शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

जात ना पूछो साधू की ...

कहते हैं संत, समाज को दिशा देते हैं, लेकिन बदले वक्त में इन्हीं संतों को सियासत की सीढ़ी बनाने की कोशिश होने लगे तो इसे क्या कहेंगे ? वाराणसी में कुछ ऐसा ही हुआ रविदास जयंती के मौके पर... मध्ययुग में धर्मनगरी वाराणसी में जन्मे संत रविदास ने समाज को न केवल दिशा दी बल्कि एकता और समानता का पाठ भी पढाया है ... उनके सिखाए सबक आज भी समाज को दिशा दे रहे हैं लेकिन सवाल ये है कि क्या सियासत भी उनसे कुछ सीख पाएगी ? फिलहाल तो रविदास की जयंती सियासी फेर में जरुर उलझती नजर आ रही है । मौका है संत रविदास को याद करने का .. उनकी शिक्षाओं को समझने का लेकिन तस्वीर वोटबैंक साधने की कोशिशों में ही फंसी नज़र आ रही है...
 
संत रविदास का जन्मस्थान सालों साल से उनके अनुयायिय़ों के लिए मंदिर रहा है ... जहां से लोग जीवनदर्शन के न जाने कितने ही सबक सीखकर आगे बढ़ते रहे ... लेकिन अब इस मंदिर से सियासत भी आगे बढ़ाने की कोशिशें हो रही हैं... वो भी संत रविदास की जयंती पर.... आगामी 22 फरवरी को रविदास जयंती के मौके पीएम मोदी वाराणसी के रविदास मंदिर में पहुंच रहे हैं साथ ही दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने भी जयंती पर होने वाले कार्यक्रम में हिस्सा लेने की बात कही है और इसी संत रविदास की जयंती को बहाना बनाकर  पूर्वांचल से लेकर पंजाब तक के रैदासी समाज को साधने की कोशिश भी हो रही है । 
 
लेकिन क्या देश के मौजूदा हालात में संत रविदास और उनकी सीख की बस इतनी ही अहमियत है कि उनके नाम पर उनसे जुड़े समाज को साधने की कोशिश होती रहे । जो एकता का पाठ पढाते रहे आज उनकी जन्मस्थली सियासत का कुरुक्षेत्र बनने जा रही है। मोदी और केजरीवाल के रविदास 'प्रेम' के बाद बीएसपी भी खासी सतर्क हो गई है और आनन-फानन में अपना भी अलग कार्यक्रम रख लिया है, लेकिन इस  पूरी सियासी गहमा-गहमी के बीच वो रविदास तो कहीं खो ही गए जिनके लिए इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म रहा । 
 
जिन संत रविदास पर इतनी सियासी कसरत हो रही है उनके बारे में विस्तार से जानना भी जरूरी है । 
भारत की मध्ययुगीन संत परम्परा में संत रविदास का बेहद ही अहम स्थान रहा है । हमेशा से ही जातिप्रथा के विरोधी रहे संत रविदास ने पूरी जिंदगी समाज में फैली कुरीतियों को दूर करने और जाति, वर्ग और धर्म की दूरियों को मिटाने की कोशिशों में लगा दी। धर्म के नाम पर लड़ रहे लोगों का विरोध करते हुए वो कहते थे ...
 
'मंदिर मस्जिद दोऊ एक हैं इनमह अन्तर नाहि
रविदास राम,रहमान को झगड़ऊ कोई नाहि’
 
सबसे दिलचस्प तो ये रहा कि संत रविदास ने न तो किसी स्कूल में शिक्षा ली और ना ही किसी गुरु से शिक्षा ली । उन्होने अपनी जिंदगी को ही एक प्रयोगशाला बना दिया जहां जीवनदर्शन से जुड़े तमाम ऐसे सिद्धांत निकले जिनकी सार्थकता आज भी कायम है । बस जरुरत उन्हें समझने की है, उसे साकार करने की है... लेकिन आज माहौल देखकर कह सकते हैं कि शायद इससे किसी भी सियासी पार्टी का कोई लेना-देना ही नहीं है ..
 
अब अगर यूपी में मिशन 2017 पर नज़र डालें तो 2017 के चुनाव में जुटे तमाम सियासी दल प्रतीकों के सहारे जातीय गोलबंदी में जुट गए हैं । बीजेपी राजा सुहेलदेव के सहारे पासी समाज के लोगों को अपने पाले में खींचने की कोशिश में है, तो वहीं कांग्रेस "दलित कॉन्क्लेव"  कर दलितों को लुभाने की कोशिशों में जुटी हैं । बीजेपी ने 22 फरवरी को संत रविदास की जयंती मनाने का फैसला लिया है । साथ ही राजा सुहेलदेव की स्मृति में बहराइच में 24 फरवरी को कार्यक्रम होगा जिसमें खुद बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह शिरकत करेंगे । बाद में सुहेल देव से जुड़े कार्यक्रम पूरे प्रदेश में आयोजित कराए जाने की योजना है । साफ है कि प्रदेश में 2017 के चुनावी संग्राम को देखते हुए सभी दलों ने दलित वोटों को रिझाने की कवायद शुरू कर दी है
 
दरअसल कबीर और रैदास भारतीय साहित्य की ऐसी शख्सियत हैं जिन्होंने भारतीय समाज को बदलने और सामाजिक न्याय के लिए हमेशा कोशिश की । दोनों ने छुआछूत और सामाजिक गैरबराबरी के खिलाफ आवाज उठाई, श्रमिकों के हित की बात की, लिहाजा दलितों के बीच रैदास खासे प्रतिष्ठित हुए । तुलसी से करीब 100 साल पहले ही रैदास की मृत्यु हुई थी । मगर ये बात कम ही लोग जानते हैं कि तुलसी ने जिस रामराज की कल्पना की थी वो संत रैदास के बेगमपुर की कल्पना पर आधारित था । जानकार मानते हैं कि रैदास को अगर सियासत में ज्यादा महत्व मिल रहा है तो इसके पीछे दलित पॉलिटिक्स ही है । अम्बेडकर के नाम पर जो दलित नहीं तोड़े जा सके उनके लिए नए आइकॉन गढ़े जा रहे हैं ।

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