मंगलवार, 26 मई 2015

राजनीतिक दलों ने सिद्धातों की बातें करना बंद कर दिया है : महेश चंद शर्मा

पंडित दीन दयाल उपाध्याय और उनके एकात्म मानववाद के सिद्धात को बीजेपी ने अपनाया है और इसी सिद्धात पर ये पार्टी आगे बढ़ रही है ... लेकिन क्या सचमुच पार्टी ने एकात्म मानवाद के सिद्धांत को अपनाया है और क्या है पंडित दीन दयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद की फिलॉसॉफी... एकात्म मानवदर्शन अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान के अध्यक्ष डॉ. महेशचन्द्र शर्मा से बातचीत के मुख्य अंश
वासिंद्र मिश्र: एकात्म मानववाद या दीन दयाल जी का Integral Humanism का जो जीवन दर्शन था, वो क्या था ? और आज की मौजूदा व्यवस्था उस जीवन दर्शन के कितना करीब है, और कितना दूर ?
महेश चंद शर्मा: दीन दयाल जी जब सार्वजनिक जीवन में आए, तब देश में एक बहस चल रही थी कि जो प्रचलित राजनीतिक जीवन प्रणालियां हैं.. उनमें से हम कौन सी अपनाएं ? प्रचलित विचार थे- व्यक्तिवाद यानि पूंजीवाद, समाजवाद यानि साम्यवाद... व्यक्तिवाद या समाजवाद दोनों में से किसको अपनाया जाए ? दीन दयाल जी ने कहा कि क्या मजबूरी है जो मैं दोनों में से किसी एक को अपनाऊं.. दोनों ही पाश्चात्य विचार हैं.. ये जहां पैदा हुए हैं.. उनकी परिस्थितियां भिन्न हैं.. दोनों परस्पर विरोधी विचार हैं.. ये व्यक्ति बनाम समाज के विचार हैं.. हम तो भारत में रहते हैं.. हमारे यहां व्यक्ति बनाम समाज की कोई दृष्टि नहीं है.. इसलिए हमको अपनी भारतीय दृष्टि से मानव को देखना चाहिए.. न कि पाश्चात्य दृष्टि से.. पाश्चात्यों में से किसी ने कहा कि.. Human being is an individual .. तो किसी ने कहा.. Human being is not an Individual but Society. दीन दयाल जी ने कहा.. भारत का विचार कहता है कि व्यक्ति और समाज.. व्यष्टि और समष्टि ये पृथक इकाइयां नहीं हैं... मानव तब बनता है जब व्यक्ति और समष्टि एकात्म हो जाती है.. मानव में से व्यक्ति और समाज को बांट दें.. तो मानव मर जाएगा.. इसलिए व्यक्तिवादी और समाजवादी मानव नहीं बल्कि एकात्मवादी मानव को जानना, समझना चाहिए.. उसके लिए रीति-नीति बनानी चाहिए.. जो व्यक्तिवादी नीतियां होंगी वो व्यक्ति जो समाजवादी नीतियां होंगी वो व्यक्ति के खिलाफ होंगी .. इसलिए मानव की नीतियां बननी चाहिए तभी तो सुखकारी होंगी... दीन दयाल जी ने कहा कि.. ये तो पाश्चात्य संदर्भ है.. भारत में ये एकात्मकता यहां तक सीमित नहीं है... जैसे मानव में व्यष्टि है... जैसी मानव में समष्टि है.. वैसे ही मानव में सृष्टि है.. मानव प्रकृति से पृथक नहीं है.. मानव में परमेश्वर है.. इसलिए व्यष्टि, समष्टि, सृष्टि और परमेष्टि.. इन चारों के एकात्मता का नाम है मानव... मानव को पहले जानो, फिर इसके लिए नीति बनाने की बात करो...
वासिंद्र मिश्र: आज़ादी के बाद से अब तक देश और राज्यों में जितनी सरकारें रही हैं.. किसके कामकाज या कार्यशैली को आप दीन दयाल जी के जीवन दर्शन के करीब देखते हैं..
महेश चंद शर्मा: दीन दयाल जी समाज और सरकार को समानार्थी नहीं मानते थे.. वो ये मानते थे कि सरकार का समाज में बहुत छोटा रोल होता है.. समाज में बड़ा रोल संस्कृति, सामाजिक संस्थाओं, परिवार, पंचायत और जनपद का होता है.. इसलिए एकात्म मानववादी संरचना सरकारवादी नहीं होती, सरकार एक महत्वपूर्ण निकाय है.. इसलिए सरकार को वैसे काम करना चाहिए.. लेकिन सरकार को ऐसे काम नहीं करने चाहिए जिससे परिवार, पंचायत, जनपद जैसी संस्थाएं विकलांग हो जाएं.. सरकार को इन सब संस्थाओं का सहयोगी होना चाहिए.. ultimately समाज संस्कारों और संस्कृति से govern होता है.. कानूनों से नहीं...
वासिंद्र मिश्र: तो क्या इसका मतलब है कि दीन दयाल जी सत्ता के विकेंद्रीकरण के पक्षधर थे ?
महेश चंद शर्मा: हां, दीन दयाल जी सत्ता और वित्त दोनों के विकेंद्रीकरण के हिमायती थे क्योंकि समष्टि विकेंद्रित है , समष्टि का मतलब होता है कि वो हर individual में समाहित है.. या कहें विकेंद्रित है.. इसलिए केंद्रीकरणवादी हर व्यवस्था चाहे वो राजनीतिक हो या आर्थिक.. दीन दयाल जी मानते थे, वो अमानवीय है.. वो समाज के सुख का कारक नहीं बन सकता...
वासिंद्र मिश्र: लेकिन, आज जो हालात हैं देश में.. उससे आपको नहीं लगता है कि.. वो दीन दयाल जी के दर्शन के बिलकुल विपरीत है ?
महेश चंद शर्मा: ये हालात देश के नहीं, बल्कि विश्व के हैं.. साथ ही संसार में आज जो paradigm है.. वो वेस्टर्न है, पूर्वी देशों में पैराडाइम वेस्टर्न है और इसलिए इन दि नेम ऑफ ग्लोबलाइजेशन... हम बुरी तरह से केंद्रीकरण की ओर बढ़ रहे हैं .. विकास के नाम पर हम नितांत भौतिकता की ओर बढ़ रहे हैं.. दीन दयाल जी कहते हैं कि हमें सरकारों में बल्कि इस paradigm में शिफ्ट होना चाहिए.. लोकतंत्र का भारतीयकरण होना चाहिए.. अर्थव्यवस्था का भारतीयकरण होना चाहिए.. हमारे संपूर्ण चेतन का भारतीयकरण होना चाहिए.. पश्चिम का ये विचार कोई भारतीय पूरे तौर से स्वीकार नहीं कर सकता.. भारतीय इसके लिए संपन्न नहीं है .. इसलिए आज की व्यवस्था के जो नियामक पुरुष हैं.. पंडित जवाहरलाल नेहरू.. उन्होंने भी जैसा व्यक्तिवाद पश्चिम में है.. उसको ज्यों का त्यों स्वीकार नहीं किया.. जैसा साम्यवाद पश्चिम में है.. वैसा स्वीकार नहीं किया.. उन्होंने कहा, हम मिलकर काम करेंगे.. उन्होंने मिश्रित व्यवस्था की बात की.. भारत और एशिया के देश पाश्चात्य साम्राज्यवाद से मुक्त होने के बावजूद.. जो western paradigm है उससे मुक्त नहीं हो पाए हैं.. इसलिए बहुत सी समस्याएं हैं...
वासिंद्र मिश्र: तो इसका solution कहां से आएगा ?
महेश चंद शर्मा: इसका solution समाज में है.. दीन दयाल जी लोकतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण काम मानते हैं लोकमत परिष्कार का.. लोकमत परिष्कृत होगा तो सरकारें परिष्कृत होंगी.. लोकमत अपरिष्कृत रहेगा और सरकारें परिष्कृत हो जाएंगी.. ये असंभव है.. उनका वाक्य है.. ''सिद्धांतहीन मतदान, सिद्धांतहीन राजनीति का जनक है'' जब तक मतदान में सिद्धांत नहीं आएगा राजनीति, व्यक्तियों में रहेगी.. पूरी राजनीति में सिद्धांतवादिता नहीं आएगी.. इसलिए वो कहते हैं कि.. ''मतदाता को मतवान बनाओ'' मतदाता को जानकार बनाओ.. साल 1952 चुनाव का विश्लेषण कर उन्होंने कहा कि.. हमारे नेताओं को विनम्र होना चाहिए.. क्योंकि, जिसको हम public mendate कह रहे हैं.. वो वास्तविकता नहीं है.. 1952 में जब कांग्रेस को व्यापक सफलता हासिल हुई थी.. तो उनको कुल मतदान का केवल 25% वोट ही मिला था.. चुनाव में 50% लोग वोट देते ही नहीं थे.. ऐसे में कुल मतदान का 25% पा गए तो mendate पर अहंकार क्यों ? हमें अपने लोकतंत्र का भारतीयकरण करते हुए उसे लोकमत और लोकइच्छा के अनुसार ढालना चाहिए.. उनका फोकस सरकार और पार्टियों पर नहीं.. वोट पर था..
वासिंद्र मिश्र: देश में आज जो सरकारें बन रही हैं उनको 30%, 32%, 33% मत मिलता है.. वो सरकार बनाते हैं... और दावा करते हैं कि.. उनको mendate है, उनको जनादेश है.. व्यवस्था में बदलाव करने का ?
महेश चंद शर्मा: दीन दयाल जी कहते हैं.. हमें विनम्र होकर स्वीकार करना चाहिए कि.. जो पद्धति है.. उसके कारण सरकारें बनती है.. लेकिन, mendate मिला है.. ये कहना सही नहीं है...
वासिंद्र मिश्र: सिद्धांतों की बातें करके सरकारें बन रही हैं, सिद्धांतों की बात कर लोग चुनाव में जाते हैं... घोषण-पत्र में सिद्धांतों की बातें करके चुनाव में जाते हैं ?
महेश चंद शर्मा: नहीं जाते, ये दुर्योग है.. इस देश का कि.. राजनीतिक दलों ने सिद्धांतों की बातें करना बंद कर दिया है... आप आज पाएंगे कि सभी पार्टियों के घोषणा-पत्र की भाषा बिलकुल समान है.. फर्क नहीं है उनमें.. और हमको इस विचारधारा के निकश पर कसिए, ऐसा कोई कहता नहीं है.. इसलिए, एक सरल रास्ता खोज लिया गया है कि.. हिंदुस्तान के जो वोट डालने वाले लोग हैं.. उनमें बड़ी संख्या गरीबों की है.. इसलिए गरीबी की बात सब बोलते हैं.
वासिंद्र मिश्र: और जब सरकार में आते हैं, गरीबों को भूल जाते हैं ?
महेश चंद शर्मा: नहीं भूलते हैं, जब सरकार में आ जाते हैं, तो गरीबी को स्थाई रखने का काम करते हैं.. जैसे गरीब को सस्ता अनाज दे देंगे.. छोटे-मोटे काम कर देंगे.. ऐसे में गरीब कैसे स्वाबलंबी बनेगा.. गरीबी के नाम पर बनने वाली योजनाएं सामान्यत: गरीबी को स्थाई बनाने के लिए होती हैं.. दरअसल, योजना होनी चाहिए.. भारत के हर वयस्क के हाथ को रोजगार मिले.. दीन दयाल जी कहते थे.. कि एक पंचवर्षीय योजना ऐसे बनाओ.. जिसका लक्ष्य हो कि कोई व्यक्ति बेरोजगार नहीं होगा.
वासिंद्र मिश्र: तमाम योजनाएं चल रही हैं.. फूड गारंटी, रोजगार गारंटी, शिक्षा के अधिकार की गारंटी.. ये सभी सरकार की ओर से चल रही हैं..
महेश चंद शर्मा: इन सब योजनाओं पर पुनर्विचार करना चाहिए.. दीन दयाल जी कहते थे, मुद्दा केवल गरीबी नहीं है.. उनका एक वाक्य है.. ''अर्थ का अभाव और अर्थ का प्रभाव धर्म की क्षति करता है''.. देश में दरिद्रता नहीं होनी चाहिए और देश में पैसे का प्रभाव नहीं होना चाहिए.. इन दोनों से क्षति होती है.. दीन दयाल जी अभाव और प्रभाव दोनों के निराकरण की बात करते हैं और कहते हैं कि धर्म की स्थापना के लिए जरूरी है कि अर्थ संतुलित रहे ..
वासिंद्र मिश्र: जो लोग अर्थ के प्रभाव में बड़े-बड़े चुनाव जीत लेते हैं.. जब वो सत्ता में आते हैं.. तो वो भी गरीबी और विषमता हटाने की बातें करते हैं..
महेश चंद शर्मा: वो ये बातें चुनाव में भी करते हैं और चुनाव के बाद भी करते हैं.
वासिंद्र मिश्र: तो उनसे आपको उम्मीद है कि.. वो कोई बदलाव ला पाएंगे दीन दयाल के चिंतन के मुताबिक ?

महेश चंद शर्मा: दीन दयाल जी का फोकस पार्टियों और सरकारों पर नहीं था.. उनका फोकस वोटर पर है.. मतदाता पर है. लोकमत परिष्कार पर है.. उनको भारतीय समाज के लोक पर विश्वास है कि.. वो परिवर्तन लाएगा.. अवश्य लाएगा.. क्योंकि प्रकृति का नियम है... सत्य मेव जयते.... सत्य की विजय होगी 

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