गुरुवार, 18 फ़रवरी 2016

जेएनयू मुद्दा : मौलिक अधिकार या राजनैतिक व्याभिचार

आजकल देश में बोलने की आजादी और मौलिक अधिकारों पर बहस तेज हो चुकी है । कुछ हद तक ये सही भी है क्योंकि ऐसे मुद्दों पर बहस होनी चाहिए, लेकिन ये बहस कब हो रही है ये समझना भी जरूरी है ।
ये बहस ऐसे वक्त में हो रही है जब जेएनयू का विवाद सुर्खियों में है । एक पक्ष है जो जेएनयू को राष्ट्रद्रोही घोषित करने पर तुला है तो दूसरा पक्ष है जो संविधान का हवाला देकर ये बता रहा है कि उसने जो किया है जो कहा है वो उसका संवैधानिक अधिकार है । ऐसे में हमारे सामने आज कई सवाल खड़े हो रहे हैं, कि क्या बोलने की आजादी के लिए भी कोई लक्ष्मणरेखा है ? क्या वाकई बोलने की आजादी के नाम पर राष्ट्रविरोध की हद तक जाने की संविधान छूट देता है ? इसके साथ ही सवाल ये भी है कि जेएनयू मसले को लेकर हो रही सियासत में क्या असल राष्ट्रवाद पर बहस हो पा रही है ? ये वही राष्ट्रवाद है, जिसकी रक्षा करने की भी नसीहत हमारा संविधान देता है। संविधान अगर मौलिक अधिकारो की बात करता है तो मूल कर्तव्यों की भी बात करता है .. कहीं ऐसा तो नहीं कि संविधान की रक्षा के नाम हो रहा ये पाखंड देश की सम्प्रभुता पर भारी पड़ने वाला है ?
 
फिलहाल हमें जरूरत है ये कि हम संविधान का पालन करें, उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करें, स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोये रखें, भारत की प्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करें,  देश के लिए आह्वान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करें । क्योंकि संविधान में लिखे ये वो मूल कर्तव्य हैं जिन्हें अक्सर बोलने की आजादी, और मौलिक अधिकारों की दलीलें देकर भुला दिया जाता है ।
 
जेएनयू जो कि देश की एक प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी है, वहां 9 फरवरी को कुछ ऐसे नारे गूंजे थे, जो देश की अखंडता और प्रभुता के खिलाफ थे । नारे किसने लगाए ? क्यों लगाए ? किसकी शह पर लगाए ? ये सबकुछ जांच का विषय है मगर इन सबके बीच एक सच ये है कि यहां नारे लगे थे, जो देश के खिलाफ थे । अब हंगामा इस बात पर हो रहा है कि बोलने की आजादी और मौलिक अधिकारों को कुचला जा रहा है लेकिन क्या वाकई ये पूरा सच है?
 
दरअसल जेएनयू की नारेबाजी का विवाद अब जिस स्थान पर खड़ा है वहां से इस तरह की वैचारिक बहस के लिए ज्यादा Scope बचा भी नहीं है । एक ओर जहां भगवा झंडे लहरा रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर लाल झंडों के तले संवैधानिक अधिकारों की दुहाई दी जा रही है । होड़ इस बात की मची है कि कैसे खुद को राष्ट्रभक्त और दूसरे को राष्ट्रविरोधी करार दिया जाए । लेकिन इन सब में असल मसला गायब है । ये सच है कि वैचारिक प्रतिबद्धता और बहसों की गुंजाइश स्वस्थ लोकतन्त्र के लिए जरूरी है मगर किस हद तक जरूरी है ये एक बड़ा सवाल है ।
 
आज बौद्धिक बहसों के शानदार केन्द्र रहे जेएनयू से निकले राष्ट्रविरोधी सुर सवाल खड़े कर रहे हैं...  आज सवाल खड़े हो रहे हैं उस व्यवस्था पर जिसने इस तरह का माहौल खड़ा करने का मौका दिया और अब संवैधानिक दलीलों के सहारे संविधान की भावना की धज्जियां उड़ाने वालों के पक्ष में खड़ा नजर आ रहा हैं ... जेएनयू में जो कुछ हुआ वो संविधान के उल्लंघन का मुद्दा है, जिसमें पुलिस और कानून की सीधी जिम्मेदारी बनती है, बीजेपी या कांग्रेस की नहीं।
 
दरअसल भारतीय संविधान में दिए गए मूल अधिकारों के पालन के लिए ना तो कोई इनाम देने की व्यवस्था है और ना ही कर्तव्यों के उल्लंघन के लिए किसी तरह की सजा का प्रावधान । लेकिन भारतीय दंड संहिता यानी Indian Penal Code में इसके लिए जरूर कुछ clause हैं जिसके आधार पर केस बनाकर मुकदमा चलाया जा सकता है । अब सवाल ये है कि फिर ऐसे में जेएनयू मामले को लेकर मचा शोर क्या उन लोगों की संविधान को लेकर अधूरी जानकारी का सबूत नहीं है, जो मौलिक अधिकार तो जानते हैं मगर कर्तव्यों को लेकर चुप हैं । जिन्हें बोलने की आजादी छिनने का डर तो सताता है लेकिन मूल कर्तव्य की मर्यादा भंग होने की कोई  फिक्र नहीं । आज हमारे लिए ये जानना भी बहुत जरूरी है कि आखिर भारतीय संविधान में लिखित मूल कर्तव्यों में क्या कहा गया है । आखिर मौलिक अधिकार के अलावा एक सामान्य भारतीय नागरिक के कर्तव्य क्या-क्या हैं ।

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