बुधवार, 17 जून 2015

राम लला हम फिर आएंगे !

अपने देश में राम भक्ति लोकतंत्र के पर्व की तरह है .. जिसका आनंद सियासी शतरंज की बिसात पर चाल चलने वाले निश्चित अंतराल पर लेते रहते हैं ... एक बार फिर राम मंदिर के निर्माण का शोर सुनाई दे रहा है अब इसे संयोग ही मान लीजिए कि इसी साल बिहार में विधानसभा चुनाव होने हैं और उत्तर प्रदेश में भी विधानसभा चुनावों की बिसात बिछ चुकी है ..
अयोध्या में एक बार फिर संतों और वीएचपी नेताओं का जमावड़ा लगा ...भले ही बड़े ऐलान की उम्मीद लगाए लोगों को निराशा हाथ लगी लेकिन  इसी बहाने मंदिर मुद्दे पर चर्चा तेज हो गई ... ऐसे में सवाल ये कि क्या  बैठक का मकसद ही यही था... और आने वाले दिनों में भी इस तरह की कवायद जारी रहेगी... लोकसभा चुनाव में बीजेपी की भारी जीत के बाद ये पहला मौका है जब अयोध्या में इस तरह से सरगर्मियां बढ़ी हैं... और वीएचपी, बीजेपी या संघ के लोग चाहें जो दलील दें, अयोध्या की ये हलचल महज इत्तेफाक नहीं है... बल्कि ये चुनावी मौसम का असर है.. सितंबर-अक्टूबर में बिहार के चुनाव होने हैं जबकि उसके साल भर बाद यूपी में राजनीतिक नारों का शोर गूंजने लगेगा...
दरअसल बीजेपी...आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद इन मुद्दों को तभी उठाते है जब या तो देश में चुनाव होने वाले हो...या फिर उत्तर प्रदेश या बिहार में चुनावी माहौल बनने लगा हो... बीजेपी...विश्व हिंदू परिषद और आरएसएस को एक बार फिर राम मंदिर की याद आ गई है...ऐसा पहली बार नहीं हुआ है बल्कि जब से देश में राम मंदिर मुक्ति आंदोलन शुरु हुआ तब से ही ऐसा चला  आ रहा है, चाहे देश में अटल बिहारी वाजपेयी जी के नेतृत्व में NDA की सरकार रही हो या फिर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चल रही मौजूदा सरकार ... ये बात और है कि हर बार बीजेपी, विश्व हिंदू परिषद और संघ की तरफ से ये दावा किया जाता रहा है कि राम का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है बल्कि राम मंदिर का मुद्दा आस्था का मुद्दा है, आध्यात्मिक मुद्दा है ...
विश्व हिंदू परिषद, बीजेपी और संघ हर बार राम नाम से राजनीतिक फायदा ही उठाना चाहते हैं और समय-समय पर उठाते भी रहे हैं .. इस मुद्दे पर बीजेपी की तरफ से विरोधाभासी बयान आना भी नया नहीं है ...मसलन अगर अमित शाह राम मंदिर समेत बीजेपी की तरफ से किए गए ऐसे सभी सियासी वादों को पूरे करने के लिए 370 सीटें आने की बात करते हैं ..राजनाथ सिंह सरकार के कॉमन मिनिमम प्रोग्राम और मामले के अदालत में होने का हवाला देकर राम मंदिर जैसे मसलों को प्राथमिकता नहीं देने की बात करते हैं तो साक्षी महाराज जैसे नेता राम मंदिर की पुरजोर वकालत करते भी नज़र आते हैं ... बीजेपी इन विरोधाभासी बयानों के जरिए जनता को गुमराह करने की रणनीति पर काम करती है .. इस तरह की बातें तब भी होती थीं जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे और अब भी हो रही हैं जब सबका साथ सबका विकास के नारे के साथ सत्ता में आए नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं ...
ये भी एक संयोग ही है कि एक तरफ बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व अल्पसंख्यक समुदाय के हितों की बात करता है तो दूसरी तरफ उनके ही नेता राम मंदिर बनाने के नारों की आवाज़ बुलंद कर रहे होते हैं ... अटल जी के ज़माने में भी जब खुद अटल जी अल्पसंख्यक समुदाय में आत्मविश्वास पैदा करने की कोशिश कर रहे थे ... विवाद सुलझाने के लिए अयोध्या समिति का गठन कर बातचीत की पहल की थी ... उसी दौरान मार्च 2002 में वीएचपी ने मंदिर निर्माण शुरु करने का ऐलान कर दिया.. संयोगवश ये भी वही वक्त था जब यूपी में विधानसभा चुनाव होने थे...हालांकि चुनावों में इसका फायदा बीजेपी को नहीं मिल पाया ..
मौजूदा वक्त में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी लगातार अल्पसंख्यकों के बीच भरोसा बहाली की कोशिश में जुटे हैं...अल्पसंख्यक नेताओं से मिल रहे हैं....अल्पसंख्यकों के लिए योजनाएं चला रहे हैं...मुस्लिम देशों की यात्राएं भी संभावित है...रमजान के ठीक पहले कतर, बहरीन, इजिप्ट और इंडोनेशिया के राजदूतों को प्रधानमंत्री ने अपने आवास पर लंच कराया है ... इसी बीच बीजेपी की दूसरी धारा भी सक्रिय हो गई है ... साक्षी महाराज जैसे नेता लगातार विवादित बयान दे रहे हैं, बीजेपी युवा मोर्चा ने अपना प्रदेश सम्मेलन अयोध्या के कारसेवकपुरम में किया है, संघ और वीएचपी की गतिविधियां अचानक बढ़ गई हैं, अयोध्या में एक बार फिर बैठकों, बयानों का दौर जारी है .... संयोग से बिहार में इस साल चुनाव हैं और उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है ..
एक बार फिर लग रहा है कि बीजेपी अपनी उसी पुरानी रणनीति पर काम कर रही है ... एक तरफ विकास के नाम पर मोदी आगे किए जाएंगे .. दूसरी तरफ राम के नाम पर पार्टी के बाकी नेताओं को आगे किया जाएगा .. चुनाव में दोनों मुद्दे साथ-साथ चलेंगे और पार्टी की कोशिश होगी कि दोनों मुद्दों के आधार पर मतों का ध्रुवीकरण अपने पक्ष में कर लिया जाए .. लेकिन इन  सबके राम नाम की सियासी धारा फिर उफान पर होगी ... जो मौसम बीतते ही शांत भी हो जाएगी .. 

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