बुधवार, 25 नवंबर 2015

ऐसी परंपराओं में बदलाव क्यों नहीं ?

मंदिर, मस्जिद गुरुद्वारों में आने जाने को लेकर कई तरह के नियम कायदे रहे हैं … कपड़ो की शालीनता को लेकर कई बार बहस भी छिड़ी है लेकिन कोई ऐसा नियम, कानून या कायदा जो किसी महिला की Modesty पर प्रहार करता हो, क्या कोई सभ्य समाज इसकी इजाज़त दे सकता है …केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 से लेकर 50 साल तक की महिलाओं को आज तक मंदिर में जाने की इजाज़त नहीं है और इसके पीछे है सदियों पुरानी सोच जिसमें वक्त बदलने के साथ कोई बदलाव नहीं आया है …

हमारे देश में धर्म के नाम पर चलने वाली सदियों पुरानी परंपराएं उस वक्त की परिस्थितियों के मुताबिक शुरू हुई थीं जिनमें कई जगहों पर वक्त के हिसाब से बदलाव आए हैं .. सती प्रथा की परंपरा बंद हुई, बाल विवाह की परंपरा पर काफी हद तक लगाम लग चुकी है .. दहेज का लेन-देन जो पहले प्रथा मानी जाती थी अब भारतीय कानून के मुताबिक अपराध की श्रेणी में आ चुका है … विधवाओं के दोबारा विवाह करने को लेकर भी सोच में काफी बदलाव आ चुका है लेकिन कई जगहों पर परंपरा के नाम पर अभी भी सोच में बदलाव नहीं आया .. केरल का सबरीमाला मंदिर इसी का उदाहरण है …

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी सैकड़ों साल से है …. 10 साल से 50 साल के बीच की महिलाएं जिन्हें मासिक धर्म होता है वो इस मंदिर में नहीं जा सकती है …हालांकि इस चीज को लेकर सोच में बदलाव इसीलिए आनी चाहिए क्योंकि पहले ऐसे साधन मौजूद नहीं थे जो महिलाओं के लिए इन चार दिनों को उनके लिए सुविधाजनक रखें लेकिन ऐसे तमाम साधनों की उपलब्धि के बाद जब महिलाएं घर से बाहर निकलने, भागदौड़ करने और दिनचर्या के बाकी काम करने से अगर पीछे नहीं हट रही हैं तो फिर उनके मंदिर जाने पर पाबंदी क्यों … क्या मासिक धर्म एक natural process नहीं है … क्या ये ईश्वर के बनाए गए विज्ञान का हिस्सा नहीं है … और अगर है तो इसे अपवित्र करार दिए जाने के पीछे का क्या logic ….परंपरा के नाम पर शुद्धता की जांच के लिए बनाए जाने वाले मशीन की चर्चा करने का क्या logic और क्या Logic है इस बात का कि इसी नाम पर लाखों महिला श्रद्धालुओं को मंदिर में प्रवेश ही ना करने दिया जाए …इतने साल से चली आ रही परंपराओं का ही परिणाम है कि आज भी आमतौर पर महिलाएं उन दिनों में पूजा-पाठ करने और मंदिर जाने से परहेज़ करती हैं … लेकिन सवाल ये कि इसे पाबंदी के तौर पर लागू करना कहां तक जायज़ है …. इसकी जांच के लिए मशीन की बात करना कहां तक जायज़ है …

जब चर्च तलाक से लेकर समलैंगिगता के मुद्दों पर बहस करने और बदलाव के लिए तैयार हैं ...ईरान जैसे देश में महिलाओं के प्रति विचार बदल रहे हैं, इस्लाम में आधुनिकता की बात होने लगी है..ऐसे में मंदिर बदलाव के लिए तैयार क्यों नहीं हैं? कोई भी परंपरा या कानून समाज के लिए होता है... समाज परंपरा या कानून के लिए नहीं होता..ऐसे में सवाल ये कि क्या त्रावणकोर देवास्वम बोर्ड के प्रेसीडेंट गोपालकृष्णन का इस तरह का बयान हिंदू समाज का नुकसान नहीं कर रहा