मंगलवार, 9 जून 2015

बिहार में मोदी बनाम ऑल

बिहार की सियासत में जिस तरह तेजी से परिवर्तन आए हैं उसने एक दिलचस्प राजनैतिक घमासान की बुनियाद तैयार कर दी है...इस घटनाक्रम ने ना केवल नीतीश कुमार की सीएम उम्मीदवारी को लेकर फंसा पेंच खत्म कर दिया है बल्कि आरजेडी की ओर से हो रही बयानबाजियों की भी हवा निकाल दी है..नीतीश और राहुल गांधी की मुलाकात ने जहां तीन यादव नेताओं को रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया है तो वहीं दूसरी ओर ये भी साफ हो गया है कि बिहार में एक बार फिर मोदी बनाम ऑल की लड़ाई होने वाली है...अब सवाल ये कि बिहार के मौजूदा माहौल को किस तरह देखा जाए और क्या 2014 के बाद बीजेपी के लिए ये सबसे बड़ी परीक्षा की घड़ी है......

अब सवाल ये कि अब तक जिस मसले पर आपसी आजमाइश चल रही थी वो मुद्दा अचानक हल कैसे हो गया..और इसका बिहार और देश पर क्या राजनीतिक असर होने वाला है....एक बार फिर नरेन्द्र मोदी औऱ बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आमने सामने होंगे....बिहार के चुनाव में जनता परिवार और कांग्रेस ने बेहद सुनियोजित रणनीति के तहत नीतीश कुमार को बिहार का अगला सीएम प्रोजेक्ट कर चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है...

दूसरी ओर एलजेपी नेता रामविलास पासवान पहले ही बोल चुके हैं कि बिहार में चुनाव मोदी को आगे करके लड़ा जाएगा...मतलब साफ है दिल्ली में हुए केजरीवाल बनाम मोदी के चुनाव के बाद एक बार फिर शक्ति प्रदर्शन की तैयारी है...
वैसे दिल्ली में बीजेपी ने ऐन वक्त पर किरण बेदी को खोजकर सीधी लड़ाई को डायवर्ट करने की कोशिश की थी...
लेकिन बिहार में बीजेपी खासकर एनडीए की ओर से नीतीश कुमार के मुकाबले किरण बेदी कौन होगा ये बड़ा सवाल है...हालांकि नाम उछालने वाले नाम उछाल रहे हैं...कभी मांझी तो कभी पासवान का जिक्र भी सामने आ रहा है..वैसे भी मोदी और नीतीश कुमार के बीच शुरु से ही रिश्ता छत्तीस का ही रहा है...

गुजरात दंगों के बाद से ही नीतीश कुमार ने मोदी से दूरी बनाए रखी...अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि को बनाए रखने
के लिए नीतीश ने बीजेपी के सहयोगी के तौर पर भी कभी भी मोदी को पसंद नहीं किया...और आखिरकार नीतीश ने बीजेपी से 17 साल पुराना रिश्ता तब तोड़ा जब 2013 में नरेन्द्र मोदी को बीजेपी के लोकसभा चुनाव प्रचार अभियान की कमान सौंपी गई...लेकिन नीतीश कुमार का ये दांव उलटा पड़ गया बिहार में..जब लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी 2 सीटों पर सिमट गई..नीतीश ने इस्तीफा दिया और जीतनराम मांझी को सीएम बनाया...लेकिन बाद में मांझी बागी हो गए..मांझी की बगावत को मोदी ने शह दिया...सीएम पद पर रहते हुए और पद से हटाए जाने के बाद मांझी कई बार मोदी से मिल चुके हैं...नीतीश और मोदी के बीच तल्खी हाल में ही आए नेपाल भूकंप के वक्त भी दिखी थी...जब नीतीश को नेपाल नहीं जाने दिया गया..यानी नीतीश ने अगर मोदी का हर कदम पर विरोध किया तो मोदी ने भी नीतीश को राजनीतिक तौर पर शिकस्त देने का कोई मौका नहीं छोड़ा...ऐसे में अब जनता परिवार की ओर से नीतीश के नाम के ऐलान के बाद गेंद मोदी के पाले में है...जिन्हें तय करना है कि बिहार में सीएम उम्मीदवार के साथ चुनाव लड़ा जाएगा या फिर खुद उनके इकबाल पर
वैसे बीजेपी के लिए बिहार की जातीय राजनीति सबसे बड़ी चुनौती है...जिसे साधना आसान नहीं होगा..वो भी ऐसे हालात में जबकि मुस्लिम, यादव, कुर्मी समीकरण की गोलबंदी पुख्ता दिख रही है...जबकि महादलित वोटों को साधने लिए बीजेपी अगर मांझी के साथ जाती है तो उन्हें सीएम प्रोजेक्ट करने की शर्त माननी होगी जिसके लिए बीजेपी तैयार होगी ऐसा लगता नहीं...यानी सियासत का पूरा खेल बेहद दिलचस्प मोड़ पर आ खड़ा हुआ है...जहां मोदी के मुकाबले नीतीश कुमार की सीधी सियासी लड़ाई की पटकथा तैयार हो रही है...यकीन मानिए अगर इस लड़ाई में दिल्ली दोहराई गई तो बीजेपी के लिए सबसे बड़ी मुश्किल यूपी में खड़ी होगी जहां संगठऩ से लेकर नेतृत्व तक के उसी संकट से पार्टी जूझ रही है जैसी हालत बिहार में है...

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