहुत संपर्क उनका ना रहा हो जशोदाबेन से। लेकिन, वह गुजरात रोडवेज की बस से चलती हो। जिसके भाई अभी भी सामान्य छोटा काम कर रहे हों, वो वहीं तक सीमित रह गए हों, उसे आप भ्रष्ट तो नहीं कह सकते, चाहकर भी नहीं कह सकते। अगर हमारे मन में ये भाव हो कि हम भ्रष्ट कहें तो कहें कैसे। मैं ये नहीं कह रहा हूं कि मैं नरेंद्र मोदी की तरफदारी कर रहा हूं लेकिन मैं ये भी कहूंगा कि नरेंद्रमोदी जी को देखने के लिए जो लोग टीवी चलाते थे पहले, आजकल ज्यादा लोग नहीं, कुछ ही लोग हैं ऐसे जो उनको देखकर टीवी बंद भी कर देते हैं। ये भी कारनामा है। 
वासिंद्र मिश्र- तो, इसका मतलब क्रेडिबिलिटी में कहीं ना कहीं इल्यूज़न तो हो रहा है, क्षरण तो हो रहा है। 
अमर सिंह- वो इसलिए हो रहा है कि, हमारे देश में लोग बहुत त्वरित गति से काम चाहते हैं। राजनीति या विकास कोई स्लोटिंग मशीन तो है नहीं कि सिक्का डाला और नीचे से कार्ड आ जाएगा। हम लोग भी उद्यमी हैं, उद्योग करते हैं, तो पहले जमीन लेते हैं। जमीन लेने से पहले किसानों से जद्दोजहद होती है,फिर प्लांट और एसेसरीज का ऑर्डर करते हैं, इंजीनियर को बुलाते हैं फिर उसका निर्माण होता है और निर्माण में इतनी ट्रबल होती है तो तीन चार साल लग जाता है। तो ये तो यही है कि कोई चाहे कि, आज ही हमने प्रयत्न किया और कल बच्चा हो जाए, तो नौ महीने का तो... उसका भी एक समय है, तो चाहे कोई भी प्रोजेक्ट हो। अब उदारीकरण की बात आप ले लीजिए, तमाम लोग कांग्रेस के बारे में जो भी कुछ कहें, चाहे आदरणीय मोदी जी हों, जेटली जी हों, लेकिन डॉ मनमोहन सिंह जी को नहीं भूलना चाहिए। 
डॉ मनमोहन सिंह ने अगर उदारीकरण ना किया होता... सोना गिरवी रखा गया था, चंद्रशेखर जी हमारे मित्र थे । हमें अपने देश सोना गिरवी रखना पड़ा था हमारी इतनी खस्ता हालत थी और उदारीकरण जब हुआ तो देश के जितने बड़े टॉप टेन थे, इसमें मफतलाल हों, तमाम लोग हैं, पूरा बॉम्बे क्लब बन गया था। जैसे श्रमिकों का यूनियन बनता है संगठन बनता है उसकी तरह उद्योगपतियों का संगठन बन गया था और वो ज्यादा प्रगतिशील हो गए थे। अब आप देखिए की तमाम गाड़ियां यहां आ गईं, जगुआर यहीं बन रही है। पहले अंबेस्डर और फिएट ही थीं। 
वासिंद्र मिश्र- एक और है इसी विषय से थोड़ा जुड़ा हुआ है, पॉलिटिकल हिप्पोक्रेसी और पॉलिटिकल फंडिंग । आप चूंकि हर बात बहुत बेबाकी से कहते हैं जब आप समाजवादी पार्टी में थे तब भी और जब समाजवादी पार्टी ज्वाइन नहीं किया था तब भी। आपके तमाम राजनीतिक पार्टियों, राजनेताओं से बहुत अंतरंग रिश्ते थे बॉलीवुड से थे और कॉर्पोरेट से भी थे। समाजवादी पार्टी में रहते हुए आपने जो भी काम किया अच्छा -बुरा।चाहे उत्तर प्रदेश का विकास हो, चाहे यादव परिवार का विकास हो या समाजादी पार्टी का विकास हो.. सबमें आपका विशेष योगदान रहा। लेकिन, जब एसपी से आपके रिश्ते खराब हुए तो आप पर आरोप लगे कि आप पार्टी का जो मूल सिद्धांत था आप उससे पार्टी को और यादव परिवार को डिरेल कर रहे थे, तो इन आरोपों को आप कितना जायज मानते हैं। कि पॉलिटिकल हिप्पोक्रेसी, कि जब आपको पैसा इकट्ठा करना हो या धनोपार्जन करना हो तो आपको अमर सिंह चाहिए और जब आपका काम निकल जाए, आपको सत्ता मिल जाए तो आप कुर्ते की कॉलर झाड़िए और कहिए कि हम तो बेदाग हैं और हमे नहीं पता था कि चुनावी चंदे के लिए गुटखा व्यापारियों ने पैसा जुटाया या रियल एस्टेट कारोबारियों ने, तो आप इस पॉलिटिकल हिप्पोक्रेसी को कितना जायज मानते हैं और इससे कितना नुकसान हो रहा है डेमोक्रेसी का । 
अमर सिंह- पहली बात तो मैं ये बता दूं कि समाजवादी पार्टी में मेरे प्रवेश से पहले राजबब्बर सांसद हुए थे और राजबब्बर इंसाफ का तराजू में पद्मिनी और जीनत अमान के साथ बलात्कार के दृश्यों के चलते बहुत बड़े स्टार बन गए थे। स्मिता पाटिल के साथ उनकी कई फिल्में रिलीज हुई थीं, बहुत ग्लैमरस थे बहुत सुंदर नायक थे। आज वो कांग्रेस में हैं। तो राजबब्बर को समाजवादी पार्टी में मैं नहीं लाया। विष्णुहरि डालमिया जो विश्व हिन्दू परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे, उनके सुपुत्र संजय डालमिया समाजवादी पार्टी के खजांची थे और वो सांसद हमसे 
पहले बन गए थे। तो ये संस्कृति मैं लाया ऐसा सबने नहीं कहा, सिर्फ समाजवादी पार्टी के परिवार के एक व्यक्ति और एक नेता ने मुझ पर आरोप लगाया, मुलायम सिंह ने नहीं लगाया । सैफई महोत्सव हमने शुरू जरूर कराया था लेकिन उसका स्केल अब बहुत आगे बढ़ गया है। पहले सैफई महोत्सव में बड़े कलाकार आते थे , लेकिन अब बहुत बड़े-बड़े कलाकार आते हैं। फिल्म फेयर का शो उतना बड़ा नहीं होता जितना सैफई महोत्सव का कार्यक्रम किया जाता है। फिल्मों का एक पारितोषिक समारोह भी उतना बड़ा नहीं होता जितना बड़ा सैफई महोत्सव होता है। अब तो मैं नहीं हूं, तो अब संस्कृति का सुधार हो गया है ये आपके प्रश्न का उत्तर है। दूसरी बात ये कि दो लोग नहीं बदलते लोकशाही में वो स्थाई होते हैं, उद्योगपति और अफसर। पॉन्टी चड्ढा मायावती की भी शराब बेचते थे, अब समाजवादी पार्टी की भी शराब बेच रहे हैं। नवीन खंडेलवाल बच्चों का खाना मायावती के लिए भी बनाते थे अब समाजवादी पार्टी के लिए भी बना रहे हैं, रमारमन मायावती का भी नोएडा देखते थे, अब समाजवाती पार्टी का नोएडा देख रहे हैं और नवनीत सहगल मायावती के सिस्टम के नाक के बाल थे और अब समाजवादी सिस्टम के भी नाक के बाल हैं। उद्योगपति और अफसर, आज की लोकशाही के ये दो पहिए हैं, सत्ता बदलती है पर ये नहीं बदलते। मै ये आशा करता हूं और मुझे पूरी उम्मीद है कि अखिलेश अच्छा काम कर रहे हैं और उनकी पुनरावृत्ति होगी। लेकिन, एक बात मैं पूरी गारंटी से कह रहा हूं कि पॉन्टी चड्ढा के शराब कारोबार के विरुद्ध और
उनके प्रति पक्षपात के लिए विधानसभा में और सड़कों पर समाजवादी कार्यकर्ताओं ने आंदोलन किया। सरकार बदल गई लेकिन, पॉन्टी चड्ढा ग्रुप नहीं बदला। 
हमारे ऊपर मायावती के कार्यकाल में मुकदमें लगे। हमारा और मुलायम सिंह का सार्वजनिक रूप से नवनीत सहगल ने अपमान किया। लेकिन हमने उनको क्षमा कर दिया, क्योंकि अपमान नवनीत सहगल ने नहीं बल्कि मायावती ने किया, नवनीत सहगल उनके कारक थे। इसका उदाहरण मैं आपको दूं कि, गोविंद बल्लभपंत को एक त्रिपाठी नाम के पुलिस अधिकारी ने इतना मारा-इतना मारा कि उनके हाथ कांपते थे। लेकिन, वो जब मुख्यमंत्री बन गए तो वो अधिकारी डरने लगा। तो उन्होंने कहा कि नहीं, तुम बहुत आज्ञाकारी व्यक्ति हो। तुमने अंग्रेजों के कहने से अगर मुझे पीटा इतना, तो हमारे कहने से और लोगों को भी पीटोगे। तो, तुम हिज मास्टर्स वाइस हो। ये कहकर पंत जी ने उनको क्षमा कर दिया, ये सत्य बात है। तो, नवनीत सहगल जितनी ईमानदारी से मायावती के लिए काम करते थे, उतनी ही ईमानदारी से आज इस सरकार के लिए काम कर रहे हैं और कल अगर मायावती आएंगी तो उतनी ही ईमानदारी से वो उनके लिए काम करेंगे। तो,अफसर जो होता हो वो पानी की तरह होता है, जिस बर्तन में आप डाल दीजिए उस बर्तन का आकार ले लेता है।  नेताओं को हम कितनी ही गाली दें, उनकी जिन्दगी बड़ी खराब होती है। अगर अच्छा काम वो करेंगे, अगर अखिलेश मेट्रो बनाएंगे, लंबी हाईवे बनाएंगे तो, ये तो उनका काम है। इसीलिए जनता ने उन्हें चुना है, लेकिन गलती अगर एक हो गई तो फिर लम्हों ने खता की और सदियों ने सज़ा पाई। फिर सारा ठीकरा उनके सिर पर फूटेगा। कोई ये नहीं कहेगा कि उनको काम करने का अवसर नहीं मिल पाया या उनको काम करने की स्वच्छंदता नहीं मिल पाई। 
वासिंद्र मिश्र- एक छोटा सा ब्रेक लेंगे और उसके बाद चर्चा करेंगे पॉलिटिकल फंडिंग की, कि अगर चुनाव प्रक्रिया को साफ सुथरा बनाना है, डेमोक्रेसी को साफ-सुथरा बनाना है तो इलेक्शन की, चुनाव की जो फंडिंग है उसको साफ सुथरा कैसे बनाया जा सके।

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वासिंद्र मिश्र- अमर सिंह आपका एक बार फिर स्वागत है, हम लोग चर्चा कर रहे थे कि इलेक्शन और राजनीति को कैसे साफ-सुथरा बनाया जाए। जो ब्लैकमनी या माफिया मनी है उसके दम पर जो राजनीति करते हैं वो सत्ता में जाते ही ऐसे लोगो के दबाव में काम करते हैं। मुझे ध्यान है कि अटल जी...जब वो पीएम थे और उससे पहले वो विपक्ष की राजनीति करते थे तो उस जमाने में कोई बीजेपी को तो चंदा देता नहीं था क्योंकि उम्मीद नहीं थी कि बीजेपी भी कभी सत्ता में आएगी, तो सबसे ज्यादा संकट उन्हीं लोगों को ही रहता था। तो वो कहा करते थे कि इलेक्शन का जो खर्चा है वो स्टेट को वहन करना चाहिए । 

अमर सिंह- मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूं और मैं ये कहता हूं कि जो भी नेता या राजनीतिक दल ये कहता है कि हमने पैसा नहीं लिया, वो झूठ बोलता है । उसकी कथनी और करनी में भेद है और ज्यादातर जो चुनाव आयोग में जो खर्चे का हिसाब देते हैं वो भी गलत देते हैं। क्योंकि खर्चे की एक सीमा है, उस सीमा के अंतर्गत ही चीजें देनी होती हैं, लेकिन अब उसमें भी तू डाल-डाल तो हम पात-पात वाली दशा है। अब कई बड़े खर्चे पार्टी की मद में डाल दिए जाते हैं, जैसे - कहा जाता है कि फलां विज्ञापन का खर्चा केंद्रीय कार्यालय वहन कर रहा है। ये प्रत्याशी के व्यक्तिगत निजी खर्चे में नहीं जुड़ेगा। तो, इस तरह से जो धन का और बल का स्थान राजनीति में बुद्धि से ज्यादा हो गया है। ये पहली बार ऐसा हुआ है कि विकास के नाम पर धर्म और जाति की दीवारें टूटी हैं। जैसे ही मोदी जी टीवी पर आते थे और कहते थे कि भाईयों और बहनों अच्छे दिन आएंगे, तो अच्छे दिनों की चाहत में लोग प्रसन्न और प्रफुल्लित होकर तालियां बजा-बजाकर बड़े बड़े कैबिनेट मंत्रियों का, या हमारे जैसे भी लोग कहां आ गए। तो, हम जब चुनाव लड़ रहे थे तो अमित शाह जी का बयान आया अपने ही प्रत्याशी के विरुद्ध, जो कविता चौधरी बलात्कार कांड में वो शामिल थे, लेकिन हम ये नहीं कह रहे, उनका मीडिया ट्रायल हुआ, हो सकता है वो बिलकुल झूठ हो। लेकिन ये देश अवधारणाओं का देश है, धोबी के कहने पर गर्भवती सीता को निकलना पड़ा । तो, उनके लिए ये गलत अवधारणा थी। मोदी जी ने उत्तर प्रदेश में कई जगह प्रचार करने गए, बगल में हेमा जी के प्रचार के लिए आए। हमारे विरुद्ध प्रचार करने भी नहीं आए, लेकिन उसके बावजूद मैं हार गया । ऐसी आंधी..ऐसी आंधी, अच्छे दिन आएंगे। लोग अच्छे दिन के चक्कर में इतने बुरे दिन भूल गए, जाति भूल गए, धर्म भूल गए और कमल को निशान लगा दिया। अब मैं देख रहा हूं कि दिल्ली चुनाव में झुग्गी झोपड़ी वाले, फिर स्कूटर वाले और उत्तर भारतीय 
फिर अरविंद केजरीवाल की जय-जयकार करने लगे हैं। बिहार चुनाव में जितना गौमांस खाने का मुद्दा बनाया गया, जितना यहां की जीत से पाकिस्तान में पटाखे फूटेंगे बोला गया, जितना लालू जी को कांग्रेस के बड़े बड़े नेताओं ने अछूत कहा, कि ये दागी हैं और इनके साथ हम मंच साझा नहीं करेंगे। तो मुझे तो लगता है कि अगर लालू जी ने गठबंधन ना किया होता नीतीश से, तो संभवतः वो अकेले जीत जाते। लालू के लोग ज्यादा जीते, नीतीश के लोग कम जीते। और लालू जी जो आज चुनाव ना लड़ने की स्थिति में हैं, और ये धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिकता क्या है, इतने दिन तक नीतीश जी अटल जी के साथ रहे, सुशील मोदी के साथ रहे और अब वो अचानक सेकुलर हो गए । रामविलास पासवान जी, जिन्होंने गुजरात के कथित नरसंहार के बाद अटलजी की सरकार में कैबिनेट से इस्तीफा दिए, पाकिस्तान गए तो मियां मुशर्रफ के सामने कहा कि , मैं वही रामविलास पासवान हूं जिसने भारत में मुस्लिमों पर अत्याचार के चलते अटल सरकार से इस्तीफा दे दिया है, और ये भारतीय जनता पार्टी नहीं भारत जलाओ पार्टी है, आज उसी की कैबिनेट में हैं, और ये वही स्मृति ईरानी हैं जो अनशन पर बैठी थीं। एक बार हमने प्रश्न किया अभी हाल ही में सार्वजनिक रूप से तो अमित शाह जी कह गए कि आप भी तो गए थे यूपीए के डिनर में तो सोनिया गांधी ने बेइज्जत करके निकाल दिया था, फिर भी आप समर्थन क्यों करते हैं। अरे भाई, अमित शाह मालिक हैं, हम मालिक नहीं, हम मालिक के प्रतिनिधि थे। हमें सुरजीत ने कहा तो हम गए और बेइज्जत होकर आ गए। अब हमारे मालिकों को या हमारी पार्टी को ये निर्णय लेना था कि इस बेइज्जती के प्रतिकार में वो समर्थन दें या ना दें। लेकिन, अमित शाह जी शायद ये भूल गए कि एक बार हमीं लोगों की अवरुद्धता के कारण जब एक मत से अटल जी की सरकार हारी थी, तो सोनिया जी प्रधानमंत्री नहीं बन पाईं, तो मीठा-मीठा गप, कड़वा-कड़वा थू। अब तो सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता तो पोशाक की तरह बन गई है। जब जो चाहे धर्मनिरपेक्ष हो जाए। दागी होने से पहले ए राजा सुषमा स्वराज के राज्यमंत्री थे, कितनों को याद है। गुजराल की सरकार में सोनिया गांधी ने कहा था कि डीएमके हमारे पति की हत्यारी पार्टी है इसलिए सरकार को नहीं चलने देंगे और बाद में फिर डीएमके बगल में बैठ गए, वही अलागिरी और काला चश्मा पहने करुणानिधि जी। तो, स्थिर प्रज्ञता मुलायम सिंह में नहीं है ये आरोप लगते हैं, कि कभी ममता के साथ तो कभी ममता के विरोध में, कभी कुछ कभी कुछ। तो कितने स्थिर प्रज्ञ लोग हैं। क्या कांग्रेस ने राजीव गांधी का हत्यारा बताने वाली डीएमके के साथ बाद में सरकार नहीं बनाई। क्या डीएमके पहले सांप्रदायिक बीजेपी के साथ और बाद में धर्मनिरपेक्ष कांग्रेस के साथ नहीं आई? क्या चंद्रबाबू नायडू 28 सांसद लेकर अटल जी की सरकार के सबसे बड़े पुरोधा नहीं बने? क्या वही चंद्रबाबू नायडू सुरजीत और येचुरी और प्रकाश करात को लेकर सबसे बड़े प्रगतिशील और वामपंथी नहीं बने ? क्या वही चंद्रबाबू नायडू फिर सत्ता शरणं गच्छामि कहते हुए मोदी जी की शरण में नहीं गए? और इस बात की क्या सुरक्षा है कि अगली बार अगर उन्हें कोई डगमग दिखाई दी कोई राजनीति की गणित... तो ये कहां जाएंगे? पाकिस्तान के प्रति और वहां के आतंकवादियों के प्रति नरम रूख रखने वाली पीडीपी के साथ बीजेपी ने अद्भुत राष्ट्रवाद का परिचय देते हुए जम्मू-कश्मीर में सरकार बना ली। मतलब एक ही वाद है वो है सत्तावाद और इसे मानने में किसी को क्या तकलीफ है। इस लिहाज से तो हम व्यापारी को बहुत ही ईमानदार मानते हैं, क्योंकि व्यापारी कहता है कि  मेरा कमिटमेंट सिर्फ तीन चीजों के साथ है। IRR, DSCR और ग्रॉस और नेट प्रॉफिट। हम अपना काम निकालने के लिए सामने वाले को ओब्लाइज करेंगे और उसके आगे-पीछे घूमेंगे।


वासिंद्र मिश्र- तो आपको ये नहीं लगता कि इस समय जो देश की सरकार चल रही है वो भी व्यापारिक सिद्धांतों के आधार पर चल रही है। 

अमर सिंह- नहीं, मुझे ये नहीं लगता। क्योंकि आज की जो सरकार चल रही है, उसमें किसी भी मंत्री और अधिकारी से पूछो तो वो रोता हुआ नज़र आता है। वो कहता है कि हमारे पास कोई अधिकार नहीं है और बिना प्रधानमंत्री कार्यालय के आदेश के कोई पत्ता भी नहीं खडकता। इस मसले में एक बहुत ही कद्दावर और प्रभावी मंत्री हैं, वो सार्वजनिक अवधारणा में अहमदाबाद के एक उद्योग घराने में बहुत जाने लगे तो पीएम मोदी ने उनसे कहा कि आजकल आप बहुत जा रहे हैं वहां, तो उन्होंने उत्तर दिया कि वो आपके मित्र हैं, इस पर मोदी ने कहा कि वो हमारे मित्र हैं, तुम्हारे तो नहीं। इस लिहाज से मैं पीएम मोदी के तेवर की तारीफ करता हूं। जामनगर के एक उद्योगपति ने मुझे बताया कि किस तरह से नरेंद्र मोदी ने उन्हें मदद देने से मना कर दिया और सुप्रीम कोर्ट में उनके एक मित्र गुजरात सरकार से हार गए। नरेंद्र मोदी के बारे में कम से कम एक बात तो माननी पड़ेगी कि उनके बहुत से पुराने मित्र हैं जो अब उनसे काफी दूरी अनुभव करते हैं। जो दिख रहा है कि पार्टी में जो बहुत पुराने लोग हैं जो यत्र-तत्र कहीं बिखर गए हैं। पांच उंगलियां बराबर नहीं होतीं, लेकिन जब हमें खाना खाना होता है तो पांचों उंगलियों के बिना कौर बनाकर ही मुंह में डालना होता है। मैं चाहता हूं कि मोदी जी ये बात समझें और ऑक्टोपस की तरह आठ हाथ और पांव से सबको संभालें। अब वो बीजेपी और संघ के पुराने स्वयंसेवक नहीं हैं कि भोजन और विश्राम से काम चला लें। वो देश के प्रधानमंत्री हैं, देश के हर विधा में प्रभाव रखने वाले छोटे से छोटे कण से सीधे मिलें या किसी तंत्र के सहारे जुड़ें, उनका समन्वय जरूरी है। अगर ये समन्वय और बात अगर लोगों तक पहुंचे तो मैं समझता हूं कि मोदी जी की जो राजनीति की चरित्र कुंजिका है, वो निश्चित रूप से कईयों से बेहतर है।

वासिंद्र मिश्र- अमर सिंह जी, हमें एक छोटे से अंतराल के लिए जाना पड़ेगा और ब्रेक के बाद हम चर्चा करेंगे नरेंद्र मोदी और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की वर्किंग स्टाइल में आपको कितनी समानता और विषमता दिखाई देती है और दूसरा आपके अभिन्न मित्र रहे अमिताभ बच्चन के बारे में  और आपके रिश्तों के बारे में भी बात करेंगे एक छोटे से अंतराल के बाद-

वासिंद्र मिश्र- ब्रेक के बाद आपका एक बार फिर स्वागत है, और हम लोग चर्चा कर रहे थे नरेंद्र मोदी की वर्किंग स्टाइल की जिसमें नरेंद्र मोदी को लेकर उनके मंत्री भी असहज हैं, तो इसके दो संकेत मिलते हैं अधिनायकवाद है या डिक्टेटरशिप है।

अमर सिंह- नहीं, ऐसा नहीं है। हम जिस नरेंद्र मोदी को जानते हैं वो बहुत ही सहज हैं, बहुत सरल हैं। होता क्या है कि आपके जीवन की प्रासंगिकता और प्राथमिकताएं बदल जाती हैं, जब आपके जीवन का स्पेक्ट्रम बदलता है, और आप घिर जाते हैं। नरेंद्र मोदी जी से मैं जब-जब भी मिला, सार्वजनिक समारोंहों में कई बार मिल गया तो हर बार रुककर पूछा कि भैया आपका स्वास्थ्य कैसा है ?  मुझे सुखद आश्चर्य हुआ, जब किरण मजूमदार शॉ ने मुझसे ये बताया की पीएम मोदी  उनसे कह रहे थे कि येचुरी और अमर सिंह भले ही हमारी पार्टी में नहीं हैं, लेकिन मेरी उनसे सदैव मित्रता रही है। हमारा उनका परिचय अरुण जेटली जी ने कराया। जब संजय जोशी के कार्यकाल में केशुभाई से द्वंद के बाद जब दिल्ली में उनका प्रवास था तो, मुझे जेटली जी का फोन आया कि नरेंद्र मोदी जी मुझसे मिलना चाहते हैं और उनके घर पर भोज में हम लोग तीन लोग थे मिले, और इंडियन एक्सप्रेस का जखीरा आया और उसने अगले दिन हेडलाइन बनाई  कि केसरिया रंगों से रंगा अमर सिंह का हाथ, लेकिन हमने इसकी कोई परवाह भी नहीं की। 

वासिंद्र मिश्र- इसका कारण क्या था ? उस समय उनको जरूरत थी दिल्ली के नेताओं की, अरुण जेटली की और आपकी ?

अमर सिंह- ऐसा कुछ नहीं था, मैं बताऊं कोई काम नहीं था। मोदी जी सलमान खान के साथ पतंग उड़ा रहे थे। आज मैं आपको बता रहा हूं कि ऑन रिकॉर्ड हैं ये सारी बातें , कि अमिताभ बच्चन कॉर्पोरेशन लिमिटेड का मैं उपाध्यक्ष था उस वक्त और पा नाम की फिल्म बनी और अमिताभ बच्चन ने कहा कि काश इस फिल्म के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार मिल जाता और उन्हें मिला, कांग्रेस के साथ उनके गतिरोध के बावजूद कांग्रेस के कार्यकाल में ही उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला । उस वक्त प्रियरंजन दास सूचना प्रसारण मंत्री थे और उन्होंने कहा कि ये टैक्स फ्री हो जाए। तो वृंदा करात और प्रकाश करात जी से मैने बात की तो पश्चिम बंगाल में पा फिल्म टैक्स फ्री हुई, येदियुरप्पा जी से बात की तो कर्नाटक मे पा टैक्स फ्री हुई। इसी संदर्भ मे संजय भावसर हमारे और मोदी जी के बीच में समन्वय कर रहे थे, और वो अभी हैं। ये सभी बातें मैं ऑन रिकॉर्ड बोल रहा हूं और काट दें संजय भावसर ये बात ।  मोदी जी से हमने बात की और मोदी जी से अमिताभ बच्चन का परिचय मैंने करवाया पा फिल्म के टैक्स एक्जम्पशन के लिए। मोदी जी ने फिल्म देखी और फिल्म टैक्स फ्री हो गई। टैक्स फ्री होने लायक पिक्चर भी थी पा। उसके बाद उन्होंने कहा कि आप गुजरात के पर्यटन का प्रचार  कर दीजिए, तो अमिताभ बच्चन असहज हो गए और बोले कि अमर सिंह जी ये तो पॉलिटिकल हो गया आपने मुझे कहां फंसा दिया, और ये मैं चुनौती देता हूं कि अमिताभ बच्चन खंडन करें कि उन्होंने ये बात नहीं कही। मैंने कहा कि ये बताईये की वहां पर जो गिर का जो शेर है उसमें सांप्रदायिक और धर्मनिरपेक्ष क्या है ? द्वारका के मंदिर में और कच्छ के रेगिस्तान में । तो, अगर मायावती हमको अपना शत्रु मानती हैं और ताजमहल के प्रचार के लिए अगर वो आपसे कहें तो आप नेशनल आईकन हैं तो आपको ताजमहल का भी प्रचार करना चाहिए। तो गिर का शेर, द्वारका का मंदिर और कच्छ का रण इसका प्रचार आप करें और इसमें कुछ नहीं है और इस बात पर मैं कायम रहा । जब इस मसले पर उन पर हमला हुआ तो मैंने सोनिया जी को पत्र लिखा कि कम से कम आप इस बात का ध्यान रखिए कि ये उस हरिवंश राय और तेजी बच्चन के बेटे हैं, और हमने सिम्बॉयोसिस के परिसर में ये पंक्ति  पढ़ी कि बैर कराते मंदिर-मस्ज़िद, मेल कराती मधुशाला। तो हमने कहा कि धर्म निरपेक्षता के बारे में ऐसी पंक्तियों की रचना करने वाला रचयिता हरिवंश राय बच्चन, उनकी रचना ये भी है और अमिताभ बच्चन भी हैं। तो ये सांप्रदायिक कैसे हो सकते है, ये धर्म निरपेक्ष हैं। उसके बाद जनार्दन द्विवेदी का बयान आया कि अमिताभ बच्चन के बारे में कोई बयान ना दिया जाए। क्योंकि हमने वही तथ्य सार्वजनिक बयान में कहे जो व्यक्तिगत रूप से अमिताभ बच्चन को कहा था, उसके बाद वो विवाद ठहरा। 



वासिंद्र मिश्र- लेकिन, अमिताभ के बारे में उनका जो असली चेहरा था, असली व्यक्तित्व था उसका अहसास आपको कब हुआ ? क्योंकि, जिस तरीके से अमिताभ और उनका परिवार आपके परिवार के साथ, आपके बच्चों के साथ हमने देखा है दिल्ली से लेकर लखनऊ तक और लखनऊ से लेकर बाराबंकी तक। 

अमर सिंह- देखिए, अमिताभ बच्चन की कुंडली में ही विवाद  है और अच्छे ज्योतिष से उनको मिलना चाहिए। बोफोर्स का विवाद हुआ तो चंद्रशेखर जी ने, सुब्रमण्यम स्वामी जी ने कानून मंत्री के रूप में अमिताभ बच्चन की मदद की। चंद्रशेखर जी के कहने से वित्त मंत्री रहे यशवंत सिंह और सुब्रमण्यम स्वामी ने अमिताभ की मदद की, नहीं तो ऐसी घेरा बंदी थी की ...अरुण जेटली जी विश्वनाथ प्रताप सिंह के एडिशनल सॉलिसीटर जनरल के रूप में इनकी जांच करने गए थे स्विट्ज़रलैंड । अरुण जेटली जी के नाम से इनको लगता था कि जैसे कोई गरम तेल इनके ऊपर डाल रहा हो। अरुण जेटली और विश्वनाथ प्रताप सिंह इनके लिए बहुत ही विषाद का विषय होते थे और विश्वनाथ प्रताप के पलायन का या परिचित होने का और चंद्रशेखर जी के आगमन का सबसे बड़े लाभ पाने वाले अमिताभ ही थे और बाद की सरकारें इनको तंग ना करें इसके लिए फेरा बोर्ड के उन्नी नाम के एक व्यक्ति से चंद्रशेखर जी ने इनके पक्ष में एक निर्णय करवाया जो कि न्यायिक लगे और मसले को राजनीतिक रंग ना दिया जा सके। 


वासिंद्र मिश्र- लेकिन, चंद्रशेखर जी ने आपके कहने पर किया होगा। 

अमर सिंह- निश्चित रूप से मैं बीच में था, मुझे कोई कहने में लज्जा नहीं है...लेकिन  चंद्रशेखर जी की मृत्यु के बाद क्या अमिताभ बच्चन संवेदना के लिए एक बार भी चंद्रशेखर जी के घर गए ? मैं जानना चाहूंगा अमिताभ बच्चन जी बता दें। तो, देखिए बोफोर्स के उस विवाद के बाद जिसमें उनके बालसखा राजीव गांधी भी उनके काम नहीं आए और चंद्रशेखर जी ने कहा की राजीव जी से जब वो रूष्ट हो गए और जब वो केयरटेकर प्रधानमंत्री थे तब उन्होंने अमिताभ की मदद की । उन्होंने कहा कि कोई ये ना कहे कि राजीव गांधी के चलते वो मदद कर रहे हैं, उन्होंने कहा कि हरिवंश राय बच्चन उनके गुरू रहे हैं लिहाजा वो अपने गुरु के बेटे की मदद कर रहे हैं, देश का बड़ा कलाकार है इसलिए मदद कर रहे हैं। जब राजीव से हमारा मनभेद -मतभेद हो गया है तब हम अमिताभ की मदद कर रहे हैं। तो ये थे चंद्रशेखर और ये हैं अमिताभ बच्चन। बोफोर्स के विवाद के बाद बाराबंकी की जमीन का विवाद सामने आया जब वो किसान बन गए थे और मायावती ने मुकदमा कर दिया था । तीसरी बात सीके पीठावाला नाम का एक व्यक्ति जिससे उन्होंने अप्रवासी भारतीय के रूप में चैनल चलाते हुए 50 करोड़ रुपए लिए और जिसको उन्होंने हस्तलिखित प्रनोट  दिया की तुम्हें लेना है और हमें देना  है। और जिसको उनहोंने हस्तलिखित प्रनोट दिया की तुम्हें लेना है और हमें देना है वो आज भी विद्यमान है, पूरे देश में घूमता रहा उसको सहारा की मदद से पचास करोड़ रुपए का भुगतान हुआ। उसने कहा कि मुझे अमिताभ के पैसे मिल गए लेकिन पता नहीं इस बात की जांच प्रवर्तन निदेशालय कर रहा था पता नहीं ...वो जांच हुई कि नहीं। तो, वो पचास करोड़ रुपया जो अमिताभ का बकाया था उसे सहारा ने क्यों दिया । और अगर सहारा ने दिया तो सहारा का हर पैसा अब सेबी की मिल्कियत है तो क्या वो पचास करोड़ जो सहारा ने उनको दिया वो ब्याज समेत वो सेबी को वापस करेंगे अमिताभ बच्चन ? और क्या सहारा ने वो पैसा पीठावाला को देने से पहले आरबीआई से स्वीकृति ली, तो क्या फेरा और फेमा के उल्लंघन का केस बनता है ? तो मैं ये समझता हूं कि मैं अमिताभ का हितैषी हूं और उम्मीद करता हूं की हर मुश्किल की तरह वो इस मुसीबत से भी निकलेंगे। क्योंकि मैने सुना है नरेंद्र मोदी जी देश के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के लिए अमिताभ बच्चन का नाम सोच रहे हैं । तो देश के भावी राष्ट्रपति का जो संभावित उम्मीदवार है उसको क्लीनचिट रहना चाहिए। तो, वो दिन आ रहा है तो उससे पहले ये स्पष्ट होना चाहिए कि और मैं ये इसलिए भी कह रहा हूं कि अमिताभ के अंधे मोह के चलते मैंने जसवंत सिंह  जी की सेवा ली थी जब वो वित्त मंत्री थे। और एक महिला अधिकारी जिसका नाम अभी मुझे याद नहीं है वो मुंबई में थीं और उनके दफ्तर में जाकर मैंने रुष्ट होकर बात की, मैंने उनसे कहा कि अमिताभ बच्चन ने पैसे नहीं दिए हैं और आप देश के इतने बड़े कलाकार को परेशान ना करें। हमने कहा अमिताभ बच्चन ने पैसा नहीं दिया क्योंकि अमिताभ ने मुझसे कहा कि मैंने पैसा नहीं दिया। कालान्तर में मुझे पता चला कि उनके लिए सहारा ने पैसा दिया । लेकिन सहारा ने अगर आरबीआई की स्वीकृति से पैसा दिया है, अगर लीगल चैनल से पैसा दिया है तो फिर कोई मामला ही नहीं है। अमिताभ जैसे बोफोर्स से निकले, जैसे वो दौलतपुर में सुप्रीम कोर्ट में केजी बालाकृष्णन के हथौड़े से निकले, मायावती के उत्पात के बावजूद, वैसे ही वो प्रवर्तन निदेशालय की जांच से जो आजकल बंद हो गई होगी या फाइल हुई होगी उससे भी बाहर निकलेंगे । और अगर नहीं निकलेंगे तो उन्हें राष्ट्रपति भवन की जगह उनको पता नहीं कहां जाना पड़े और जो उनको पद्मभूषण और तमाम अलंकरण जो मिले हैं, जिनके बारे में वो ट्वीट करते हैं की उनके परिवार को सबसे ज्यादा मिला है, वो सब वापस भी करना पड़ सकता है। तो, मैं उनके लिए बहुत चिंतित हूं। मैं चाहता हूं की हमारे पुराने मित्र, बड़े भाई, सदी के महानायक, आदरणीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इनक्रेडिबल इंडिया के संभावित संवाहक अपने को शुचिता और शुद्धता से  युक्त कर लें ताकि आने वाले सारे बड़े बड़े पद अलंकृत हों सुशोभित हों, हमें बुरा तो नहीं लगेगा बल्कि अच्छा लगेगा, मेरी शुभकामनाएं उनके साथ हैं।

वासिंद्र मिश्र- अमर सिंह जी हमें एक और ब्रेक लेना पड़ेगा, और ब्रेक के बाद बात करेंगे कि अगर हम आपसे ये पूछें कि कॉर्पोरेट्स  और पॉलिटिशिएन ये जो दो वर्ग हैं, इनमें सबसे ज्यादा क्रेडिबल और रिलाइबेल आप किसको मानते हैं, तो इसका उत्तर हम जानेंगे ब्रेक के बाद-

वासिंद्र मिश्र- अमर सिंह जी ब्रेक के बाद आपका फिर स्वागत है। हम ये जानना चाह रहे थे कि आपको दोनों क्षेत्रों का  गहन अनुभव रहा है। कॉर्पोरेट्स के साथ आपकी बहुत करीबी रही है, आपका चोली-दामन का साथ रहा है कॉर्पोरेट्स से और राजनेताओं से।अगर हम इन दो लोगो को सामने रखें इन दोनों बातों को और आपसे कहें कि आप इन दो लोगों में से आप किस पर सबसे ज्यादा भरोसा कर सकते हैं रिलाइबिलिटी के मामले में और क्रेडिबिलिटी के मामले में। 

अमर सिंह- देखिए, रिलाइबिलिटी और क्रेडिबिलिटी के मामले में आप जानवरों पर भरोसा कर सकते हैं, आदमियों पर नहीं। इस पर गोपाल दास नीरज की एक कविता मुझे बहुत याद आती है कि, क्या है करिश्मा कैसा खिलवाड़ है और ज़ानवर आदमी से ज्यादा वफ़ादार है ... आदमी माल जिसका खाता है,प्यार जिसका पाता है ..उसके ही सीने में भोंकता कटार है। ऐ भाई ज़रा देख के चलो, आगे ही नहीं पीछे भी ...ऊपर ही नहीं नीचे भी, दाएं ही नहीं बायें भी। लेकिन, आपने प्रश्न किया है तो मैं आपको बता दूं कि अपवाद हर जगह होते हैं, दो अपवाद हमने अपने जीवन में उद्योगपतियों में देखे हैं। बड़े उद्योगपतियों में के के बिरला और धीरूभाई अंबानी, इन्होंने मित्रता का निर्वहन किया है। के के बिरला, जेल जाने की नौबत आ गई, उनके पिता घनश्याम दास बिड़ला ने उन्हें डिसओन कर दिया, लेकिन उन्होंने इंदिरा गांधी को नहीं छोड़ा और हमारे साथ भी उन्होंने बिल्कुल घरेलू संबंध रखा। सबसे पहली महत्वपूर्ण एक पहचान जो मुझे जीवन में मिली वो बिड़ला जी ने दी। हिंदुस्तान टाइम्स के बोर्ड में मुझे बहुत अल्पायु में डायरेक्टर बनाया और अपने परिवार का सदस्य बनाया और अपने घरों में छुट्टियों पर बुलाया। हम एक सामान्य से मध्यम वर्ग के घरों के लड़के थे, जो बड़े परिवेश में हमारी एंट्री जिसको कह सकते हैं वो आदरणीय कृष्ण कुमार बिड़ला जी ने करवाई। आज भी शोभना जी उनके दामाद और उनकी बेटियां हमारे बहुत पितृवत हैं। दूसरा सुभाष चंद्रा जी के बारे में मैं कहूंगा, एक तत्काल  भोग योगी नहीं हैं, हमारे आरोह-अवरोह में, हमारे बुरे दिनों में भी इनके संबंध का असर ना घटा ना बढ़ा। एक स्थिर प्रज्ञता रही। तीसरा नाम मैं धीरूभाई अंबानी का भी लूंगा, जब से उनकी हमारी मित्रता हुई, मैं ये नहीं कहता कि उन्होंने सब अच्छे ही काम किए होंगे या उनके भी बहुत से लोग विरोधी हैं। लेकिन आज मैं मुकेश अंबानी की या अनिल अंबानी की चापलूसी नहीं कर रहा। धीरूबाई से  जिसकी मित्रता हो गई ...वो मित्रता का निर्वहन करते थे। जितने अच्छे वो मित्र थे उतने ही अच्छे शत्रु भी थे। जिस दिन से हमारी उनकी मित्रता हो गई और उस दिन से लेकर उनकी मृत्यु तक, मृत्यु के भी दो घंटा पहले उन्होंने मुझसे बात की। उन्होंने निर्देशित करके रखा था अपने लोगों को... कि लंच पर बिना बताए अगर अमर सिंह बंबई हैं तो, हमारे साथ या हमारे दोनों बेटों के साथ खा सकते हैं। वो जब सार्वजनिक अवकाश पर जाते थे तो मुझे जरूर ले जाते थे और मृत्यु से पहले उन्होंने जो कार्यक्रम बनाया था उसमें उन्होंने आर के धवन का भी नाम रखा था कि धवन साहब भी हमारे साथ चलेंगे, जबकि धवन साहब प्रासंगिक नहीं थे, धवन साहब बिल्कुल महत्वहीन थे मतलब दिल्ली की राजनीति के दृष्टिकोण से। और ये भी मैं आपको बताऊं की धवन साहब पर राजीव गांधी की सरकार में इंदिरा गांधी की हत्या का जब आरोप लगा था, तो पूरी मुंबई में सिर्फ दो ही लोगों ने उनका खुलेआम स्वागत किया था, एक स्वर्गीय धीरूभाई अंबानी ने और दूसरे स्वर्गीय सुनील दत्त ने। तो अपवाद तो होते हैं मनुष्यों में भी.... तो मुझे मुश्किल से सुभाष चंद्रा, के के बिरला और धीरूभाई अंबानी दिखाई देते हैं। राजनेताओं के बारे में बताऊं तो भ्रष्ट से भ्रष्ट राजनेता अपने क्षेत्र में सड़क, खड़न्जा, पानी ...भले ही अपने स्वार्थ के लिए वोट के ही चक्कर में बनाता है। कुछ ना कुछ लोगों से संपर्क रखना उसकी बाध्यता होती है क्योंकि लोक ही उसका जीवन है। चाहे जितना भी उसके ऊपर भ्रष्टाचार का आरोप लगे कितने भी केस लगें। इसीलिए आप चाहे जितना भी उसका अवमानना करें, चाहे जितना भी उसको अवसाद में रखने का प्रयत्न कीजिए। कितना ही कहिए आप चुनाव नहीं लड़ सकते वो लालू यादव हो जाता है। फिर आपकी छाती को कूटके चाहे वो पत्रकार हों, चाहे वो सिस्टम हों, चाहे वो ज्यूडीशियरी हो वो खड़ा हो जाता है। फिर वो बाल ठाकरे हो जाता है। बाल ठाकरे को लोगों ने कहा कि आप चुनाव नहीं लड़ सकते तो उन्होंने कहा हम चुनाव नहीं लड़ेंगे, हम अपने चेलों को मुख्यमंत्री बनाएंगे और चुनाव लड़वाएंगे। तो राजनेताओं के बारे में तो ये है कि ....जनता से जो वो जुड़ा नहीं होगा, जनता की समस्याओं से वो जुड़ा नहीं होगा, अनुपात कम ज्यादा हो सकता है। मेरा अपने जीवन का यही अनुभव है कि मेरा जितना झगड़ा मुलायम सिंह से हुआ, अंत में मुलायम सिंह कह ही बैठे , अमर सिंह हमारे दल में नहीं हैं लेकिन हमारे दिल में हैं। तो दल तो क्षणिक होता है, कहीं जीतता है तो कही हारता है और दिल, ये तो पागल है ये दीवाना है। मैं तो दल में रहने से ज्यादा अच्छा समझूंगा कि दिल में रहूं।

वासिंद्र मिश्र- बहुत -बहुत धन्यवाद हमसे बात करने के लिए, धन्यवाद।

अमर सिंह- जी, शुक्रिया

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