शुक्रवार, 25 मार्च 2016

बदल रही कांग्रेस ?

ट्रिपल तलाक को लेकर चल रहे मामले पर छिड़ी बहस में अब कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी भी कूद पड़े हैं ... मनीष तिवारी ने फिर बहस छेड़ दी है कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और मुस्लिमों के लिए अलग कानून क्या भारतीय संविधान से ऊपर है ... लंबे समय से चले रहे आ रहे इस मसले पर 5 राज्यों में चुनाव के ठीक पहले कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी का दखल देना आखिर क्या संकेत देता है ... यहां एक बार शाह बानो केस और उसके बाद हुए घटनाक्रम को याद करना जरूरी है .. शाह बानो केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और मुस्लिम धर्मगुरुओं की तरफ से पुरजोर विरोध किया गया था और इसी
दवाब में आखिरकार 1986 में राजीव गांधी की सरकार ने मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 1986 पारित किया ... मध्य प्रदेश के इंदौर की रहने वाली पांच बच्चों की मां शाहबानो को सुप्रीम कोर्ट में केस जीतने के बाद भी अपने पति से गुज़ारा भत्ता नहीं मिल सका था जिसके बाद शाहबानो सुप्रीम कोर्ट चली गई थीं .. सुप्रीम कोर्ट ने शाहबानो के हक में फैसला किया .. मुस्लिम धर्मगुरुओं को पारिवारिक और धार्मिक मामलों में अदालत का दख़ल मुस्लिम अधिकारों के लिए खतरा लगा... जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पुरज़ोर विरोध शुरू हुआ और नतीजतन राजीव गांधी सरकार ने संविधान में संशोधन कर दिया ...
उस वक्त हिंदूवादी संगठनों ने राजीव गांधी पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगाया था.... अब चुनावों के ठीक पहले वही कांग्रेस ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के खिलाफ बयान दे रही है .. तो क्या एक बार फिर ये तुष्टिकरण की राजनीति हो रही है ...
वैसे भी कांग्रेस पर हमेशा ये आरोप लगते रहे हैं कि कांग्रेस मौका देखकर कभी बहुसंख्यक तो कभी अल्पसंख्यक के तुष्टिकरण को देखते हुए एजेंडा तय करती है ... कांग्रेस अगर cow belt में जाती है तो वहां उसका एजेंडा अलग होता है और वही कांग्रेस जब South India में होती है तो उसका एजेंडा कुछ और हो जाता है ... यहां ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और उसकी भूमिका के बारे में जानना भी जरूरी है ... भारत में पारिवारिक और धार्मिक मामलों में मुस्लिम शरीयत कानून मानते हैं ... 1973 में बना ऑल इंडिया  मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड शरीयत कानून के संरक्षण और इसे लागू करने में अहम भूमिका निभाता है .. हालांकि एक ही देश में दो तरह के कानून का विरोध होता रहा है ... खासकर मुस्लिम महिलाएं हीं  शरई कानून में तलाक
और गुजारा भत्ता को लेकर बने प्रावधानों का विरोध करती रही है ... देश में यूनिफॉर्म सिविल कोड की मांग भी होती रही है लेकिन कांग्रेस ने 1986 में शाहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट ने जब पहली बार शरई कानून के खिलाफ शाहबानो के अपील पर उनके पक्ष में फैसला दिया तो राजीव गांधी के नेतृत्व में चल रही कांग्रेस की सरकार ने ही इसका विरोध कर दिया था .. ऐसे में कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी का अचानक ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के खिलाफ जाकर बयान देना महज अपनी राय ज़ाहिर करना तो नहीं हो सकता ... कांग्रेस अच्छी तरह जानती है कि ऐसे संवेदनशील मामलों का कितना गहरा असर हो सकता है ... ऐसे में क्या कांग्रेस किसी रणनीति के तहत काम कर रही है ?

1 टिप्पणी:

  1. सही कह रहे हैं सर..कहीं ना कहीं राजनीतिक रूप से पिछड़ रही कांग्रेस कुछ नया करने के मत से खुद में ये बदलाव ला रही है..कांग्रेस जानती है कि सिर्फ राहुल गांधी के सहारे उनकी नैया पार नहीं लग सकती ।

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