शनिवार, 3 जनवरी 2015

सत्ता और सिद्धांत में गुत्थमगुत्थी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और संघ के बीच एक बार फिर मतभेद का दौर शुरु हो गया है ... सत्ता मिलने तक पॉलिटिकल आउटफिट हो या फिर वैचारिक आउटफिट, इनके बीच एकजुटता बनी रहती है, सत्ता में आते हीं इनके बीच सैद्धांतिक और वैचारिक मतभेद शुरु हो जाते हैं ... ऐसा तब भी देखने को मिला था जब उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह, गुजरात में नरेंद्र मोदी या फिर केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी । ये अलग बात है कि सार्वजनिक तौर पर संघ प्रवक्ता मनमोहन वैद्य सरकार से किसी भी तरह के मतभेदों से इनकार करते हैं

दरअसल संघ और इससे जुड़े अन्य organizations एक बार फिर उसी ढर्रे पर लौट आए हैं, शायद इसके पीछे अब नहीं तो कभी नहीं की भावना काम कर रही है। हिन्दू संगठनों की गतिविधियां एकाएक तेज हो गईं हैं, मोदी सरकार की विकासवादी योजनाओं का राग एक तरफ है तो आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों का हिन्दूवादी राग एक तरफ ।

उत्तर प्रदेश के संसदीय इतिहास में कल्याण सिंह के नेतृत्व में जून 1991 में पहली बार बीजेपी की बहुमत की सरकार बनी थी लेकिन ये सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई … महज डेढ़ साल के अंदर दिसंबर 1992 में सरकार बर्खास्त कर दी गई .. वजह दुनिया जानती है .. संघ के frontal organizations ने अयोध्या की लगभग 450 साल पुरानी विवादित बाबरी मस्जिद को गिरा दिया था और उसी शाम कल्याण सिंह ने इस्तीफा दे दिया … केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश की विधानसभा के साथ साथ देश के उन तीन राज्यों की सरकारें बर्खास्त कर दी थी जिनमें सत्ता पर बीजेपी काबिज थी … ये राज्य थे हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान .. इसके बाद उत्तर प्रदेश में आज तक बीजेपी की अकेले दम पर सरकार नहीं बन पाई … और 92 के बाद केंद्र में बीजेपी की सरकार बनी भी तो अटल जी को भानुमति का कुनबा जोड़ना पड़ा … उस दौरान भी अटल जी की सरकार के लिए संघ और उससे जुड़े संगठन मुसीबतें पैदा करते रहे …

अब केंद्र में पहली बार बीजेपी पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता पर काबिज है .. लंबी जद्दोजहद के बाद बीजेपी को ये कामयाबी तब मिली है जब पार्टी ने हिंदुत्व के एजेंडे को बदला है और विकास को अपना मुख्य एजेंडा बनाया है … और विकास के इस एजेंडे का श्रेय नरेंद्र मोदी को जाता है … हालांकि अब संघ और संघ के Frontal Organizations समय-समय पर अपने कार्यक्रमों के ज़रिए मोदी और उनके development के एजेंडे को चोट पहुंचा रहे हैं … बावजूद इसके नरेंद्र मोदी बार-बार यही कोशिश कर रहे हैं कि जिस जनता ने विकास के नाम पर, अच्छे दिन आने की उम्मीद के नाम पर उन्हें वोट दिया है उसकी उम्मीद ना टूटे... कमोबेश नरेंद्र मोदी अपने उसी रवैये पर कायम हैं जो उन्होंने गुजरात का मुख्यमंत्री रहते दिखाया था … और जिसकी वजह से वो हमेशा संघ और उसके frontal organizations के निशाने पर बने रहे थे … लिहाजा मोदी को अब इस love and hate relationship को निभाने में महारत हासिल हो चुकी है .. शायद यही वजह है कि जब संघ परिवार और उसके अनुषांगिक संगठन मोदी सरकार के विकास के एजेंडे को भटकाने में लगे हैं तो मोदी ने कड़ा फैसला करने में कामयाबी हासिल कर ली है और ये कामयाबी है घर वापसी की मुहिम चलाने वाले राजेश्वर सिंह की छुट्टी करवाना …. इसके बाद साइंस कांग्रेस के उद्धाटन के मौके पर विकास के एजेंडे पर एक बार फिर ज़ोर देना और फिर ट्वीट करना कि सब खबरों में बने रहना चाहते हैं, जो सीधा-सीधा उन लोगों के लिए संदेश है कि खबरों में बने रहने के लिए ऊटपटांग बयानों से बचें ..

पिछले 7 महीनों के दौरान कभी बीजेपी तो कभी संघ और उससे जुड़े अन्य संगठनों की तरफ से हो रही बयानबाज़ी से पहले ही मोदी सरकार की किरकिरी हो चुकी है … धर्मांतरण की खबरों ने इस किरकिरी का रंग और भी पक्का किया है .. सरकार इसका स्वाद संसद के शीतकाल सत्र के दौरान चख चुकी है … लिहाजा अब वक्त प्रतिक्रिया का है .. और इसके निशाने पर हैं बीजेपी के चुनिंदा नेता, संघ और इससे जुड़े अन्य संगठन

इसके साथ एक सच्चाई ये भी है कि बीजेपी को सत्ता तक पहुंचाने में संघ के करोड़ों कार्यकर्ताओं की कड़ी मेहनत का ही हाथ रहा है … राज्य हो या केंद्र जब भी बीजेपी को सत्ता हासिल हुई है तो इसका श्रेय संघ के कार्यकर्ताओं को ही जाता है लेकिन इसके साथ इतिहास इस बात का भी गवाह है कि देश या प्रदेश में जब भी बीजेपी की सरकार बनी है तो उसे बाहरी ताकतों से ज्यादा अंदरूनी ताकतों से सैद्धांतिक और वैचारिक स्तर पर लड़ाई लड़नी पड़ी है …

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