सोमवार, 28 दिसंबर 2015

बीजेपी का आचरण जनता दल सा, कार्यशैली कांग्रेस सी ?

बीजेपी के मार्गदर्शक मंडल की बेरुखी ने मोदी की अगुआई वाली सरकार के लिए वही हालात पैदा कर दिए हैं जो हालात राजीव गांधी के लिए हुआ करते थे .. जिन लोगों ने इंदिरा की हत्या के बाद उपजी सहानुभूति की लहर की वजह से कांग्रेस को मिली  thumping majority से बनी सरकार का हाल देखा होगा उनके मन में वर्तमान मोदी की सरकार के लिए भी वही अहसास पैदा हो रहे होंगे ..

राजीव गांधी सत्ता में मिस्टर क्लीन की इमेज लेकर आए थे और देश को इक्कीसवीं सदी में लेकर जाने के अपने सपने को साकार करने की दिशा में कदम उठा रहे थे लेकिन विरोधियों के मुकाबले पार्टी के अंदर उठ रहे विरोध के सुर ने जो मुश्किलें उनके  सामने खड़ी कीं उसपर कांग्रेस पार्टी को आज तक यदा कदा सफाई देनी पड़ रही है ... Muslim Women (Protection of Rights on Divorce) Act, 1986 पास करने को लेकर कांग्रेस नेता रहे आरिफ  मोहम्मद खान ने मंत्री रहते हुए राजीव गांधी सरकार का जबरदस्त विरोध किया था ... तो वहीं बोफोर्स केस को लेकर राजीव गांधी के खिलाफ कांग्रेस में एक बार फिर जबरदस्त खेमेबंदी हुई ... राजीव गांधी की सरकार को पांच साल पूरे होते-होते उनकी मिस्टर क्लीन की इमेज  धुंधली पड़ गई ... और इसमें विपक्ष से ज्यादा पार्टी के लोगों का ही रोल रहा ... नतीजा ये हुआ कि पांच साल बाद सत्ता में फिर कांग्रेस की वापसी नहीं हो पाई ...

देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ बने माहौल में thumping majority से  बीजेपी ने जीत हासिल की है ... प्रधानमंत्री की कुर्सी पर नरेंद्र मोदी काबिज हैं जिनकी छवि बेहद साफ है .. भ्रष्टाचार के किसी भी मामले से मोदी का नाम दूर-दूर तक नहीं जुड़ा है .. लेकिन  प्रधानमंत्री मोदी के लिए बीजेपी के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनने से सत्ता में लगभग दो साल पूरा होने तक राह आसान नहीं रही है ... विरोधियों का सामना करना फिर भी आसान रहा है लेकिन मोदी सरकार और उनके करीबियों के लिए पार्टी के  stalwart leaders ही असहज हालात पैदा करते रहे हैं ... इन leaders की अगुआई में बने मार्गदर्शक मंडल ने एक बार फिर बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व को निशाने पर लिया है... ये सभी नेता किसी ना किसी वजह से पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और पीएम नरेन्द्र मोदी से नाराज है...बिहार चुनाव के नतीजों के बाद भी इस नाराजगी की तस्वीर देखने को मिली थी जब एक खुले पत्र के जरिए इन नेताओं ने मोदी-शाह के कामकाज को कटघरे में खड़ा किया था और विपक्ष को चुटकी लेने का मौका दे दिया था....अब एक बार फिर DDCA कांड और कीर्ति आजाद के जरिए बीजेपी नेतृत्व निशाने पर है...

हालात वैसे ही बन गए हैं .. जैसे राजीव गांधी के खिलाफ अरुण नेहरु, ज्ञानी जैल सिंह, आरिफ मोहम्मद खान और वी पी सिंह खुलकर सामने आए थे वैसे ही मोदी सरकार के खिलाफ लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, शांता कुमार, यशवंत सिन्हा, शत्रुघ्न सिन्हा, अरुण शौरी और सुब्रह्मण्यम स्वामी आ गए हैं .. और ताजा मामला भ्रष्टाचार का ही है ...Party with a difference के नेताओं का आचरण जनता दल के नेताओं जैसा हो गया है तो कार्यशैली कांग्रेस जैसी हो गई है ... जनता दल की तरह ही बेलगाम हो चुके नेताओं के लिए पार्टी आलाकमान को circular जारी करना पड़ रहा है .. कभी अटल जी की नाराजगी पर मोदी के समर्थन में आए नेता ही आज मोदी के विरोध में खड़े हैं ..  ...पीढ़ीगत बदलाव से जूझ रही बीजेपी के भीतर के हालात बिहार की हार के बाद और ज्यादा विस्फोटक बने हुए हैं... ऐसे में ऐतिहासिक बहुमत के बाद भी मोदी सरकार के बाकी बचे अगले तीन साल Cakewalk  साबित नहीं होने वाले ...

मंगलवार, 15 दिसंबर 2015

क्यों बदल गए 'सरकार' !


भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन के जरिए देश में अपनी पहचान बनाने वाले अरविंद केजरीवाल को राजनीति में महज कुछ साल बिताने के बाद आर्थिक आरोप के खिलाफ जांच एजेंसी की कार्रवाई बदले की भावना से की गई कार्रवाई नज़र आने लगी है ... फिर भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे मुलायम सिंह यादव, मायावती और वीरभद्र सिंह सरीखे नेताओं और केजरीवाल में क्या फर्क है .. भ्रष्टाचार के आरोपों के घेरे में आने पर अपने या करीबियों के खिलाफ जांच एजेंसी की कार्रवाई होने पर इन्होंने भी हमेशा इसे बदले की कार्रवाई ही बताया है ..

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि किसी मुख्यमंत्री या उसके करीबी के घर या ऑफिस पर सीबीआई ने छापेमारी की है .. इससे पहले भी देश में अलग-अलग सरकारों के कार्यकाल में राज्यों के मुख्यमंत्रियों या उनके करीबियों के खिलाफ कार्रवाई होती रही है ... पूछताछ होती रही है ...नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे ... उनके करीबियों के विरोध में सीबीआई ने कार्रवाई की थी .... मायावती हों, मुलायम सिंह यादव हों या फिर वीरभद्र सिंह हों इन सभी पूर्व और वर्तमान मुख्यमंत्रियों और इनके करीबियों से सीबीआई पूछताछ कर चुकी है .. इनके खिलाफ कार्रवाई कर चुकी है ... और समय-समय पर अभी भी कर रही है ...

अगर भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ना है .... तो आज की भी सीबीआई की कार्रवाई पर अरविंद केजरीवाल को ऐतराज़ नहीं होना चाहिए .... ये सबको याद होगा कि सत्ता में आने के पहले तक केजरीवाल का मुख्य एजेंडा भ्रष्टाचार विरोधी कार्रवाई ही था ..  ऐसे में अगर उनके या उनके किसी करीबी के आवास या फिर उनके दफ्तर में भ्रष्टाचार के विरोध में कोई जांच एजेंसी कार्रवाई कर रही है तो इस पर इतना हो हल्ला क्यों ? ...
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को तो इस कार्रवाई का समर्थन करना चाहिए ... अगर उनके किसी करीबी पर आर्थिक भ्रष्टाचार के आरोप हैं और इस मामले में जांच एजेंसी इसकी सच्चाई परखना चाह रही है तो केजरीवाल को इस बात का समर्थन करना चाहिए .. क्योंकि वो खुद भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई के हिमायती रहे हैं ... ऐसे में केजरीवाल अगर बार बार ये ट्वीट कर रहे हैं कि बदले की भावना से कार्रवाई की जा रही है .. तो उनमें और भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे बाकी दलों के मुख्यमंत्रियों में क्या फर्क रह जाता है ..

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2015

किसानों की दुर्दशा - बुंदेलखंड से अकोला तक

एक बार फिर किसी बाबूलाल ने सरकार की नींद हराम की है … ये वो बाबूलाल है जो आर के नारायण के राजू की तरह ही उपवास रख रहा था .. ताकि बारिश की कुछ बूंदे धरती पर गिरें तो उनके सूख चुकी जीवन की धरा पर हरियाली के अंश नज़र आने लगें … हालांकि बाबूलाल का अंत आर के नारायण के कैरेक्टर राजू की तरह नहीं हुआ क्योंकि उसकी खबर सरकार तक पहुंच गई और उसकी मदद की कोशिशें होने लगी हैं … खेत में बोरवेल खुदवाने का वादा कर दिया गया है .. अगर ये वादा पूरा हो गया तो शायद उस इलाके के कुछ किसानों को सूखे की तकलीफ से राहत हो जाएगी और उन्हें बाबूलाल की तरह बारिश के लिए अपना जीवन दांव पर नहीं लगाना पड़ेगा लेकिन उन किसानों का क्या जो बाबूलाल की तरह ही परेशान हैं लेकिन समझ नहीं पा रहे कि अपनी जिंदगी बदलने के लिए उन्हें क्या करना चाहिए ..

किसानों की ये हालत हमेशा से रही है... चाहे इस पर कितनी भी सियासत हुई हो .. कितने हीं नेताओं के सियासी जीवन का ग्राफ ऊपर नीचे हुआ हो.. इन किसानों के हक की बात करके भले ही कई नेता अपनी मंज़िल के करीब आ गए हों लेकिन इन किसानों के जीवन में कोई फर्क नहीं आया … 2014 में लोकसभा के चुनाव होने थे तो बीजेपी ने अपने मैनिफेस्टो में किसानों के लिए जो वादे किए अगर वो पूरे हो गए होते तो बाबूलाल आज सरकार को परेशान नहीं कर रहा होता … अगर सरकार ने खेती में सरकारी निवेश बढ़ा दिया होता,लागत का 50 फीसदी तक फायदा पहुंचाने की कोशिश की गई होतीसस्ते कृषि उत्पाद और कर्ज़ मुहैया कराया गया होताग्रामीण इलाकों में कर्ज़ की सीमा बढ़ा दी गई होतीअच्छे बीजों की बड़े पैमाने पर व्यवस्था की गई होतीहर खेत में पानी पहुंचाया गया होता ,ग्राम सिंचाई योजना की स्कीम आ गई होती. etc. etc. ऐसा नहीं है कि सरकार ने सिर्फ मैनिफेस्टो में इसका ज़िक्र किया और बैठ गई ..अकेले प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत ही केंद्र सरकार ने 50 हज़ार करोड़ की रकम allocate की जो पांच साल में खर्च की जानी है ताकि हर खेत में पानी पहुंच सके ..
लेकिन फिर वही सवाल काश सरकार ने इस दिशा में कदम भी उठाए होते …

अकेले केंद्र सरकार ही क्यों राज्य सरकारों ने भी अपनी ज़िम्मेदारी बखूबी निभाई है .. बाबूलाल तो बुंदलखंड के उन किसानों का चेहरा है जो सालों से चोट खाते रहने के बाद भी अपनी जिंदगी की आखिरी सांस तक कोशिश कर रहे हैं … समाजवादी पार्टी ने भी 2012 में चुनावों के दौरान किसानों के लिए तमाम ऐलान किए लेकिन इनका ज़मीनी स्तर पर अगर फायदा हुआ होता तो बाबूलाल या देवराज की तस्वीरें मीडिया की सुर्खियां नहीं बन रही होतीं …क्योंकि समाजवादी पार्टी के वादों के मुताबिक ना तो किसानों को लाभकारी मूल्य दिलाने के लिए कमीशन बना और ना ही परतीबंजर क्षेत्र को उपजाऊ बनाने की दिशा में कुछ सार्थक काम किए गए .. नदियों को जोड़ने की योजना का तो सरकार को शायद याद भी ना हो .. किसानों को सब्सिडी पर बीज क्या मिलेंगे .. कई जगहों पर तो बीज ही नहीं मिले …इसी तरह तमाम वादे अधूरे ही रहे .. अगर पूरे हुए होते तो क्या ये बाबूलाल परेशान करता … क्या देवराज सुर्खियों में आ पाता ?हां इतना ज़रूर हुआ कि जब ये किसान सुर्खियों में आए तो सरकार ने इन्हें हाथों-हाथ लिया और मामले की तुरंत सुनवाई हो गई …
बात इतनी ही नहीं है … अब किसानों के प्रति सरकारों के उदासीन रवैये ने बेवजह परेशान करने वाले किसानों के प्रति कुछ अपराधिक लोगों को सक्रिय कर दिया है … अब किसान सिर्फ कुदरत और सरकारों का मारा ही क्यों रहे …उससे सिर्फ अन्न क्यों लिया जाए उसका अंग क्यों नहीं … अन्न से ज्यादा तो अंग की कीमत होती है … पहले साहूकार किसानों का खून चूस लिया करते थे … अब उनकी नज़र अंगों पर है … खून चूसने की बात तो खैर मुहावरा है लेकिन अंगों की सौदेबाज़ी सच्चाई … ये सच्चाई विदर्भ की है … जहां साहूकार कर्ज़ नहीं चुका पाने वाले किसानों को अंग बेच देने की राह दिखाते हैं … और कर्ज़ के बदले साढे चार लाख में किडनी निकाल लेते हैं … अब किसान ने कर्ज़ लिया है तो भुगतान तो करना होगा … इसका मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि सरकार को किसानों की फिक्र नहीं है … मौजूदा बीजेपी सरकार ने भी अपने election manifesto में किसानों की मदद का भरपूर ऐलान किया था … कल्याणकारी योजनाएं बनाने के वादे किए गए … अगर सचमुच सरकार ने किसानों के कल्याण के लिए काम किया होता तो क्या एक किसान महज़ चंद रुपयों के लिए अपनी किडनी बेचने को मजबूर हो जाता .. ये हाल तब है जब केंद्र के साथ साथ महाराष्ट्र में भी बीजेपी की ही सरकार है लिहाज़ा इस बात की भी गुंजाइश नहीं रह जाती कि केंद्र और राज्य सरकार के बीच कोई रस्साकशी चल रही हो …

तो क्या किसानों के लिए सरकारों के पास सिवाय वादों के और कुछ नहीं … अगर सरकार किसानों के लिए योजनाएं बनाने के दावे करती भी हैं और किसानों को इसका फायदा नहीं हैं तो दरअसल ये योजनाएं किसके लिए हैं … सोचिए क्यों देवराज अभी भी देवराज है और क्यों बाबूलाल अभी भी बाबूलाल ही है … क्यों कलावती की किस्मत भी कभी नहीं बदली ..

बुधवार, 25 नवंबर 2015

ऐसी परंपराओं में बदलाव क्यों नहीं ?

मंदिर, मस्जिद गुरुद्वारों में आने जाने को लेकर कई तरह के नियम कायदे रहे हैं … कपड़ो की शालीनता को लेकर कई बार बहस भी छिड़ी है लेकिन कोई ऐसा नियम, कानून या कायदा जो किसी महिला की Modesty पर प्रहार करता हो, क्या कोई सभ्य समाज इसकी इजाज़त दे सकता है …केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 से लेकर 50 साल तक की महिलाओं को आज तक मंदिर में जाने की इजाज़त नहीं है और इसके पीछे है सदियों पुरानी सोच जिसमें वक्त बदलने के साथ कोई बदलाव नहीं आया है …

हमारे देश में धर्म के नाम पर चलने वाली सदियों पुरानी परंपराएं उस वक्त की परिस्थितियों के मुताबिक शुरू हुई थीं जिनमें कई जगहों पर वक्त के हिसाब से बदलाव आए हैं .. सती प्रथा की परंपरा बंद हुई, बाल विवाह की परंपरा पर काफी हद तक लगाम लग चुकी है .. दहेज का लेन-देन जो पहले प्रथा मानी जाती थी अब भारतीय कानून के मुताबिक अपराध की श्रेणी में आ चुका है … विधवाओं के दोबारा विवाह करने को लेकर भी सोच में काफी बदलाव आ चुका है लेकिन कई जगहों पर परंपरा के नाम पर अभी भी सोच में बदलाव नहीं आया .. केरल का सबरीमाला मंदिर इसी का उदाहरण है …

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी सैकड़ों साल से है …. 10 साल से 50 साल के बीच की महिलाएं जिन्हें मासिक धर्म होता है वो इस मंदिर में नहीं जा सकती है …हालांकि इस चीज को लेकर सोच में बदलाव इसीलिए आनी चाहिए क्योंकि पहले ऐसे साधन मौजूद नहीं थे जो महिलाओं के लिए इन चार दिनों को उनके लिए सुविधाजनक रखें लेकिन ऐसे तमाम साधनों की उपलब्धि के बाद जब महिलाएं घर से बाहर निकलने, भागदौड़ करने और दिनचर्या के बाकी काम करने से अगर पीछे नहीं हट रही हैं तो फिर उनके मंदिर जाने पर पाबंदी क्यों … क्या मासिक धर्म एक natural process नहीं है … क्या ये ईश्वर के बनाए गए विज्ञान का हिस्सा नहीं है … और अगर है तो इसे अपवित्र करार दिए जाने के पीछे का क्या logic ….परंपरा के नाम पर शुद्धता की जांच के लिए बनाए जाने वाले मशीन की चर्चा करने का क्या logic और क्या Logic है इस बात का कि इसी नाम पर लाखों महिला श्रद्धालुओं को मंदिर में प्रवेश ही ना करने दिया जाए …इतने साल से चली आ रही परंपराओं का ही परिणाम है कि आज भी आमतौर पर महिलाएं उन दिनों में पूजा-पाठ करने और मंदिर जाने से परहेज़ करती हैं … लेकिन सवाल ये कि इसे पाबंदी के तौर पर लागू करना कहां तक जायज़ है …. इसकी जांच के लिए मशीन की बात करना कहां तक जायज़ है …

जब चर्च तलाक से लेकर समलैंगिगता के मुद्दों पर बहस करने और बदलाव के लिए तैयार हैं ...ईरान जैसे देश में महिलाओं के प्रति विचार बदल रहे हैं, इस्लाम में आधुनिकता की बात होने लगी है..ऐसे में मंदिर बदलाव के लिए तैयार क्यों नहीं हैं? कोई भी परंपरा या कानून समाज के लिए होता है... समाज परंपरा या कानून के लिए नहीं होता..ऐसे में सवाल ये कि क्या त्रावणकोर देवास्वम बोर्ड के प्रेसीडेंट गोपालकृष्णन का इस तरह का बयान हिंदू समाज का नुकसान नहीं कर रहा 

बुधवार, 17 जून 2015

राम लला हम फिर आएंगे !

अपने देश में राम भक्ति लोकतंत्र के पर्व की तरह है .. जिसका आनंद सियासी शतरंज की बिसात पर चाल चलने वाले निश्चित अंतराल पर लेते रहते हैं ... एक बार फिर राम मंदिर के निर्माण का शोर सुनाई दे रहा है अब इसे संयोग ही मान लीजिए कि इसी साल बिहार में विधानसभा चुनाव होने हैं और उत्तर प्रदेश में भी विधानसभा चुनावों की बिसात बिछ चुकी है ..
अयोध्या में एक बार फिर संतों और वीएचपी नेताओं का जमावड़ा लगा ...भले ही बड़े ऐलान की उम्मीद लगाए लोगों को निराशा हाथ लगी लेकिन  इसी बहाने मंदिर मुद्दे पर चर्चा तेज हो गई ... ऐसे में सवाल ये कि क्या  बैठक का मकसद ही यही था... और आने वाले दिनों में भी इस तरह की कवायद जारी रहेगी... लोकसभा चुनाव में बीजेपी की भारी जीत के बाद ये पहला मौका है जब अयोध्या में इस तरह से सरगर्मियां बढ़ी हैं... और वीएचपी, बीजेपी या संघ के लोग चाहें जो दलील दें, अयोध्या की ये हलचल महज इत्तेफाक नहीं है... बल्कि ये चुनावी मौसम का असर है.. सितंबर-अक्टूबर में बिहार के चुनाव होने हैं जबकि उसके साल भर बाद यूपी में राजनीतिक नारों का शोर गूंजने लगेगा...
दरअसल बीजेपी...आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद इन मुद्दों को तभी उठाते है जब या तो देश में चुनाव होने वाले हो...या फिर उत्तर प्रदेश या बिहार में चुनावी माहौल बनने लगा हो... बीजेपी...विश्व हिंदू परिषद और आरएसएस को एक बार फिर राम मंदिर की याद आ गई है...ऐसा पहली बार नहीं हुआ है बल्कि जब से देश में राम मंदिर मुक्ति आंदोलन शुरु हुआ तब से ही ऐसा चला  आ रहा है, चाहे देश में अटल बिहारी वाजपेयी जी के नेतृत्व में NDA की सरकार रही हो या फिर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चल रही मौजूदा सरकार ... ये बात और है कि हर बार बीजेपी, विश्व हिंदू परिषद और संघ की तरफ से ये दावा किया जाता रहा है कि राम का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है बल्कि राम मंदिर का मुद्दा आस्था का मुद्दा है, आध्यात्मिक मुद्दा है ...
विश्व हिंदू परिषद, बीजेपी और संघ हर बार राम नाम से राजनीतिक फायदा ही उठाना चाहते हैं और समय-समय पर उठाते भी रहे हैं .. इस मुद्दे पर बीजेपी की तरफ से विरोधाभासी बयान आना भी नया नहीं है ...मसलन अगर अमित शाह राम मंदिर समेत बीजेपी की तरफ से किए गए ऐसे सभी सियासी वादों को पूरे करने के लिए 370 सीटें आने की बात करते हैं ..राजनाथ सिंह सरकार के कॉमन मिनिमम प्रोग्राम और मामले के अदालत में होने का हवाला देकर राम मंदिर जैसे मसलों को प्राथमिकता नहीं देने की बात करते हैं तो साक्षी महाराज जैसे नेता राम मंदिर की पुरजोर वकालत करते भी नज़र आते हैं ... बीजेपी इन विरोधाभासी बयानों के जरिए जनता को गुमराह करने की रणनीति पर काम करती है .. इस तरह की बातें तब भी होती थीं जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे और अब भी हो रही हैं जब सबका साथ सबका विकास के नारे के साथ सत्ता में आए नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं ...
ये भी एक संयोग ही है कि एक तरफ बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व अल्पसंख्यक समुदाय के हितों की बात करता है तो दूसरी तरफ उनके ही नेता राम मंदिर बनाने के नारों की आवाज़ बुलंद कर रहे होते हैं ... अटल जी के ज़माने में भी जब खुद अटल जी अल्पसंख्यक समुदाय में आत्मविश्वास पैदा करने की कोशिश कर रहे थे ... विवाद सुलझाने के लिए अयोध्या समिति का गठन कर बातचीत की पहल की थी ... उसी दौरान मार्च 2002 में वीएचपी ने मंदिर निर्माण शुरु करने का ऐलान कर दिया.. संयोगवश ये भी वही वक्त था जब यूपी में विधानसभा चुनाव होने थे...हालांकि चुनावों में इसका फायदा बीजेपी को नहीं मिल पाया ..
मौजूदा वक्त में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी लगातार अल्पसंख्यकों के बीच भरोसा बहाली की कोशिश में जुटे हैं...अल्पसंख्यक नेताओं से मिल रहे हैं....अल्पसंख्यकों के लिए योजनाएं चला रहे हैं...मुस्लिम देशों की यात्राएं भी संभावित है...रमजान के ठीक पहले कतर, बहरीन, इजिप्ट और इंडोनेशिया के राजदूतों को प्रधानमंत्री ने अपने आवास पर लंच कराया है ... इसी बीच बीजेपी की दूसरी धारा भी सक्रिय हो गई है ... साक्षी महाराज जैसे नेता लगातार विवादित बयान दे रहे हैं, बीजेपी युवा मोर्चा ने अपना प्रदेश सम्मेलन अयोध्या के कारसेवकपुरम में किया है, संघ और वीएचपी की गतिविधियां अचानक बढ़ गई हैं, अयोध्या में एक बार फिर बैठकों, बयानों का दौर जारी है .... संयोग से बिहार में इस साल चुनाव हैं और उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है ..
एक बार फिर लग रहा है कि बीजेपी अपनी उसी पुरानी रणनीति पर काम कर रही है ... एक तरफ विकास के नाम पर मोदी आगे किए जाएंगे .. दूसरी तरफ राम के नाम पर पार्टी के बाकी नेताओं को आगे किया जाएगा .. चुनाव में दोनों मुद्दे साथ-साथ चलेंगे और पार्टी की कोशिश होगी कि दोनों मुद्दों के आधार पर मतों का ध्रुवीकरण अपने पक्ष में कर लिया जाए .. लेकिन इन  सबके राम नाम की सियासी धारा फिर उफान पर होगी ... जो मौसम बीतते ही शांत भी हो जाएगी .. 

मंगलवार, 9 जून 2015

बिहार में मोदी बनाम ऑल

बिहार की सियासत में जिस तरह तेजी से परिवर्तन आए हैं उसने एक दिलचस्प राजनैतिक घमासान की बुनियाद तैयार कर दी है...इस घटनाक्रम ने ना केवल नीतीश कुमार की सीएम उम्मीदवारी को लेकर फंसा पेंच खत्म कर दिया है बल्कि आरजेडी की ओर से हो रही बयानबाजियों की भी हवा निकाल दी है..नीतीश और राहुल गांधी की मुलाकात ने जहां तीन यादव नेताओं को रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया है तो वहीं दूसरी ओर ये भी साफ हो गया है कि बिहार में एक बार फिर मोदी बनाम ऑल की लड़ाई होने वाली है...अब सवाल ये कि बिहार के मौजूदा माहौल को किस तरह देखा जाए और क्या 2014 के बाद बीजेपी के लिए ये सबसे बड़ी परीक्षा की घड़ी है......

अब सवाल ये कि अब तक जिस मसले पर आपसी आजमाइश चल रही थी वो मुद्दा अचानक हल कैसे हो गया..और इसका बिहार और देश पर क्या राजनीतिक असर होने वाला है....एक बार फिर नरेन्द्र मोदी औऱ बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आमने सामने होंगे....बिहार के चुनाव में जनता परिवार और कांग्रेस ने बेहद सुनियोजित रणनीति के तहत नीतीश कुमार को बिहार का अगला सीएम प्रोजेक्ट कर चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है...

दूसरी ओर एलजेपी नेता रामविलास पासवान पहले ही बोल चुके हैं कि बिहार में चुनाव मोदी को आगे करके लड़ा जाएगा...मतलब साफ है दिल्ली में हुए केजरीवाल बनाम मोदी के चुनाव के बाद एक बार फिर शक्ति प्रदर्शन की तैयारी है...
वैसे दिल्ली में बीजेपी ने ऐन वक्त पर किरण बेदी को खोजकर सीधी लड़ाई को डायवर्ट करने की कोशिश की थी...
लेकिन बिहार में बीजेपी खासकर एनडीए की ओर से नीतीश कुमार के मुकाबले किरण बेदी कौन होगा ये बड़ा सवाल है...हालांकि नाम उछालने वाले नाम उछाल रहे हैं...कभी मांझी तो कभी पासवान का जिक्र भी सामने आ रहा है..वैसे भी मोदी और नीतीश कुमार के बीच शुरु से ही रिश्ता छत्तीस का ही रहा है...

गुजरात दंगों के बाद से ही नीतीश कुमार ने मोदी से दूरी बनाए रखी...अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि को बनाए रखने
के लिए नीतीश ने बीजेपी के सहयोगी के तौर पर भी कभी भी मोदी को पसंद नहीं किया...और आखिरकार नीतीश ने बीजेपी से 17 साल पुराना रिश्ता तब तोड़ा जब 2013 में नरेन्द्र मोदी को बीजेपी के लोकसभा चुनाव प्रचार अभियान की कमान सौंपी गई...लेकिन नीतीश कुमार का ये दांव उलटा पड़ गया बिहार में..जब लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी 2 सीटों पर सिमट गई..नीतीश ने इस्तीफा दिया और जीतनराम मांझी को सीएम बनाया...लेकिन बाद में मांझी बागी हो गए..मांझी की बगावत को मोदी ने शह दिया...सीएम पद पर रहते हुए और पद से हटाए जाने के बाद मांझी कई बार मोदी से मिल चुके हैं...नीतीश और मोदी के बीच तल्खी हाल में ही आए नेपाल भूकंप के वक्त भी दिखी थी...जब नीतीश को नेपाल नहीं जाने दिया गया..यानी नीतीश ने अगर मोदी का हर कदम पर विरोध किया तो मोदी ने भी नीतीश को राजनीतिक तौर पर शिकस्त देने का कोई मौका नहीं छोड़ा...ऐसे में अब जनता परिवार की ओर से नीतीश के नाम के ऐलान के बाद गेंद मोदी के पाले में है...जिन्हें तय करना है कि बिहार में सीएम उम्मीदवार के साथ चुनाव लड़ा जाएगा या फिर खुद उनके इकबाल पर
वैसे बीजेपी के लिए बिहार की जातीय राजनीति सबसे बड़ी चुनौती है...जिसे साधना आसान नहीं होगा..वो भी ऐसे हालात में जबकि मुस्लिम, यादव, कुर्मी समीकरण की गोलबंदी पुख्ता दिख रही है...जबकि महादलित वोटों को साधने लिए बीजेपी अगर मांझी के साथ जाती है तो उन्हें सीएम प्रोजेक्ट करने की शर्त माननी होगी जिसके लिए बीजेपी तैयार होगी ऐसा लगता नहीं...यानी सियासत का पूरा खेल बेहद दिलचस्प मोड़ पर आ खड़ा हुआ है...जहां मोदी के मुकाबले नीतीश कुमार की सीधी सियासी लड़ाई की पटकथा तैयार हो रही है...यकीन मानिए अगर इस लड़ाई में दिल्ली दोहराई गई तो बीजेपी के लिए सबसे बड़ी मुश्किल यूपी में खड़ी होगी जहां संगठऩ से लेकर नेतृत्व तक के उसी संकट से पार्टी जूझ रही है जैसी हालत बिहार में है...

मंगलवार, 2 जून 2015

बीजेपी की शह और मात !


हाईटेक प्रचार और रणनीति की बदौलत 2014 में अपने इतिहास की सबसे बड़ी कामयाबी दर्ज करने वाली बीजेपी अब सदस्यता और महासम्पर्क अभियान के जरिए संगठन की एक ऐसी मजबूत नींव बनाने में जुटी है...जिस पर वो भविष्य की सियासत की एक मजबूत इमारत खड़ी करने में कामयाब हो सके ....बीजेपी का महासम्पर्क अभियान सिर्फ एक अभियान भर नहीं है....बल्कि एक ऐसी रणनीति है जो अगर कामयाब हुई तो दूसरी पार्टियो के मुकाबले बीजेपी कोसों आगे नजर आएगी...
बीजेपी के चल रहे महासंपर्क अभियान के कई राजनीतिक मायने हैं .. इस महाअभियान के जरिए बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व अपने हर कार्यकर्ता से सीधे संवाद कायम करने के साथ–साथ अपने नीति निर्धारण की प्रक्रिया में भी उनको शामिल करने में कामयाब रहेगी …. इतना ही नहीं शीर्ष नेतृत्व नीति तय करने के महज चंद सेकेंड्स के भीतर उसे गांव और मोहल्ले में काम करने वाले कार्यकर्ता तक पहुंचा भी पाएगी … बीजेपी देश की पहली ऐसी पार्टी है जो तकनीक के सहारे अपने विरोधियों को जबरदस्त पटखनी देने जा रही है ..
बीजेपी महासम्पर्क अभियान के जरिए एक मजबूत डेटा बैंक तैयार कर रही है .. बीजेपी ने चुनावों के बाद लॉन्च किए गए अपने सदस्यता अभियान में देशभर में 10.5 करोड़ सदस्यों को जोड़ने का दावा किया था...बीजेपी ने इसके लिए एक नंबर 18002662020 जारी किया था...जिस पर मिस्डकॉल देनी जिससे सदस्य बनने के ख्वाहिशमंद लोगों का रजिस्ट्रेशन हो जाता था...31 मार्च तक बीजेपी का ये अभियान चला...अब बीजेपी तीन महीने का महासम्पर्क अभियान चला रही है...इसके जरिए रजिस्ट्रेशन करा चुके लोगों से एक फॉर्म भरवाया जा रहा है....इस फॉर्म में जो जानकारियां मांगी जा रही है उसके जरिए बीजेपी एक डेटा बैंक बनाने की तैयारी में है...फॉर्म में धर्म और जाति के अलावा प्रोफेशन, एजुकेशन, और रूचि का क्षेत्र जैसी जानकारियां मांगी गई है..
ये जानकारी बीजेपी अपने पास रखेगी जिसे बीजेपी कई तरीके से इस्तेमाल कर सकती है .. दरअसल ये डेटा बैंक जिस तरह से तैयार किया जा रहा है वैसा पहले कभी नहीं हुआ..इसके जरिए बीजेपी अपने सभी सदस्यों से सीधे जुड़ जाएगी . शीर्ष नेतृत्व की देश के सभी कार्यकर्ताओं से वन टू वन कनेक्टिविटी होगी...बीजेपी को ये पता होगा कि किस प्रोफेशन, किस जाति, किस वर्ग के कितने सदस्य उसके पास है...किस गली, किस मोहल्ले के सदस्य उसके पास हैं...कोई भी नीति बनाने के लिए अगर फीडबैक की जरूरत होगी तो वो पार्टी को महज एक क्लिक पर मिल जाएगी...इतना ही नहीं किसी भी सदस्य तक अगर कोई बात पहुंचानी होगी तो सेकेंडों में पहुंचाई जा सकेगी...कार्यकर्ताओं की कार्यशैली पर सीधी नजर होगी....तो वहीं कार्यकर्ताओं और शीर्ष नेतृत्व के बीच की दूरी कम हो जाएगी...सीधे संवाद का फायदा ये होगा कि लालफीताशाही और वरिष्ठताक्रम का पेंच कार्यकर्ताओं के कदम नहीं रोक पाएगा
इसी के साथ बीजेपी जिस तरह से data bank तैयार कर रही है वैसा पहले किसी भी पार्टी ने कभी नहीं किया .. इसके जरिए पार्टी की अपने सदस्यों के साथ one on one connectivity हो जाएगी .. और आने वाले समय में भारत की सियासत पर इसका गहरा असर पड़ेगा .. इससे ना सिर्फ सामाजिक राजनैतिक ढांचा बदलेगा बल्कि इससे राजनीति की दशा -दिशा बदल जाएगी .. बीजेपी का दावा है कि सदस्यता अभियान के जरिए सवा दस करोड़ से ज्यादा लोग मेंबरशिप के लिए रजिस्ट्रेशन करा चुके हैं … ऐसे में अगर इतने ही लोग अपनी मेंबरशिर confirm कराते हैं और अपने महासंपर्क अभियान के जरिए बीजेपी इन सबको अपनी पार्टी का सदस्य बना पाती है तो इन सब से जुड़ी जानकारी बीजेपी के पास मौजूद होगी .. बीजेपी को ना सिर्फ इनके जाति धर्म का पता होगा बल्कि इनके एजुकेशन और प्रोफेशन से जुड़ी जानकारी भी बीजेपी के पास होगी .. इन्हें ये भी पता होगा कि किस निर्वाचन क्षेत्र, किस जिले, गांव यहां तक कि वॉर्ड में उनके कितने सदस्य हैं … साथ ही वो किस व्यवसाय, किस कॉलेज से जुड़े हैं .. data analysis और data synergy के जरिए ये सब लोग बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व से सीधे जुड़ जाएंगे … ऐसे में बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व को वॉर्ड लेवल तक अपनी बात पहुंचाने के लिए अलग -अलद पदाधिकारियों से बात करने तक की ज़रूरत नहीं होगी .. इस के जरिए बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व hierarchy को खत्म कर सकता है .. लालफीताशाही को खत्म कर सकता है .. जिससे communication error होने की संभावना खत्म हो जाएगी … इसके अलावा बीजेपी अगर सिर्फ वकीलों या डॉक्टर्स या शिक्षक या छात्रों तक कोई संदेश पहुंचाना चाहे तो ये पार्टी के लिए बेहद आसान हो जाएगा …

बीजेपी की इस रणनीति का असर भविष्य की सियासत पर पड़ेगा....जिससे ना केवल सामाजिक राजनैतिक ढांचा बदलेगा बल्कि राजनीति की दिशा और दशा भी बदल जाएगी...अपने हाईटेक प्रचार का लोहा मनवा चुकी बीजेपी प्रचार के मोर्चे पर विरोधियों को पहले ही करारी मात दे चुकी है अब इस फॉरवर्ड प्लानिंग के जरिए बीजेपी संगठन के स्तर पर एक नया मील का पत्थर स्थापित करने की तैयारी में है...जिसका मुकाबला कर पाना विरोधियों के लिए आसान नहीं होगा..

मंगलवार, 26 मई 2015

राजनीतिक दलों ने सिद्धातों की बातें करना बंद कर दिया है : महेश चंद शर्मा

पंडित दीन दयाल उपाध्याय और उनके एकात्म मानववाद के सिद्धात को बीजेपी ने अपनाया है और इसी सिद्धात पर ये पार्टी आगे बढ़ रही है ... लेकिन क्या सचमुच पार्टी ने एकात्म मानवाद के सिद्धांत को अपनाया है और क्या है पंडित दीन दयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद की फिलॉसॉफी... एकात्म मानवदर्शन अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान के अध्यक्ष डॉ. महेशचन्द्र शर्मा से बातचीत के मुख्य अंश
वासिंद्र मिश्र: एकात्म मानववाद या दीन दयाल जी का Integral Humanism का जो जीवन दर्शन था, वो क्या था ? और आज की मौजूदा व्यवस्था उस जीवन दर्शन के कितना करीब है, और कितना दूर ?
महेश चंद शर्मा: दीन दयाल जी जब सार्वजनिक जीवन में आए, तब देश में एक बहस चल रही थी कि जो प्रचलित राजनीतिक जीवन प्रणालियां हैं.. उनमें से हम कौन सी अपनाएं ? प्रचलित विचार थे- व्यक्तिवाद यानि पूंजीवाद, समाजवाद यानि साम्यवाद... व्यक्तिवाद या समाजवाद दोनों में से किसको अपनाया जाए ? दीन दयाल जी ने कहा कि क्या मजबूरी है जो मैं दोनों में से किसी एक को अपनाऊं.. दोनों ही पाश्चात्य विचार हैं.. ये जहां पैदा हुए हैं.. उनकी परिस्थितियां भिन्न हैं.. दोनों परस्पर विरोधी विचार हैं.. ये व्यक्ति बनाम समाज के विचार हैं.. हम तो भारत में रहते हैं.. हमारे यहां व्यक्ति बनाम समाज की कोई दृष्टि नहीं है.. इसलिए हमको अपनी भारतीय दृष्टि से मानव को देखना चाहिए.. न कि पाश्चात्य दृष्टि से.. पाश्चात्यों में से किसी ने कहा कि.. Human being is an individual .. तो किसी ने कहा.. Human being is not an Individual but Society. दीन दयाल जी ने कहा.. भारत का विचार कहता है कि व्यक्ति और समाज.. व्यष्टि और समष्टि ये पृथक इकाइयां नहीं हैं... मानव तब बनता है जब व्यक्ति और समष्टि एकात्म हो जाती है.. मानव में से व्यक्ति और समाज को बांट दें.. तो मानव मर जाएगा.. इसलिए व्यक्तिवादी और समाजवादी मानव नहीं बल्कि एकात्मवादी मानव को जानना, समझना चाहिए.. उसके लिए रीति-नीति बनानी चाहिए.. जो व्यक्तिवादी नीतियां होंगी वो व्यक्ति जो समाजवादी नीतियां होंगी वो व्यक्ति के खिलाफ होंगी .. इसलिए मानव की नीतियां बननी चाहिए तभी तो सुखकारी होंगी... दीन दयाल जी ने कहा कि.. ये तो पाश्चात्य संदर्भ है.. भारत में ये एकात्मकता यहां तक सीमित नहीं है... जैसे मानव में व्यष्टि है... जैसी मानव में समष्टि है.. वैसे ही मानव में सृष्टि है.. मानव प्रकृति से पृथक नहीं है.. मानव में परमेश्वर है.. इसलिए व्यष्टि, समष्टि, सृष्टि और परमेष्टि.. इन चारों के एकात्मता का नाम है मानव... मानव को पहले जानो, फिर इसके लिए नीति बनाने की बात करो...
वासिंद्र मिश्र: आज़ादी के बाद से अब तक देश और राज्यों में जितनी सरकारें रही हैं.. किसके कामकाज या कार्यशैली को आप दीन दयाल जी के जीवन दर्शन के करीब देखते हैं..
महेश चंद शर्मा: दीन दयाल जी समाज और सरकार को समानार्थी नहीं मानते थे.. वो ये मानते थे कि सरकार का समाज में बहुत छोटा रोल होता है.. समाज में बड़ा रोल संस्कृति, सामाजिक संस्थाओं, परिवार, पंचायत और जनपद का होता है.. इसलिए एकात्म मानववादी संरचना सरकारवादी नहीं होती, सरकार एक महत्वपूर्ण निकाय है.. इसलिए सरकार को वैसे काम करना चाहिए.. लेकिन सरकार को ऐसे काम नहीं करने चाहिए जिससे परिवार, पंचायत, जनपद जैसी संस्थाएं विकलांग हो जाएं.. सरकार को इन सब संस्थाओं का सहयोगी होना चाहिए.. ultimately समाज संस्कारों और संस्कृति से govern होता है.. कानूनों से नहीं...
वासिंद्र मिश्र: तो क्या इसका मतलब है कि दीन दयाल जी सत्ता के विकेंद्रीकरण के पक्षधर थे ?
महेश चंद शर्मा: हां, दीन दयाल जी सत्ता और वित्त दोनों के विकेंद्रीकरण के हिमायती थे क्योंकि समष्टि विकेंद्रित है , समष्टि का मतलब होता है कि वो हर individual में समाहित है.. या कहें विकेंद्रित है.. इसलिए केंद्रीकरणवादी हर व्यवस्था चाहे वो राजनीतिक हो या आर्थिक.. दीन दयाल जी मानते थे, वो अमानवीय है.. वो समाज के सुख का कारक नहीं बन सकता...
वासिंद्र मिश्र: लेकिन, आज जो हालात हैं देश में.. उससे आपको नहीं लगता है कि.. वो दीन दयाल जी के दर्शन के बिलकुल विपरीत है ?
महेश चंद शर्मा: ये हालात देश के नहीं, बल्कि विश्व के हैं.. साथ ही संसार में आज जो paradigm है.. वो वेस्टर्न है, पूर्वी देशों में पैराडाइम वेस्टर्न है और इसलिए इन दि नेम ऑफ ग्लोबलाइजेशन... हम बुरी तरह से केंद्रीकरण की ओर बढ़ रहे हैं .. विकास के नाम पर हम नितांत भौतिकता की ओर बढ़ रहे हैं.. दीन दयाल जी कहते हैं कि हमें सरकारों में बल्कि इस paradigm में शिफ्ट होना चाहिए.. लोकतंत्र का भारतीयकरण होना चाहिए.. अर्थव्यवस्था का भारतीयकरण होना चाहिए.. हमारे संपूर्ण चेतन का भारतीयकरण होना चाहिए.. पश्चिम का ये विचार कोई भारतीय पूरे तौर से स्वीकार नहीं कर सकता.. भारतीय इसके लिए संपन्न नहीं है .. इसलिए आज की व्यवस्था के जो नियामक पुरुष हैं.. पंडित जवाहरलाल नेहरू.. उन्होंने भी जैसा व्यक्तिवाद पश्चिम में है.. उसको ज्यों का त्यों स्वीकार नहीं किया.. जैसा साम्यवाद पश्चिम में है.. वैसा स्वीकार नहीं किया.. उन्होंने कहा, हम मिलकर काम करेंगे.. उन्होंने मिश्रित व्यवस्था की बात की.. भारत और एशिया के देश पाश्चात्य साम्राज्यवाद से मुक्त होने के बावजूद.. जो western paradigm है उससे मुक्त नहीं हो पाए हैं.. इसलिए बहुत सी समस्याएं हैं...
वासिंद्र मिश्र: तो इसका solution कहां से आएगा ?
महेश चंद शर्मा: इसका solution समाज में है.. दीन दयाल जी लोकतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण काम मानते हैं लोकमत परिष्कार का.. लोकमत परिष्कृत होगा तो सरकारें परिष्कृत होंगी.. लोकमत अपरिष्कृत रहेगा और सरकारें परिष्कृत हो जाएंगी.. ये असंभव है.. उनका वाक्य है.. ''सिद्धांतहीन मतदान, सिद्धांतहीन राजनीति का जनक है'' जब तक मतदान में सिद्धांत नहीं आएगा राजनीति, व्यक्तियों में रहेगी.. पूरी राजनीति में सिद्धांतवादिता नहीं आएगी.. इसलिए वो कहते हैं कि.. ''मतदाता को मतवान बनाओ'' मतदाता को जानकार बनाओ.. साल 1952 चुनाव का विश्लेषण कर उन्होंने कहा कि.. हमारे नेताओं को विनम्र होना चाहिए.. क्योंकि, जिसको हम public mendate कह रहे हैं.. वो वास्तविकता नहीं है.. 1952 में जब कांग्रेस को व्यापक सफलता हासिल हुई थी.. तो उनको कुल मतदान का केवल 25% वोट ही मिला था.. चुनाव में 50% लोग वोट देते ही नहीं थे.. ऐसे में कुल मतदान का 25% पा गए तो mendate पर अहंकार क्यों ? हमें अपने लोकतंत्र का भारतीयकरण करते हुए उसे लोकमत और लोकइच्छा के अनुसार ढालना चाहिए.. उनका फोकस सरकार और पार्टियों पर नहीं.. वोट पर था..
वासिंद्र मिश्र: देश में आज जो सरकारें बन रही हैं उनको 30%, 32%, 33% मत मिलता है.. वो सरकार बनाते हैं... और दावा करते हैं कि.. उनको mendate है, उनको जनादेश है.. व्यवस्था में बदलाव करने का ?
महेश चंद शर्मा: दीन दयाल जी कहते हैं.. हमें विनम्र होकर स्वीकार करना चाहिए कि.. जो पद्धति है.. उसके कारण सरकारें बनती है.. लेकिन, mendate मिला है.. ये कहना सही नहीं है...
वासिंद्र मिश्र: सिद्धांतों की बातें करके सरकारें बन रही हैं, सिद्धांतों की बात कर लोग चुनाव में जाते हैं... घोषण-पत्र में सिद्धांतों की बातें करके चुनाव में जाते हैं ?
महेश चंद शर्मा: नहीं जाते, ये दुर्योग है.. इस देश का कि.. राजनीतिक दलों ने सिद्धांतों की बातें करना बंद कर दिया है... आप आज पाएंगे कि सभी पार्टियों के घोषणा-पत्र की भाषा बिलकुल समान है.. फर्क नहीं है उनमें.. और हमको इस विचारधारा के निकश पर कसिए, ऐसा कोई कहता नहीं है.. इसलिए, एक सरल रास्ता खोज लिया गया है कि.. हिंदुस्तान के जो वोट डालने वाले लोग हैं.. उनमें बड़ी संख्या गरीबों की है.. इसलिए गरीबी की बात सब बोलते हैं.
वासिंद्र मिश्र: और जब सरकार में आते हैं, गरीबों को भूल जाते हैं ?
महेश चंद शर्मा: नहीं भूलते हैं, जब सरकार में आ जाते हैं, तो गरीबी को स्थाई रखने का काम करते हैं.. जैसे गरीब को सस्ता अनाज दे देंगे.. छोटे-मोटे काम कर देंगे.. ऐसे में गरीब कैसे स्वाबलंबी बनेगा.. गरीबी के नाम पर बनने वाली योजनाएं सामान्यत: गरीबी को स्थाई बनाने के लिए होती हैं.. दरअसल, योजना होनी चाहिए.. भारत के हर वयस्क के हाथ को रोजगार मिले.. दीन दयाल जी कहते थे.. कि एक पंचवर्षीय योजना ऐसे बनाओ.. जिसका लक्ष्य हो कि कोई व्यक्ति बेरोजगार नहीं होगा.
वासिंद्र मिश्र: तमाम योजनाएं चल रही हैं.. फूड गारंटी, रोजगार गारंटी, शिक्षा के अधिकार की गारंटी.. ये सभी सरकार की ओर से चल रही हैं..
महेश चंद शर्मा: इन सब योजनाओं पर पुनर्विचार करना चाहिए.. दीन दयाल जी कहते थे, मुद्दा केवल गरीबी नहीं है.. उनका एक वाक्य है.. ''अर्थ का अभाव और अर्थ का प्रभाव धर्म की क्षति करता है''.. देश में दरिद्रता नहीं होनी चाहिए और देश में पैसे का प्रभाव नहीं होना चाहिए.. इन दोनों से क्षति होती है.. दीन दयाल जी अभाव और प्रभाव दोनों के निराकरण की बात करते हैं और कहते हैं कि धर्म की स्थापना के लिए जरूरी है कि अर्थ संतुलित रहे ..
वासिंद्र मिश्र: जो लोग अर्थ के प्रभाव में बड़े-बड़े चुनाव जीत लेते हैं.. जब वो सत्ता में आते हैं.. तो वो भी गरीबी और विषमता हटाने की बातें करते हैं..
महेश चंद शर्मा: वो ये बातें चुनाव में भी करते हैं और चुनाव के बाद भी करते हैं.
वासिंद्र मिश्र: तो उनसे आपको उम्मीद है कि.. वो कोई बदलाव ला पाएंगे दीन दयाल के चिंतन के मुताबिक ?

महेश चंद शर्मा: दीन दयाल जी का फोकस पार्टियों और सरकारों पर नहीं था.. उनका फोकस वोटर पर है.. मतदाता पर है. लोकमत परिष्कार पर है.. उनको भारतीय समाज के लोक पर विश्वास है कि.. वो परिवर्तन लाएगा.. अवश्य लाएगा.. क्योंकि प्रकृति का नियम है... सत्य मेव जयते.... सत्य की विजय होगी 

रविवार, 24 मई 2015

गुर्जर आरक्षण पर सरकार प्रस्ताव भेजे तो केंद्र विचार करेगा : थावरचंद गहलोत

एक बार फिर राजस्थान में गुर्जर आंदोलन शुरू हो गया है.. थावरचंद गहलोत केंद्र में सामाजिक न्याय मंत्री है .. गुर्जर आंदोलन और आरक्षण के मसले पर थावरचंद गहलोत से बातचीत के मुख्य अंश
वासिंद्र मिश्र – पिछले 15 साल से गुर्जरों के आरक्षण का ये मुद्दा बना हुआ है...सरकारें राज्य में बदलती है..राजस्थान में मुद्दा जस का तस बना रहता है...ये क्यों हो रहा है....आप की दोनों जगह सरकार है..दिल्ली में भी और राजस्थान में भी ...क्या इस बार इस मुद्दे का समाधान दिखाई दे रहा है...
थावरचंद गहलोत - इस प्रकार के मामले या विषय जब आते हैं...तो जो नियम प्रक्रिया है उसकी जानकारी देना चाहूंगा....अगर कोई ओबीसी में अपने आप को शामिल करवाना चाहता हो...तो राज्य सरकार की अनुशंसा...राज्य सरकार की सिफारिश आवश्यक है...राज्य सरकार जब तक हमें अपनी सिफारिश नहीं भेजेगी तब तक हम उसपर विचार करने की स्थिति में नहीं रहते हैं.... राज्य सरकार अनुशंसा करके, सिफारिश करके भेजती है तो हम ओबीसी आयोग के चैयरमैन के पास उसे भेजते हैं, ओबीसी आयोग के चैयरमैन या ओबीसी आयोग उसके गुणदोष पर विचार करता है...मंडल कमीशन की रिपोर्ट और 1955 में जो अनुसूचित जातियां..जन-जातियां आदेश जारी हुआ था उसके आधार पर ये तय किया जाता है कि ये इस समुदाय में शामिल करने योग्य हैं या नहीं, अगर वो सकारात्मक राय देते है तो फिर हम विधेयक बनाकर संसद में पेश करते है...संसद की सहमति होती है तो फिर आरक्षण दे दिया जाता है ...परंतु ये सब राज्य सरकार की अनुशंसा के बाद ही होता है अन्यथा हम कुछ नहीं कर सकते...
वासिंद्र मिश्र - गहलोत जी ये जो आप ने बताया...ये तो एक प्रक्रिया है...कि किसको आरक्षण देना है और किसको नहीं...राज्य में बीजेपी की सरकार है...केंद्र में भी बीजेपी की सरकार है...इसके पहले जब कांग्रेस की सरकार थी..तब भी आंदोलन हुआ था...और उसके पहले राज्य में आप की सरकार थी...जब वसुंधरा जी मुख्यमंत्री थीं...तब भी आंदोलन हुआ था....जब बीजेपी सत्ता से बाहर होती है तो गुर्जर आंदोलन को समर्थन करती है, जब सत्ता में आ जाती है तो चुप्पी साध लेती है...इसकी क्या वजह है ?
थावरचंद गहलोत - मैने जो प्रक्रिया बताई...उसके अनुरूप अगर हमारे पास प्रस्ताव आएगा...तो ही हम विचार करेंगे...नहीं तो नहीं करेंगे....रहा सवाल राज्य सरकार का तो ये राज्य सरकार को ही तय करना है ...हम उन्हें इस बाबत ना तो कोई राय दे सकते हैं ना हीं कोई आदेश जारी करने को कह सकते हैं ... .राज्य सरकार के साथ हम विचार विमर्श करते हैं उसके बाद भी राज्य सरकार गुणदोष के हिसाब से ही फैसला करेगी....राज्य सरकार से अनुशंसा आएगी तो हम कार्रवाई करेंगे....
वासिंद्र मिश्र - ये बात सच है ...लेकिन आप संगठन में महामंत्री है,.,,पार्टी में कई अहम पदों पर आप रहे हैं...मंत्री के अलावा भी आप की अलग अहमियत है...आप को नहीं लगता कि आंदोलन बहुत दिनों से चल रहा है और अब इसका समाधान निकाला जाना चाहिए...
थावर चंद गहलोत- वो तो सामने दिखाई दे रहा है...ये लंबे समय से चल रहा है....और इसका समाधान होना चाहिए...पर राज्य सरकार इसके गुणदोष पर विचार करके,.....अगर हमारे साथ कोई पत्र व्यवहार करेगी..अनुशंसा करेगी तो ही हम विचार कर पाएंगे....
वासिंद्र मिश्र – बार-बार क्रीमीलेयर का मुद्दा उठता है .. .जो समाज में आर्थिक और सामाजिक रूप से संपन्न लोग हैं उनको भी आरक्षण की सुविधा हासिल है....उनके आश्रितों को, उनके परिवार के सदस्यों को ..क्या आप या आप की सरकार इस पर पहल करेगी...कि क्रीमीलेयर से जो लोग ऊपर हैं....उनको आरक्षण की सुविधा से वंचित रखा जाएगा....
थावरचंद गहलोत- अनुसूचित जाति और जनजाति पर सामान्यत:: ये विषय लागू होता नहीं है..आज भी अनुसूचित जाति वर्ग को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है..अन्य वर्गों की तुलना में वो काफी पिछड़े हैं..और अनेक पद ऐसे हैं जहां उनका कोई प्रतिनिधित्व नहीं है...जैसे भारत सरकार में इस वर्ग से सचिव स्तर का कोई अधिकारी नहीं है...अगर गलती से एक-दो बार रहा हो तो बात अलग है...आज की तारीख में तो नहीं है...तो SC-ST पर क्रीमी लेयर का फॉर्मूला लागू हो या नहीं...इस प्रकार के विचार सरकार के सामने फिलहाल नहीं है। हालांकि समय-समय पर इन वर्गों में से बहुत सारे लोग क्रीमी लेयर बनाए जाने की मांग करते हैं अनुसूचित समूह में आने वाली कई जातियों से कुछ लोग लंबे समय से IAS, IPS या राजनीतिक क्षेत्रों में काम करते हैं, लेकिन अभी निष्कर्ष पर पहुंचने का समय नहीं आया है, अभी हमने SC-ST के लिए क्रीमी लेयर के मसले पर गंभीरता से विचार नहीं किया है । हालांकि ओबीसी के लिए क्रीमीलेयर लागू होने के आधार पर अब ये चर्चा शुरु हो गई है कि SC में भी ये देना चाहिए...ये बात अपने आप में सही हो सकती है कि जिन लोगों ने लगातार दस पंद्रह या बीस सालों तक IAS, IPS और IFS अधिकारी के रुप में या राजनीति क्षेत्र में रहकर अपने समाज में अपने परिवार का स्तर ऊंचा किया है, उनके बारे में इस प्रकार का विषय आता है तो विचार करने योग्य है...जब ऐसा वातावरण बनेगा तो इस पर गंभीरता से विचार करके आगे की कार्रवाई के बारे में कुछ सोचेंगे...
वासिंद्र मिश्र - मतलब पिछड़े वर्ग में क्रीमीलेयर के पक्षधर हैं आप ?
थावरचंद गहलोत – जी हां वो तो लागू हो गया और इसी कारण से SC-ST के लिए भी लागू होता है..SC-ST को जो आरक्षण दिया गया उसके पीछे आर्थिक, शैक्षणिक और जाति आधारित का वातावरण था ... इस कारण से उनको आरक्षण दिया गया था...इस प्रकार का वातावरण आज भी यदाकदा अपवाद स्वरुप दिखाई देता है..और बहुत सारे क्षेत्रों में इस तरह की घटनाएं हो रही हैं.. इसी वजह से अभी तक SC/ST के लिए क्रीमी लेयर की धारणा को बल नहीं मिला है...जब इन वर्गों में से ही मांग उठेगी तो विचार करेंगे
वासिंद्र मिश्र - थवरचंद जी...जाट आरक्षण के बारे में सरकार क्या सोच रही है ?
थावरचंद गहलोत - जाट आरक्षण का जहां तक सवाल है...यूपीए की सरकार ने चुनावी माहौल को देखते हुए हां कहा था ...हमने भी उनकी सहमति को अपनी सहमति मान कर उसको लागू कर दिया था..परन्तु इसी बीच सुप्रीम कोर्ट ने जाट आरक्षण को अवैध घोषित कर दिया ...अब इसमें सरकार की ओर से पुनर्विचार याचिका लगाई गई है...सुप्रीम कोर्ट की जो पहले बेंच थी,...उसी बेंच में हमने पुनर्विचार के लिए आग्रह किया है...अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार है...कोर्ट के फैसले के बाद ही हम आगे की कार्रवाई कर पाएंगे....
वासिंद्र मिश्र - तो आप बिल लाकर, संविधान संशोधन करके लागू क्यों नहीं कर देते...
थावरचंद गहलोत- नहीं सुप्रीम कोर्ट ने जिस आधार पर फैसला किया है, उस आधार पर हमने कोर्ट को पुनर्विचार करने का आग्रह किया है ...ये एक प्रक्रिया है इसलिए हमने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया है..सुप्रीम कोर्ट की राय आएगी उसके बाद आगे की कार्रवाई करेंगे...
वासिंद्र मिश्र - एक और मुद्दा बना हुआ है..यूपी में खास तौर से...कि प्रमोशन में भी आरक्षण मिलना चाहिए ......मायावती की सरकार ने किया था....उसके बाद कोर्ट ने उसे खारिज कर दिया...मौजूदा जो यूपी की सरकार है...उस दिशा में कोई पहल नहीं कर रही है....निर्देशों के बावजूद उसमें कोई सकारात्मक कार्रवाई अभी तक दिखाई नहीं दे रही है....क्या आपकी सरकार इस दिशा में कोई पहल करने जा रही है... ?
थावरचंद गहलोत - पहले तो ये बात स्पष्ट कर दूं....कि बीजेपी और बीजेपी की सरकार SC-ST के आरक्षण की पक्षधर है....और उसमें प्रमोशन में आरक्षण भी शामिल है...मैं इस अवसर पर आपको ये भी बताना चाहता हूं..कि भारत सरकार के सभी नौकरियों में प्रमोशन में आरक्षण लागू है...अनेक राज्यों में प्रमोशन में आरक्षण लागू है...जिसमें राजस्थान, गुजरात, छत्तीसगढ़ शामिल हैं...यूपी की मायावती जी की सरकार ने राज्य के कर्मचारियों के लिए प्रमोशन में आरक्षण नहीं होने के कारण एक कानून बनाया..उस कानून को कुछ लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी...और उस समय सुप्रीम कोर्ट ने मायाजी की सरकार से तीन प्रकार की जानकारियां मांगी थी...कि आप ये बताएं कि प्रमोशन में आरक्षण क्यों दिया जाए...क्या ये जो पिछड़े लोग हैं नका पिछड़ापन दूर हुआ है ..और अगर प्रमोशन हो जाएगा तो...उस पद पर जाने के बाद उनकी काम करने की क्षमता पर कोई विपरीत असर तो नहीं पड़ेगा, अब ये बहुत सीधी सरल बातें थी जिसका जवाब देना चाहिए था...पता नहीं क्यों उन्होंने जवाब नहीं दिया...और मैं सोचता हूं कि जवाब नहीं देने के कारण भी कोर्ट पर कुछ विपरीत असर पड़ा...SC आयोग और ST आयोग की रिपोर्ट्स दे सकते थे.... योजना आयोग की भी रिपोर्ट दी जा सकती थी...माया सरकार ने जवाब नहीं दिया और कोर्ट ने इस जानकारी के अभाव में प्रमोशन में आरक्षण पर रोक लगा दी... बाद में संसद में इस मामले में एक विधेयक पेश किया गया था .. बीजेपी और कांग्रेस और सभी ने मिलकर राज्यसभा से प्रमोशन में आरक्षण बिल को पास किया...अब वो लोकसभा में लंबित है....
वासिंद्र मिश्र - एक और अहम सवाल है कि लोकसभा चुनाव के पहले और चुनाव के दौरान भी लगभग सभी पार्टियों की ओर से कहा गया कि समाज में जो आर्थिक रुप से कमजोर हैं...चाहे वो अगड़ी जाति के क्यों ना हों...उनके लिए भी कोई व्यवस्था की जाएगी.... अब इस सरकार को लगभग एक साल पूरा हो गया है आप लोग इसकी सालगीरह भी मना रहे हैं... क्या आर्थिक रुप से कमजोर वर्ग के लिए आपके मंत्रालय ने या आपकी सरकार ने अभी तक कोई पहल शुरु की है ?
थावरचंद गहलोत - बिलकुल की है...मेरे विभाग में गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों के लिए एक बोर्ड बनाने का विचार किया है...मध्य प्रदेश ने एक आयोग बनाया था, राज्य योजना आयोग के उपाध्यक्ष बाबू लाल जैन इसके चेयरमैन थे.. .. शिवराज सिंह की सरकार ने इस आयोग के जरिए जो कार्ययोजना बनाई थी, हमने उसे मंगाया है .... कुछ और राज्योंमें ऐसा विचार किया जा रहा है...उस पर हम विचार विमर्श करके और मंत्रीमंडल की राय लेकर तेज़ गति से आगे बढ़ रहे हैं...मैं उम्मीद करता हूं कि अन्य सामान्य वर्ग के ऐसे लोग जो गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे हैं....उनके लिए भी जैसे SC-ST, OBC, विकलांग वर्ग या किन्नर जाति या घुमंतू जाति को लोगों के बच्चों को पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं को जो स्कॉलरशिप या अन्य सुविधाएं देते हैं....उस प्रकार की सुविधाएं देने पर हम विचार कर रहे हैं....और उम्मीद है कि जल्द करेंगे....
वासिंद्र मिश्र - थावर जी एक साल पूरा हुआ है आपकी सरकार का, आपकी नज़र में अपने मंत्रालय के काम-काज में ऐसी कौन सी उपलब्धि रही है जिसको लेकर आप खुशी ज़ाहिर कर सकते हैं ?
थावरचंद गहलोत- हमने सामाजिक सुरक्षा की दृष्टि से बच्चों को पढ़ाई में मिलने वाली स्कॉलर शिप में 10 फीसदी बढ़ोतरी की ... पात्र छात्र-छात्राओं के माता-पिता की आय सीमा में भी वृद्धि की है, कुछ नई स्कीमें जैसे विकलांग छात्रवृत्ति, ओबीसी छात्रवृत्ति योजनाएं शुरू कीं । हम तीन प्रकार की, प्री मैट्रिक, पोस्ट मैट्रिक और ओवरसीज स्कॉलरशिप स्कॉलरशिप देते हैं । विदेश में यदि कोई पढ़ना चाहता है तो 30 लाख तक का ऋण, 4 फीसदी वार्षिक ब्याज की दर से देने का फैसला कियाहै । पहले ये ऋण सुविधा य दा-कदा मिलती थीं पर ब्याज की दर बहुत होती थी
वासिंद्र मिश्र- ये सब अच्छी बात है, लेकिन आपने बातचीत की शुरुआत में कहा था कि तमाम बैकलॉग बने हुए हैं सरकारी विभागों में, केंद्र और राज्य सरकारों में तमाम विभाग ऐसे हैं जिनमें एससी/एसटी के खाली पदों को भरा नहीं गया है, तो, ये आप नहीं मानते हैं कि ये आपकी सरकार की विफलता है, एक साल सरकार में रहने के बावजूद आप लोग उन खाली पड़े पदों पर नियुक्ति नहीं कर पाए ?
थावरचंद गहलोत- नहीं, इसे मैं विफलता इसलिए नहीं मानता क्योंकि भर्ती प्रक्रिया में 6 महीने तो रूटीन मे लगते हैं... चूंकि बैकलॉग की पूर्ति का काम डीओपीटी विभाग से होता है हमने डीओपीटी विभाग से एक बार नहीं हजार बार आग्रह किया है और उन्होनें हमें आश्वस्त किया है कि वो विशेष भर्ती अभियान चलाकर रिक्त स्थानों पर भर्ती करेंगे । हम उम्मीद करते हैं कि सरकार का अगला साल जो शुरु होगा उसमें हम एससी/एसटी के रिक्त आरक्षित पदों को भरेंगे ये बात सही है कि जो 3 फीसदी आरक्षण विकलांगों , 15 फीसदी एससी, 7.5 प्रतिशत एसटी का है, उसमे से बहुत सारे पद रिक्त हैं, इन रिक्त पदों को विशेष भर्ती अभियान चलाकर पूरा करना चाहिए । ये मेरा भी प्रयास है और मैं ये सोचता हूं कि नरेद्र मोदी साहब भी इस दिशा में कारगर कदम उठाने पर सहयोग कर रहे हैं। जहां तक राज्यों का सवाल है तो वहां भी ऐसी ही स्थिति है, हम राज्य सरकारों के साथ समय-समय बैठक करते हैं, संबंधित मत्रियों और सचिवों के साथ बैठक करते हैं। प्रयास ये रहेगा कि तेज गति से रिक्त स्थानों पर भर्ती हो।
वासिंद्र मिश्र- बिहार चुनाव के पहले कुछ उम्मीद है कि उसमें तेजी आएगी ?
थावरचंद गहलोत- बिहार में रिक्त स्थानों की पूर्ति करना राज्य सरकारों का काम है
वासिंद्र मिश्र- नहीं नहीं, आपकी तरफ से ?
थावरचंद गहलोत- केंद्र सरकार की तरफ से हम निरंतर कोशिश कर रहे हैं और उम्मीद है कि सफलता की सीढ़ी चढ़ेंगे...
वासिंद्र मिश्र- आप ये बात तो मानते हैं कि, यूपी और बिहार के चुनाव में एससी एसटी की डी निर्णायक भूमिका रहती है ?
थावरचंद गहलोत- हां स्वाभाविक है, पंजाब में भी है, तमिलनाडु में भी है, वहां ये प्रभाव है तो वहां दिखेगा ।
वासिंद्र मिश्र- तो इस तरह की कल्याणकारी योजनाओं पर को आपकी सरकार महत्व देती हुई क्यों नहीं दिख रही ?
थावरचंद गहलोत- हो रही है ना... मैंने बताया कि हमने प्रयास प्रारंभ किया और सकारात्मक सोच के आधार पर सभी विभाग काम कर रहे हैं । अब मैं ये समझता हूं कि साल भर के समय के मुताबिक कुछ ना कुछ शुरुआत होनी चाहिए पर नहीं हुई.. देर आए दुरुस्तआए.. अगले वर्ष जब सरकार का एक साल पूरा हो जाएगा। उसके बाद इस पर कुछ ना कुछ सफलता प्राप्त कर पाएंगे।

वासिंद्र मिश्र- बहुत बहुत धन्यवाद