बुधवार, 17 दिसंबर 2014

गैर मजहबी हैं ये जिहादी !

आतंकवाद से घिरे पाकिस्तान के लिए आतंकियों के हमले कोई नई बात नहीं है लेकिन 16 दिसंबर 2014 की घटना ना तो पाकिस्तान के हुक्मरान भूल पाएंगे ना ही उनकी अवाम .. इतना ही नहीं इस घटना ने दुनिया के हर मुल्क, हर इंसान को झकझोरा है ... लाखों लोगों के दिलों से इंसानियत के लिए भरोसे की चूलें हिला दी हैं .... यहां तक कि जिहाद के नाम पर दहशत फैलाते रहे अफगान तालिबान के आतंकी भी इस घटना को अफसोसनाक बता रहे हैं .. पर सबसे ज्यादा अफसोस इस बात का है कि ये कायराना हरकत उन लोगों ने की है जो कथित तौर पर इस्लाम की शिक्षा को आगे बढ़ाने की बात करते हैं  .. क्या इस्लाम मासूमों के खून बहाने की इजाज़त देता है? क्या वो नफरत का सैलाब पैदा करने की इजाज़त देता है?  अल्ला हू अकबर का नारा लगाकर जब आतंकी  बच्चों के शरीर में गोलियां उतार रहे होंगे तब क्या खुदा खुश हो रहा होगा ? यकीनन नहीं ..
दरअसल इस्लाम और खुदा के नाम पर ऐसी कायराना और जाहिल हरकत करते आ रहे लोग कभी इस्लाम को समझ हीं नहीं पाए ... वो ये नहीं समझ पाए कि इस्लाम तलवार के दम पर पैदा हुआ धर्म नहीं है ... जो इस्लाम को जानते हैं वो ये भी जानते हैं कि ये धर्म प्यार, इंसानियत और बराबरी की शिक्षा देता है ... तो फिर ये कौन से लोग हैं जो इस्लाम के नाम पर नफरत फैलाने की ठेकेदारी लिए बैठे हैं .. क्या है इनका दीन और ये किसे अपना खुदा मानते हैं ...

भारत के बड़े विद्वान और इस्लाम के जानकार हज़रत मौलाना अली मियां  नफरत की इस आग को इस्लाम से जोड़े जाने के खिलाफ थे ... वो खिलाफ थे कि इस्लाम के नाम पर जिहाद और जिहाद के नाम पर इस तरह की हरकतें नहीं होनी चाहिए ... मौलाना अली मियां ने ये डर जताया था कि नफरत और हिंसा की आग उन सभी परंपराओं को जलाकर खाक कर देगी जिसने इस्लाम और इसका पालन करने वालों को आदर औॅर प्रतिष्ठा दिलाई थी .. मौलाना अली मियां ने अपील भी की थी कि नफरत की ये आग बुझनी चाहिए नहीं तो ये दूसरों का मुल्क, उनके घर या उन्हें ही नहीं जलाएगी बल्कि इसकी तपिश में वो सब झुलसेंगे जो लेशमात्र भी इसका विरोध करेंगे .... क्या मौलाना अली मियां की ये बातें सच नहीं हैं ... और फिर नफरत की इस खेती से हासिल ही क्या होगा ? जो हरकत पाक कुरान शरीफ के खिलाफ हो, जो इस्लाम के खिलाफ हो, उससे भी बढ़कर जो इंसानियत के खिलाफ हो उसे जिहाद का नाम कैसे दिया जा सकता है ...

हर मज़हब मोहब्बत और अमन का पैगाम देता है....लेकिन पाक इस्लाम के नाम को बदनाम करने वालों से कौन पूछे कि उन्होंने जिहाद का क्या मतलब निकाला है...उन्हें आखिर पाक कुरान को बदनाम करने का हक किसने दे दिया....कुरान कहता है कि जिहाद का मतलब संघर्ष या जद्दोजहद करना होता है...इसका मतलब किसी बेगुनाह की जान लेना नहीं और ना ही युद्ध करना है...युद्ध के लिए अरबी भाषा में अलग से शब्द है गजवा या मगाजी...जबकि जिहाद का मतलब इनसे बिल्कुल उलट है...जिहाद दो किस्मों का बताया गया है...पहला जिहाद अल अकबर यानी इंसान अपने अंदर की बुराइयों से लड़े....अपने बुरे व्यवहार को अच्छाई में बदले....इसे बड़ा जिहाद कहा गया है ....जबकि जिहाद अल असगर का मतलब है समाज में फैली बुराइयों के खिलाफ संघर्ष ... ऐसे में खुद ही सोचिए कि तालिबान के तथाकथित जिहादी अपने अंदर की बुराइयों से लड़ रहे हैं या फिर समाज की बुराइयों से ?

क्या ये सच नहीं है कि मतलबपरस्ती के लिए ये इस्लाम की पाक शिक्षा को तोड़मरोड़कर अपने नापाक मंसूबों के लिए इस्तेमाल करते हैं ... पाकिस्तान के पेशावर का मंजर ये बताने के लिए काफी है कि पाक हुक्मरानों औैर पाक की अवाम को सबक सिखाने निकले तथाकथित जेहादी दरअसल दरिंदे थे ... ऐसे में ये लड़ाई इंसान और दरिंदों के बीच की है ... जो बच्चे मरे, वो ना तो हिंदू थे ना ही मुसलमान .. वो इंसान का भविष्य थे.. जिनपर अपने मुल्क को आगे ले जाने की जिम्मेदारी थी ... और अब भी अगर आतंक से लड़ने से पहले धर्म की बात सामने आई तो इसका कोई हल नहीं निकल सकता ...


कोई भी धर्म आतंक फैलाने, कत्लेआम करने की इजाज़त नहीं देता .. तो फिर क्यों धर्म के नाम कुछ गए गुज़रे लोग आतंक का राज कायम करने की सोचते हैं ... लड़ाई आतंकवाद के खिलाफ है और अगर इस घटना ने पाकिस्तान के अलावा बाकी देशों  पर भी असर डाला है तो उन्हें कोशिश करनी चाहिए कि ऐसी घटना दोबारा ना हो .... अपने हित, अपने अहंकार अपने मंसूबों से ऊपर उठकर सबको साथ आना चाहिए और पूरी ताकत से आतंकवाद का खात्मा कर देना चाहिए ..

गुरुवार, 11 दिसंबर 2014

सिद्धांत पर सत्ता हावी !

लोकतंत्र की अऩिवार्य आवश्यकता है राजनीति और राजनीति की अनिवार्य जरूरत है विचारधारा...अलग अलग विचारधाराओं का संयोग ही एक स्वस्थ लोकतन्त्र की बुनियाद बनता है...शायद इसीलिए लोकतन्त्र में विपक्ष की भूमिका खासी अहम मानी गई है... साथ ही एक हकीकत ये भी है कि कई बार सत्ता की जरूरतें विचारधारा पर हावी हो जाती है....और कोई भी राजनीतिक दल विपक्ष में रहते हुए जिन मुद्दों के सहारे राजनीति करता है सत्ता में आते ही उन्हें तिलांजलि दे देता है क्योंकि इससे उनके राजनीतिक हित जुड़े होते हैं... खुद को राष्ट्रवाद का सबसे बड़ा झंडाबरदार बताने वाली बीजेपी की हालत भी कुछ ऐसी ही है... जिसकी विपक्ष के तौर पर विचारधारा और सत्ता में रहते हुए सामने आ रही विचारधारा दोनों में खासा फर्क है...बांग्लादेश से जमीन अदला-बदली के मुद्दे पर बीजेपी का यू टर्न इसकी ताजा मिसाल है...
अपने राजनीतिक इतिहास में पहली बार देश की सत्ता पर पूर्ण बहुमत से काबिज होने वाली बीजेपी अब चेहरा बदलने की कवायद में जुटी है और इस कवायद में उसने ऐसे कई मुद्दों से किनारा किया है जो उसके तरकश में कभी ब्रह्मास्त्र की हैसियत रखते थे ....पिछली एनडीए की सरकार में गठबंधन की मजबूरी के नाम पर बीजेपी ने विवादित मुद्दे छोड़ दिए थे लेकिन पूर्ण बहुमत की सरकार में भी पुराने मुद्दे हाशिए पर रख दिए गए हैं....अब बीजेपी नेता कश्मीर में धारा 370 का नाम नहीं लेते...समान नागरिक संहिता और राममंदिर मुद्दे को तो छोड़ ही दीजिए...
दरअसल बीजेपी को लेकर ये सारे सवाल सिर्फ इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि सत्ता में आने से पहले बीजेपी ने इन तमाम मुद्दों को राष्ट्रवाद की चाशनी में लगाकर पेश किया था..खासकर बांग्लादेशी घुसपैठियों के मुद्दे पर तो सिर्फ बीजेपी ने ही नहीं बल्कि उससे जुड़े तमाम संगठनों का बड़ा अभियान सालों से चल रहा है...लेकिन अब जबकि बांग्लादेश से जमीन की अदला-बदली के मुद्दे पर केन्द्र की दिलचस्पी बढ़ती दिख रही है तो सवाल उठने लाजिमी है क्योंकि इस मुद्दे के विरोध में बीजेपी के दिग्गज नेता विपक्ष में रहते हुए खासा हंगामा मचा चुके हैं
दरअसल बांग्लादेश से जमीन की अदला बदली का मुद्दा काफी पुराना है...साल 1974 में पहली बार इसे लेकर एक समझौता हुआ था लेकिन बात नहीं बनी...दोनों देशों के बीच उन 162 जमीन के टुकड़ों की अदला-बदली होनी है जो बंटवारे के वक्त एक दूसरे के क्षेत्र में रह गई थीं....इसे लेकर पिछली यूपीए सरकार एक प्रस्ताव लाई थी जिसका बीजेपी ने ये कहते हुए विरोध किया था कि इससे संविधान के मूल ढांचे पर चोट होगी और सुरक्षा के साथ समझौता होगा.... दरअसल इस प्रस्ताव को लेकर होने वाले 119वें संविधान संशोधन का विरोध करते हुए बीजेपी अतीत में इतने तर्क दे चुकी है कि अब उसकी बदली हुई रणनीति पर सवाल उठ रहे हैं...
बीजेपी ने कांग्रेस पर हमेशा ही वोटबैंक के चक्कर में बांग्लादेशी घुसपैठियों को पनाह देने, उनका राशन कार्ड, वोटरआई कार्ड बनवाकर वोटबैंक के तौर पर इस्तेमाल करने का आरोप लगाया है इतना हीं नहीं बांग्लादेशी घुसपैठियों को बीपीएल स्कीम के तहत फायदा मिलने पर भी बीजेपी सवाल खड़े करती रही है कि इससे मूल भारतीयों का हक मारा जाता है ...भगवा संगठनों का दावा रहा है कि पूर्वोत्तर में कांग्रेस की सरकारें बांग्लादेशी घुसपैठियों का राजनीतिक इस्तेमाल करती रही हैं...सरकारी और गैर सरकारी आंकड़े भी देश में बांग्लादेशी घुसपैठियों की तादाद 3 से 5 करोड़ तक आंकते रहे हैं...हालांकि ये कयास ही है क्योंकि लम्बे वक्त से देश में रह रहे बांग्लादेशियों की पहचान खासी मुश्किल है...पूर्वोत्तर में तो इनकी संख्या इतनी ज्यादा हो चुकी है कि अब ये राजनीतिक तौर पर भी दखल देने लगे हैं...
भगवा संगठनों का आरोप रहा है कि कांग्रेस ने जानबूझकर इन्हें घुसपैठ की छूट मुहैया कराई और तुष्टिकरण की राजनीति की...जमीन से अदला-बदली के मुद्दे को भी बीजेपी इसी से जोड़ती रही है... लेकिन अब वक्त बदल चुका है...अब बीजेपी को बांग्लादेश से जमीन की अदला-बदली पर एतराज नहीं है....खुद प्रधानमंत्री पूर्वोत्तर दौरे में ये बात कह चुके हैं...तो सवाल उठ रहे हैं कि क्या ये बीजेपी का तुष्टिकरण नहीं है ?
दरअसल देश में पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने वाली बीजेपी अब अपनी छवि बदलने को बेचैन है...अब वो ना केवल पार्टी का विस्तार चाहती है बल्कि साम्प्रदायिक छवि से भी बाहर निकलना चाहती है...माहौल और मौका देखकर वो अपना रुख निर्धारित कर रही है...कश्मीर में धारा 370 से किनारा इसी रणनीति का हिस्सा है...तो पूर्वोत्तर में सीमा विवाद हल करने के नाम पर कांग्रेसी प्रस्ताव को आगे बढ़ाने की कोशिश भी इसी सिलसिले की कड़ी है....लेकिन सवाल ये कि दूसरो पर वोट बैंक के लिए तुष्टिकरण का आरोप लगाने वाली बीजेपी अब खुद क्या कर रही है...क्या बीजेपी के लिए सत्ता सिद्धांत पर हावी हो रहे हैं ..

शुक्रवार, 5 दिसंबर 2014

जनता परिवार की जद्दोजहद !

सत्ता बनाए रखने और सत्ता हथियाने के मकसद से एक बार फिर गैर कांग्रेसी और गैर भाजपाई राजनैतिक दलों के मेल-मिलाप की गतिविधियां तेज हो गई हैं, और राजनैतिक हलकों से जो संकेत मिल रहे हैं उसके आधार पर कहा जा सकता है कि जल्दी ही गैर कांग्रेसी, गैर बीजेपी और गैर वामपंथी दलों की नई पार्टी बन जाएगी...

नए दलों का बनना और टूटना राजनीतिक प्रक्रिया की सामान्य घटनाएं हुआ करती हैं, लेकिन इस बार जिस प्रस्तावित समाजवादी जनता दल के गठन की कोशिश की जा रही है उसके पीछे सांप्रदायिक ताकतों के मुकाबले धर्मनिरपेक्ष ताकतों को लामबंद करने की दुहाई है । दिलचस्प बात ये है कि प्रस्तावित समाजवादी जनता दल में शामिल होने वाले ज्यादातर नेतागण समय-समय पर उन्हीं कथित सांप्रदायिक लोगों के साथ मिलकर सत्ता का सुख भोगते रहे हैं ...

उदाहरण के लिए 1977 में इंदिरा गांधी के मुकाबले गठित जनता पार्टी में ये सभी कथित धर्मनिरपेक्ष नेतागण शामिल थे और आपातकाल के दौरान भी ये सभी नेतागण उन्हीं कथित सांप्रदायिक नेताओं के साथ 19 महीने जेल में भी रहे .. ये अलग बात है कि सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने की महात्वाकांक्षा ने जनता पार्टी का विघटन करा दिया और dual citizenship का मुद्दा बनाकर ये सभी कथित धर्मनिरपेक्ष नेताओं ने खुद को अलग कर लिया ...
ऐसे धर्मनिरपेक्ष नेताओं को एक बार फिर राजीव गांधी के मुकाबले उन्हीं कथित सांप्रदायिक नेताओं के साथ मिलकर सत्ता में अंदर और बाहर हिस्सेदारी करते देखा गया जब वी पी सिंह को पीएम बनाने के लिए दोनों विचारधाराओं के लोग वामपंथी दलों के साथ एकजुट हो गए थे ...

ऐसे नेताओं की राजनैतिक अवसरवादिता का सबसे बड़ा उदाहरण पं. अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में संगठित होने वाले NDA में सहयोगी दलों के रूप में देखने को मिला था .. जब पंडित अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में गठित NDA में शरद यादव जैसे दिग्गज समाजवादी और रामविलास पासवान जैसे गरीबों के मसीहा जैसे लोग मंत्रिमंडल में शामिल दिखाई दिए .. अटल जी की अस्वस्थता के बाद NDA के संयोजक का पद हथियाते समय भी शायद समाजवादी शरद यादव को कहीं सांप्रदायिकता की बू नहीं आई ठीक इसी तरह नीतीश कुमार लंबे समय तक बीजेपी के साथ मिलकर बिहार में सरकार चलाते रहे ... कमोबेश यही स्थिति कर्नाटक में एच डी देवगौड़ा की भी रही ...एच डी देवगौड़ा के बेटे कुमारस्वामी बीजेपी के साथ मिलकर कुछ दिन तक कर्नाटक के मुख्यमंत्री रहे ... रामविलास पासवान सरीखे नेता पहले से ही अवसरवादिता की राजनीति के लिए मशहूर रहे हैं ...

अब इन नेताओं की बेचैनी का कारण अपना अस्तित्व बचाए रखना है... नरेंद्र मोदी के सामने एक के बाद एक राजनैतिक पराजय झेल रहे ये नेतागण एक बार फिर वही घिसा-पिटा सांप्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता का राग अलाप रहे हैं ताकि 2016 में बिहार और 2017 में उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव में अपनी राजनैतिक जमीन बचा सकें ... समय के साथ खुद को अप्रासंगिक होते देख ऐसे नेताओं की मन:स्थिति का अंदाज़ा आपस में छत्तीस का आंकड़ा होते हुए भी इन के एक होने के प्रयासों में दिख  रहा है ... हालांकि इस बार तीसरे मोर्चे की कवायद से वामपंथी दलों ने खुद को अलग रखा है .. ऐसे में बिना वामपंथी दलों के गैर बीजेपी और गैर कांग्रेसी दल मिलकर कितनी मजबूत पार्टी बना पाते हैं ये देखने वाली बात होगी ...

गुरुवार, 4 दिसंबर 2014

क्यों खत्म नहीं होता अयोध्या का विवाद ?

बाबरी ध्वंस की बरसी के ठीक पहले हाशिम अंसारी ने इस विवाद से किसी ना किसी तरीके जुड़े रहे लोगों को हैरत में डाल दिया है .. हालांकि हाशिम अंसारी के इस मुकदमे से खुद को अलग करने के बयान पर उनके जानने वालों को हैरानी नहीं हो रही होगी .. हाशिम अंसारी दरअसल अयोध्या के इस विवादित मामले के ऐसे पैरोकार हैं जिसने अयोध्या मामले को करीब से देखा है... दशकों की कानूनी लड़ाई लड़ी है..कभी भी इस मामले की पैरवी करते हुए साम्प्रदायिक रंग में नहीं रंगे और इस मामले का हल निकालने के लिए लड़ते-लड़ते उम्र के पांच दशक गुजार दिए...
अयोध्या मामले में हाशिम अंसारी एकमात्र ऐसे पक्षकार रहे हैं जिन्होंने इस मामले का रंग अपनी निजी जिन्दगी पर कभी चढ़ने नहीं दिया...हाशिम अंसारी कभी भी जेहनी तौर पर भेदभाव की राजनीति में शरीक नहीं रहे ...बाबरी विध्वंस के पहले या उस दौरान या फिऱ उसके बाद कभी भी हाशिम अंसारी ने फिरकापरस्तों का साथ नहीं दिया ... इस मामले के अपने विरोधी पक्षकार रामचन्द्र परमहंस के साथ ही हाशिम अंसारी एक रिक्शे पर अदालत आते-जाते रहे...उनके साथ ही उनका खाना-पीना होता रहा.. और ये सिलसिला रामचंद्र परमहंस के निधन के बाद ही खत्म हुआ ...
हाशिम अंसारी ने कभी भी अयोध्या के विवादित ढांचे से जुड़े विवाद को संप्रदाय के विवाद से जोड़कर देखा ही नहीं ... दरअसल अयोध्या का माहौल ही कभी इतना विषाक्त नहीं हुआ जितना अयोध्या के नाम पर देश भर में हुआ है ... हाशिम अंसारी इसी अयोध्या में रहे हैं .. ऐसे में हाशिम अंसारी के मुकदमे से अलग होने के बयान पर उनके विरोधियों की सियासत बेमानी लगती है ... जहां एक तरफ लोगों ने इस मुकदमे से जुड़कर सियासी और आर्थिक फायदे उठाए हैं वहीं हाशिम अंसारी ने कभी भी इससे ना तो राजनैतिक फायदा उठाया और इतने सालों में ना ही उनकी माली हालत में कोई फर्क आया है ...
हाशिम अंसारी का खुद को इस मसले से अलग करने का बयान यही बताता है कि वो इस मसले पर हो रही सियासत से आजिज आ चुके हैं ... क्योंकि हाशिम अंसारी जानते हैं कि अयोध्या विवाद आम लोगों की पैदाइश नहीं है इस विवाद को वो तबका हवा देता रहा है जिसने इससे राजनैतिक या आर्थिक फायदा उठाया है ... अपने फायदे के लिए इन लोगों या राजनीतिक दलों ने कभी भी इस मसले का सर्वमान्य हल खोजने की कोशिश ही नहीं की ...जबकि देश की आबोहवा में ज़हर घोल देने वाले इस मसले का हल खोजने की पहले भी कई बार प्रयास किए जा चुके है ... कानूनी दांव-पेंच से परे भी इस मसले का हल निकालने की कोशिश हुई है...
अयोध्या के विवादित ढांचे को गिराए जाने से पहले भी इस मामले का हल निकालने की कोशिश की गई थी ... साल 1986 में केंद्र और राज्य दोनों में कांग्रेस सरकार के रहते विवादित परिसर का ताला खुलवा दिया गया था .... इससे माहौल में थोड़ी तल्खी घुल गई थी जिसे खत्म करने के लिए 1986 में यूपी के तत्कालीन सीएम वीरबहादुर सिंह ने मामले से जुड़े दोनो पक्षों की दिल्ली में बैठक बुलाई .. इस बैठक में मुस्लिम नेता मंदिर के लिए तैयार हो गए थे... सहमति बनी कि मस्जिद के चारों ओर 11 फीट की दीवार बने और मंदिर की शुरुआत रामचबूतरे से हो, लेकिन ये कोशिश नाकामयाब हो गई..
फिर 1989 में राजीव गांधी ने विवादित स्थल के पास शिलान्यास करवाकर इसका हल निकालने की कोशिश की ... तत्कालीन गृहमंत्री बूटा सिंह को उन्होंने उस वक्त उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे नारायण दत्त तिवारी के पास मामले का हल निकालने को भेजा ... 5 कालीदास मार्ग पर बैठक हुई जिसके बाद शिलान्यास पर सहमति बनी.. हालांकि इसने नए विवाद को जन्म दे दिया और राजीव गांधी की इस रणनीति का देश की सियासत पर दूरगामी असर पड़ा ... इसके बाद हुए चुनाव में देश कांग्रेस को अपनी काफी सीटें गंवानी पड़ गईं .... केंद्र में सरकार बनी नेशनल फ्रंट की और पीएम बने वीपी सिंह और इसके साथ ही उत्तर प्रदेश में भी मुलायम सिंह यादव को सत्ता में वापसी का मौका मिल गया .. तब से सत्ता से बेदखल हुई कांग्रेस दोबारा उत्तर प्रदेश में वापसी नहीं कर पाई .. और राजनीति के फेर में आकर अयोध्या का मुद्दा कोयले की आंच की तरह धीरे धीरे सुलगने लगा ..
1990 केंद्र की सरकार बदली और एक बार फिर सरकार की तरफ से मामले का हल निकालने की कोशिश की गई .. नवंबर 1990 में प्रधानमंत्री बनने वाले चन्द्रशेखर ने भी इस मामले को सुलझाने की कोशिश की.. प्रधानमंत्री रहते हुए चंद्रशेखर ने अलग से अयोध्या सेल बनाया .. लेकिन कामयाबी नहीं मिली .. कहा जाता है कि इस दौरान चन्द्रशेखर दोनों पक्षों के सामने ये प्रस्ताव रखा था कि इस मामले का हल सुलह समझौते से हो लेकिन अगर किसी कारण समझौता ना हो सके तो दोनों पक्ष कोर्ट के निर्णय को मानेंगे...और फैसला होने तक इस मुद्दे पर कोई आंदोलन नहीं होगा...कहा तो ये भी जाता है कि इसे लेकर दोनों पक्षों ने एक दूसरे को सहमति के कागजात भी सौंप दिए थे...लेकिन इसी बीच चन्द्रशेखर की सरकार गिर गई और समझौते की उम्मीद भी टूट गई
फिर 1 दिसंबर 1990 को वीएचपी और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी ने बैठक कर इस मामले में समझौते की कोशिश की लेकिन दो चक्र की वार्ताओं के बाद ये कोशिश भी फेल हो गई.. ये वो वक्त था जब देश में सियासतदान राजनीति में नए दांवपेंच के ज़रिए अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे थे ..... गैर कांग्रेसी दलों के लिए अयोध्या का मुद्दा ऑक्सीजन मास्क की तरह काम कर रहा था ... अभियान चल रहा था, कुछ विरोध में थे कुछ पक्ष में .. लेकिन सबका मकसद सियासी रोटी सेंकना भर था ... इसी बीच मसले का हल निकालने में लगे लोगों की सारी कोशिशों पर पानी फिर गया और 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद का विध्वंस हो गया
इस विध्वंस के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव जैसे सोकर उठे और कहा कि विवादित स्थल पर दोबारा मस्जिद बना दी जाएगी लेकिन उनके इस बयान ने अयोध्या से जुड़े इस मसले को लेकर जल रही आग में घी का काम किया .... एक तरफ अदालती कार्रवाई शुरु हुई तो दूसरी तरफ बीजेपी शासित चार राज्यों की सरकारें बर्खास्त कर दी गईं ... उत्तर प्रदेश की सरकार शामिल थी ...
माहौल थोड़ा शांत होने के बाद नरसिंहराव सरकार ने 3 जनवरी 1993 को विवादित स्थल और उसके आस पास की 67 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया ... और रामालय ट्रस्ट बनाकर इस भूमि पर मंदिर, मस्जिद पुस्तकालय और संग्रहालय बनाने की घोषणा की...उस वक्त मौलाना वहीउद्दीन ने मुसलमानों को मस्जिद से दावा छोड़ने की सलाह दी थी लेकिन बात नहीं बनी
इसके बाद भी छिटपुट स्तर पर कोशिशें जारी रहीं ...फैजाबाद के सांसद रहे विनय कटियार ने भी कई दफे स्थानीय स्तर पर मामला सुलझाने की कोशिश की, 2002-03 में कांची कामकोटि के शंकराचार्य और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के बीच भी दो बार बातचीत हुई लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला... मामला अदालत में चल ही रहा है लेकिन फिलहाल विवाद सुलझने की उम्मीद नज़र नहीं आती ... विवादित जमीन पर यथास्थिति बनी हुई है तो विवाद भी यथावत ही है ..
अदालत से बाहर विवाद सुलझाने की तमाम कोशिशों के दौरान हाशिम अंसारी सकारात्मक ही रहे ... लेकिन मसले का हल नहीं ढूंढ पाए ... इसके पीछे वो लोग या सियासी दल रहे हैं जिनके लिए अयोध्या मामला राजनीतिक संजीवनी साबित होता रहा है ...हालांकि अब जब हाशिम अंसारी जैसे भरोसेमंद लोग अगर इस विवाद को दफन करने की बात करते हैं तो राजनीति की रोटी सेंकने वालों पर असर ज़रूर पड़ेगा ...

फर्जीवाड़ा साबित हुआ तो राजनीति से संन्यास ले लूंगा : कठेरिया

कठेरिया जी केंद्र सरकार में मानव संसाधन राज्यमंत्री हैं और भारतीय जनता पार्टी के कुछ ज़िम्मेदार और महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारियां निभानेवाले नेताओं में एक हैं .. रामशंकर कठेरिया के पास पंजाब और छत्तीसगढ़ की सांगठनिक जिम्मेदारी है .. रामशंकर कठेरिया को मानव संसाधन मंत्रालय में राज्यमंत्री का दर्जा दिया गया है .. लेकिन इसके साथ हीं इनके साथ कुछ विवाद भी जुड़ गए हैं .. इन सभी मसलों पर ज़ी मीडिया के एडिटर वासिंद्र मिश्र ने रामशंकर कठेरिया से बेबाक बातचीत की .. पेश हैं बातचीत के कुछ अंश
वासिंद्र मिश्र - कठेरिया जी आज हम आपसे जानना चाहते हैं कि आपके पास पंजाब और छत्तीसगढ़, दो राज्यों की सांगठनिक ज़िम्मेदारी है, पंजाब में विधानसभा चुनाव होनेवाले हैं कुछ दिन में, क्या पार्टी हरियाणा की तरह पंजाब में भी अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है ?
रामशंकर कठेरिया : देखिए भारतीय जनता पार्टी, पंजाब में अकाली दल के साथ सरकार में शामिल है, और भारतीय जनता पार्टी का एक बहुत पुराना राजनैतिक गठबंधन ही नहीं, बल्कि एक रिश्ता भी है, और हम दोनों लोग मिल जुलकर गठबंधन धर्म निभा रहे हैं .. उसमें हम दोनों दलों को किसी तरह की कोई आपत्ति नहीं है
वासिंद्र मिश्र : लेकिन अभी तक जो उदाहरण है देश के सामने कि आपने अपनी 25 साल पुराने सहयोगी शिवसेना को चुनाव के दौरान महाराष्ट्र में dump कर दिया , जब आपको लगा कि शिवसेना अब भारतीय जनता पार्टी के लिए liability है , और वही शिवसेना जब बीजेपी के लिए जब ऑक्सीजन का काम कर रही थी तब पार्टी शिवसेना के साथ थी दूसरा उदाहरण हरियाणा का है, हरियाणा में आपने अपनी राजनैतिक सहयोगी पार्टी को छोड़ दिया, अकेले चुनाव लड़ा और सरकार में आए तो इन दो राज्यों के जो परिणाम आए, जो ट्रेंड देखने को मिला उसके आधार पर कहा जा रहा है कि अब पंजाब में भी भारतीय जनता पार्टी ने लगभग मन बना लिया है अकेले चुनाव लड़ने का, इसमें कितनी सच्चाई है ?
रामशंकर कठेरिया : देखिए ये बात बिल्कुल सत्य है कि आज पूरे देश के राजनैतिक परिदृश्य को देखें तो हमारे ध्यान में ये ज़रूर आता है, कि देश की जनता भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में है, और मैं ये भी कह सकता हूं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है के 6 महीने हो गए हैं और जो सरकार की परफॉर्मेंस रही है, वो देश की जनता ने स्वीकार किया है और उनके नेतृत्व में जो भी 6 महीने में सरकारी गतिविधियां रही हैं, चाहे महंगाई का विषय हो, चाहे और कई क्षेत्रों के विषय हों, सारे विषयों में मैं मानता हूं कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार खरी उतरी है जहां तक महाराष्ट्र की बात है, महाराष्ट्र में गठबंधन हमारा बहुत पुराना है, वहां भी रिश्ते की तरह राजनैतिक गठबंधन था, लेकिन ठीक है, कुछ परिस्थितियोंवश हम दोनों का गठबंधन नहीं हुआ और अलग-अलग चुनाव लड़ा है.. और उसका रिज़ल्ट हम सबके सामने है शिवसेना भी महसूस करती है कि मिल जुलकर ही चुनाव लड़ना ठीक था हमारा मानना, पार्टी का मानना पहले से ही था, हमने कोशिश भी की, कि हमारा गठबंधन बना रहे और हम दोनों मिलकर सरकार बनाएं आज परिस्थिति कुछ बदली है , लेकिन आज भी हम दोनों के बीच अच्छे संबंध हैं, और मुझे उम्मीद है कि अच्छे संबंध रहेंगे भी जहां तक आपने हरियाणा का प्रश्न किया है, मैं मानता हूं कि हरियाणा में किसी एक दल से ऐसा गठबंधन कभी नहीं रहा, मैं समझता हूं कि हर चुनाव में गठबंधन की परिभाषा वहां बदलती रही है और स्थाई हमारा कोई गठबंधन ऐसा था नहीं लेकिन इस साल हरियाणा की जनता ने, जो और दल थे, कांग्रेस के प्रति नाराज़गी थी, लेकिन और जो छोटे-छोटे दल थे उनके प्रति भी वही नाराज़गी थी इसलिए जनता की जनभावनाओं को सम्मान करते हुए भारतीय जनता पार्टी ने निर्णय लिया कि हम चुनाव में अकेले जाएंगे अच्छी बात ये रही कि हरियाणा का चुनाव हुआ उस चुनाव में जैसे पार्टी ने चुनाव लड़ा अकेले उसी तरह हरियाणा की जनता ने भी भारतीय जनता पार्टी को बहुमत के साथ सरकार बनाने का अवसर दिया जहां तक आप पंजाब की बात करते हैं मैने पहले ही कहा है कि पंजाब में हमारा राजनैतिक गठबंधन केवल नहीं है बल्कि एक रिश्ता भी है, और हमारा अटूट संबंघ है, और हमारी जो मिली जुली सरकार है उसके दो साल हैं, और बहुत जल्दी कोई चुनाव भी नहीं है, इसलिए उसके बारे में अभी कुछ कहना ठीक नहीं है ...
वासिंद्र मिश्र : नहीं लेकिन अभी आपने कहा कि हरियाणा में आपने जनभावनाओं का आदर किया और गठबंधन तोड़कर अलग-अलग चुनाव लड़े, महाराष्ट्र में आपने कहा कि वहां भी आपका 25 साल पुराना रिश्ता था लेकिन आपने उस गठबंधन को तोड़ दिया, पंजाब में अभी तक जो खबरें रही हैं जिस तरह की आप लोगों के पास भी रही हैं कि पंजाब की जनता मौजूदा अकाली दल सरकार से काफी नाराज़ है और उससे ऊब चुकी है इसका नुकसान ये रहा कि लोकसभा चुनाव में पूरे देश में मोदी का जादू भले ही चला हो लेकिन पंजाब में उस तरह की कामयाबी भारतीय जनता पार्टी को नहीं मिली, शायद इसका सबसे बड़ा कारण यही था कि अकाली दल की सरकार से वहां की जनता बेहद खफा है, बेहद नाराज़ है इस कड़वी सच्चाई को समझते हुए ही शायद भारतीय जनता पार्टी ने अब ये मन बनाया है कि दो साल बाद जब पंजाब में चुनाव होगा तो अकेले चुनाव लड़ना पार्टी के लिए राजनैतिक तौर ज्यादा फायदेमंद हो सकता है
रामशंकर कठेरिया : ये बात ठीक है आपकी कि कोई भी राजनैतिक दल है चुनाव के क्षेत्र में जाता है तो उस क्षेत्र की जनभावनाओं का सम्मान करता है हरियाणा में भारतीय जनता पार्टी ने जनभावनाओं का सम्मान किया और उसके कारण मुझे फायदा हुआ जहां तक आप पंजाब की बात कर रहे हैं मैंने बार-बार यही कहा है कि कोई भी दल है जनभावनाओं का सम्मान करता ही है, क्योंकि राजनैतिक क्षेत्र में उसे चुनाव लड़ना होता है। लेकिन हमने कहा कि हम केवल राजनैतिक आधार पर हम पंजाब में सबकुछ decision नहीं लेते हैं वहां पर हमारा पुराना संबंध है और ये ठीक है कि जनता में और कार्यकर्ताओं में इस बात की सुगबुगाहट है इससे इनकार हम नहीं कर सकते हैं लोकसभा चुनाव हुए हमें, हमारी पार्टी को और अकाली दल को भी मुझे लगता है जो हमें जितनी सफलता पंजाब में मिलनी चाहिए थी वो हमें नहीं मिली कारण बहुत हो सकते हैं, लेकिन अभी हमारा गठबंधन है और मज़बूती के साथ गठबंधन है
वासिंद्र मिश्र : रामशंकर जी आप छत्तीसगढ़ के भी प्रभारी हैं पार्टी के, छत्तीसगढ़ में आपकी सरकार है और लगातार तीसरी बार रमन सिंह वहां के मुख्यमंत्री हैं राजनैतिक कामयाबी मिल गई ये भी सच्चाई है लेकिन आपकी सरकार पर कई गंभीर आरोप हैं सबसे बड़ा आरोप है प्राकृतिक संसाधनों का जिस तरह कुछ बिज़नेस घरानों और सत्ता में बैठे लोगों ने मिलकर बंदरबांट किया, उसका लाभ कुछ चंद बिज़नेस घरानों की जेब में गया, आम जनता की जेब में नहीं दूसरी बड़ी समस्या वहां नक्सलवाद की रही जो आज भी वहां बरकरार है उसमें कहीं कोई खास कामयाबी मिलती दिखाई नहीं दे रही आप या आपका संगठन क्या इस परफॉर्मेंस से संतुष्ट है अपनी सरकार के ?
रामशंकर कठेरिया : देखिए, मैं कहूंगा कि छत्तीसगढ़ में हमारी सरकार है और हमारे मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह सरकार की अच्छी परफॉर्मेंस रही है और लोग संतुष्ट हैं, इसलिए मैं कह सकता हूं कि तीसरी बार बहुमत के साथ हमारी सरकार वहां बनी है आपने कहा कि नेचुरल रिसोर्स वहां पर हैं जिनपर आपने संकेत किया है, मैं ऐसा नहीं मानता हूं जो वैधानिक प्रक्रिया है उसके अंतर्गत किसी को लाभ मिला है, तो मिला है, लेकिन उसमें जो नियमानुसार और वैधानिक प्रक्रिया है उसको पूरा करने के बाद, और जहां तक आपने दूसरा विषय लिया है नक्सलवाद हमारी सरकार नक्सलवाद के विषय को लेकर गंभीर है, और उसके समाधान की दिशा में भी जो ठोस कदम उठाए जा रहे हैं उसी का परिणाम है कि हमें अभी दिखाई नहीं दे रहा है लेकिन हमारा silent work उसके समाधान की दिशा में मैं कह सकता हूं कि बहुत अच्छा प्रयास हो रहा है ..
वासिंद्र मिश्र : रामशंकर जी ... मानव संसाधन विकास मंत्रालय देश के कुछ चुनिंदा मंत्रालयों में से सबसे महत्वपूर्ण मंत्रालय है, उस मंत्रालय की ज़िम्मेदारी है आपके पास । भारतीय जनता पार्टी, संघ परिवार का शिक्षा में गुणात्मक परिवर्तन का सपना रहा है, खासतौर से संघ परिवार का ये मानना रहा है कि एक विचारधारा विशेष से जुड़े इतिहासकारों ने भारत के इतिहास को, भारत की संस्कृति को बिगाड़ कर, उससे छेड़छाड़ कर पाठ्यक्रमों में शामिल किया है, और अब सुनने में आ रहा है कि संघ परिवार चाहता है कि मौजूदा सरकार उन खामियों को दूर करे । जहां-जहां इतिहास में गलतियां हुई हैं, उसको दुरुस्त कर नए पाठ्यक्रम लागू किए जाएं, वो किस स्थिति में हैं, और आपकी उसपर क्या राय है ?
रामशंकर कठेरिया : मैं ये ज़रूर मानता हूं कि देश में आज जो कुछ है चाहे शिक्षा के क्षेत्र में हो, या समाज के क्षेत्र में हो, चाहे मनुष्य के जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में हो, कुल मिलाकर स्थिति बहुत संतोषजनक नहीं है । ये सभी लोग मानते हैं, देश के विद्वान भी मानते हैं, समाज के बुद्धिजीवी भी मानते हैं । जो सुधार होना चाहिए था आज़ादी के बाद और जिस तरह की हमारे देश की प्रकृति है, जिस तरह की देश की सोच और संस्कृति है, स्वतंत्रता के बाद जिस तरह से देश को बढ़ना चाहिए था, जिस दिशा में बढ़ना चाहिए था, हम उतना नहीं बढ़े । जब हम ये बात सोचते हैं, तो आखिर में कहां जाएं ? किसके ऊपर ज़िम्मेदारी है ? ऐसा क्यों नहीं हुआ ? अंत में हम आते हैं कि एक मंत्रालय है मानव संसाधन मंत्रालय जो हिंदुस्तान में एक ठोस कदम उठाने की ज़िम्मेदारी रखता है । आज मेरे ऊपर ज़िम्मेदारी है, जैसा कि आपने कहा कि संघ के बारे में, तो मैं ये कहूंगा कि संघ की विचारधारा राष्ट्रीय विचारधारा है । संघ की कोई अलग विचारधारा नहीं है, संघ की विचारधारा भारत की संस्कृति से जुड़ी हुई है, और उसके आलोक में संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत अगर यहां आवश्यकता है और ऐसा कोई सुझाव आता है, तो हम देश के बुद्धिजीवियों का आह्वान करते हैं कि आज के परिवेश में, आज के परिपेक्ष्य में हमारे मंत्रालय को किस-किस क्षेत्र में किस-किस परिवर्तन की ज़रूरत है.. हमें बताएं तो हम संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत उसपर विचार करेंगे । और आज मुझे विचार करने की ज़रूरत भी महसूस हो रही है ।
वासिंद्र मिश्र : आप शिक्षा के क्षेत्र से आते हैं, क्या आपने ऐसे बिंदुओं की पहचान की है जिसमें फौरी तौर पर सुधार की आवश्यकता है ?
रामशंकर कठेरिया : देखिए, दो-तीन बड़ी चुनौतियां हैं । एक तो हमारे देश की जो प्राथमिक शिक्षा है, खासकर जो ग्रामीण क्षेत्र की शिक्षा है- प्राइमरी, मिडिल और प्राथमिक स्कूल हैं, उनकी स्थिति में आज सुधार होने की बहुत बड़ी ज़रूरत है । इसपर हमारा मंत्रालय गहन चिंतन कर भी रहा है । इसी के साथ-साथ जो हमारा वनवासी, आदिवासी क्षेत्र है, जनजाति के लोग हैं, अनुसूचित जाति के लोग हैं, जो एडमिशन लेते हैं लेकिन पांचवीं पास करते हैं, आठवीं पास करते हैं, लेकिन स्कूल छोड़ देते हैं, जिन इलाकों में Dropout Students की संख्या 50 फीसदी से ज्यादा हो जाती है, वहां सुधार की जरूरत है .. हिंदुस्तान में जो ऐसे कमज़ोर वर्ग है, उसमें 66 % स्टूडेंट आगे पढ़ता नहीं है हम भारत को पूर्ण साक्षर बनाना चाहते हैं, चाहे वो ग्रामीण क्षेत्र के हों, गरीब लोग हों, चाहे अनुसूचित जाति के लोग हों, चाहे जनजाति के लोग हों, जो आर्थिक दृष्टि से पिछड़े हैं, जो अच्छे स्कूल में जा नहीं सकते उनके बच्चे , वो उन्हीं सरकारी स्कूलों पर निर्भर करते हैं, उनमें सुधार हो, गुणात्मक विकास हो, इस दिशा में हमारा मंत्रालय चिंतन कर रहा है, विचार कर रहा है और निश्चित रूप से हम इस दिशा में ठोस कदम उठाएंगे ।
वासिंद्र मिश्र : आपकी पिछली सरकार थी जब देश में थी तो उसने right to education की बात की थी । उन्होंने कानून बनाया था । अब आप लोग उसमें और गुणात्मक सुधार लाना चाह रहे हैं । जो राष्ट्रवादी विचारधारा वाले संगठन हैं उनका भी अपना एक ब्लू प्रिंट है, एक ड्राफ्ट है, क्या उनके जो ड्राफ्ट हैं, वो आप लोगों को मिल गए हैं, जिसमें उन्होंने सुझाव दिए हों कि क्या-क्या बदलाव की ज़रूरत है और किन-किन क्षेत्रों में ?
रामशंकर कठेरिया : ये बड़े दुर्भाग्य की बात है कि जब भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनती है, तब कुछ लोग कुछ ना किए हुए चिल्लाना शुरु कर देते हैं कि भगवाकरण हो रहा है यो ये संघ का एजेंडा है । इस तरह की मानसिकता अच्छी नहीं है । ऐसा कुछ है भी नहीं, हम तो पूरे देश का आह्वान कर रहे हैं । जो देश के लिए अच्छा एजेंडा हो सकता है, उसमें सब लोगों का स्वागत है । उसमें संघ के लोग भी आएं , कम्यूनिस्ट भी आएं, कांग्रेस के लोग भी आएं, सारे लोगों से अपील है कि आप अपने अच्छे सुझाव दीजिए और मंत्रालय उसपर गहन विचार करेगा ।
वासिंद्र मिश्र : एक और अभी विवाद खड़ा हुआ था जर्मन भाषा को लेकर, साउथ इंडिया के कुछ स्कूलों में उसको पढ़ाने पर रोक लगा दी गई, जिसपर जर्मनी के राष्ट्राध्यक्ष ने नरेंद्र मोदी जी से आपत्ति भी दर्ज कराई, उसका क्या स्टेटस है आज की तारीख में ? जो त्रिभाषा फॉर्मूला था उसमें और जर्मन भाषा को लेकर जो विवाद था उसका समाधान क्या खोज लिया गया ?
रामशंकर कठेरिया : नहीं-नहीं, इस मामले में अब अदालत का भी दखल है, इसलिए उसपर बहुत ज्यादा टिप्पणी करना ठीक नहीं होगा
वासिंद्र मिश्र : लेकिन जो भारतीय भाषाओं को प्रमोट करने की नीति रही है उसको देखते हुए आपकी सरकार और क्या-क्या काम करने जा रही है जिससे कि भारतीय भाषाओं को और ज्यादा प्रोत्साहन मिल सके ?
रामशंकर कठेरिया : ये अच्छा प्रश्न है कि किसी भी देश की जो भाषाए हैं, और अपने देश में तो सबका अपना-अपना महत्व है, उनके विकास के लिए, उनके संवर्धन के लिए, कुछ और क्षेत्रीय भाषाए हैं उनके विकास के लिए निश्चित रूप से मंत्रालय विचार कर रहा है और इस दिशा में जो-जो सुधार की संभावना होगी वो हम करेंगे ।
वासिंद्र मिश्र : एक और विवाद खड़ा हुआ है जब से ये सरकार बनी है पहले आपकी कैबिनेट मंत्री स्मृति ईरानी को लेकर था और बाद में आपकी योग्यता और सर्टिफिकेट्स को लेकर था । आपको नहीं लगता है कि मानव संसाधन जैसा मंत्रालय जिसकी ज़िम्मेदारी आप दो लोग निभा रहे हैं उसमें इस तरह का विवाद खड़ा होने से, या विवादों में बना रहने से उसका असर पूरे मंत्रालय के performance पर पड़ेगा ?
रामशंकर कठेरिया : नहीं-नहीं, जब इन खबरों में अगर कोई सच्चाई होती तो असर पड़ता ... वैसे भी इससे कोई मतलब नहीं है । मैं समझता हूं की जो मेरे बारे में कुछ मीडिया के लोगों ने कहा था या मीडिया में दिखाया गया , जो बीएसपी के कैंडिडेट हमसे चुनाव हार गए थे, उन्होंने जिस रजिस्ट्रार के लेटरपैड पर कुछ चार प्वाइंट लिखे थे, वो लैटरपैड उनका नहीं था, उसकी फोटोकॉपी की गई, उसपर चार प्वाइंट लिखे गए, और वो चार प्वाइंट लेकर, उस फर्जी फोटोकॉपी के आधार पर मेरे खिलाफ एफआईआर की गई । ये इतिहास में पहला उदाहरण है जहां फर्ज़ी फोटोकॉपी पर मेरे खिलाफ एफआईआर हुई । और इसलिए जब मेरे संज्ञान में ये मामला आया तब मैंने कहा था कि यूनिवर्सिटी से लेकर पार्लियामेंट तक अगर कोई ये सिद्ध कर देगा कि मैंने आधे अंक का भी फर्जीवाड़ा किया है तो मंत्री पद क्या मैं हर तरह से संन्यास ले लूंगा ।
वासिंद्र मिश्र : रामशंकर जी एक आम चर्चा है, खासतौर पर सत्तारूढ़ दल में ही है और जो लोग मंत्रिमंडल में, सरकार में शामिल हैं उनके बीच में भी है कि मोदी जी की जो स्पीड है, मोदी जी का जो एनर्जी लेवल है काम करने का, सरकार में शामिल मंत्रियों के लिए उस स्पीड के साथ कदम से कदम मिलाकर चल पाना बहुत मुश्किल हो रहा है । आपको कैसा लग रहा है आप भी मंत्री हैं ? आपके ऊपर संगठन की ज़िम्मेदारी है, सरकार चलाने की भी ज़िम्मेदारी है एक मंत्रालय की, आपकी क्या राय है ?
रामशंकर कठेरिया : ये बात एकदम सत्य है कि हमारे प्रधानमंत्री में बहुत एनर्जी है और इसलिए पूरी सरकार में एनर्जी है । उनकी एनर्जी से हम लोगों में भी एनर्जी है । हम भी वहीं से एनर्जी लेकर चलते हैं । हम लोगों के लिए मंत्रियों के लिए अच्छा है कि उनसे प्रेरणा लेकर के उनसे एनर्जी लेकर के और उनके मार्गदर्शन में हम आगे बढ़ें और अपनी ज़िम्मेदारी का निर्वहन करें । उनका मार्गदर्शन हम लोगों को मिलता रहता है ।
वासिंद्र मिश्र : एक और एकदम पर्सनल सवाल आपसे पूछ रहे हैं कि आपको अपने अंदर कौन सी ऐसी खूबी नज़र आती है कि नरेंद्र मोदी जी और अमित शाह जी, सब लोगों ने आप पर इतना भरोसा जताया । इतने संवेदनशील राज्यों का प्रभारी बनाया, सरकार में मंत्री बनाया । आपको नहीं लगता कि पार्टी में आपसे भी ज्यादा योग्य और समर्पित कार्यकर्ता हैं , लेकिन उनको ये दायित्व, ये मौका नहीं मिला, क्या कारण है ?
रामशंकर कठेरिया : देखिए भारतीय जनता पार्टी ही, देश में एक ऐसी लोकतांत्रिक पार्टी है जिसमें सच्चा लोकतंत्र है । कांग्रेस में लोकतंत्र मर गया है । समाजवादी पार्टी में लोकतंत्र की कोई बात कर नहीं सकता है पूरा परिवारवाद है । और हमारे उत्तरप्रदेश में बीएसपी है उसमें ना परिवारवाद है ना लोकतंत्र है, वहां व्यक्तिवाद के अलावा कुछ है नहीं । भारतीय जनता पार्टी ही हिंदुस्तान की एक ऐसी पार्टी है जिसमें सच्चा लोकतंत्र है । जिसमें गांव का किसान भी राष्ट्राध्यक्ष बन सकता है, सामान्य घर में जन्मा हुआ एक व्यक्ति हिंदुस्तान का प्रधानमंत्री बन सकता है । सामान्य कार्यकर्या भी इस पार्टी में संगठन की बड़ी ज़िम्मेदारी संभाल सकता है और सरकार में भी शामिल हो सकता है । हम जैसे कार्यकर्ताओं की संख्या, असंख्य है । लोकसभा में भी मुझ से बहुत बेहतर, क्षमतावान और योग्य सांसद चुनकर आए हैं, मैं अपने आपको बहुत छोटा मानता हूं । मैं अपने को ये मानता हूं कि एक कार्यकर्ता हूं और वो भी कार्यकर्ता हैं जो जीतकर आए हैं और हमसे योग्य भी हैं । लेकिन मुझे हमारे प्रधानमंत्री जी ने, हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष जी ने ये ज़िम्मेदारी दी हैं तो मैं अपना सौभाग्य समझता हूं और कोशिश करता हूं कि उन्होंने मुझे जो ज़िम्मेदारी दी है उसपर मैं खरा उतरूं ।
वासिंद्र मिश्र : बहुत-बहुत धन्यवाद
रामशंकर कठेरिया : धन्यवाद