मंगलवार, 26 मई 2015

राजनीतिक दलों ने सिद्धातों की बातें करना बंद कर दिया है : महेश चंद शर्मा

पंडित दीन दयाल उपाध्याय और उनके एकात्म मानववाद के सिद्धात को बीजेपी ने अपनाया है और इसी सिद्धात पर ये पार्टी आगे बढ़ रही है ... लेकिन क्या सचमुच पार्टी ने एकात्म मानवाद के सिद्धांत को अपनाया है और क्या है पंडित दीन दयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद की फिलॉसॉफी... एकात्म मानवदर्शन अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान के अध्यक्ष डॉ. महेशचन्द्र शर्मा से बातचीत के मुख्य अंश
वासिंद्र मिश्र: एकात्म मानववाद या दीन दयाल जी का Integral Humanism का जो जीवन दर्शन था, वो क्या था ? और आज की मौजूदा व्यवस्था उस जीवन दर्शन के कितना करीब है, और कितना दूर ?
महेश चंद शर्मा: दीन दयाल जी जब सार्वजनिक जीवन में आए, तब देश में एक बहस चल रही थी कि जो प्रचलित राजनीतिक जीवन प्रणालियां हैं.. उनमें से हम कौन सी अपनाएं ? प्रचलित विचार थे- व्यक्तिवाद यानि पूंजीवाद, समाजवाद यानि साम्यवाद... व्यक्तिवाद या समाजवाद दोनों में से किसको अपनाया जाए ? दीन दयाल जी ने कहा कि क्या मजबूरी है जो मैं दोनों में से किसी एक को अपनाऊं.. दोनों ही पाश्चात्य विचार हैं.. ये जहां पैदा हुए हैं.. उनकी परिस्थितियां भिन्न हैं.. दोनों परस्पर विरोधी विचार हैं.. ये व्यक्ति बनाम समाज के विचार हैं.. हम तो भारत में रहते हैं.. हमारे यहां व्यक्ति बनाम समाज की कोई दृष्टि नहीं है.. इसलिए हमको अपनी भारतीय दृष्टि से मानव को देखना चाहिए.. न कि पाश्चात्य दृष्टि से.. पाश्चात्यों में से किसी ने कहा कि.. Human being is an individual .. तो किसी ने कहा.. Human being is not an Individual but Society. दीन दयाल जी ने कहा.. भारत का विचार कहता है कि व्यक्ति और समाज.. व्यष्टि और समष्टि ये पृथक इकाइयां नहीं हैं... मानव तब बनता है जब व्यक्ति और समष्टि एकात्म हो जाती है.. मानव में से व्यक्ति और समाज को बांट दें.. तो मानव मर जाएगा.. इसलिए व्यक्तिवादी और समाजवादी मानव नहीं बल्कि एकात्मवादी मानव को जानना, समझना चाहिए.. उसके लिए रीति-नीति बनानी चाहिए.. जो व्यक्तिवादी नीतियां होंगी वो व्यक्ति जो समाजवादी नीतियां होंगी वो व्यक्ति के खिलाफ होंगी .. इसलिए मानव की नीतियां बननी चाहिए तभी तो सुखकारी होंगी... दीन दयाल जी ने कहा कि.. ये तो पाश्चात्य संदर्भ है.. भारत में ये एकात्मकता यहां तक सीमित नहीं है... जैसे मानव में व्यष्टि है... जैसी मानव में समष्टि है.. वैसे ही मानव में सृष्टि है.. मानव प्रकृति से पृथक नहीं है.. मानव में परमेश्वर है.. इसलिए व्यष्टि, समष्टि, सृष्टि और परमेष्टि.. इन चारों के एकात्मता का नाम है मानव... मानव को पहले जानो, फिर इसके लिए नीति बनाने की बात करो...
वासिंद्र मिश्र: आज़ादी के बाद से अब तक देश और राज्यों में जितनी सरकारें रही हैं.. किसके कामकाज या कार्यशैली को आप दीन दयाल जी के जीवन दर्शन के करीब देखते हैं..
महेश चंद शर्मा: दीन दयाल जी समाज और सरकार को समानार्थी नहीं मानते थे.. वो ये मानते थे कि सरकार का समाज में बहुत छोटा रोल होता है.. समाज में बड़ा रोल संस्कृति, सामाजिक संस्थाओं, परिवार, पंचायत और जनपद का होता है.. इसलिए एकात्म मानववादी संरचना सरकारवादी नहीं होती, सरकार एक महत्वपूर्ण निकाय है.. इसलिए सरकार को वैसे काम करना चाहिए.. लेकिन सरकार को ऐसे काम नहीं करने चाहिए जिससे परिवार, पंचायत, जनपद जैसी संस्थाएं विकलांग हो जाएं.. सरकार को इन सब संस्थाओं का सहयोगी होना चाहिए.. ultimately समाज संस्कारों और संस्कृति से govern होता है.. कानूनों से नहीं...
वासिंद्र मिश्र: तो क्या इसका मतलब है कि दीन दयाल जी सत्ता के विकेंद्रीकरण के पक्षधर थे ?
महेश चंद शर्मा: हां, दीन दयाल जी सत्ता और वित्त दोनों के विकेंद्रीकरण के हिमायती थे क्योंकि समष्टि विकेंद्रित है , समष्टि का मतलब होता है कि वो हर individual में समाहित है.. या कहें विकेंद्रित है.. इसलिए केंद्रीकरणवादी हर व्यवस्था चाहे वो राजनीतिक हो या आर्थिक.. दीन दयाल जी मानते थे, वो अमानवीय है.. वो समाज के सुख का कारक नहीं बन सकता...
वासिंद्र मिश्र: लेकिन, आज जो हालात हैं देश में.. उससे आपको नहीं लगता है कि.. वो दीन दयाल जी के दर्शन के बिलकुल विपरीत है ?
महेश चंद शर्मा: ये हालात देश के नहीं, बल्कि विश्व के हैं.. साथ ही संसार में आज जो paradigm है.. वो वेस्टर्न है, पूर्वी देशों में पैराडाइम वेस्टर्न है और इसलिए इन दि नेम ऑफ ग्लोबलाइजेशन... हम बुरी तरह से केंद्रीकरण की ओर बढ़ रहे हैं .. विकास के नाम पर हम नितांत भौतिकता की ओर बढ़ रहे हैं.. दीन दयाल जी कहते हैं कि हमें सरकारों में बल्कि इस paradigm में शिफ्ट होना चाहिए.. लोकतंत्र का भारतीयकरण होना चाहिए.. अर्थव्यवस्था का भारतीयकरण होना चाहिए.. हमारे संपूर्ण चेतन का भारतीयकरण होना चाहिए.. पश्चिम का ये विचार कोई भारतीय पूरे तौर से स्वीकार नहीं कर सकता.. भारतीय इसके लिए संपन्न नहीं है .. इसलिए आज की व्यवस्था के जो नियामक पुरुष हैं.. पंडित जवाहरलाल नेहरू.. उन्होंने भी जैसा व्यक्तिवाद पश्चिम में है.. उसको ज्यों का त्यों स्वीकार नहीं किया.. जैसा साम्यवाद पश्चिम में है.. वैसा स्वीकार नहीं किया.. उन्होंने कहा, हम मिलकर काम करेंगे.. उन्होंने मिश्रित व्यवस्था की बात की.. भारत और एशिया के देश पाश्चात्य साम्राज्यवाद से मुक्त होने के बावजूद.. जो western paradigm है उससे मुक्त नहीं हो पाए हैं.. इसलिए बहुत सी समस्याएं हैं...
वासिंद्र मिश्र: तो इसका solution कहां से आएगा ?
महेश चंद शर्मा: इसका solution समाज में है.. दीन दयाल जी लोकतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण काम मानते हैं लोकमत परिष्कार का.. लोकमत परिष्कृत होगा तो सरकारें परिष्कृत होंगी.. लोकमत अपरिष्कृत रहेगा और सरकारें परिष्कृत हो जाएंगी.. ये असंभव है.. उनका वाक्य है.. ''सिद्धांतहीन मतदान, सिद्धांतहीन राजनीति का जनक है'' जब तक मतदान में सिद्धांत नहीं आएगा राजनीति, व्यक्तियों में रहेगी.. पूरी राजनीति में सिद्धांतवादिता नहीं आएगी.. इसलिए वो कहते हैं कि.. ''मतदाता को मतवान बनाओ'' मतदाता को जानकार बनाओ.. साल 1952 चुनाव का विश्लेषण कर उन्होंने कहा कि.. हमारे नेताओं को विनम्र होना चाहिए.. क्योंकि, जिसको हम public mendate कह रहे हैं.. वो वास्तविकता नहीं है.. 1952 में जब कांग्रेस को व्यापक सफलता हासिल हुई थी.. तो उनको कुल मतदान का केवल 25% वोट ही मिला था.. चुनाव में 50% लोग वोट देते ही नहीं थे.. ऐसे में कुल मतदान का 25% पा गए तो mendate पर अहंकार क्यों ? हमें अपने लोकतंत्र का भारतीयकरण करते हुए उसे लोकमत और लोकइच्छा के अनुसार ढालना चाहिए.. उनका फोकस सरकार और पार्टियों पर नहीं.. वोट पर था..
वासिंद्र मिश्र: देश में आज जो सरकारें बन रही हैं उनको 30%, 32%, 33% मत मिलता है.. वो सरकार बनाते हैं... और दावा करते हैं कि.. उनको mendate है, उनको जनादेश है.. व्यवस्था में बदलाव करने का ?
महेश चंद शर्मा: दीन दयाल जी कहते हैं.. हमें विनम्र होकर स्वीकार करना चाहिए कि.. जो पद्धति है.. उसके कारण सरकारें बनती है.. लेकिन, mendate मिला है.. ये कहना सही नहीं है...
वासिंद्र मिश्र: सिद्धांतों की बातें करके सरकारें बन रही हैं, सिद्धांतों की बात कर लोग चुनाव में जाते हैं... घोषण-पत्र में सिद्धांतों की बातें करके चुनाव में जाते हैं ?
महेश चंद शर्मा: नहीं जाते, ये दुर्योग है.. इस देश का कि.. राजनीतिक दलों ने सिद्धांतों की बातें करना बंद कर दिया है... आप आज पाएंगे कि सभी पार्टियों के घोषणा-पत्र की भाषा बिलकुल समान है.. फर्क नहीं है उनमें.. और हमको इस विचारधारा के निकश पर कसिए, ऐसा कोई कहता नहीं है.. इसलिए, एक सरल रास्ता खोज लिया गया है कि.. हिंदुस्तान के जो वोट डालने वाले लोग हैं.. उनमें बड़ी संख्या गरीबों की है.. इसलिए गरीबी की बात सब बोलते हैं.
वासिंद्र मिश्र: और जब सरकार में आते हैं, गरीबों को भूल जाते हैं ?
महेश चंद शर्मा: नहीं भूलते हैं, जब सरकार में आ जाते हैं, तो गरीबी को स्थाई रखने का काम करते हैं.. जैसे गरीब को सस्ता अनाज दे देंगे.. छोटे-मोटे काम कर देंगे.. ऐसे में गरीब कैसे स्वाबलंबी बनेगा.. गरीबी के नाम पर बनने वाली योजनाएं सामान्यत: गरीबी को स्थाई बनाने के लिए होती हैं.. दरअसल, योजना होनी चाहिए.. भारत के हर वयस्क के हाथ को रोजगार मिले.. दीन दयाल जी कहते थे.. कि एक पंचवर्षीय योजना ऐसे बनाओ.. जिसका लक्ष्य हो कि कोई व्यक्ति बेरोजगार नहीं होगा.
वासिंद्र मिश्र: तमाम योजनाएं चल रही हैं.. फूड गारंटी, रोजगार गारंटी, शिक्षा के अधिकार की गारंटी.. ये सभी सरकार की ओर से चल रही हैं..
महेश चंद शर्मा: इन सब योजनाओं पर पुनर्विचार करना चाहिए.. दीन दयाल जी कहते थे, मुद्दा केवल गरीबी नहीं है.. उनका एक वाक्य है.. ''अर्थ का अभाव और अर्थ का प्रभाव धर्म की क्षति करता है''.. देश में दरिद्रता नहीं होनी चाहिए और देश में पैसे का प्रभाव नहीं होना चाहिए.. इन दोनों से क्षति होती है.. दीन दयाल जी अभाव और प्रभाव दोनों के निराकरण की बात करते हैं और कहते हैं कि धर्म की स्थापना के लिए जरूरी है कि अर्थ संतुलित रहे ..
वासिंद्र मिश्र: जो लोग अर्थ के प्रभाव में बड़े-बड़े चुनाव जीत लेते हैं.. जब वो सत्ता में आते हैं.. तो वो भी गरीबी और विषमता हटाने की बातें करते हैं..
महेश चंद शर्मा: वो ये बातें चुनाव में भी करते हैं और चुनाव के बाद भी करते हैं.
वासिंद्र मिश्र: तो उनसे आपको उम्मीद है कि.. वो कोई बदलाव ला पाएंगे दीन दयाल के चिंतन के मुताबिक ?

महेश चंद शर्मा: दीन दयाल जी का फोकस पार्टियों और सरकारों पर नहीं था.. उनका फोकस वोटर पर है.. मतदाता पर है. लोकमत परिष्कार पर है.. उनको भारतीय समाज के लोक पर विश्वास है कि.. वो परिवर्तन लाएगा.. अवश्य लाएगा.. क्योंकि प्रकृति का नियम है... सत्य मेव जयते.... सत्य की विजय होगी 

रविवार, 24 मई 2015

गुर्जर आरक्षण पर सरकार प्रस्ताव भेजे तो केंद्र विचार करेगा : थावरचंद गहलोत

एक बार फिर राजस्थान में गुर्जर आंदोलन शुरू हो गया है.. थावरचंद गहलोत केंद्र में सामाजिक न्याय मंत्री है .. गुर्जर आंदोलन और आरक्षण के मसले पर थावरचंद गहलोत से बातचीत के मुख्य अंश
वासिंद्र मिश्र – पिछले 15 साल से गुर्जरों के आरक्षण का ये मुद्दा बना हुआ है...सरकारें राज्य में बदलती है..राजस्थान में मुद्दा जस का तस बना रहता है...ये क्यों हो रहा है....आप की दोनों जगह सरकार है..दिल्ली में भी और राजस्थान में भी ...क्या इस बार इस मुद्दे का समाधान दिखाई दे रहा है...
थावरचंद गहलोत - इस प्रकार के मामले या विषय जब आते हैं...तो जो नियम प्रक्रिया है उसकी जानकारी देना चाहूंगा....अगर कोई ओबीसी में अपने आप को शामिल करवाना चाहता हो...तो राज्य सरकार की अनुशंसा...राज्य सरकार की सिफारिश आवश्यक है...राज्य सरकार जब तक हमें अपनी सिफारिश नहीं भेजेगी तब तक हम उसपर विचार करने की स्थिति में नहीं रहते हैं.... राज्य सरकार अनुशंसा करके, सिफारिश करके भेजती है तो हम ओबीसी आयोग के चैयरमैन के पास उसे भेजते हैं, ओबीसी आयोग के चैयरमैन या ओबीसी आयोग उसके गुणदोष पर विचार करता है...मंडल कमीशन की रिपोर्ट और 1955 में जो अनुसूचित जातियां..जन-जातियां आदेश जारी हुआ था उसके आधार पर ये तय किया जाता है कि ये इस समुदाय में शामिल करने योग्य हैं या नहीं, अगर वो सकारात्मक राय देते है तो फिर हम विधेयक बनाकर संसद में पेश करते है...संसद की सहमति होती है तो फिर आरक्षण दे दिया जाता है ...परंतु ये सब राज्य सरकार की अनुशंसा के बाद ही होता है अन्यथा हम कुछ नहीं कर सकते...
वासिंद्र मिश्र - गहलोत जी ये जो आप ने बताया...ये तो एक प्रक्रिया है...कि किसको आरक्षण देना है और किसको नहीं...राज्य में बीजेपी की सरकार है...केंद्र में भी बीजेपी की सरकार है...इसके पहले जब कांग्रेस की सरकार थी..तब भी आंदोलन हुआ था...और उसके पहले राज्य में आप की सरकार थी...जब वसुंधरा जी मुख्यमंत्री थीं...तब भी आंदोलन हुआ था....जब बीजेपी सत्ता से बाहर होती है तो गुर्जर आंदोलन को समर्थन करती है, जब सत्ता में आ जाती है तो चुप्पी साध लेती है...इसकी क्या वजह है ?
थावरचंद गहलोत - मैने जो प्रक्रिया बताई...उसके अनुरूप अगर हमारे पास प्रस्ताव आएगा...तो ही हम विचार करेंगे...नहीं तो नहीं करेंगे....रहा सवाल राज्य सरकार का तो ये राज्य सरकार को ही तय करना है ...हम उन्हें इस बाबत ना तो कोई राय दे सकते हैं ना हीं कोई आदेश जारी करने को कह सकते हैं ... .राज्य सरकार के साथ हम विचार विमर्श करते हैं उसके बाद भी राज्य सरकार गुणदोष के हिसाब से ही फैसला करेगी....राज्य सरकार से अनुशंसा आएगी तो हम कार्रवाई करेंगे....
वासिंद्र मिश्र - ये बात सच है ...लेकिन आप संगठन में महामंत्री है,.,,पार्टी में कई अहम पदों पर आप रहे हैं...मंत्री के अलावा भी आप की अलग अहमियत है...आप को नहीं लगता कि आंदोलन बहुत दिनों से चल रहा है और अब इसका समाधान निकाला जाना चाहिए...
थावर चंद गहलोत- वो तो सामने दिखाई दे रहा है...ये लंबे समय से चल रहा है....और इसका समाधान होना चाहिए...पर राज्य सरकार इसके गुणदोष पर विचार करके,.....अगर हमारे साथ कोई पत्र व्यवहार करेगी..अनुशंसा करेगी तो ही हम विचार कर पाएंगे....
वासिंद्र मिश्र – बार-बार क्रीमीलेयर का मुद्दा उठता है .. .जो समाज में आर्थिक और सामाजिक रूप से संपन्न लोग हैं उनको भी आरक्षण की सुविधा हासिल है....उनके आश्रितों को, उनके परिवार के सदस्यों को ..क्या आप या आप की सरकार इस पर पहल करेगी...कि क्रीमीलेयर से जो लोग ऊपर हैं....उनको आरक्षण की सुविधा से वंचित रखा जाएगा....
थावरचंद गहलोत- अनुसूचित जाति और जनजाति पर सामान्यत:: ये विषय लागू होता नहीं है..आज भी अनुसूचित जाति वर्ग को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है..अन्य वर्गों की तुलना में वो काफी पिछड़े हैं..और अनेक पद ऐसे हैं जहां उनका कोई प्रतिनिधित्व नहीं है...जैसे भारत सरकार में इस वर्ग से सचिव स्तर का कोई अधिकारी नहीं है...अगर गलती से एक-दो बार रहा हो तो बात अलग है...आज की तारीख में तो नहीं है...तो SC-ST पर क्रीमी लेयर का फॉर्मूला लागू हो या नहीं...इस प्रकार के विचार सरकार के सामने फिलहाल नहीं है। हालांकि समय-समय पर इन वर्गों में से बहुत सारे लोग क्रीमी लेयर बनाए जाने की मांग करते हैं अनुसूचित समूह में आने वाली कई जातियों से कुछ लोग लंबे समय से IAS, IPS या राजनीतिक क्षेत्रों में काम करते हैं, लेकिन अभी निष्कर्ष पर पहुंचने का समय नहीं आया है, अभी हमने SC-ST के लिए क्रीमी लेयर के मसले पर गंभीरता से विचार नहीं किया है । हालांकि ओबीसी के लिए क्रीमीलेयर लागू होने के आधार पर अब ये चर्चा शुरु हो गई है कि SC में भी ये देना चाहिए...ये बात अपने आप में सही हो सकती है कि जिन लोगों ने लगातार दस पंद्रह या बीस सालों तक IAS, IPS और IFS अधिकारी के रुप में या राजनीति क्षेत्र में रहकर अपने समाज में अपने परिवार का स्तर ऊंचा किया है, उनके बारे में इस प्रकार का विषय आता है तो विचार करने योग्य है...जब ऐसा वातावरण बनेगा तो इस पर गंभीरता से विचार करके आगे की कार्रवाई के बारे में कुछ सोचेंगे...
वासिंद्र मिश्र - मतलब पिछड़े वर्ग में क्रीमीलेयर के पक्षधर हैं आप ?
थावरचंद गहलोत – जी हां वो तो लागू हो गया और इसी कारण से SC-ST के लिए भी लागू होता है..SC-ST को जो आरक्षण दिया गया उसके पीछे आर्थिक, शैक्षणिक और जाति आधारित का वातावरण था ... इस कारण से उनको आरक्षण दिया गया था...इस प्रकार का वातावरण आज भी यदाकदा अपवाद स्वरुप दिखाई देता है..और बहुत सारे क्षेत्रों में इस तरह की घटनाएं हो रही हैं.. इसी वजह से अभी तक SC/ST के लिए क्रीमी लेयर की धारणा को बल नहीं मिला है...जब इन वर्गों में से ही मांग उठेगी तो विचार करेंगे
वासिंद्र मिश्र - थवरचंद जी...जाट आरक्षण के बारे में सरकार क्या सोच रही है ?
थावरचंद गहलोत - जाट आरक्षण का जहां तक सवाल है...यूपीए की सरकार ने चुनावी माहौल को देखते हुए हां कहा था ...हमने भी उनकी सहमति को अपनी सहमति मान कर उसको लागू कर दिया था..परन्तु इसी बीच सुप्रीम कोर्ट ने जाट आरक्षण को अवैध घोषित कर दिया ...अब इसमें सरकार की ओर से पुनर्विचार याचिका लगाई गई है...सुप्रीम कोर्ट की जो पहले बेंच थी,...उसी बेंच में हमने पुनर्विचार के लिए आग्रह किया है...अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार है...कोर्ट के फैसले के बाद ही हम आगे की कार्रवाई कर पाएंगे....
वासिंद्र मिश्र - तो आप बिल लाकर, संविधान संशोधन करके लागू क्यों नहीं कर देते...
थावरचंद गहलोत- नहीं सुप्रीम कोर्ट ने जिस आधार पर फैसला किया है, उस आधार पर हमने कोर्ट को पुनर्विचार करने का आग्रह किया है ...ये एक प्रक्रिया है इसलिए हमने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया है..सुप्रीम कोर्ट की राय आएगी उसके बाद आगे की कार्रवाई करेंगे...
वासिंद्र मिश्र - एक और मुद्दा बना हुआ है..यूपी में खास तौर से...कि प्रमोशन में भी आरक्षण मिलना चाहिए ......मायावती की सरकार ने किया था....उसके बाद कोर्ट ने उसे खारिज कर दिया...मौजूदा जो यूपी की सरकार है...उस दिशा में कोई पहल नहीं कर रही है....निर्देशों के बावजूद उसमें कोई सकारात्मक कार्रवाई अभी तक दिखाई नहीं दे रही है....क्या आपकी सरकार इस दिशा में कोई पहल करने जा रही है... ?
थावरचंद गहलोत - पहले तो ये बात स्पष्ट कर दूं....कि बीजेपी और बीजेपी की सरकार SC-ST के आरक्षण की पक्षधर है....और उसमें प्रमोशन में आरक्षण भी शामिल है...मैं इस अवसर पर आपको ये भी बताना चाहता हूं..कि भारत सरकार के सभी नौकरियों में प्रमोशन में आरक्षण लागू है...अनेक राज्यों में प्रमोशन में आरक्षण लागू है...जिसमें राजस्थान, गुजरात, छत्तीसगढ़ शामिल हैं...यूपी की मायावती जी की सरकार ने राज्य के कर्मचारियों के लिए प्रमोशन में आरक्षण नहीं होने के कारण एक कानून बनाया..उस कानून को कुछ लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी...और उस समय सुप्रीम कोर्ट ने मायाजी की सरकार से तीन प्रकार की जानकारियां मांगी थी...कि आप ये बताएं कि प्रमोशन में आरक्षण क्यों दिया जाए...क्या ये जो पिछड़े लोग हैं नका पिछड़ापन दूर हुआ है ..और अगर प्रमोशन हो जाएगा तो...उस पद पर जाने के बाद उनकी काम करने की क्षमता पर कोई विपरीत असर तो नहीं पड़ेगा, अब ये बहुत सीधी सरल बातें थी जिसका जवाब देना चाहिए था...पता नहीं क्यों उन्होंने जवाब नहीं दिया...और मैं सोचता हूं कि जवाब नहीं देने के कारण भी कोर्ट पर कुछ विपरीत असर पड़ा...SC आयोग और ST आयोग की रिपोर्ट्स दे सकते थे.... योजना आयोग की भी रिपोर्ट दी जा सकती थी...माया सरकार ने जवाब नहीं दिया और कोर्ट ने इस जानकारी के अभाव में प्रमोशन में आरक्षण पर रोक लगा दी... बाद में संसद में इस मामले में एक विधेयक पेश किया गया था .. बीजेपी और कांग्रेस और सभी ने मिलकर राज्यसभा से प्रमोशन में आरक्षण बिल को पास किया...अब वो लोकसभा में लंबित है....
वासिंद्र मिश्र - एक और अहम सवाल है कि लोकसभा चुनाव के पहले और चुनाव के दौरान भी लगभग सभी पार्टियों की ओर से कहा गया कि समाज में जो आर्थिक रुप से कमजोर हैं...चाहे वो अगड़ी जाति के क्यों ना हों...उनके लिए भी कोई व्यवस्था की जाएगी.... अब इस सरकार को लगभग एक साल पूरा हो गया है आप लोग इसकी सालगीरह भी मना रहे हैं... क्या आर्थिक रुप से कमजोर वर्ग के लिए आपके मंत्रालय ने या आपकी सरकार ने अभी तक कोई पहल शुरु की है ?
थावरचंद गहलोत - बिलकुल की है...मेरे विभाग में गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों के लिए एक बोर्ड बनाने का विचार किया है...मध्य प्रदेश ने एक आयोग बनाया था, राज्य योजना आयोग के उपाध्यक्ष बाबू लाल जैन इसके चेयरमैन थे.. .. शिवराज सिंह की सरकार ने इस आयोग के जरिए जो कार्ययोजना बनाई थी, हमने उसे मंगाया है .... कुछ और राज्योंमें ऐसा विचार किया जा रहा है...उस पर हम विचार विमर्श करके और मंत्रीमंडल की राय लेकर तेज़ गति से आगे बढ़ रहे हैं...मैं उम्मीद करता हूं कि अन्य सामान्य वर्ग के ऐसे लोग जो गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे हैं....उनके लिए भी जैसे SC-ST, OBC, विकलांग वर्ग या किन्नर जाति या घुमंतू जाति को लोगों के बच्चों को पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं को जो स्कॉलरशिप या अन्य सुविधाएं देते हैं....उस प्रकार की सुविधाएं देने पर हम विचार कर रहे हैं....और उम्मीद है कि जल्द करेंगे....
वासिंद्र मिश्र - थावर जी एक साल पूरा हुआ है आपकी सरकार का, आपकी नज़र में अपने मंत्रालय के काम-काज में ऐसी कौन सी उपलब्धि रही है जिसको लेकर आप खुशी ज़ाहिर कर सकते हैं ?
थावरचंद गहलोत- हमने सामाजिक सुरक्षा की दृष्टि से बच्चों को पढ़ाई में मिलने वाली स्कॉलर शिप में 10 फीसदी बढ़ोतरी की ... पात्र छात्र-छात्राओं के माता-पिता की आय सीमा में भी वृद्धि की है, कुछ नई स्कीमें जैसे विकलांग छात्रवृत्ति, ओबीसी छात्रवृत्ति योजनाएं शुरू कीं । हम तीन प्रकार की, प्री मैट्रिक, पोस्ट मैट्रिक और ओवरसीज स्कॉलरशिप स्कॉलरशिप देते हैं । विदेश में यदि कोई पढ़ना चाहता है तो 30 लाख तक का ऋण, 4 फीसदी वार्षिक ब्याज की दर से देने का फैसला कियाहै । पहले ये ऋण सुविधा य दा-कदा मिलती थीं पर ब्याज की दर बहुत होती थी
वासिंद्र मिश्र- ये सब अच्छी बात है, लेकिन आपने बातचीत की शुरुआत में कहा था कि तमाम बैकलॉग बने हुए हैं सरकारी विभागों में, केंद्र और राज्य सरकारों में तमाम विभाग ऐसे हैं जिनमें एससी/एसटी के खाली पदों को भरा नहीं गया है, तो, ये आप नहीं मानते हैं कि ये आपकी सरकार की विफलता है, एक साल सरकार में रहने के बावजूद आप लोग उन खाली पड़े पदों पर नियुक्ति नहीं कर पाए ?
थावरचंद गहलोत- नहीं, इसे मैं विफलता इसलिए नहीं मानता क्योंकि भर्ती प्रक्रिया में 6 महीने तो रूटीन मे लगते हैं... चूंकि बैकलॉग की पूर्ति का काम डीओपीटी विभाग से होता है हमने डीओपीटी विभाग से एक बार नहीं हजार बार आग्रह किया है और उन्होनें हमें आश्वस्त किया है कि वो विशेष भर्ती अभियान चलाकर रिक्त स्थानों पर भर्ती करेंगे । हम उम्मीद करते हैं कि सरकार का अगला साल जो शुरु होगा उसमें हम एससी/एसटी के रिक्त आरक्षित पदों को भरेंगे ये बात सही है कि जो 3 फीसदी आरक्षण विकलांगों , 15 फीसदी एससी, 7.5 प्रतिशत एसटी का है, उसमे से बहुत सारे पद रिक्त हैं, इन रिक्त पदों को विशेष भर्ती अभियान चलाकर पूरा करना चाहिए । ये मेरा भी प्रयास है और मैं ये सोचता हूं कि नरेद्र मोदी साहब भी इस दिशा में कारगर कदम उठाने पर सहयोग कर रहे हैं। जहां तक राज्यों का सवाल है तो वहां भी ऐसी ही स्थिति है, हम राज्य सरकारों के साथ समय-समय बैठक करते हैं, संबंधित मत्रियों और सचिवों के साथ बैठक करते हैं। प्रयास ये रहेगा कि तेज गति से रिक्त स्थानों पर भर्ती हो।
वासिंद्र मिश्र- बिहार चुनाव के पहले कुछ उम्मीद है कि उसमें तेजी आएगी ?
थावरचंद गहलोत- बिहार में रिक्त स्थानों की पूर्ति करना राज्य सरकारों का काम है
वासिंद्र मिश्र- नहीं नहीं, आपकी तरफ से ?
थावरचंद गहलोत- केंद्र सरकार की तरफ से हम निरंतर कोशिश कर रहे हैं और उम्मीद है कि सफलता की सीढ़ी चढ़ेंगे...
वासिंद्र मिश्र- आप ये बात तो मानते हैं कि, यूपी और बिहार के चुनाव में एससी एसटी की डी निर्णायक भूमिका रहती है ?
थावरचंद गहलोत- हां स्वाभाविक है, पंजाब में भी है, तमिलनाडु में भी है, वहां ये प्रभाव है तो वहां दिखेगा ।
वासिंद्र मिश्र- तो इस तरह की कल्याणकारी योजनाओं पर को आपकी सरकार महत्व देती हुई क्यों नहीं दिख रही ?
थावरचंद गहलोत- हो रही है ना... मैंने बताया कि हमने प्रयास प्रारंभ किया और सकारात्मक सोच के आधार पर सभी विभाग काम कर रहे हैं । अब मैं ये समझता हूं कि साल भर के समय के मुताबिक कुछ ना कुछ शुरुआत होनी चाहिए पर नहीं हुई.. देर आए दुरुस्तआए.. अगले वर्ष जब सरकार का एक साल पूरा हो जाएगा। उसके बाद इस पर कुछ ना कुछ सफलता प्राप्त कर पाएंगे।

वासिंद्र मिश्र- बहुत बहुत धन्यवाद