मंगलवार, 14 अप्रैल 2015

'नियमों' के शिकार किसान

फैज़ाबाद में किसानों को हज़ारों के नुकसान के ऐवज़ में 75 रुपए से लेकर 100 रुपयों तक का मुआवज़ा ही क्यों मिला .. ये सवाल इतना स्वाभाविक है कि किसी को भी जवाब तलाशने पर मजबूर कर दे … मसलन क्या मुआवज़े के नाम पर मज़ाक होता है … क्या राहत के नाम पर केंद्र सरकार और राज्य सरकार की तरफ से जारी की गई करोड़ों की राशि सिर्फ दिखावा है... किस आधार पर मुआवज़ा बांटा जाता है ?

इस साल बेमौसम हुई बारिश ने कई किसानों की जिंदगी भर की कमाई पर पानी फेर दिया है … उनके पास मदद की आस के अलावा अब कुछ नहीं बचा .. लेकिन मदद के नाम पर सरकार की तरफ से75 रुपए से लेकर 750 रुपए तक के चेक बांटे जा रहे हैं … जाहिर है कि जिस किसान ने एक बीघा में 20 से 25 हज़ार रुपए खर्च किए होंगे उसके लिए 750 रुपए का चेक उनके नुकसान का मज़ाक उड़ाने जैसा ही है …ये हाल तब है जब प्रदेश की सरकार किसानों के नुकसान की भरपाई के लिए लगभग 500 करोड़ रुपए जारी कर चुकी है … और लगातार किसानों को हुए नुकसान का आंकलन कराया जा रहा है .. लेकिन नुकसान के आंकलन और मुआवजे के लिए जो नियम हैंवही किसानों के लिए असल मुसीबत पैदा करते हैं
 
नुकसान का सर्वे दरअसल युनाइटेड प्रोविंस के रेवेन्यू मैनुअल 1940 के अध्याय 26 के नियमों के आधार पर होता है जिसमें क्षेत्रफल का सर्वे करने का प्रावधान है....वैसे ये कानून किसानों को मुआवजा देने के लिए नहीं बल्कि लगान और राजस्व माफ करने के लिए बनाया गया था ...लेकिन मुआवजे के लिए नुकसान का आंकलन भी इसी के आधार पर किया जाता है...इसकी जिम्मेदारी हलके के लेखपाल की होती है....नियम के मुताबिक सर्वे का आधार खेत नहीं बल्कि क्षेत्रफल होता है... इसका नुकसान कई किसानों को उठाना पड़ता है ..उन्हें सही मुआवज़ा नहीं मिल पाता … हर खेत का नुकसान अलग होता है लेकिन जब मुआवजे की रकम बांटी जाती है तो खेतों की गिनती के आधार पर बांट दी जाती है … 

एक गांव में अगर तीन किसान हों और 100 फीसदी नुकसान हुआ हो तो मुआवज़ा 33-33 फीसदी बांटा जाता है चाहे किसी एक किसान की पूरी फसल तबाह हो गई हो और दूसरे की 20 फीसदी फसल ही क्यों ना बरबाद हुई हो .. इतना ही नहीं जैसे ही ये दायरा गांव से निकलकर ब्लॉकतहसील और जिले तक पहुंचता है तो इसी फॉर्म्यूले के तहत नुकसान का आंकड़ा घटता चला जाता है.. 
 
सीधे शब्दों में समझें तो नुकसान के लिए फंड की मांग करते वक्त आधार उत्पादन लागत नहीं बल्कि क्षेत्रफल के आधार पर किया गया सर्वे होता है... और इस सर्वे की प्रक्रिया भी खासी लम्बी होती है.. सर्वे लेखपाल करता है और रिपोर्ट तहसीलदार तक जाती है.. तहसीलदार इसे एडीएम वित्त को देता है
एडीएम इसे राहत आयुक्त के पास भेजता हैजहां से रिपोर्ट मुख्य सचिव को भेजी जाती हैफिर मुख्य सचिव इसे भारत सरकार के पास भेजते हैंकृषि मंत्रालय मुआवजे का प्रस्ताव वित्तमंत्रालय को भेजता है, वित्तमंत्रालय इसे स्वीकृत कर गृहमंत्रालय को भेजता हैगृहमंत्रालय धनराशि को राहत आयुक्त को भेजता है … राहत आयुक्त ये पैसा ज़िलों में भेजता है … ये प्रक्रिया इतनी लंबी है कि आज के नुकसान की भरपाई होने में महीनों निकल जाते हैं और कई बार साल ... दूसरे इस प्रक्रिया से होकर किसानों तक मुआवजे की जो राशि पहुंचती है वो इतनी कम होती है कि उसका कोई सीधा फायदा नहीं मिल पाता...
 
मुआवज़े से अलग किसानों को फसल के नुकसान के उबारने के लिए बीमा योजनाएं भी चलाई जा रही हैं … देश में इस वक्त तीन तरह की बीमा योजनाएं चल रही है... राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना , उच्चीकृत राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना और मौसम आधारित फसल बीमा योजना...ये सारी योजनाएं मिलकर भी किसी भी राज्य के सभी किसानों को अब तक अपने दायरे में नहीं ला पाई हैं...देश के 50जिलों में लागू उच्चीकृत राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना में फसल नुकसान का आंकलन बीमा कंपनी सैटेलाइट इमेज के इस्तेमाल से कर सकती है....इसमें बीमा क्लेम तीन स्थितियों में होता है .. अगर बरसात ना होने पर फसल ना बोई जा सके ...तो राज्य सरकार बीमा कंपनी को फसल को होने वाले अनुमानित नुकसान का ब्यौरा भेजेगी इसके बाद बीमा कंपनी किसान को तुरंत बीमा क्लेम का 25 फीसदी रकम देगी ...

दूसरी स्थिति में खड़ी फसल पर अगर कोई प्राकृतिक आपदा आए और पचास फीसदी से ज्यादा फसल नष्ट होने का आंकलन राज्य सरकार पेश करे तो बीमा कंपनी 25 फीसदी तक क्लेम की रकम देगी । तीसरी स्थिति यह है कि अगर फसल कटने के बाद नष्ट होती है तो किसान को 48 घंटे के भीतर संबंधित बीमा कंपनी या बैंक को फसल के नुकसान की जानकारी देनी हैइसके बाद बीमा कंपनी क्लेम का भुगतान करेगी...इसमें भी तमाम नियम और शर्ते हैं...जैसे अगर कोई किसान बैंक का डिफाल्टर है तो उसे बीमा क्लेम नहीं मिलेगा.... दुर्भाग्य ये है कि ज्यादातर किसान डिफॉल्टर ही होते हैं और कई किसानों को तो बीमा योजना के बारे में पता ही नहीं होता ..
 
देश को Colonial rule से आज़ादी ज़रूर मिल गई लेकिन आज भी ऐसे कई कानून या नियम ऐसे हैं जो बदले नहीं गए हैं … इसी में से एक नियम ये रेवेन्यू मैनुअल भी है जिसके आधार पर ये तय होता है कि आगबाढ़ पानी या बेमौसम बरसात से कितना नुकसान हुआ और उसकी भरपाई कितनी होगी … साल दर साल इसे बदले जाने की जरूरत महसूस हुई हैबौद्धिक बहस भी की गई है लेकिन ये बहस बुद्धिजीवियों तक हीं सिमट कर रह जाती है .. भारत के ज्यादातर गरीब किसानों को ना तो इस रेवेन्यू मैनुअल से कोई लेना- देना होता है ना हीं मुआवजे को लेकर हो रही सियासत से… सालों पुरानी व्यवस्था को बदलने की ज़िम्मेदारी रखने वाले तंत्र की उदासीनता ही वो वजह है जिसकी वजह से आज तक इन नियमों को नहीं बदला जा सका है जो अंग्रेज़ों ने अपने शासनकाल में अपने फायदों को देखते हुए बनाया था... जिन्हें भारत के नागरिकों से कोई मतलब नहीं थाजिनकी कोशिश सरकारी ख़ज़ाने को भरने की थी..लेकिन ये कहां से जायज़ है कि देश में लोकतंत्र की स्थापना के 6दशक से ज्यादा बीत जाने के बाद भी ऐसे नियमों को बनाए रखा गया है ..  

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