शुक्रवार, 4 दिसंबर 2015

किसानों की दुर्दशा - बुंदेलखंड से अकोला तक

एक बार फिर किसी बाबूलाल ने सरकार की नींद हराम की है … ये वो बाबूलाल है जो आर के नारायण के राजू की तरह ही उपवास रख रहा था .. ताकि बारिश की कुछ बूंदे धरती पर गिरें तो उनके सूख चुकी जीवन की धरा पर हरियाली के अंश नज़र आने लगें … हालांकि बाबूलाल का अंत आर के नारायण के कैरेक्टर राजू की तरह नहीं हुआ क्योंकि उसकी खबर सरकार तक पहुंच गई और उसकी मदद की कोशिशें होने लगी हैं … खेत में बोरवेल खुदवाने का वादा कर दिया गया है .. अगर ये वादा पूरा हो गया तो शायद उस इलाके के कुछ किसानों को सूखे की तकलीफ से राहत हो जाएगी और उन्हें बाबूलाल की तरह बारिश के लिए अपना जीवन दांव पर नहीं लगाना पड़ेगा लेकिन उन किसानों का क्या जो बाबूलाल की तरह ही परेशान हैं लेकिन समझ नहीं पा रहे कि अपनी जिंदगी बदलने के लिए उन्हें क्या करना चाहिए ..

किसानों की ये हालत हमेशा से रही है... चाहे इस पर कितनी भी सियासत हुई हो .. कितने हीं नेताओं के सियासी जीवन का ग्राफ ऊपर नीचे हुआ हो.. इन किसानों के हक की बात करके भले ही कई नेता अपनी मंज़िल के करीब आ गए हों लेकिन इन किसानों के जीवन में कोई फर्क नहीं आया … 2014 में लोकसभा के चुनाव होने थे तो बीजेपी ने अपने मैनिफेस्टो में किसानों के लिए जो वादे किए अगर वो पूरे हो गए होते तो बाबूलाल आज सरकार को परेशान नहीं कर रहा होता … अगर सरकार ने खेती में सरकारी निवेश बढ़ा दिया होता,लागत का 50 फीसदी तक फायदा पहुंचाने की कोशिश की गई होतीसस्ते कृषि उत्पाद और कर्ज़ मुहैया कराया गया होताग्रामीण इलाकों में कर्ज़ की सीमा बढ़ा दी गई होतीअच्छे बीजों की बड़े पैमाने पर व्यवस्था की गई होतीहर खेत में पानी पहुंचाया गया होता ,ग्राम सिंचाई योजना की स्कीम आ गई होती. etc. etc. ऐसा नहीं है कि सरकार ने सिर्फ मैनिफेस्टो में इसका ज़िक्र किया और बैठ गई ..अकेले प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत ही केंद्र सरकार ने 50 हज़ार करोड़ की रकम allocate की जो पांच साल में खर्च की जानी है ताकि हर खेत में पानी पहुंच सके ..
लेकिन फिर वही सवाल काश सरकार ने इस दिशा में कदम भी उठाए होते …

अकेले केंद्र सरकार ही क्यों राज्य सरकारों ने भी अपनी ज़िम्मेदारी बखूबी निभाई है .. बाबूलाल तो बुंदलखंड के उन किसानों का चेहरा है जो सालों से चोट खाते रहने के बाद भी अपनी जिंदगी की आखिरी सांस तक कोशिश कर रहे हैं … समाजवादी पार्टी ने भी 2012 में चुनावों के दौरान किसानों के लिए तमाम ऐलान किए लेकिन इनका ज़मीनी स्तर पर अगर फायदा हुआ होता तो बाबूलाल या देवराज की तस्वीरें मीडिया की सुर्खियां नहीं बन रही होतीं …क्योंकि समाजवादी पार्टी के वादों के मुताबिक ना तो किसानों को लाभकारी मूल्य दिलाने के लिए कमीशन बना और ना ही परतीबंजर क्षेत्र को उपजाऊ बनाने की दिशा में कुछ सार्थक काम किए गए .. नदियों को जोड़ने की योजना का तो सरकार को शायद याद भी ना हो .. किसानों को सब्सिडी पर बीज क्या मिलेंगे .. कई जगहों पर तो बीज ही नहीं मिले …इसी तरह तमाम वादे अधूरे ही रहे .. अगर पूरे हुए होते तो क्या ये बाबूलाल परेशान करता … क्या देवराज सुर्खियों में आ पाता ?हां इतना ज़रूर हुआ कि जब ये किसान सुर्खियों में आए तो सरकार ने इन्हें हाथों-हाथ लिया और मामले की तुरंत सुनवाई हो गई …
बात इतनी ही नहीं है … अब किसानों के प्रति सरकारों के उदासीन रवैये ने बेवजह परेशान करने वाले किसानों के प्रति कुछ अपराधिक लोगों को सक्रिय कर दिया है … अब किसान सिर्फ कुदरत और सरकारों का मारा ही क्यों रहे …उससे सिर्फ अन्न क्यों लिया जाए उसका अंग क्यों नहीं … अन्न से ज्यादा तो अंग की कीमत होती है … पहले साहूकार किसानों का खून चूस लिया करते थे … अब उनकी नज़र अंगों पर है … खून चूसने की बात तो खैर मुहावरा है लेकिन अंगों की सौदेबाज़ी सच्चाई … ये सच्चाई विदर्भ की है … जहां साहूकार कर्ज़ नहीं चुका पाने वाले किसानों को अंग बेच देने की राह दिखाते हैं … और कर्ज़ के बदले साढे चार लाख में किडनी निकाल लेते हैं … अब किसान ने कर्ज़ लिया है तो भुगतान तो करना होगा … इसका मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि सरकार को किसानों की फिक्र नहीं है … मौजूदा बीजेपी सरकार ने भी अपने election manifesto में किसानों की मदद का भरपूर ऐलान किया था … कल्याणकारी योजनाएं बनाने के वादे किए गए … अगर सचमुच सरकार ने किसानों के कल्याण के लिए काम किया होता तो क्या एक किसान महज़ चंद रुपयों के लिए अपनी किडनी बेचने को मजबूर हो जाता .. ये हाल तब है जब केंद्र के साथ साथ महाराष्ट्र में भी बीजेपी की ही सरकार है लिहाज़ा इस बात की भी गुंजाइश नहीं रह जाती कि केंद्र और राज्य सरकार के बीच कोई रस्साकशी चल रही हो …

तो क्या किसानों के लिए सरकारों के पास सिवाय वादों के और कुछ नहीं … अगर सरकार किसानों के लिए योजनाएं बनाने के दावे करती भी हैं और किसानों को इसका फायदा नहीं हैं तो दरअसल ये योजनाएं किसके लिए हैं … सोचिए क्यों देवराज अभी भी देवराज है और क्यों बाबूलाल अभी भी बाबूलाल ही है … क्यों कलावती की किस्मत भी कभी नहीं बदली ..

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