बुधवार, 22 अप्रैल 2015

आक्रोश !

जंतर-मंतर पर हज़ारों लोगों की मौजूदगी में किसान की आत्महत्या पूरे प्रशासन की कार्यशैली पर सवालिया निशान लगाने के लिए काफी है ... मरने वाले किसान ने अपने सुसाइड नोट में जय जवान जय किसान नारा भी लिखा है .. ये शायद हुक्मरानों को उन बेचारे किसानों की याद दिला दे जो पहले तो मौसम फिर मुआवज़े की नीतियों की वजह से मौत को गले लगाना बेहतर समझ रहे हैं .. 

किसानों का मसला केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के लिए ठीक वैसा ही मसला बनता जा रहा है जैसा मंडल कमीशन का मसला था ... वी पी सिंह ने मंदिर आंदोलन की आग को बुझाने के लिए मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने का ऐलान किया था .. लेकिन इसके विरोध में आंदोलन की जो चिंगारी भड़की उसने पूरे देश में आग लगा दी... नतीजा ये हुआ था कि ना सिर्फ वी पी सिंह के राजनीतिक कद का बल्कि उनकी पार्टी और सरकार का भी खात्मा हो गया .. ऐसा लग रहा है कि किसानों की समस्याओं पर उचित फैसले की कमी से पैदा हो रहे भंवर में केजरीवाल और नरेंद्र मोदी भी फंसते नज़र आ रहे हैं ...

अपने अज्ञातवास से लौटने के बाद पिछले 3-4 दिनों में राहुल गांधी ने जिस तरह से किसानों के हक की वकालत की है और जिस तेवर से उन्होंने केंद्र सरकार पर हमला किया है.. वो अच्छे दिनों की आस लगाए आम जनमानस के दिलों को छूने में कामयाब दिख रहे हैं ... बीते दिनों में देश में जो हालात बने हैं उसकी वजह से ना चाहते हुए भी इतने कम समय में केंद्र और राज्य सरकारों के प्रति आक्रोश बढ़ रहा है और आज की घटना ने आग में घी डालने का काम किया है ...

अब ये सत्ता में बैठे लोगों पर निर्भर करता है कि किसानों में बढ़ रहे आक्रोश को समझते हुए नीतियों पर पुनर्विचार करे और नही तो किसानों, बेरोज़गारों, नौजवानों समेत गरीब और मजबूर जनता के आक्रोश का सामना करने को तैयार हो जाएं .. 

मंगलवार, 21 अप्रैल 2015

मोदी जी ! ये पब्लिक है ....

क्या अमेरिका की तारीफ के बगैर भारत में लोकप्रियता और सुशासन का कोई पैमाना तय नहीं किया जा सकता .. क्यों ज़रूरी है अमेरिका की तारीफ ….. क्या इसके बिना कोई योग्य नहीं माना जा सकता … क्या मजबूरी है कि नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार अमेरिकी प्रशंसा पत्र के ज़रिए अपने राजनैतिक विरोधियों की आवाज़ बंद करना चाहते हैं.. वही नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए पूरे एक दशक तक अमेरिकी विरोध का सामना करते रहे और तमाम प्रयासों के बावजूद अमेरिकी वीजा हासिल करने में नाकाम रहे … आज वही नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनते ही अमेरिकी मेज़बानी और मेहमाननवाज़ी से इतना प्रभावित क्यों हैं .. नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी को अमेरिकी प्रशंसा से गद्गद् होने के बजाय उसकी मंशा पर नज़र डालनी चाहिए .. 

ये वही अमेरिका है जो यूपीए के 10 साल के शासनकाल में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की योग्यता सादगी और नीतियों की खुले दिल से तारीफ करता रहा और तारीफ करके अमेरिकी नीतियों को भारतीय सरज़मीं पर थोपता रहा … साल 2009 में ओबामा ने मनमोहन सिंह को बहुत बुद्धिमान और एक अच्छा इंसान कहकर तारीफ की थी .. साल 2010 में G-20 समिट के दौरान ओबामा ने एक बार फिर कहा कि भारतीय प्रधानमंत्री नमोहन सिंह में आर्थिक मुद्दों की गहरी समझ है इसीलिए भारत विश्व शांति और उत्थान की तरफ बढ़ रहा है …. मनमोहन सिंह और कांग्रेस पार्टी इस अमेरिकी प्रशंसा के आदी हो गए .. लिहाजा भारतीय जनमानस की भावनाओं को नहीं समझ पाए और परिणाम 2014 के लोकसभा चुनाव में उनको भुगतना पड़ा..

मौजूदा राष्ट्रपति ओबामा ने सिर्फ भारतीय प्रधानमंत्री की तारीफ नहीं की है बल्कि ओबामा इटली के मातेयो रेंज़ी को Leading Voice of Europe कह चुके हैं…. ओबामा इराक के प्रधानमंत्री हैदर अल आब्दी और नाइजीरिया के राष्ट्रपति गुडलक जोनाथन की प्रशंसा भी एक अच्छे नेता के तौर पर की है … अपने कूटनीतिक चालबाज़ी के चलते अमेरिका हमेशा से दुनिया के विकसित और विकासशील देशों के नेताओं को अपने जाल में फंसाता रहा है … सोवियत रूस का उदाहरण दुनिया के सामने है .. सोवियत रूस के तत्कालीन राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचोव के जरिए पेरेस्त्रोइका और ग्लासनोस्त (खुलाबाज़ार और पुनर्रचना) लागू करवाकर सोवियत रूस का विघटन तक करा दिया और बदले में गोर्बाचोव को नोबल शांति पुरस्कार से नवाज़ दिया … इराक, अफगानिस्तान, मिडल ईस्ट, पाकिस्तान दुनिया के तमाम विकसित और विकासशील देश ऐसे हैं जिनपर अमेरिका प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से अपनी दादागिरी बनाए हुए है .. भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इतिहास की इस कड़वी सच्चाई से अवश्य सबक लेना चाहिए और 11 महीने में 14 मुल्कों का दौरा करके भारतीय प्रधानमंत्री को सबसे पहले देश की मूलभूत समस्याओं का समाधान खोजने की कोशिश करनी चाहिए ..


भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 1974 में आई मशहूर फिल्म रोटी के उस सदाबहार गीत 'ये पब्लिक है … ये सब जानती है..... ' पर ज़रूर गौर फरमाना चाहिए । देश की जनता आंतरिक समस्याओं को लेकर इस कदर बेजार है कि उसको अब सपनों के सौदगरों से कोई लेना-देना नहीं है … उसको अपनी मूलभूत समस्याओं का समाधान चाहिए .. अच्छे दिन की उम्मीद में बैठी जनता के सब्र का बांध टूटता जा रहा है … 

बुधवार, 15 अप्रैल 2015

पुतिन-बराक के नक्शेकदम पर मोदी ?

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी क्या अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और रूसी राष्ट्रपति पुतिन के नक्शेकदम पर चल पड़े हैं ? नरेंद्र मोदी के लगभग 11 महीने की कार्यशैली से कमोबेश इसी तरह के संकेत मिल रहे हैं .. मोदी के हालिया विदेश दौरे और राज्यपालों के लिए जारी निर्देशों से उनकी मंशा पर सवालिया निशान लग गया है ?

देश में राज्यपालों को अब नए तौर तरीकों से काम करना होगा … मसलन अगर कहीं जाना हो तो राष्ट्रपति से लिखित में इजाज़त लेनी होगी … इजाज़त लेने के लिए अपनी यात्रा से संबंधित पूरी जानकारी भेजनी होगी … ये जानकारी ना सिर्फ राष्ट्रपति बल्कि प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव और गृहमंत्री को भी देनी होगी … राष्ट्रपति से इजाज़त के बाद ही गवर्नर अब राज्य से बाहर की यात्रा कर पाएंगे … इतना ही नहीं अब राज्यपालों को अपने राज्य में साल के 292 दिन बिताने ही होंगे … ऑफिशियल हो या फिर पर्सनल यात्रा अब बाकी बचे दिनों में ही करनी होगी … गृह मंत्रालय की तरफ से 18 प्वाइंट सेट ऑफ रूल्स जारी किए गए हैं… इसके मुताबिक अगर गवर्नर को अचानक कहीं जाना पड़ता है तो उसकी वजह साफ करनी होगी …. कहा जा रहा है कि गवर्नर्स के राज्य से बाहर टूर पर रहने की खबरें आने के बाद ये बदलाव किया जा रहा है...

लेकिन क्या मसला सिर्फ इतना ही है.... हमारा देश कहीं presidential form of government की तरफ तो नहीं बढ़ रहा.... अमेरिका में presidential form of government है जहां राष्ट्रपति के पास सबसे ज़्यादा ताकत होती है … केंद्र में बीजेपी की सरकार बनने के बीते 11 महीनों में मोदी ने सरकार की कार्यशैली में कई बदलाव ला दिए हैं … मसलन ज्यादातर मौकों पर नरेंद्र मोदी ही आगे नजर आते हैं चाहे वो मसला किसी भी मंत्रालय से जुड़ा हुआ क्यों ना हो .. आप नरेंद्र मोदी की अप्रैल में की गई तीन देशों की विदेश यात्रा को ही देख लीजिए .. इस यात्रा में नरेंद्र मोदी के साथ एक मंत्री है उनकी भी कहीं कोई खबर नहीं है …. अक्सर ऐसा देखने को नहीं मिलता कि विदेशों में होने वाले समझौतो से संबंधित मंत्रालय के मंत्री भी डेलीगेशन में शामिल ना हों …

हालांकि मोदी की इस कार्यशैली की झलक उनकी भाषा में भी दिखती है … चाहें तो आप उनके चुनाव प्रचार के दौरान दिए गए भाषणों को दोबारा सुन लें … अक्सर मोदी 'मैं' शब्द का इस्तेमाल करते सुनाई देंगे … उनके भाषणों के दौरान हीं इस बात का अहसास होने लगा था कि अगर बीजेपी की सरकार बन जाती है तो नरेंद्र मोदी power center भी बन जाएंगे … मोदी के चुनाव प्रचार का तरीका भी कमोबेश अमेरिकी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जैसा ही था .. उतना ही हाइटेक, वैसे ही शब्दों का चयन..

ऐसा लगता है कि मोदी ने जो अच्छे दिन के सपने दिखाए हैं उसे वो किसी और के भरोसे नहीं छोड़ना चाहते … वो किसी पर भरोसा नहीं कर पाते .. शायद कोई और उनकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाता … इसीलिए अलग-अलग मंत्रालयों के काम-काज पर भी मोदी की नज़र रहती है … भारत में parliamentary form of government है जिसमें प्रधानमंत्री और मंत्रियों के अधिकार क्षेत्र में ज्यादा फर्क नहीं होता... लेकिन मोदी की कार्यशैली ऐसी है कि उनके मंत्रियों के अधिकार क्षेत्र में भी उन्होंने अपने लिए काफी जगह बना ली है .. ऐसा Presidential form of government में होता है जहां राष्ट्रपति सबसे ज्यादा ताकतवर होता है … अमेरिका में राष्ट्रपति के पास असीमित अधिकार हैं … रूस के प्रेसीडेंट ब्लादिमीर पुतिन भी असीमित अधिकार रखते हैं .. मोदी की कार्यशैली भी इन दोनों से मेल खाती है ..

लेकिन अमेरिका और रूस का संविधान अलग है .. वहां की जनता का मिजाज़ अलग है … क्या भारत की जनता मोदी के इस Initiative और Intention को लंबे समय तक accept कर पाएगी … भारत में आज तक एक बार इमरजेंसी लगी है जब इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं.. इंदिरा गांधी भी Absolute power चाहती थीं … इंदिरा गांधी ने संविधान में 42वें संशोधन के जरिए प्रधानमंत्री कार्यालय को काफी पावरफुल बना दिया था .. सुप्रीम कोर्ट की शक्तियां कम कर दी थीं … जिसकी वजह से सियासत में उनके कई विरोधी पैदा हो गए … बदले माहौल में देश में political unrest भी बढ़ गया …. इस unrest का ही नतीजा था कि देश में इमरजेंसी लगा दी गई …. उसके बाद तो जनता ने भी इंदिरा गांधी को नकार दिया .. 1977 के आम चुनाव के बाद देश में जनता पार्टी की सरकार बन गई .. जनता पार्टी की सरकार ने संविधान में 44 वां संशोधन किया इसके जरिए जनता को और ताकतवर बना दिया ... साथ हीं इंदिरा सरकार के दौरान 42वें संशोधन के जरिए संविधान में किए गए विवादित बदलावों को खत्म कर दिया … सवाल ये है कि देश में और ज्यादा जागरुक हो चुकी जनता क्या फिर प्रधानमंत्री तक सीमित हो रहे अधिकारों को पचा पाएगी ?

मंगलवार, 14 अप्रैल 2015

'नियमों' के शिकार किसान

फैज़ाबाद में किसानों को हज़ारों के नुकसान के ऐवज़ में 75 रुपए से लेकर 100 रुपयों तक का मुआवज़ा ही क्यों मिला .. ये सवाल इतना स्वाभाविक है कि किसी को भी जवाब तलाशने पर मजबूर कर दे … मसलन क्या मुआवज़े के नाम पर मज़ाक होता है … क्या राहत के नाम पर केंद्र सरकार और राज्य सरकार की तरफ से जारी की गई करोड़ों की राशि सिर्फ दिखावा है... किस आधार पर मुआवज़ा बांटा जाता है ?

इस साल बेमौसम हुई बारिश ने कई किसानों की जिंदगी भर की कमाई पर पानी फेर दिया है … उनके पास मदद की आस के अलावा अब कुछ नहीं बचा .. लेकिन मदद के नाम पर सरकार की तरफ से75 रुपए से लेकर 750 रुपए तक के चेक बांटे जा रहे हैं … जाहिर है कि जिस किसान ने एक बीघा में 20 से 25 हज़ार रुपए खर्च किए होंगे उसके लिए 750 रुपए का चेक उनके नुकसान का मज़ाक उड़ाने जैसा ही है …ये हाल तब है जब प्रदेश की सरकार किसानों के नुकसान की भरपाई के लिए लगभग 500 करोड़ रुपए जारी कर चुकी है … और लगातार किसानों को हुए नुकसान का आंकलन कराया जा रहा है .. लेकिन नुकसान के आंकलन और मुआवजे के लिए जो नियम हैंवही किसानों के लिए असल मुसीबत पैदा करते हैं
 
नुकसान का सर्वे दरअसल युनाइटेड प्रोविंस के रेवेन्यू मैनुअल 1940 के अध्याय 26 के नियमों के आधार पर होता है जिसमें क्षेत्रफल का सर्वे करने का प्रावधान है....वैसे ये कानून किसानों को मुआवजा देने के लिए नहीं बल्कि लगान और राजस्व माफ करने के लिए बनाया गया था ...लेकिन मुआवजे के लिए नुकसान का आंकलन भी इसी के आधार पर किया जाता है...इसकी जिम्मेदारी हलके के लेखपाल की होती है....नियम के मुताबिक सर्वे का आधार खेत नहीं बल्कि क्षेत्रफल होता है... इसका नुकसान कई किसानों को उठाना पड़ता है ..उन्हें सही मुआवज़ा नहीं मिल पाता … हर खेत का नुकसान अलग होता है लेकिन जब मुआवजे की रकम बांटी जाती है तो खेतों की गिनती के आधार पर बांट दी जाती है … 

एक गांव में अगर तीन किसान हों और 100 फीसदी नुकसान हुआ हो तो मुआवज़ा 33-33 फीसदी बांटा जाता है चाहे किसी एक किसान की पूरी फसल तबाह हो गई हो और दूसरे की 20 फीसदी फसल ही क्यों ना बरबाद हुई हो .. इतना ही नहीं जैसे ही ये दायरा गांव से निकलकर ब्लॉकतहसील और जिले तक पहुंचता है तो इसी फॉर्म्यूले के तहत नुकसान का आंकड़ा घटता चला जाता है.. 
 
सीधे शब्दों में समझें तो नुकसान के लिए फंड की मांग करते वक्त आधार उत्पादन लागत नहीं बल्कि क्षेत्रफल के आधार पर किया गया सर्वे होता है... और इस सर्वे की प्रक्रिया भी खासी लम्बी होती है.. सर्वे लेखपाल करता है और रिपोर्ट तहसीलदार तक जाती है.. तहसीलदार इसे एडीएम वित्त को देता है
एडीएम इसे राहत आयुक्त के पास भेजता हैजहां से रिपोर्ट मुख्य सचिव को भेजी जाती हैफिर मुख्य सचिव इसे भारत सरकार के पास भेजते हैंकृषि मंत्रालय मुआवजे का प्रस्ताव वित्तमंत्रालय को भेजता है, वित्तमंत्रालय इसे स्वीकृत कर गृहमंत्रालय को भेजता हैगृहमंत्रालय धनराशि को राहत आयुक्त को भेजता है … राहत आयुक्त ये पैसा ज़िलों में भेजता है … ये प्रक्रिया इतनी लंबी है कि आज के नुकसान की भरपाई होने में महीनों निकल जाते हैं और कई बार साल ... दूसरे इस प्रक्रिया से होकर किसानों तक मुआवजे की जो राशि पहुंचती है वो इतनी कम होती है कि उसका कोई सीधा फायदा नहीं मिल पाता...
 
मुआवज़े से अलग किसानों को फसल के नुकसान के उबारने के लिए बीमा योजनाएं भी चलाई जा रही हैं … देश में इस वक्त तीन तरह की बीमा योजनाएं चल रही है... राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना , उच्चीकृत राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना और मौसम आधारित फसल बीमा योजना...ये सारी योजनाएं मिलकर भी किसी भी राज्य के सभी किसानों को अब तक अपने दायरे में नहीं ला पाई हैं...देश के 50जिलों में लागू उच्चीकृत राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना में फसल नुकसान का आंकलन बीमा कंपनी सैटेलाइट इमेज के इस्तेमाल से कर सकती है....इसमें बीमा क्लेम तीन स्थितियों में होता है .. अगर बरसात ना होने पर फसल ना बोई जा सके ...तो राज्य सरकार बीमा कंपनी को फसल को होने वाले अनुमानित नुकसान का ब्यौरा भेजेगी इसके बाद बीमा कंपनी किसान को तुरंत बीमा क्लेम का 25 फीसदी रकम देगी ...

दूसरी स्थिति में खड़ी फसल पर अगर कोई प्राकृतिक आपदा आए और पचास फीसदी से ज्यादा फसल नष्ट होने का आंकलन राज्य सरकार पेश करे तो बीमा कंपनी 25 फीसदी तक क्लेम की रकम देगी । तीसरी स्थिति यह है कि अगर फसल कटने के बाद नष्ट होती है तो किसान को 48 घंटे के भीतर संबंधित बीमा कंपनी या बैंक को फसल के नुकसान की जानकारी देनी हैइसके बाद बीमा कंपनी क्लेम का भुगतान करेगी...इसमें भी तमाम नियम और शर्ते हैं...जैसे अगर कोई किसान बैंक का डिफाल्टर है तो उसे बीमा क्लेम नहीं मिलेगा.... दुर्भाग्य ये है कि ज्यादातर किसान डिफॉल्टर ही होते हैं और कई किसानों को तो बीमा योजना के बारे में पता ही नहीं होता ..
 
देश को Colonial rule से आज़ादी ज़रूर मिल गई लेकिन आज भी ऐसे कई कानून या नियम ऐसे हैं जो बदले नहीं गए हैं … इसी में से एक नियम ये रेवेन्यू मैनुअल भी है जिसके आधार पर ये तय होता है कि आगबाढ़ पानी या बेमौसम बरसात से कितना नुकसान हुआ और उसकी भरपाई कितनी होगी … साल दर साल इसे बदले जाने की जरूरत महसूस हुई हैबौद्धिक बहस भी की गई है लेकिन ये बहस बुद्धिजीवियों तक हीं सिमट कर रह जाती है .. भारत के ज्यादातर गरीब किसानों को ना तो इस रेवेन्यू मैनुअल से कोई लेना- देना होता है ना हीं मुआवजे को लेकर हो रही सियासत से… सालों पुरानी व्यवस्था को बदलने की ज़िम्मेदारी रखने वाले तंत्र की उदासीनता ही वो वजह है जिसकी वजह से आज तक इन नियमों को नहीं बदला जा सका है जो अंग्रेज़ों ने अपने शासनकाल में अपने फायदों को देखते हुए बनाया था... जिन्हें भारत के नागरिकों से कोई मतलब नहीं थाजिनकी कोशिश सरकारी ख़ज़ाने को भरने की थी..लेकिन ये कहां से जायज़ है कि देश में लोकतंत्र की स्थापना के 6दशक से ज्यादा बीत जाने के बाद भी ऐसे नियमों को बनाए रखा गया है ..