मंगलवार, 29 मार्च 2016

5 दशक का 'जवाब' 2016 !

स्वस्थ राजनीति में बदले के लिए कोई जगह नहीं होती...लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में तानाशाही के लिए भी स्पेस नहीं होता....लोकतन्त्र में चुनी हुई सरकार ही सबसे ऊपर होती है...मगर ये तमाम बातें किताबी हैं...असल में ऐसा कम ही होता है जब इन सूत्र वाक्यों को पत्थर की लकीर माना जाए...हकीकत में राजनीति में सबसे ज्यादा महत्व अवसर का होता है...जिसे अवसर मिले वो शेर, जिसे ना मिले वो हो जाता है ढेर...मौजूदा वक्त में जिस तरह एक के बाद एक राज्यों में विपक्षी सरकारों को नेस्तनाबूद करने की परम्परा सी चल पड़ी है वो इसी बात का जीता जागता सबूत है...पहले अरुणाचल, फिर उत्तराखंड और अब निशाने पर है मणिपुर। आशंकित तो हिमाचल प्रदेश के सीएम वीरभद्र सिंह भी हैं.....सवाल उठ रहे हैं कि क्या केन्द्र सरकार उसी राह पर चल पड़ी है जिस राह को मोरारजी देसाई और इंदिरा गांधी की सरकारें अपना चुकी हैं....सवाल ये भी है कि राजनीति के इस बदलापुर फॉर्मूले से क्या वाकई लोकतन्त्र का भला हो रहा है...
किसी शायर ने क्या खूब कहा है मतलबपरस्ती, मौकापरस्ती तो खूबियों में शुमार है...लोग शरीफों को बेवकूफ कहा करते हैं...उत्तराखंड के ताजा हालात पर गौर करें तो ये शेर बिल्कुल सटीक बैठता है...मगर बात सिर्फ मौकापरस्ती तक ही होती तो और बात थी...यहां बात तो बदले की रणनीति और हनक वाली पॉलिटिक्स के इर्द गिर्द घूम रही है...बीजेपी और मोदी सरकार उत्तराखंड के माहौल को संविधान सम्मत बता रही है तो कांग्रेस इसे ओछी सियासत करार दे रही है
दरअसल मौजूदा वक्त में जिस तरह कांग्रेस की सरकारों को निपटाने का काम हो रहा है उसने सत्तर और अस्सी के दशक में पैदा हुए उस पॉलिटिकल राइवल की यादें ताजा कर दी हैं जिसकी पटकथा जनता पार्टी की सरकार और बाद में इंदिरा गांधी की सरकार के बीच लिखी गई...
कहानी की शुरुआत हुई थी 1969 में जब कांग्रेस दो हिस्सों में बंट गई...एक का नेतृत्व कामराज और मोरारजी देसाई कर रहे थे जबकि दूसरे की कमान इंदिरा गांधी के हाथ में थी...1971 के चुनाव में इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस को जबरदस्त बहुमत मिला...फिर जेपी आंदोलन और इमरजेंसी के बाद बने माहौल में जनता पार्टी की सरकार बनी...सत्ता संभालते ही मोरारजी देसाई ने 10 राज्य सरकारों को ये कहते हुए बर्खास्त कर दिया कि देश में कांग्रेस विश्वास खो चुकी है...इन दसों राज्यों में चुनाव हुए जिनमें सात राज्य यूपी, बिहार, हरियाणा, ओडिशा, एमपी, राजस्थान, और हिमाचल में जनता पार्टी सत्ता में आई जबकि तमिलनाडु में एआईएडीएमके प्रमुख एमजी रामचन्द्रन ने सरकार बनाई...जम्मू कश्मीर में जनता पार्टी की सरकार तो नहीं बनी मगर कांग्रेस की 13 में से 11 सीटें जनता पार्टी ने छीन लीं...जनता पार्टी सरकार के इस कदम का जवाब इंदिरा गांधी ने तब दिया जब 1980 में वो पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में वापस लौटीं...इंदिरा गांधी ने भी मोरारजी देसाई का जवाब देते हुए 22 राज्य सरकारों को बर्खास्त कर दिया...दोबारा चुनाव कराए और 15 राज्यों में कांग्रेस की सत्ता स्थापित की...
ये एक इतिहास है...जिसमें राजनीतिक बदले की कहानी नजर आती है...मगर तीन दशक बाद देश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाली बीजेपी आखिर इसी राह पर आगे क्यों बढ़ चली है...क्या राज्य सरकारों को निपटाने के ताजा मामले मोदी के कांग्रेस मुक्त भारत के नारे से जुड़ा अभियान है
अब आइए जरा मौजूदा राजनीतिक हालात पर नजर डालते हैं...कि कैसे आखिर सरकारों को निपटाने का प्लान चल रहा है...उत्तराखंड में 9 विधायक बागी हुए, स्टिंग ऑपरेशन आया और फिर हरीश रावत सरकार को बहुमत साबित करने का मौका दिए बगैर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया...इसके पहले अरुणाचल प्रदेश में कांग्रेस के 47 में से 21 विधायकों ने बगावत कर दी..बीजेपी के 11 विधायकों के साथ मिलकर नवाब टुकी सरकार को हटाने की कोशिश की...कांग्रेस के 14 विधायक अयोग्य करार दे दिए गए गए...मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, इस बीच राष्ट्रपति शासन लगा और आखिरकार बागी गुट के नेता कलिखाओ पुल बीजेपी के समर्थन से सीएम बन गए...अब मणिपुर में भी काग्रेस के 42 विधायकों में से 25 ने बगावत कर दी है...हाईकमान इसे सुलझाने की कोशिश में जुटा है
इन सबके बीच हिमाचल प्रदेश के सीएम वीरभद्र सिंह भी सहमे हुए हैं..उन्हें डर है कि उत्तराखंड पार्ट-2 हिमाचल में रिपीट हो सकता है..देश की सियासत में वक्त खुद को दोहरा रहा है...इसकी वजह बनी है दिल्ली और बिहार की करारी हार...जानकार मानते हैं कि राजनीतिक लड़ाई में ताकत के इस्तेमाल की वजह यहीं से निकली है...सवाल ये कि क्या सरकारी लोकतंत्र का ये खेल आगे भी चलने वाला है

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