गुरुवार, 11 फ़रवरी 2016

इतिहास के सियासी सबक !

उत्तर प्रदेश में 2 महीने से चल रहे पंचायत चुनावों के दौर ने खतरे की घंटी बजाई है...वो खतरा जिसने कभी पश्चिम बंगाल की पहचान बदल दी थी...अब उत्तर प्रदेश में दस्तक दे रहा है...पंचायत चुनावों में जिस तरह हिंसा हुई है जिस तरह सरकारी तन्त्र के जरिए प्रायोजित दबंगई दिखाई गई है उसने सवाल खड़े कर दिए हैं कि क्या उत्तर प्रदेश में भी बंगाल की तर्ज पर समानान्तर असामाजिक तत्वों का कैडर खड़ा हो रहा है...क्या मुलायम सिंह यादव अतीत के सबक भूल चुके हैं...
 
उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत के साथ 2012 में सत्ता पाने वाली समाजवादी पार्टी की सबसे ज्यादा किरकिरी उसके बेलगाम नेताओं और कार्यकर्ताओं की करतूतों के चलते हुई है...खुद पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव भी कई बार अपने सिपहसालारों को चेतावनी दे चुके हैं मगर इसका परिणाम कुछ नहीं निकला....बीते दो ढाई महीनों से जारी पंचायत चुनावों के दौर में हर जिले, हर कस्बे, हर इलाके में समाजवादी नेताओं की दबंगई के किस्से आम हुए हैं... बात चाहे शामली में हुई फायरिंग की हो या मंत्री रहे तोताराम के बूथ कैप्चरिंग की तस्वीरें हों.. इलाहाबाद में हुए हिंसक संघर्ष का मामला हो...हर जगह समाजवादी पार्टी से जुड़े लोगों के नाम आए हैं.. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि कहीं सरकारी तन्त्र ही तो संस्थागत तरीके से असामाजिक तत्वों का कैडर तैयार करने में नहीं जुटा है...वरना जिस तरह से  हिंसा प्रधान के चुनाव से लेकर जिला पंचायत और ब्लॉक प्रमुख के चुनावों में देखी गई है उसके बाद तो कायदे से निष्कासन निलंबन की फेहरिस्त बन जानी चाहिए थी जो नहीं बनी...मीडिया में कुछ खबरें सुर्खियां बनने के बाद थोड़ी बहुत कार्रवाई हुई जो सिवाय दिखावे के ज्यादा कुछ नहीं लगती...
 
आजादी के बाद पश्चिम बंगाल में संस्थागत तरीके से असामाजिक तत्वों का कैडर खड़ा करने की बड़ी तस्वीर दिखी है ...जहां लेफ्ट ने तीन दशक तक राज किया...वजह थी ग्राम पंचायत, ब्लॉक और जिला स्तर पर एक ऐसा समानान्तर कैडर का होना जो वक्त पड़ने पर बूथ कब्जाने  से लेकर बमबाजी, गोलीबारी करने तक से बाज नहीं आता था...एक दौर ऐसा भी आ गया जब सरकारी योजनाओं को लागू करने का जिम्मा भी इसी  कैडर पर आ गया...पश्चिम बंगाल के उदाहरण को बिहार में भी आजमाया गया...जातीय संघर्ष बढ़े...कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ गई मगर सत्ता बनी रही... हालांकि ऐसा लंबे वक्त तक नहीं चला ... जनता ने इस तरह का दौर ना तो पश्चिम बंगाल में बर्दाश्त किया औऱ ना ही बिहार में...पश्चिम बंगाल में लेफ्ट का तीन दशक पुराना किला ध्वस्त हुआ तो बिहार में लालूराज खत्म हुआ...... आज लेफ्ट पार्टियों की राजनीतिक हैसियत लगातार घटी है...किसी जमाने में लोकसभा राज्यसभा में अच्छी संख्या रखने वाली लेफ्ट पार्टियां अब सिंगल डिजिट में सिमटती नजर आ रही हैं...सवाल ये कि क्या ये नजीर भी उत्तर प्रदेश सरकार और समाजवादी पार्टी के दिग्गजों को नहीं दिखती....
 
इतिहास गवाह है कि जब जब शासन तन्त्र निरंकुश हुआ है या फिर सरकारी तन्त्र के समानान्तर कोई ताकत बनी है...तो क्रांति हुई है...सिर्फ भारत ही नहीं दुनिया में ऐसे तमाम उदाहरण हैं जब जनता ने सब्र खोया है और ताकतवर से ताकतवर तन्त्र को उखाड़ फेंका है...यूरोप से लेकर चीन तक की क्रांति इसका उदाहरण हैं जहां जनता ने दमन के खिलाफ मुखर होकर आवाज बुलंद की और शासन तन्त्र की ओर से स्पांसर्ड अराजकता को खत्म कर दिया...
 
दमन के खिलाफ जनक्रांति के जरिए सत्ता उखाड़ फेंकने का सबसे बड़ा उदाहरण है यूरोप... मौजूदा यूरोप की चमक-दमक के पीछे क्रांतियों का एक लम्बा इतिहास रहा है... लंदन हो, पेरिस हो या फिर इटली और जर्मनी...आधुनिकता की परिभाषा गढ़ रहे इन देशों ने सैकड़ों सालों तक दमन का दौर झेला है...
 
500 ईसापूर्व में पैदा हुईं रोमन और यूनानी सभ्यताओं से शुरु हुआ राजतन्त्र का सफर करीब डेढ़ हजार साल तक चला...इस दौर ने अभिजात्य वर्ग और निम्न वर्ग की लम्बी खाई पैदा की...पादरी वर्ग सत्ता के समर्थन से समानान्तर सत्ता चलाता था...यूरोपीय देशों के संसाधनों पर लम्बे वक्त तक इसी वर्ग का कब्जा रहा...ये वो लोग थे जिन्हें हत्या जैसे संगीन अपराध में भी सिर्फ जुर्माना लेकर छोड़ दिया जाता था...आबादी के महज 3 से 4 प्रतिशत लोगों के हाथों में ताकत थी बाकी आवाम निरंकुश राजतन्त्र का दमन सहने को मजबूर थी...ऐसे दौर में 1789 में फ्रांस की क्रांति हुई...दस साल तक चली इस क्रांति ने फ्रांस के निरंकुश शासन लुई चौदहवें की सत्ता उखाड़ फेंकी...हालांकि फ्रांस को पूर्ण गणतन्त्र बनने में इसके बाद भी दो सौ साल लग गए मगर फ्रांस की क्रांति ने यूरोप के दूसरे देशों ही नहीं चीन जैसे देश में भी सत्ता की निरंकुश नीति के खिलाफ जनजागरण कर दिया...नतीजा यूरोप समेत दुनिया के कई देशों में गणतन्त्रों की स्थापना होने लगी...1911 में चीन की क्रांति ने अगर मंचूरियन राजवंश का खात्मा कर दिया तो...तो इससे प्रेरणा लेकर इसी के कुछ वक्त बाद रूसी क्रांति भी हुई...
 
दुनिया की इन क्रांतियों का जन्म आम आवाम की अनदेखी....गरीबी, भुखमरी, और लगातार अराजकता की वजह से हुई ... इसके पीछे वजह है सत्ता का वो चरित्र जो किसी भी कीमत पर अपनी स्थिति मजबूत रखना चाहता है और इसके लिए उसे राजनीतिक अराजकता तक से परहेज नहीं है... लेकिन अवाम ऐसी अराजकता को झेलने के बाद अगर दुनिया का भूगोल बदल सकती है...बड़े से बड़े राजतन्त्र को मिट्टी में मिला सकती है तो इससे सबक लेना जरूरी है...सत्ता प्रायोजित हिंसा को सहन करने की भी एक सीमा होती है...नेताजी को भी इसे समझना होगा 

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