सोमवार, 26 दिसंबर 2016

अखिलेश का आगाज़, सपा में 'कामराज'

समाजवादी पार्टी के घरेलु संग्राम में शिवपाल सिंह यादव और अखिलेश यादव के बीच मोर्चा खुल गया है, उत्तर प्रदेश के मौजूदा सियासी हालात ऐसे हैं कि टिकट बंटवारे के मसले पर परिवार और पार्टी में बंटवारे के हालात बनते जा रहे हैं । राजनीति होती ही ऐसी है जहां  व्यक्तिगत Political Future और Agenda रिश्तों और भावनात्मक जुड़ाव पर हावी हो जाता है, और इन सबके बीच लगता है कांग्रेस अपने उस रिवाइवल प्लान पर काम कर रही है जैसा वो पहले करती आई है ।

जहां तक अखिलेश यादव और उनके विरोध से पैदा हो रहे हालात की बात है तो समाजवादी पार्टी ऐसी पहली पार्टी नहीं है जो इस मुश्किल से गुज़र रही हो, भारतीय राजनीति के इतिहास के पन्नों पर नज़र डालें तो इससे पहले भी ऐसी कई घटनाएं हुई हैं जब पार्टी के अंदर ही पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ बगावत हुई हो और पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार के खिलाफ पार्टी में ही बने दूसरे ग्रुप ने अपना उम्मीदवार खड़ा कर उसे जिता दिया हो । अगर सीधे बात करें तो इंदिरा गांधी ने राष्ट्रपति चुनाव में पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी के खिलाफ अपना उम्मीदवार उतारा और उन्हें समर्थन दिलाने में कामयाबी भी हासिल की, इसके कुछ समय बाद कांग्रेस में विभाजन हो गया था और पूरी पार्टी पर इंदिरा गांधी ने कब्जा कर लिया । शायद अखिलेश यादव भी इसी राह पर चल रहे हैं ।

कांग्रेस पार्टी की ये खासियत रही है कि वो अपने रिवाइवल के लिए या अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखने के लिए मौका मिलने पर धुर विरोधियों से भी हाथ मिला सकती है, या अपने विरोधी को मात देने के लिए किसी को भी समर्थन दे सकती है । 1977 में लगी इमरजेंसी के बाद कांग्रेस की हालत ये थी कि खुद इंदिरा गांधी अपनी सीट नहीं बचा पाई । कुछ समय तक शांत रहकर कांग्रेस ने तत्कालीन सियासी हालात में खुद को दोबारा स्थापित करने की कोशिश शुरू कर दी थी । देश में जनता पार्टी की सरकार थी जिसमें चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में मतभेद शुरू हो गए थे । इंदिरा गांधी ने इस मतभेद को बढ़ावा देना शुरू किया था । बाद में कांग्रेस की मदद से चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बनने में कामयाब हो गए लेकिन कांग्रेस ने कुछ ही महीनों में अपना समर्थन वापस ले लिया और चौधरी चरण सिंह की सरकार गिर गई । इस Political disturbance की वजह से इंदिरा गांधी की पार्टी Congress (I) को स्थापित होने का मौका मिला और 1980 में हुए आम चुनावों में कामयाबी भी हासिल हुई ।

कांग्रेस को एक बार फिर हार का स्वाद तब चखना पड़ा था जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे ... कांग्रेस से हटकर वी पी सिंह ने पार्टी के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी.. वी पी सिंह ने कई छोटी पार्टियों को मिलाकर जनता दल बनाया, बाद में इनकी सरकार बनी और वी पी सिंह प्रधानमंत्री बन गए । कांग्रेस सत्ता से बाहर होकर जनता दल के अंदरूनी हालात पर नज़र रख रही थी ।  इसीलिए जब जनता दल का अंदरूनी कलह सतह पर आने लगा तो वी पी सिंह के शुरू से ही विरोधी रहे चंद्रशेखर को राजीव गांधी ने बाहर से समर्थन दे दिया । चंद्रशेखर अपने समर्थकों को लेकर जनता दल से अलग हो गए और कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री भी बन गए ।  हालांकि ये गठबंधन ज्यादा दिन तक नहीं चला, कुछ ही महीनों में राजीव गांधी ने समर्थन वापस ले लिया और चंद्रशेखऱ की सरकार गिर गई । ये परंपरा सोनिया गांधी और राहुल गांधी के वक्त में भी जारी रही ... जब सोनिया गांधी ने पार्टी को मजबूत करने के लिए उन लोगों का समर्थन लेने से भी परहेज़ नहीं किया जिन पर राजीव गांधी की हत्या की साजिश करने वालों में शामिल होने के आरोप लगते रहे थे ... तो राहुल गांधी UPA 2 की सरकार के दौरान विरोधी पार्टी बीजेपी के साथ सरकार चला रहे नीतीश कुमार की तारीफ करने से कभी नहीं चूके और बाद में नीतीश कुमार के बीजेपी से अलग होने पर जेडीयू के समर्थन में आ गए ।

उत्तर प्रदेश के मौजूदा सियासी हालात को देखकर ये कहा जा सकता है कि अखिलेश यादव भारतीय राजनीति की इन घटनाओं से काफी प्रभावित हैं,  उनके लिए शायद ये पार्टी पर कब्जा करने, अपनी साफ और बेदाग छवि के आधार पर पार्टी पर एकाधिकार बनाए रखने का उपयुक्त मौका है ।  बीते दिनों अखिलेश ने पार्टी आलाकमान के खिलाफ जाकर कई बार पर अपनी अलग Identity, अलग image बनाने की कोशिश की है, अपने फैसलों को पार्टी और सरकार पर थोपना चाहा है।  पिछले कुछ दिनों से  जिस तरह की घटनाएं देखने को मिल रही हैं और जिस तरह की खतो-किताबत का दौर एक बार फिर शुरू हो गया है, उससे लगता है कि आने वाले विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव पार्टी के अंदर ही एक प्रेशर ग्रुप बनाकर पार्टी आलाकमान को या तो मजबूर करेंगे कि उनके नेतृत्व को, उनकी कार्यशैली को पार्टी में accept किया जाए और अगर पार्टी आलाकममान या पार्टी का रैंक एंड फाइल उनकी इस कार्यशैली के खिलाफ है तो उसके विरुद्ध अखिलेश अपने प्रेशर ग्रुप के जरिए parallel संगठन खड़ा करने की कोशिश करेंगे और इस चुनाव में अपने चहेते लोगों को टिकट देकर चुनाव लड़ाएंगे ।

अब जब एक बार फिर ये लग रहा है कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी दो फाड़ होने की कगार पर है तो कांग्रेस अपनी पुरानी सियासी चाल चलने को बेताब है । बीते कुछ महीनों में हुए development में यादव परिवार के झगड़े से कमजोर पड़ी समाजवादी पार्टी में  युवा वर्ग और कुछ वरिष्ठ नेता अखिलेश यादव के साथ हैं तो समाजवादी पार्टी के ज्यादातर veteran शिवपाल सिंह यादव के साथ नज़र आ रहे हैं । ऐसे में लग रहा है कि अखिलेश यादव इंदिरा गांधी के नक्शेकदम पर चलना चाहते हैं ... और कांग्रेस पार्टी परिवार से अलग हो रहे अखिलेश के इस डगमगाते हुए सियासी कदम में उनका सहारा बनने को तैयार है । 

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2016

Demonetization से हट जाएगी गरीबी ?

इंडिया में दूसरी बार गरीबों का नाम लेकर वोट बैंक बढाने की कोशिश हो रही है ... पहली बार 1971 में इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था .. इंदिरा ने कहा,  गरीबी हटाओ देश बचाओ,  जबकि उनके विरोधी उस वक्त नारा दे रहे थे इंदिरा हटाओ देश बचाओ । इसका असर ये था कि इंदिरा अपनी हर रैली में अपने विरोधियों पर अपनी हर जनसभा में कहती थीं कि हम देश से गरीबी हटाने की बात कर रहे हैं तो वहीं विरोधी मुझे हटाने की बात कर रहे हैं । तब से लेकर आज तक देश की राजनीति गरीबी और भ्रष्टाचार मिटाने के नाम पर होती रही है ।

भ्रष्टाचार, विकास और governance के मुद्दे पर चुनाव जीतकर सत्ता में आए नरेंद्र मोदी भी सरकार में ढाई साल पूरे होने के बाद गरीबी हटाने की ही बात कर रहे हैं, और उनका मानना है कि गरीबों की दशा और दिशा बदलने के लिए नोटबंदी सबसे कारगर फैसला है और demonetization की कामयाबी के साथ ही देश से गरीबी समाप्त हो जाएगी ।

पहले तीन दिन, फिर 50 दिन और अब अनिश्चितकाल की मांग करने वाले नरेंद्र मोदी गरीबी मिटाने में कितना
कारगर साबित होंगे इसका आंकलन तो आने वाला समय करेगा, फिलहाल demonetization के बाद सामने आए आंकड़ों पर नज़र डालें तो देश में कैश के रूप में ब्लैक मनी रखने वालों की संख्या महज 6 फीसदी ही सामने आई है ।

अब सवाल ये उठता है कि क्या Demonetization अमीर और गरीब के बीच की बढ़ती खाई को पाटने में कारगर साबित होगा ? क्या Demonetization सही मायनों में गांधी, दीनदयाल और डॉ लोहिया द्वारा पारिभाषित अर्थव्यवस्था स्थापित करने में सहयोगी होगा ? क्या Demonetization देश में ग्राम स्वराज (Village Republic) और Integral Humanism के जीवन दर्शन को साकार कर पाएगा ?

ये सवाल इसलिए क्योंकि 2015 के युनाइटेड नेशंस के आंकड़ों के मुताबिक भारत की लगभग 1 अरब 20 करोड़ की आबादी में से करीब 24 फीसदी आबादी गरीब है ...  वर्ल्ड वेल्थ रिपोर्ट के मुताबिक भारत की 1 फीसदी सुपर रिच आबादी के पास देश के total wealth का लगभग 59 फीसदी हिस्सा है, यानि बाकी के 99 फीसदी लोग बाकी बचे चालीस फीसदी वेल्थ पर निर्भर करते हैं । भारत में भले ही 1991 के Economic liberalization के बाद गरीबों का प्रतिशत घटा है लेकिन ये भी सच है कि अमीरों के गरीबों के बीच का फासला लगातार बढ़ता जा रहा है । इसी साल आए India Human Development Survey (IHDS) की रिपोर्ट के मुताबिक आम भारतीय नागरिक गरीब है, सुपर रिच और रिच के बाद जो वेल्थ गरीबों के खाते में बचता है वो देश के total wealth का सिर्फ चार फीसदी है । Credit Suisse data के मुताबिक साल 2000 में भारत के सुपर रिच के पास total wealth का महज 36 फीसदी ही था जो 2016 में 59 फीसदी हो चुका है ।

नोटबंदी को लेकर ज्यादातर economists ने भी शंका ज़ाहिर की है नोबल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने Demonetization को Despotic action यानि तानाशाही या स्वच्छंद कार्रवाई करार दिया है तो Black Economy in India के लेखक प्रोफेसर अरुण कुमार ने भी ये साफ कर दिया है कि Demonetization देश से ब्लैक मनी का खात्मा करने में कामयाब नहीं होगा और हो सकता है कि देश की अर्थव्यवस्था पर इससे बुरा असर पड़े । अरुण कुमार ने साफ किया है कि ब्लैक मनी पर रोक लगाने के लिए ब्लैक इनकम को रोकना जरूरी है । अरुण कुमार मानते हैं कि नोटबंदी black wealth generation को रोकने में कामयाब नहीं होगा ।

वहीं जेएनयू के प्रोफेसर रहे अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक का कहना है कि नोटबंदी ने एक तरफ अगर शॉर्ट टर्म के लिए जनता को परेशान किया है तो लॉन्ग टर्म में अर्थव्यवस्था के लिए भी नुकसानदेह है .. प्रभात पटनायक की दलील है कि demonetization के बाद बैंक में लगभग नब्बे फीसदी scrapped notes का वापस आ जाना ये साबित करता है कि नोटबंदी का ये कदम ब्लैक मनी को खत्म नहीं कर रहा...

हालांकि  Demonetization को कई लोग सही भी करार दे रहे हैं इसमें reserve bank of India के पूर्व गवर्नर सी रंगराजन और डी सुब्बाराव भी शामिल हैं । डी सुब्बाराव कहते हैं कि नोटबंदी से अर्थव्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ेगी जो कारोबारी सहूलियत को बढा देगा तो वहीं इससे कई हज़ार रुपए के बाहर आ जाने से भारत की उत्पादन क्षमता बढ़ेगी । पूर्व गवर्नर सी रंगराजन मोदी सरकार के Demonetization के फैसले को black money के खिलाफ एक कामयाब कदम बता चुके हैं । वहीं ICICI बैंक की एमडी चंदा कोचर भी Demonetization को game-changer बता चुकी हैं और मानती हैं कि इससे महंगाई कम करने में मदद मिलेगी तो एक्सिस बैंक की एमडी शिखा शर्मा ने इसे सरकार का bold move करार दिया है जो ब्लैक मनी और terror funding के खिलाफ एक कारगर कदम साबित हो सकता है ।

तमाम दलीलों के बीच सवाल यही उठता है कि क्या demonetization गरीबों के लिए फायदेमंद है ? क्या सचमुच इससे black money खत्म हो जाएगी,  गरीबी खत्म हो जाएगी, terrorists को Fund मिलना बंद हो जाएगा ? इसका जवाब शायद आने वाले दिनों में मिल पाए । 

मंगलवार, 29 नवंबर 2016

रैली है बहाना, मोदी हैं निशाना

नोटबंदी के खिलाफ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की लखनऊ में रैली किसी को भी हैरान कर सकती है ... सवाल सियासी मायनों का है .. आखिर ममता बनर्जी ने प्रदर्शन के लिए लखनऊ को क्यों चुना ये विरोध तो पश्चिम बंगाल में भी रहकर जताया जा सकता था या फिर दिल्ली में ...  लेकिन ये सियासत है जहां हवा का रुख पहचान कर दांव खेले जाते हैं ..

लखनऊ की रैली के बहाने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच नजदीकियां देखी जा रही हैं ...मसला नोटबंदी का है, ममता बनर्जी शुरु से ही इसका मुखर विरोध करती रही हैं ... अखिलेश यादव भी इस पर सवाल उठा चुके हैं ..... इसीलिए अखिलेश यादव ममता बनर्जी को मेहमान और सीनियर बताकर उनसे मिलने पहुंच गए तो वहीं ममता ने लखनऊ आने का मकसद मौजूदा हालात का विरोध करना बताया है ... हालांकि इन सभी घटनाक्रमों के सियासी मायने हैं ... सवाल ये उठता है कि क्या नोटबंदी के बहाने ममता और अखिलेश अपना कोई सियासी मकसद पूरा करना चाहते हैं... उत्तर प्रदेश में ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस की युनिट सक्रिय नहीं है ऐेसे में ग्राउंड लेवल पर बिना किसी सपोर्ट के इतनी बड़ी रैली कर पाना क्या मुमकिन है .. इससे भी बड़ा सवाल ये कि बिना किसी सियासी मकसद के कोई भी राजनीतिक पार्टी ऐसी रैली करेगी ही क्यों .... ऐसे में साफ है कि इस रैली के सियासी मायने भी हैं और इसमें समाजवादी पार्टी को भी अपना फायदा नज़र आ रहा है .. नहीं तो अखिलेश यादव ममता बनर्जी का खुले दिल से स्वागत करते ही क्यों .. और तृणमूल कांग्रेस की रैली के आयोजन को सफल बनाने  के लिए समाजवादी पार्टी के नेता और कार्यकर्ता क्यों दिन-रात एक करते ... असल में अखिलेश को उत्तर प्रदेश में तो ममता को बंगाल में बीजेपी और खासतौर पर प्रधानमंत्री मोदी से कड़ी चुनौती मिल रही है...  

 पश्चिम बंगाल में बीजेपी लगातार मज़बूत हो रही है , बंगाल में हाल के उपचुनाव में बीजेपी दूसरे नंबर पर रही, ये परिणाम तृणमूल कांग्रेस के लिए एक चेतावनी हैं ...दूसरे ममता बनर्जी खुद को राष्ट्रीय स्तर का नेता प्रोजेक्ट करना चाहती हैं इसीलिए मसला चाहे नोटबंदी का हो कोशिश मोदी की सियासी धार कुंद करने की है...  कमोबेश यही हाल उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का भी है .. प्रदेश में अखिलेश यादव को सबसे बड़ी चुनौती बीजेपी से मिल रही है और मौजूदा हालात में बीजेपी की सबसे बड़ी सियासी ताकत खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं ...

हालांकि समाजवादी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस के बीच पहले भी नजदीकियां देखी गईं हैं लेकिन उस वक्त इनका ब्रेकअप होने में भी ज्यादा वक्त नहीं लगा था .. मसला ज्यादा पुराना नहीं है ... मौका था 2012 में हुए राष्ट्रपति चुनाव का, जब तृणमूल कांग्रेस प्रणब मुखर्जी को वोट देने के पक्ष में नहीं थी ... मुलायम सिंह यादव कई दिनों तक ममता बनर्जी के इस फैसले का समर्थन करते रहे थे लेकिन ऐन वक्त पर मुलायम ने अपना पाला बदल लिया ... जिसके बाद दोनों पार्टियों के रिश्तों में खटास आ गई थी ... हालांकि
इस बात को अब एक अरसा गुज़र चुका है और देश के सियासी हालात भी बदल गए हैं ... तो एक बार फिर नोटबंदी के बहाने अखिलेश यादव और ममता बनर्जी नई सियासी जुगलबंदी में जुटे हैं ... 

सोमवार, 21 नवंबर 2016

मार्क्स, गांधी और मोदी के सपनों का भारत

समाज में समानता का सपना तो देश-दुनिया के कई चिंतकों ने देखा....साम्यवाद के जन्मदाता कार्ल मार्क्स से लेकर एकात्म मानववाद का दर्शन देने वाले पंडित दीनदयाल उपाध्याय तक ने समाज में गैर बराबरी और HAVES AND HAVE NOTS के बीच की खाई को पाटने की बात कही... लेकिन हकीकत के धरातल पर इस सपने को उतारा नरेंद्र मोदी ने...

महात्मा गांधी और समाजवाद के पुरोधा डॉक्टर राममनोहर लोहिया भी गैर बराबरी मिटाने के पक्षधर थे...लेकिन जिस साहस से नरेंद्र मोदी ने कदम उठाया, उतना साहस शायद ही इतिहास में किसी महान नेता या चिंतक ने दिखाया हो... ये दावा नरेंद्र मोदी के समर्थकों का है... मोदी समर्थकों का मानना है कि Demonetization की वजह से जहां एक तरफ काले धन पर लगाम लगेगी तो वहीं दूसरी तरफ आर्थिक विषमता और आर्थिक गैर बराबरी का खात्मा होगा....खुद पीएम मोदी भी कमोबेश ऐसा ही दावा कर रहे हैं...

Demonetization के फैसले के साथ खड़े लोगों का मानना है कि ये फैसला समाज के आधार में मूलचूल परिवर्तन लाने वाला साबित होगा... धनकुबेरों की तिजोरियां खाली होंगी... तो गरीब और किसान के हाथ में पूंजी आएगी....समाज में संसाधनों का समान बंटवारा होगा....यही मार्क्स का साम्यवादी समाज है...

मार्क्स ने अपनी थ्योरी में कहा था कि इस दुनिया में दो तरह के लोग है...एक वो जिनके पास है, दूसरे वो जिनके पास नहीं है... यानी 'HAVES & HAVE-NOTS' ... HAVES को मार्क्स ने पूंजीपति कहा और HAVE-NOTS को श्रमिक वर्ग बताया... समाज में धन-दौलत के इसी असमान बंटवारे को मार्क्स ने बताया... मोदी अब इसी असमान बंटवारे को खत्म कर रहे हैं ...

पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने भी कतार में खड़े अंतिम व्यक्ति की बात की.... मोदी समर्थकों का दावा है कि Demonetization से सबसे ज्यादा ये कतार में खड़ा समाज का अंतिम व्यक्ति ही मजबूत होगा...समाज में गैरबराबरी मिटेगी....और अमीर और गरीब के बीच की खाई पट जाएगी ....

लोहिया समाजवादी थे... राजनीतिक अधिकारों के पक्षधर रहे डॉ. लोहिया ऐसी समाजवादी व्यवस्था चाहते थे जिसमें सभी की बराबर की हिस्सेदारी रहे...  वह कहते थे कि सार्वजनिक धन समेत किसी भी प्रकार की संपत्ति प्रत्येक नागरिक के लिए होनी चाहिए ... लोहिया की सारी चिंता मानव विकास की यात्रा में बढ़ती असमानता थी... वे मानते थे कि उसी असमानता से गुलामी और दमन का रास्ता साफ होता है और बाद में उसी से युद्ध की स्थितियां बनती हैं... लेकिन, उनकी खासियत यह थी कि विकास की इन स्थितियों की व्याख्या वे पूंजीवाद और साम्यवाद के प्रभावों से मुक्त होकर करना चाहते थे...

उदारीकरण के बाद भारत में समाज के बीच आर्थिक और सामाजिक असमानता की खाई और चौड़ी हुई... अगर ये असमानता सिर्फ मेहनत और नियमों के भीतर युक्ति के आधार पर होती तो सामाजिक असमानता कुछ हद तक संयत रहती.... लेकिन ऐसा हुआ नहीं....नियम-कायदों से अलग देश की अर्थव्यवस्था में भयंकर उथल-पुथल मची....आए दिन नये नये घोटाले ना सिर्फ सामने आना शुरु हुए... बल्कि विकास के नाम पर होने वाले हर काम में एक ऐसी समानान्तर अर्थव्यवस्था खड़ी हो गयी...जिसमें सरकारी खजाना कागजों में समृद्ध हुआ... लेकिन आम जनता को उसका लाभ अत्यंत सीमित रुप में मिला... अब उम्मीद है कि नोटबंदी का फैसला इस सीमित लाभ को व्यापक तौर पर इस आम आदमी तक पहुंचाएगा...

दूसरी तरफ महात्मा गांधी ने अपने सपनों के भारत में जिस दृष्टि की कल्पना की थी
उसमें व्या‍पकता थी....ग्रामीण विकास की तरफ महात्मा गांधी की दृष्टि हमेशा सजग रही ... ग्रामीण विकास के लिए जिन बुनियादी चीजों को वे जरूरी समझते थे, उनमें ग्राम स्वराज, पंचायतराज, ग्रामोद्योग, महिलाओं की शिक्षा, गांवों की सफाई, गांवों का आरोग्य और समग्र ग्राम विकास प्रमुख हैं...गांधी चाहते थे कि भारत का अगर सही मायनों में विकास होना है तो सरकारें पंचायतों को मजबूत करें....कुटीर उद्योगों....स्थानीय बाजार को विकसित करें....और लोगों को स्वावलंबी बनाने के लिए प्रेरित करें..और अब एतिहासिक नोटबंदी के बाद कोशिश है कि ये सारी संस्थाए एक साथ मजबूत होकर देश की मजबूती बढ़ाएंगी..

गांधी और लोहिया के नाम पर राजनीति देश और प्रदेश के स्तर पर खूब चमकी ... लेकिन साथ-साथ गांधी और लोहिया के सपनों का भारत उनके विचारों से उतना ही दूर होता गया....

मौजूदा सरकार ने ऐसे कई कामों का दावा किया जो गांव के लोगों को तरक्की के रास्ते पर ले जाने वाले हैं... लेकिन शायद इन कामों से असल लक्ष्य तक पहुंचने में कुछ संदेह रह गया और इसीलिए नोटबंदी के फैसले पर अमल किया गया... अब उम्मीद है कि इस बड़े फैसले के बाद भारत देश में सैंकड़ों सालों बाद अब सबसे बड़े बदलाव आ जाएंगे.. 30 दिसंबर के बाद जब नोटबदली की मियाद पूरी हो जाएगी....तो मौजूदा सरकार लोहिया और गांधी के सपनों का भारत बना पाएगी....

गुरुवार, 10 नवंबर 2016

डोनाल्ड ट्रंप कैसे बन गए राष्ट्रपति ..

लगभग एक साल से अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव को लेकर चल रही सरगर्मी डोनाल्ड ट्रंप के 270 के आंकड़े को छूते ही खत्म हो गई …. जनता ने साफ कर दिया कि डेमोक्रैटिक पार्टी को लगातार तीसरी बार सत्ता देने के पक्ष में नहीं हैं । तो क्या हिलेरी क्लिंटन को ओबामा की असफल नीतियों का खामियाज़ा भुगतना पड़ा ।

अमेरिका के चुनावी कैंपेन के दौरान कई बार ट्रंप पर लग रहे आरोपों और उनकी बयानबाज़ी की वजह से ऐसा लगा कि हिलेरी की दावेदारी मजबूत होती जा रही है । हिलेरी अगर राष्ट्रपति बनतीं तो इतिहास रच डालतीं । हिलेरी ना सिर्फ अमेरिका जैसे सुपरपावर की पहली महिला राष्ट्रपति कहलातीं बल्कि लगातार तीसरी बार डेमोक्रैटिक पार्टी के हाथों में अमेरिका की कमान जाने का इतिहास भी बनता .. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हो पाया …

बेरोज़गारी और आर्थिक मंदी से जूझ रही अमेरिका की अवाम को डेमोक्रेटिक पार्टी से अपने सपने पूरे होने की उम्मीद नहीं दिखी … 8 साल पहले बेरोज़गारी और आर्थिक मंदी को दूर करने के वायदे की बदौलत ही बराक ओबामा ने अमेरिका के करोड़ों वोटर्स के भरोसे को जीता था लेकिन इन दोनों ही मसलों को सुलझाने में ब्राकक ओबामा फेल रहे । अपने 8 साल के कार्यकाल के दौरान ओबामा ना तो ज़रूरत के हिसाब से रोज़गार पैदा करने में कामयाब हुए बल्कि आर्थिक मंदी भी कम नहीं हुई …इतना ही नहीं एक तरफ ओबामा के राष्ट्रपति रहते हुए अमेरिका में आतंकी गतिविधियां बढ़ने के आरोप लगे तो दूसरी तरफ फंड की कमी से अमेरिका की मिलिट्री पॉवर के कमजोर होने की बातें भी सामने आईं ।

ऐसा नहीं था कि ओबामा की विदेश नीतियां कामयाब हुई हों … इस दिशा में उठाए गए ओबामा के कई बड़े कदमों से अमेरिका कमजोर होता नज़र आया … फिर चाहे वो Russia Reset के जरिए रिश्ते सुधारने की कवायद हो या फिर ईरान और नॉर्थ कोरिया का अमेरिका की चेतावनी को नज़रअंदाज़ करते हुए अपने मिलिट्री पॉवर को बढ़ाना हो … कुल मिलाकर ओबामा के कार्यकाल में अमेरिका अपने सुपरपावर होने के status को खोता नज़र आया … अपनी नीतियों को लेकर ओबामा सरकार 8 साल में अपनी छाप छोड़ने में नाकामयाब रही … इन वजहों से Anti incumbency factor डेमोक्रेटिक पार्टी के खिलाफ चला गया …

वैसे भी आज़ाद अमेरिका के 240 साल के इतिहास में आज तक कोई महिला राष्ट्रपति नहीं बन पाई है … शायद ये देश महिला के हाथों में कमान सौंपने से डरता है । इस बार पूरे कैंम्पेन के दौरान ऐसा लगा कि अमेरिकी अवाम हिलेरी को ही कमान देगी और हिलेरी क्लिंटन इतिहास रचने में कामयाब हो जाएंगी.. वजह साफ थी क्योंकि डोनाल्ड ट्रंप का कोई political background नहीं था औऱ कई बार कभी महिलाओं तो कभी minorities को लेकर अपने बयानों से डोनाल्ड ट्रंप unpopular होते जा रहे थे .. बावजूद इसके अमेरिका ने हिलेरी को नहीं चुना .. ऐसा लगता है जैसे अमेरिका अभी भी महिला को राष्ट्रपति के पद पर देखने के लिए तैयार नहीं है …
हालांकि कुछ चीजें ऐसी थीं जो हिलेरी क्लिंटन के खिलाफ गईं .. इसमें सबसे बड़ा मसला उनकी Email से जुड़े विवाद का था … मसलन हिलेरी के हज़ारों Email की पूरी controversy पर आनन-फानन में की गई FBI की जांच और हिलेरी को मिले क्लीन चिट का मसला backfire कर गया तो वहीं विकीलीक्स के बार-बार उठाए जा रहे सवालों ने हिलेरी को हमेशा शक के घेरे में बनाए रखा ...

हिलेरी को फॉरेन एजेंसीज़ का भी पूरी तरह सपोर्ट नहीं मिला .. जिस तरह ओबामा और हिलेरी की टीम ने Anti Putin Campaign चलाया था वैसे ही रूस Anti Clinton Campaign चलाता रहा... Clinton Foundation और चंदे का मामला भी हिलेरी क्लिंटन के खिलाफ जाता नज़र आया ...कैम्पेन के दौरान अमेरिका की पहली महिला राष्ट्रपति के तौर पर अपनी सशक्त उम्मीदवारी पेश करती हिलेरी खुद को Women of America बताती रहीं लेकिन लोग उनसे जुड़ी controversies को देखते हुए उन्हें Face of American women के तौर पर स्वीकार ही नहीं कर पाए …

सोमवार, 24 अक्तूबर 2016

सियासत, सबक और परिवार

राजनीति में संयम, धैर्य टाइमिंग और सही वक्त पर फैसले ही सबसे बड़ी काबिलियत होती है और एसपी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव अपने पूरे पॉलिटिकल करियर में देश के टॉप पॉलिटिशियन्स में शुमार होते हैं..अपने सटीक फैसलों से मुलायम सिंह पहले भी कई बार ये साबित कर चुके हैं कि जल्दबाजी में लिए फैसले अक्सर गलत साबित होते हैं और सियासत में आपको पीछे ले जा सकते हैं..

परिवारवाद के चश्मे से मुलायम सिंह की पॉलिटिक्स को देखने वाले तमिलनाडु और पंजाब की सियासत से निकले संदेशों की अनदेखी कर रहे हैं... तमिलनाडु में करुणानिधि और पंजाब का बादल परिवार..आज भी अपने बुजुर्गों के मार्गदर्शन और लीडरशिप में ही चल रहे हैं..

तमिलनाडु में डीएमके प्रमुख करुणानिधि 92 साल की उम्र में दक्षिण भारत  की सियासत की एक अहम धूरी है... बड़ा परिवार है..3 पत्नियां और उनके बच्चे और सब साथ-साथ हैं..बावजूद इसके करुणानिधि ने अभी तक कुर्सी नहीं छोड़ी है..किसी ने भी उनसे अब तक उत्तराधिकारी के बारे में नहीं पूछा..स्टालिन को भी उन्होंने अपना पद नहीं सौंपा और जब भी तमिलनाडु में अम्मा के जवाब में किसी नेता की बात आती है तो सबसे पहला और आखिरी जिक्र करुणानिधि का ही होता है..दिल्ली में राज करने वाले राष्ट्रीय दलों का वहां पर कोई नामलेवा तक नहीं है ... यही वजह है कि करुणानिधि आज भी तमिलनाडु की राजनीति में प्रासंगिक बने हुए हैं...जबकि करुणानिधि के बच्चे भी अखिलेश  यादव की उम्र से काफी बड़े हैं...

परिवार और सियासत का दूसरा बड़ा सबक हमें पंजाब से भी देखने को मिलता है... पिछले विधानसभा चुनाव में पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल पर दबाव था कि अपने जीते जी पार्टी की कमान अपने उत्तराधिरकारी को सौंप दें... लेकिन प्रकाश सिंह बादल ने ऐसा नहीं किया..और इसका नतीजा ये है कि पंजाब की राजनीति में उलटफेर करते हुए प्रकाश सिंह बादल दोबारा पंजाब में सरकार चला रहे हैं औऱ साथ ही परिवार के सदस्यों को आने वाली जिम्मेदारियों के लिए तैयार भी कर रहे हैं..पिछले विधानसभा चुनावों में उनके ही परिवार के कुछ लोगों ने उन पर आरोप लगाया कि वो पुत्रमोह में पार्टी का बंटाधार कर रहे हैं..लेकिन बादल अड़े रहे..किसी को मनमर्जी नहीं करने दी और इसका नतीजा हुआ कि प्रकाश सिंह बादल ने पंजाब में फिर से सरकार बनाई..

साफ है कि सियासत में परिवार का सदस्य होने के साथ-साथ maturity  और discipline भी देखा जाता है...  इसीलिए सियासत के जानकारों का मानना है कि यूपी के सीएम अखिलेश यादव को तमिलनाडु और पंजाब की First Families से सबक लेना चाहिए... तमिलनाडु की सियासत में ए राजा को लेकर हुआ सियासी हड़कंप गायत्री प्रसाद प्रजापति और अमर सिंह एपिसोड से भी बड़ा था... फिर भी वहां परिवार पर कोई आंच नहीं आई... 
ऐसे वक्त में गांधी जी का वो famous quote याद आता है, पाप से घृणा करो..पापी से नहीं 

आचार्य विनोभा भावे ने अपना पूरा जीवन दुर्जनों को सज्जन बनाने में लगा दिया... चंबल में कई डकैतों का आत्मसमर्पण कराया... जाहिर है गांधी, विनोबा भावे, लोहिया जी जैसे लोगों ने सार्वजनिक जीवन में रहते हुए भी एक मिसाल कायम की है...

ये ऐसे लोग हैं जो समय-समय पर असामाजिक दागी लोगों  को अपने राजनीतिक जीवन में जोड़े रखते थे... लेकिन उनके अपने जीवन में ऐसे लोगों का कुछ प्रभाव नहीं पड़ता था... बल्कि ऐसे महान लोगों की संगत में रहकर ये लोग कुछ बेहतर इंसान भी बन जाते हैं... 

अब अगर एसपी प्रमुख मुलायम सिंह यादव इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं  तो इसमे गलत क्या है... जिस समय बहमई नरसंहार की नायिका फूलन देवी को मुलायम सिंह ने समाजवादी पार्टी में शामिल किया था तो कहा गया कि अब समाजवादी पार्टी को ठाकुरों का वोट कभी नहीं मिलेगा ... लेकिन ऐसा नही हुआ, ठाकुर आज भी एसपी और मुलायम के साथ हैं... मुलायम ने एक सियासी रिस्क लिया और सही भी साबित किया... 

साफ है कि अगर आज कुछ लोग कुछ अपरिहार्य कारणों से मुलायम के साथ हैं तो परिवार के बाकी लोगों को मुलायम की स्थिति समझनी चाहिए... और एक बड़े सियासी मकसद को समझते हुए एक साथ लक्ष्य की ओर कदम बढ़ाने चाहिए...

गुरुवार, 20 अक्तूबर 2016

चक्रव्यूह में नेता जी !

अपने अपने अजनबी...वैसे तो ये बड़े साहित्यकार सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय की एक किताब का नाम है लेकिन फिलहाल ये टाइटिल यूपी के सबसे बड़े सियासी परिवार पर सटीक बैठ रहा है...
रोटी , दाल ,कच्चा प्याज़ और नींबू खाकर समाजवादी पार्टी बनाने वाले नेता जी मुलायम सिंह यादव अपने लम्बे राजनैतिक जीवन के  सबसे कठिन दौर से गुज़र रहे हैं... राजनैतिक समर में लंबे समय तक अपने विरोधियों को शिकस्त देने वाले नेता जी आज खुद को पारिवारिक कलह रुपी चक्रव्यूह में घिरा महसूस कर  रहे हैं,  ऐसा लगता है कि महाभारत के सूत्रधार अंतिमभेरी की आवाज़ सुनने के लिए घात लगाए  बैठे हैं...
पत्रकारिता में आने के बाद से मेरा और नेताजी मुलायम सिंह यादव का रिश्ता लगभग 30-32 साल पुराना है..पत्रकारीय सरोकारों के साथ साथ इस रिश्ते की बुनियाद  वैचारिक और भावनात्मक आधार पर रखी गई थी... सबसे खास बात ये रही है कि हम दोनों के बीच इस बेहद खास रिश्ते में किसी भी तरह का वाणिज्यिक आधार नहीं था...
बीते 32 सालों के सफर के दौरान हजारों बार ऐसे मौके आए जब मेरे व्यवसायिक दायित्वों के निर्वहन के कारण नेताजी से वैचारिक और व्यवसायिक टकराव भी हुए..नेताजी की पार्टी और उनकी सरकारों के खिलाफ अलग अलग वक्त में हजारों बार लिखना और बोलना पड़ा था..बावजूद इसके नेताजी और हमारे बीच कभी भी किसी स्तर पर कोई खटास नहीं पैदा हुई... 
रिश्तों में दूरियों की कोई वजह नहीं बनी..परस्पर विश्वास और भरोसे में जरा भी कमी नहीं आई..
मैं उन गिने-चुने लोगों में हूं जो  समाजवादी पार्टी के गठन के वक्त से समाजवादी पार्टी की अब तक की यात्रा का भी चश्मदीद है... लेकिन जो दौर आज इस पार्टी और इस परिवार को देखना पड़ा रहा है..ऐसा इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ..
ऐसा पहली बार हुआ है कि कुछ बाहरी लोगों की साजिश और परिवार के कुछ अति महत्वाकांक्षी लोगों के कारण आज नेताजी की निजी जिंदगी से जुड़ी बातों को भी सार्वजनिक किया जा रहा है..
इस सच को स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं है कि समाज के करोड़ो पिछड़े वांछित, प्रताड़ित लोगों को उनका हक और हुकूक दिलाने के मकसद से नेताजी ने शायद अपने पारिवारिक दायित्वों का सही ढंग से निर्वहन नहीं किया जितना कि एक सामान्य गृहस्थ जीवन में रहने वाला व्यक्ति करता है... लेकिन इसका मतलब ये भी नहीं था कि उन्होने अपनी तरफ से अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाने में किसी तरह की कसर रखी... अपने परिवार के सभी सदस्य जिनमें अखिलेश यादव भी शामिल हैं, उनकी सुख-सुविधा और भविष्य निर्माण में नेताजी ने ना दिन देखा और ना रात... बल्कि ये कहा जाए तो गलत ना होगा कि उन्होने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया... अपने तमाम राजनीतिक विरोधियों की तीखी आलोचना की परवाह किए बगैर नेताजी ने अपने परिवार के सभी लोगों को उनके कद से भी आगे के पदों पर भी बिठाने में कोई कोताही नहीं की...
कुछ कम जानकार लोगों की ओर से आजकल नेताजी पर ये आरोप लगाए जा रहे हैं कि नेताजी अखिलेश के प्रति सौतेला व्यवहार कर रहे हैं... अखिलेश के लिए नेताजी के लगाव का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है... कि 2012 के विधानसभा चुनाव में स्पष्ट बहुमत मिलने के बाद बिना किसी की परवाह किए उन्होंने अखिलेश यादव की मुख्यमंत्री पद पर ताजपोशी की थी...
उस दौर में कुछ लोगों ने नेताजी को महाभारत की कथा वाले धृतराष्ट्र कहकर भी संबोधित किया था..और आज वही लोग अखिलेश के लिए नेताजी पर पक्षपात करने के आरोप लगा रहे हैं... साफ है कि जिन लोगों को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने धृतराष्ट्र की पदवी धारण कर ली ... आज उन्हीं लोगों के लिए वो खुद सवालों के घेरे में हैं...
नेताजी का अखिलेश के लिए लगाव का आलम ये था कि वो अपने बिज़ी से बिज़ी शेड्यूल में भी अखिलेश से मिलने के लिए वक्त जरूर निकाल लिया करते थे... नेता जी मुलायम सिंह और अखिलेश के बीच हुईं ऐसी कई अंतरंग मुलाक़ातों का मैं खुद साक्षी रहा  हूं...
मैं, नेता जी के राजनीतिक सफर के दौरान २-२ हफ्ते तक लगातार दौरे किया करता था इसलिए मैंने  नेता जी को करीब से देखा है और समझा है... ये वो दिन था जब पहले अंबेसेडर और फिर कन्टेसा  गाड़ी में पीछे की सीट पर सोते  हुए नेता जी सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा  किया करते थे ..ढाबे में खाना खाना और ज़्यादा से ज़्यादा कार्यकर्ताओं से मिलना और दिन रात मेहनत करके पार्टी को खड़ा करना, उसे आगे बढ़ाना नेता जी के जीवन का मक़सद हुआ करता था...
लेकिन जब पार्टी अपनी स्थापना के 25 साल मनाने जा रही है तो ऐसे वक्त में परिवार के ही कुछ लोग नेता जी की नीयत और उनकी कार्यशैली पर सवाल उठा रहे  हैं...  और इन सवालों को देखकर लगता है कि कि जैसे नेताजी के कठिन परिश्रम, त्याग और समर्पण को नकारा जा रहा है...
ये कहना पूरी तरह से गलत नहीं होगा कि अपनी लंबी राजनीतिक यात्रा में नेताजी ने समय-समय पर कुछ ऐसे लोगों की भी मदद ली थी जो समाज की नज़रों में विवादास्पद और दाग़ी रहे हैं... लेकिन इसके पीछे भी नेताजी की एक सोची-समझी सोच थी... वो सोच जो एक बड़ी राजनीतिक ताकत खड़ी करके उन करोड़ों पिछड़े, कमजोर और दलित वर्गों के लोगों को न्याय दिलाना था और इसी मकसद के लिए उन्होंने अपनी निजी जिंदगी तक कुर्बान कर दी थी..
इस वक्त नेताजी को उनके परिवार के सभी सदस्यों के सहयोग की जरूरत है..और ठीक ऐसे ही वक्त में परिवार के कुछ सदस्यों की ओर से नेताजी को गलत ठहराने की कोशिश ना तो  पारिवारिक मर्यादा के लिहाज से मुनासिब है और ना ही राजनीतिक दृष्टि से...
नेता जी आज भी समाजवादी पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष हैं और एक अध्यक्ष के नाते उनको पार्टी के संचालन और पदाधिकारियों के दायित्व परिवर्तन का पूरा अधिकार है...चुनाव के इस मौके पर समाजवादी परिवार के सभी लोगो का कर्तव्य एकजुट रहकर नेता जी के उन सपनो को साकार करने की कोशिश करनी चाहिए... ऐसा करके ही नेता जी के प्रति सच्चा आदर  और कृतज्ञता ज़ाहिर की जा सकती है... 

शुक्रवार, 14 अक्तूबर 2016

इंदिरा जी के नक्शेकदम पर अखिलेश ?

समाजवादी पार्टी के भीतर का घमासान कई बार थमता नजर आया,.....फिर कलह सतह पर आई,...लेकिन अब ऐसी निजी बातें सामने आ रही हैं, जिनसे साफ लगता है कि इस टकराव में भी कुछ न कुछ समीकरण ज़रुर साधा जा रहा है,...अखिलेश ने जिस तरह खुद को ,...अपने बचपन को,...अपने इमोशन को सामने रखा,...परिवार की लड़ाई सिमटने की बजाय और उलझती नजर आ रही है..क्या अखिलेश किसी सीक्रेट मिशन पर निकल पड़े है..क्या कई सालों बाद देश का सियासी इतिहास खुद को दोहरा रहा है...अब इसमे कोई सीक्रेट नहीं है कि उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े सियासी परिवार में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है.. ऐसा लगता है कि अब अखिलेश ने तय कर लिया है कि वो अपने बनाए हुए रास्ते पर चलेंगे...
ठीक वैसे ही जैसे इंदिरा गांधी ने अपनी ही पार्टी के नेताओं के खिलाफ एक Parallel Structure खड़ा कर लिया था..और एक बार पार्टी के अधिकृत राष्ट्रपति उम्मीदवार के खिलाफ अलग उम्मीदवार उतार कर पार्टी के सभी veteran leaders  को वैचारिक शिकस्त दे दी थी.. अखिलेश यादव भी अब पार्टी से इतर एकला चलो की राह पर जाते नज़र आ रहे हैं... अब अखिलेश खुद को नई तरह से स्ट्रगलर के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रहे हैं..
परिवार में जारी कलह की खबरों के बीच एक अखबार को दिए इंटरव्यू में अखिलेश कहते हैं कि बचपन में उनके साथ ठीक से बर्ताव नहीं हुआ... उनकी बुआ ने उनका पालन-पोषण किया...यानि बचपन से ही स्ट्रगलर के तौर पर रहे हैं अखिलेश.. इस बात को पब्लिक लाइफ में कभी भी निजी ज़िंदगी पर बयान नहीं देने वाले मुलायम सिंह यादव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में मान लिया है ... मुलायम सिंह यादव ने कहा है कि मां बीमार रहती थीं और वो व्यस्त रहते थे इसीलिए उनकी बहन ने अखिलेश की देखभाल की ...
मां बीमार थी और पिता पर ध्यान ना देने का आरोप और जब मेहनत कर आगे बढ़े तो चाचा और पिता पर कमजोर किए जाने का आरोप..कुल मिलाकर देखा जाए तो अखिलेश एक प्रखर राजनेता की तरह हमदर्दी और भावनाओं को एक साथ लोगों के सामने रख रहे हैं..अखबार से अखिलेश ने कहा है कि उन्हें किनारे तो किया जा सकता, हराया नहीं जा सकता...

क्या इतिहास खुद को दोहरा रहा है..इंदिरा गांधी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था..जब उनको पीएम बनाया गया तो पार्टी के Veteran Leaders चाहते थे कि उनको रिमोट की तरह चलाया जाए और जब इंदिरा जी ने इसका विरोध किया तो उनका विरोध होने लगा..इंदिरा गांधी के विरोध के बाद Open War हुआ और Young Generation इंदिरा के साथ खड़ी हो गई..पार्टी के बुजुर्ग अपनी विश्सनीयता खोते गए और इंदिरा जी  ने कामराज प्लान के तहत एक-एक करके सभी बुजुर्गों को हाशिए पर खड़ा कर दिया ...
ये सच है कि आज से 25 साल पहले एसपी को मुलायम सिंह ने बनाया और 24 घंटे मेहनत करके पार्टी को आज के मुकाम तक पहुंचाय़ा..लेकिन इधर कुछ सालों में मुलायम ने पार्टी मे ऐसे तत्वों को संरक्षण देना शुरु किया जो आज के जमाने के युवाओं को रास नहीं आया है...
डीपी यादव से शुरू हुआ ये सिलसिला गायत्री प्रसाद प्रजापति से लेकर मुख्तार अंसारी तक जाता हुआ नजर आता है..इन सब लोगों के खिलाफ अखिलेश के स्टैंड ने भी उन्हे पार्टी की भीड़ से अलग खड़ा कर दिया.. अखिलेश ये मैसेज देने में कामयाब रहे है कि वो साफ-सुथरी राजनीति के साथ हैं और उसी को लेकर चलेंगे..
खैर समाजवादी परिवार के उत्तरकांड का सभी को इंतजार है लेकिन एक बात तो तय है कि अब अखिलेश की राहें परिवार में अलग हैं और अगर ये झगड़ा और बढ़ा तो अगले चुनावों मे इसका फायदा बीएसपी को ही मिलेगा... 

गुरुवार, 6 अक्तूबर 2016

आरक्षण का लॉलीपॉप कब तक ?

महाराष्ट्र में एक बार फिर मराठा बिरादरी को आरक्षण का लॉलीपॉप पकड़ाने की कोशिश की जा रही है … 10 जिलों में फैल चुके आरक्षण के आंदोलन की आग से घिरी बीजेपी मराठा आरक्षण के समर्थन में दलीलें दे रही है... बिना नेता के लाखों लोगों की रैलियों ने देवेंद्र फडणवीस की सरकार की नींद उड़ा दी है … और अब सरकार 13 अक्टूबर को हाईकोर्ट में वकीलों के जरिए 70 दलीलें पेश करने जा रही है … मसला ये है कि ये 70 दलीलें क्या हाईकोर्ट की संविधान के आधार पर दिए गए फैसले पर भारी पड़ेंगीं …

सवाल यही है कि अगर संविधान के मुताबिक 50 फीसदी से ऊपर आरक्षण नहीं दिया जा सकता तो सरकारें किस आधार पर इससे ज्यादा आरक्षण देने के वादे कर सकती हैं …. देवेंद्र फडणवीस सरकार भी मराठा आंदोलनकारियों की 16 फीसदी आरक्षण की मांग को पूरे करने के वादे कर रही है …. हालांकि इससे पहले भी मराठा आरक्षण की मांग होती रही है … लेकिन महाराष्ट्र ऐसा राज्य है जहां पहले से ही एससी, एसटी और ओबीसी मिलाकर 52 फीसदी आरक्षण लागू है …इसी आधार पर 2014 में एनसीपी और कांग्रेस गठबंधन सरकार की तरफ से चुनाव के ठीक पहले मराठाओं को दिए गए आरक्षण पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने रोक लगा दी थी … ऐसे में एक बार फिर देवेंद्र फडणवीस सरकार की तरफ से की जा रही ये कोशिशें क्या सिर्फ मराठा आंदोलन को शांत करने की तरकीब है ?

ऐसा लगता है कि जब कभी भी राज्य सरकारें या केंद्र सरकार राजनैतिक मुश्किलों में घिरती हैं, उन्हें लगता है कि उनकी नीतियां आम जनता को पसंद नहीं आ रही हैं तो इस तरह के डैमेज कंट्रोल एक्सरसाइज़ किए जाते हैं .. महाराष्ट्र की सरकार पिछले कई महीनों से अपने काम काज को लेकर विवादों में है .. महाराष्ट्र में जो बीजेपी और शिवसेना का परंपरागत वोटबैंक है वही नाराज होता दिखाई दे रहा है …खासतौर से देवेंद्र फडणवीस की कार्यशैली को लेकर पूरे महाराष्ट्र में नाराजगी देखने को मिल रही है ... इसी का नतीजा है कि एक छोटी सी घटना इतने बड़े मराठवाड़ा आंदोलन का रूप ले चुकी है ... अब जब फडणवीस सरकार को लग रहा है कि उनकी कार्यशैली को लेकर पूरे महाराष्ट्र में नाराजगी बढ़ रही है तो उस नाराजगी को कम करने के लिए इस तरह के फैसले लिए जा रहे है, इस तरह के वायदे किए जा रहे हैं …

इससे पहले भी जब-जब राज्य सरकारों की तरफ से राजनैतिक संकट से उबरने के लिए 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण के वायदे किए गए हैं … अदालतों ने उसे खारिज कर दिया है .. अब अगर महाराष्ट्र की फडणवीस सरकार कह रही है कि वो आरक्षण देंगे तो ये शिगूफा ही कहा जा सकता है ...ये सभी राजनीतिक दलों को पता है कि संविधान में 50 फीसदी से जयादा आरक्षण देने की इजाज़त किसी को नहीं है .. इससे पहले राजस्थान की सरकार ने गुर्जर आंदोलन को दबाने के लिए ऐसा ही वायदा किया था .. आंध्र प्रदेश या कर्नाटक सरकार ने भी इसी तरह के वायदे किए .. हरियाणा सरकार ने भी जाट आंदोलन को दबाने के लिए आरक्षण देने की बात कही थी लेकिन किसी भी सरकार ने अपने वायदे को पूरा नहीं किया .. और अगर किसी भी सरकार ने ऑर्डिनेंस के जरिए या राज्य विधानसभा में प्रस्ताव पारित करके अपने उस वायदे को पूरा करने की कोशिश की भी अदालतों के जरिए ये कोशिश खारिज कर दी गई … अदालतों ने ऐसे मौकों पर राज्य सरकार को फटकार भी लगाई … इसीलिए फडणवीस की सरकार चाहे जो वायदे करे .. सच्चाई ये है कि 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण देने का अधिकार किसी भी राज्य सरकार या केंद्र सरकार को नहीं है …

सेना की उपलब्धियों पर सियासत क्यों …

देश में इन दिनों सर्जिकल स्ट्राइक पर बयानों की बाढ़ सी आई हुई है… नेता इस बात पर चर्चा करने में मशगूल हैं कि भारत ने सर्जिकल स्ट्राइक किया या नहीं … तो कुछ नेता सर्जिकल स्ट्राइक पर सवाल उठाने वाले नेताओं को देशद्रोही बताने में लगे हैं और आपत्तिजनक टिप्पणियां की जा रही है …चिंता की बात ये है कि इन सबके बीच राजनीति अपने निचले स्तर पर पहुंच गई है और सेना की तरफ से बीच बीच में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सैनिक कार्रवाई की जानकारी दी जा रही है … ऐसा नहीं है कि भारत की तरफ से पहली बार सर्जिकल स्ट्राइक हुआ हो … उरी हमले की प्रतिक्रिया में हुए सर्जिकल स्ट्राइक के बाद कई पूर्व सैन्य अधिकारी ऐसा कह चुके हैं कि पहले भी सर्जिकल स्ट्राइक होते रहे है .. यही सच है ..लेकिन ऐसा पहली बार हो रहा है कि इस पर देश के तमाम बयानवीर नेता अपने बयानों से सुर्खियां बनाने में लगे हैं ... मंत्री जी के जयकारे हो रहे हैं और जगह-जगह उन्हें सम्मानित किया जा रहा है ... यहां तक कि सोशल मीडिया पर भी ऐसे पोस्ट्स की बाढ़ है...

सवाल उठता है कि ऐसा करने की जरूरत ही क्यों है … अगर पहले इस तरह के ऑपरेशन को सार्वजनिक मंच से उजागर नहीं किया गया तो अब ऐसा क्यों किया जा रहा है… क्या देश की रक्षा और सुरक्षा को बीच में लाकर सियासत करना किसी और लक्ष्य को पाने की कवायद है … और अगर ऐसा है तो किस कीमत पर .. क्या सेना को सियासत में घसीटने के बाद हम उन्हीं देशों की कतार में शामिल नहीं हो रहे जहां सेना और सियासत अलग-अलग नहीं है ... ऐसा करने के बाद भारत और पाकिस्तान में क्या फर्क रह जाएगा …

सर्जिकल स्ट्राइक के बाद ऐसा नहीं है कि सिर्फ सत्तारूढ़ पार्टी के नेता ही नाक ऊंची कर घूम रहे हों .. विपक्ष इनके दावों पर सवाल उठाने के साथ-साथ अपने कार्यकाल में भी सर्जिकल स्ट्राइक करने के दावे कर रहा है … अब सवाल ये कि विपक्ष को अपने कार्यकाल के सीक्रेट ऑपरेशन को अचानक पब्लिक करने की बेचैनी क्यों हो रही है … होड़ ऐसी है कि जैसे आने वाले विधानसभा चुनावों में सर्जिकल स्ट्राइक का मुद्दा जनता के बीच distinction दिलाने की गारंटी हो …

पड़ोसी देश से रिश्तों की तल्खी बयानवीरों को परेशान करे ना करे ….बॉर्डर के पास रहने वाले नागरिकों पर बुरा असर डालती है … बीते दिनों में उनकी परेशानी सुर्खियां बनी हैं .. लेकिन किसी का ध्यान इस तरफ जा ही नहीं रहा … सब बस इसी कोशिश में लगे हैं कि किसी तरह इस मसले का राजनैतिक फायदा उठाया जाए … .अपने व्यक्तिगत राजनैतिक स्वार्थ साध लिए जाएं .. ठीक वैसे ही जैसा करगिल युद्ध के दौरान हुआ था … सब जानते हैं कि भारतीय सैनिकों के पूरी तरह से सक्षम होने के बावजूद पाकिस्तानी सैनिकों ने भारत की ज़मीन से अपना कब्जा अमेरिका की दखल के बाद छोड़ा था... भारतीय सैनिकों ने उन्हें खदेड़ा हो ऐसा कुछ नहीं हुआ फिर भी आज तक भारत इसे शौर्य दिवस के रूप में मनाता है ... उस वक्त भी इस मसले पर राजनीति पूरे शबाब पर थी सत्ता पर आसीन लोग खुद अपनी पीठ थपथपाने में लगे हुए थे ... ना तो इसका जिक्र हुआ कि हमने अपने कितने सैनिकों को खो दिया ना ही इसका कि हमें कितना नुकसान उठाना पड़ा ... कुछ समय तक शहीदों के परिवारों को मदद की बातों का दावा किया जाता रहा …. बाद में उनकी बदहाली पर कोई सुध लेने नहीं पहुंचा .. सत्ता पक्ष हो या विपक्ष दोनों ही इस संवेदनशील मुद्दे पर भी राजनीति करते रहे खुद को बेहतर और दूसरे को कमतर बताते रहे ..

सैन्य कार्रवाई का राजनैतिक फायदा उठाने की एक कोशिश Bangladesh liberation war के बाद भी हुई थी …सत्तारूढ़ दल ने युद्ध में मिली कामयाबी का इस्तेमाल अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए किया था …. अगर मिलिट्री कामयाबी के राजनीतिकरण की ये कोशिश तब गलत थी तो अब भी गलत है .. ये बात सियासतदानों को समझनी होगी कि पाकिस्तान अपने अस्तित्व से लेकर अब तक political instability की problem से जूझ रहा है उसकी एक बहुत बड़ी वजह है कि वहां आर्मी के जरिए सियासत करने की परंपरा रही है …. इसीलिए भारत में ऐसी कोई भी कोशिश नहीं होनी चाहिए ..और चुनावों में जाते वक्त अपने अपने सरकारों की उपलब्धियों को लेकर चुनाव में जाना चाहिए ना कि सेना की उपलब्धियों को ..