सोमवार, 28 दिसंबर 2015

बीजेपी का आचरण जनता दल सा, कार्यशैली कांग्रेस सी ?

बीजेपी के मार्गदर्शक मंडल की बेरुखी ने मोदी की अगुआई वाली सरकार के लिए वही हालात पैदा कर दिए हैं जो हालात राजीव गांधी के लिए हुआ करते थे .. जिन लोगों ने इंदिरा की हत्या के बाद उपजी सहानुभूति की लहर की वजह से कांग्रेस को मिली  thumping majority से बनी सरकार का हाल देखा होगा उनके मन में वर्तमान मोदी की सरकार के लिए भी वही अहसास पैदा हो रहे होंगे ..

राजीव गांधी सत्ता में मिस्टर क्लीन की इमेज लेकर आए थे और देश को इक्कीसवीं सदी में लेकर जाने के अपने सपने को साकार करने की दिशा में कदम उठा रहे थे लेकिन विरोधियों के मुकाबले पार्टी के अंदर उठ रहे विरोध के सुर ने जो मुश्किलें उनके  सामने खड़ी कीं उसपर कांग्रेस पार्टी को आज तक यदा कदा सफाई देनी पड़ रही है ... Muslim Women (Protection of Rights on Divorce) Act, 1986 पास करने को लेकर कांग्रेस नेता रहे आरिफ  मोहम्मद खान ने मंत्री रहते हुए राजीव गांधी सरकार का जबरदस्त विरोध किया था ... तो वहीं बोफोर्स केस को लेकर राजीव गांधी के खिलाफ कांग्रेस में एक बार फिर जबरदस्त खेमेबंदी हुई ... राजीव गांधी की सरकार को पांच साल पूरे होते-होते उनकी मिस्टर क्लीन की इमेज  धुंधली पड़ गई ... और इसमें विपक्ष से ज्यादा पार्टी के लोगों का ही रोल रहा ... नतीजा ये हुआ कि पांच साल बाद सत्ता में फिर कांग्रेस की वापसी नहीं हो पाई ...

देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ बने माहौल में thumping majority से  बीजेपी ने जीत हासिल की है ... प्रधानमंत्री की कुर्सी पर नरेंद्र मोदी काबिज हैं जिनकी छवि बेहद साफ है .. भ्रष्टाचार के किसी भी मामले से मोदी का नाम दूर-दूर तक नहीं जुड़ा है .. लेकिन  प्रधानमंत्री मोदी के लिए बीजेपी के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनने से सत्ता में लगभग दो साल पूरा होने तक राह आसान नहीं रही है ... विरोधियों का सामना करना फिर भी आसान रहा है लेकिन मोदी सरकार और उनके करीबियों के लिए पार्टी के  stalwart leaders ही असहज हालात पैदा करते रहे हैं ... इन leaders की अगुआई में बने मार्गदर्शक मंडल ने एक बार फिर बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व को निशाने पर लिया है... ये सभी नेता किसी ना किसी वजह से पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और पीएम नरेन्द्र मोदी से नाराज है...बिहार चुनाव के नतीजों के बाद भी इस नाराजगी की तस्वीर देखने को मिली थी जब एक खुले पत्र के जरिए इन नेताओं ने मोदी-शाह के कामकाज को कटघरे में खड़ा किया था और विपक्ष को चुटकी लेने का मौका दे दिया था....अब एक बार फिर DDCA कांड और कीर्ति आजाद के जरिए बीजेपी नेतृत्व निशाने पर है...

हालात वैसे ही बन गए हैं .. जैसे राजीव गांधी के खिलाफ अरुण नेहरु, ज्ञानी जैल सिंह, आरिफ मोहम्मद खान और वी पी सिंह खुलकर सामने आए थे वैसे ही मोदी सरकार के खिलाफ लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, शांता कुमार, यशवंत सिन्हा, शत्रुघ्न सिन्हा, अरुण शौरी और सुब्रह्मण्यम स्वामी आ गए हैं .. और ताजा मामला भ्रष्टाचार का ही है ...Party with a difference के नेताओं का आचरण जनता दल के नेताओं जैसा हो गया है तो कार्यशैली कांग्रेस जैसी हो गई है ... जनता दल की तरह ही बेलगाम हो चुके नेताओं के लिए पार्टी आलाकमान को circular जारी करना पड़ रहा है .. कभी अटल जी की नाराजगी पर मोदी के समर्थन में आए नेता ही आज मोदी के विरोध में खड़े हैं ..  ...पीढ़ीगत बदलाव से जूझ रही बीजेपी के भीतर के हालात बिहार की हार के बाद और ज्यादा विस्फोटक बने हुए हैं... ऐसे में ऐतिहासिक बहुमत के बाद भी मोदी सरकार के बाकी बचे अगले तीन साल Cakewalk  साबित नहीं होने वाले ...

मंगलवार, 15 दिसंबर 2015

क्यों बदल गए 'सरकार' !


भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन के जरिए देश में अपनी पहचान बनाने वाले अरविंद केजरीवाल को राजनीति में महज कुछ साल बिताने के बाद आर्थिक आरोप के खिलाफ जांच एजेंसी की कार्रवाई बदले की भावना से की गई कार्रवाई नज़र आने लगी है ... फिर भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे मुलायम सिंह यादव, मायावती और वीरभद्र सिंह सरीखे नेताओं और केजरीवाल में क्या फर्क है .. भ्रष्टाचार के आरोपों के घेरे में आने पर अपने या करीबियों के खिलाफ जांच एजेंसी की कार्रवाई होने पर इन्होंने भी हमेशा इसे बदले की कार्रवाई ही बताया है ..

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि किसी मुख्यमंत्री या उसके करीबी के घर या ऑफिस पर सीबीआई ने छापेमारी की है .. इससे पहले भी देश में अलग-अलग सरकारों के कार्यकाल में राज्यों के मुख्यमंत्रियों या उनके करीबियों के खिलाफ कार्रवाई होती रही है ... पूछताछ होती रही है ...नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे ... उनके करीबियों के विरोध में सीबीआई ने कार्रवाई की थी .... मायावती हों, मुलायम सिंह यादव हों या फिर वीरभद्र सिंह हों इन सभी पूर्व और वर्तमान मुख्यमंत्रियों और इनके करीबियों से सीबीआई पूछताछ कर चुकी है .. इनके खिलाफ कार्रवाई कर चुकी है ... और समय-समय पर अभी भी कर रही है ...

अगर भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ना है .... तो आज की भी सीबीआई की कार्रवाई पर अरविंद केजरीवाल को ऐतराज़ नहीं होना चाहिए .... ये सबको याद होगा कि सत्ता में आने के पहले तक केजरीवाल का मुख्य एजेंडा भ्रष्टाचार विरोधी कार्रवाई ही था ..  ऐसे में अगर उनके या उनके किसी करीबी के आवास या फिर उनके दफ्तर में भ्रष्टाचार के विरोध में कोई जांच एजेंसी कार्रवाई कर रही है तो इस पर इतना हो हल्ला क्यों ? ...
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को तो इस कार्रवाई का समर्थन करना चाहिए ... अगर उनके किसी करीबी पर आर्थिक भ्रष्टाचार के आरोप हैं और इस मामले में जांच एजेंसी इसकी सच्चाई परखना चाह रही है तो केजरीवाल को इस बात का समर्थन करना चाहिए .. क्योंकि वो खुद भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई के हिमायती रहे हैं ... ऐसे में केजरीवाल अगर बार बार ये ट्वीट कर रहे हैं कि बदले की भावना से कार्रवाई की जा रही है .. तो उनमें और भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे बाकी दलों के मुख्यमंत्रियों में क्या फर्क रह जाता है ..

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2015

किसानों की दुर्दशा - बुंदेलखंड से अकोला तक

एक बार फिर किसी बाबूलाल ने सरकार की नींद हराम की है … ये वो बाबूलाल है जो आर के नारायण के राजू की तरह ही उपवास रख रहा था .. ताकि बारिश की कुछ बूंदे धरती पर गिरें तो उनके सूख चुकी जीवन की धरा पर हरियाली के अंश नज़र आने लगें … हालांकि बाबूलाल का अंत आर के नारायण के कैरेक्टर राजू की तरह नहीं हुआ क्योंकि उसकी खबर सरकार तक पहुंच गई और उसकी मदद की कोशिशें होने लगी हैं … खेत में बोरवेल खुदवाने का वादा कर दिया गया है .. अगर ये वादा पूरा हो गया तो शायद उस इलाके के कुछ किसानों को सूखे की तकलीफ से राहत हो जाएगी और उन्हें बाबूलाल की तरह बारिश के लिए अपना जीवन दांव पर नहीं लगाना पड़ेगा लेकिन उन किसानों का क्या जो बाबूलाल की तरह ही परेशान हैं लेकिन समझ नहीं पा रहे कि अपनी जिंदगी बदलने के लिए उन्हें क्या करना चाहिए ..

किसानों की ये हालत हमेशा से रही है... चाहे इस पर कितनी भी सियासत हुई हो .. कितने हीं नेताओं के सियासी जीवन का ग्राफ ऊपर नीचे हुआ हो.. इन किसानों के हक की बात करके भले ही कई नेता अपनी मंज़िल के करीब आ गए हों लेकिन इन किसानों के जीवन में कोई फर्क नहीं आया … 2014 में लोकसभा के चुनाव होने थे तो बीजेपी ने अपने मैनिफेस्टो में किसानों के लिए जो वादे किए अगर वो पूरे हो गए होते तो बाबूलाल आज सरकार को परेशान नहीं कर रहा होता … अगर सरकार ने खेती में सरकारी निवेश बढ़ा दिया होता,लागत का 50 फीसदी तक फायदा पहुंचाने की कोशिश की गई होतीसस्ते कृषि उत्पाद और कर्ज़ मुहैया कराया गया होताग्रामीण इलाकों में कर्ज़ की सीमा बढ़ा दी गई होतीअच्छे बीजों की बड़े पैमाने पर व्यवस्था की गई होतीहर खेत में पानी पहुंचाया गया होता ,ग्राम सिंचाई योजना की स्कीम आ गई होती. etc. etc. ऐसा नहीं है कि सरकार ने सिर्फ मैनिफेस्टो में इसका ज़िक्र किया और बैठ गई ..अकेले प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत ही केंद्र सरकार ने 50 हज़ार करोड़ की रकम allocate की जो पांच साल में खर्च की जानी है ताकि हर खेत में पानी पहुंच सके ..
लेकिन फिर वही सवाल काश सरकार ने इस दिशा में कदम भी उठाए होते …

अकेले केंद्र सरकार ही क्यों राज्य सरकारों ने भी अपनी ज़िम्मेदारी बखूबी निभाई है .. बाबूलाल तो बुंदलखंड के उन किसानों का चेहरा है जो सालों से चोट खाते रहने के बाद भी अपनी जिंदगी की आखिरी सांस तक कोशिश कर रहे हैं … समाजवादी पार्टी ने भी 2012 में चुनावों के दौरान किसानों के लिए तमाम ऐलान किए लेकिन इनका ज़मीनी स्तर पर अगर फायदा हुआ होता तो बाबूलाल या देवराज की तस्वीरें मीडिया की सुर्खियां नहीं बन रही होतीं …क्योंकि समाजवादी पार्टी के वादों के मुताबिक ना तो किसानों को लाभकारी मूल्य दिलाने के लिए कमीशन बना और ना ही परतीबंजर क्षेत्र को उपजाऊ बनाने की दिशा में कुछ सार्थक काम किए गए .. नदियों को जोड़ने की योजना का तो सरकार को शायद याद भी ना हो .. किसानों को सब्सिडी पर बीज क्या मिलेंगे .. कई जगहों पर तो बीज ही नहीं मिले …इसी तरह तमाम वादे अधूरे ही रहे .. अगर पूरे हुए होते तो क्या ये बाबूलाल परेशान करता … क्या देवराज सुर्खियों में आ पाता ?हां इतना ज़रूर हुआ कि जब ये किसान सुर्खियों में आए तो सरकार ने इन्हें हाथों-हाथ लिया और मामले की तुरंत सुनवाई हो गई …
बात इतनी ही नहीं है … अब किसानों के प्रति सरकारों के उदासीन रवैये ने बेवजह परेशान करने वाले किसानों के प्रति कुछ अपराधिक लोगों को सक्रिय कर दिया है … अब किसान सिर्फ कुदरत और सरकारों का मारा ही क्यों रहे …उससे सिर्फ अन्न क्यों लिया जाए उसका अंग क्यों नहीं … अन्न से ज्यादा तो अंग की कीमत होती है … पहले साहूकार किसानों का खून चूस लिया करते थे … अब उनकी नज़र अंगों पर है … खून चूसने की बात तो खैर मुहावरा है लेकिन अंगों की सौदेबाज़ी सच्चाई … ये सच्चाई विदर्भ की है … जहां साहूकार कर्ज़ नहीं चुका पाने वाले किसानों को अंग बेच देने की राह दिखाते हैं … और कर्ज़ के बदले साढे चार लाख में किडनी निकाल लेते हैं … अब किसान ने कर्ज़ लिया है तो भुगतान तो करना होगा … इसका मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि सरकार को किसानों की फिक्र नहीं है … मौजूदा बीजेपी सरकार ने भी अपने election manifesto में किसानों की मदद का भरपूर ऐलान किया था … कल्याणकारी योजनाएं बनाने के वादे किए गए … अगर सचमुच सरकार ने किसानों के कल्याण के लिए काम किया होता तो क्या एक किसान महज़ चंद रुपयों के लिए अपनी किडनी बेचने को मजबूर हो जाता .. ये हाल तब है जब केंद्र के साथ साथ महाराष्ट्र में भी बीजेपी की ही सरकार है लिहाज़ा इस बात की भी गुंजाइश नहीं रह जाती कि केंद्र और राज्य सरकार के बीच कोई रस्साकशी चल रही हो …

तो क्या किसानों के लिए सरकारों के पास सिवाय वादों के और कुछ नहीं … अगर सरकार किसानों के लिए योजनाएं बनाने के दावे करती भी हैं और किसानों को इसका फायदा नहीं हैं तो दरअसल ये योजनाएं किसके लिए हैं … सोचिए क्यों देवराज अभी भी देवराज है और क्यों बाबूलाल अभी भी बाबूलाल ही है … क्यों कलावती की किस्मत भी कभी नहीं बदली ..