मंगलवार, 18 नवंबर 2014

सियासत की 'बारात'

जो भी व्यक्ति विश्व हिन्दू परिषद को ठीक से जानता है वो इसके तमाम एजेंडों को भी बेहतर समझ सकता
है...  नब्बे का राम मंदिर आंदोलन हो या फिर आगे के दौर में किया गया शिलापूजन, चौरासी कोस की यात्रा के नाम पर बनाया गया माहौल हो या फिर पंचकोसी यात्रा के नाम पर की गई सियासत..इन सभी आयोजनों को लेकर वीएचपी पर ये आरोप लगते रहे हैं कि वो धर्म का राजनीतिकरण कर रहा है...लेकिन वीएचपी के नेता हमेशा इससे इनकार करते रहे हैं...और अपने आयोजनों को सांस्कृतिक आयोजन करार देते रहे हैं...अब एक आयोजन फिर से सामने आया है...ये आयोजन है राम बारात का...जिसमें वीएचपी ने यूपी से होते हुए बिहार औऱ नेपाल तक का माहौल राममय करने का अभियान शुरु किया है...

भगवान राम की नगरी अयोध्या से राम की बारात निकल चुकी है जो 25 नवंबर को नेपाल के जनकपुर पहुंचेगी...विश्व हिन्दू परिषद के तत्वावधान में हो रहा ये आयोजन यूं तो पूरी तरह गैर राजनीतिक कहा जा रहा है लेकिन इसके राजनीतिक मायने तब ज्यादा समझ में आते हैं जब इस यात्रा के पूरे रूट को बारीकी से समझने की कोशिश होती है...क्योंकि ये यात्रा जिस रुट से हो रही है वो रुट दरअसल प्राचीन मान्यताओं के हिसाब से है ही नहीं...

आस्था के सवाल पर हमेशा ही तमाम दायरे टूटते आए हैं...तमाम दलगत सियासत के रास्ते छूटते आए हैं...लेकिन इस बार की ये यात्रा सिर्फ सांस्कृतिक है ऐसा नहीं है...इस सांस्कृतिक यात्रा के पहलू में छिपे नजर आ रहे हैं कई सियासी  फैक्टर जिनका सीधा ताल्लुक चुनावी सियासत से है .. और ये बात रामबारात की 8 दिनों वाली यात्रा के पड़ावों साफ जाहिर होती है ...

अयोध्या से 17 नवंबर को शुरु हुई इस यात्रा का पहला पड़ाव आज़मगढ़ है...आज़मगढ़ जिसका रामचरित मानस के किसी पात्र से कोई दूर-दूर तक का रिश्ता नहीं है...आज़मगढ़ के बाद ये यात्रा मऊ पहुंचेगी...मऊ जहां पौराणिक काल के तार तो जुड़े हैं लेकिन बात अगर राम की करें तो मऊ जिले का दोहरीघाट इस तौर पर प्रसिद्ध है मऊ शहर नहीं...मऊ के बाद ये यात्रा बलिया, बक्सर, आरा, पटना, हजारीबाग, बाघनगरी, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी, अहिल्या स्थान और माधवपुर से होते हुए नेपाल के जनकपुर पहुंचेगी...यानी पूर्वांचल से शुरु होकर दक्षिण बिहार को छूते हुए ये यात्रा उत्तरी बिहार नापते हुए नेपाल तक चली जाएगी...

अब जरा इस रास्ते का राजनीतिक महत्व समझते हैं...दरअसल आज़मगढ़ यूपी की उन चंद सीटों में शुमार है जो बीजेपी के हिस्से मोदीलहर में भी नहीं आई हैं...तो मऊ साम्प्रदायिक तौर पर बेहद संवेदनशील इलाका माना जाता है...बिहार के जिन क्षेत्रों से होकर ये यात्रा गुजरने वाली है वो पूरा बेल्ट दरअसल किसी जमाने में मंडल की सियासत का गढ़ रहा है...हालांकि 2014 के लोकसभा चुनाव में इन क्षेत्रों में बीजेपी ने इन क्षेत्रों में भी बेहतर प्रदर्शन किया है लेकिन असली अग्निपरीक्षा 2015 के बिहार विधानसभा चुनावों में होनी है जिसके लिए भला राम नाम से बेहतर माहौल और कौन बना सकता है...


बहरहाल ये तमाम कयास सिर्फ इसलिए लग रहे हैं क्योंकि 2004 से शुरु हुई इस राम बारात की यात्रा का रूट वीएचपी अक्सर बदलती रहती है...हर पांच साल में होने वाले इस आयोजन में पहली बार यानी 2004 और दूसरी बार यानी 2009 में रूट आज़मगढ़ नहीं बल्कि आज़मगढ़ से सटे अम्बेडकरनगर से होकर रहा था...प्राचीन मान्यताओं और लोककथाओं की अगर बात करें तो भी ये रूट तर्कसंगत नहीं लगता...लोकपरम्पराओं के मुताबिक राम बारात अयोध्या से बस्ती, बस्ती से अगौना, अगौना से संतकबीरनगर जिले में धनघटा, फिर गोरखपुर जिले के सिकरीगंज होते हुए बड़हलगंज, बड़हलगंज से देवरिया के कपरवारघाट होते हुए बरहज, सलेमपुर, बलिया, बक्सर, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी और फिर जनकपुर पहुंची थी .. आज भी इस मार्ग को जोड़ने वाले रास्ते को रामजानकी मार्ग कहा जाता है...अब सवाल ये कि लोकमान्यताओं और पौराणिक मान्यताओं में जिस रास्ते की बात कही गई है या जिसे लेकर मान्यताएं आज भी प्रचलित हैं उन रास्तों की बजाय नए रास्ते का चुनाव आखिर क्या संकेत देता है ?

अयोध्या के कई संत भी मानते हैं कि राम बारात को वीएचपी ने सियासी आयोजन बना दिया है...संतों की दलील है कि रामचरित मानस में तुलसीदास ने राम की बारात को लेकर सरसरी तौर पर ही वर्णन किया है...तुलसीदास का पूरा जोर राम की बारात का सौन्दर्य दिखाने में रहा है मार्ग नहीं...तुलसीदास के मुताबिक राम के विवाह की सूचना मिलने पर महाराजा दशरथ ने अयोध्या में तैयारियां की और अपने सभी रिश्तेदारों के साथ जनकपुर पहुंच गए...लेकिन जनकपुर किस मार्ग से होकर पहुंचे इसका कोई जिक्र नहीं है...इसी प्रकार बारात के वापस आने का क्या रूट था इसका भी कोई जिक्र नहीं है...जो भी मार्ग कहा जाता है वो सिर्फ जनश्रुतियों, लोकमान्यताओं और लोककथाओं के आधार पर ही कहा जाता है....रामचरित मानस के बालकांड में बारात पहुंचने को लेकर जो अंतिम दोहा है उसमें कहा गया है कि  ...

आवत जानि भानुकुल केतू। सरितन्हि जनक बँधाए सेतू॥
बीच-बीच बर बास बनाए। सुरपुर सरिस संपदा छाए


यानी दशरथ को आते जान जनक ने नदियों पर पुल बंधवा दिए...बीच बीच में ठहरने के लिए पड़ाव बनवा दिए जिसमें देवलोक के समान सम्पदा छाई है...

वहीं बारात लौटने को लेकर तुलसीदास ने सिर्फ इतना लिखा है कि....
चली बरात निसान बजाई। मुदित छोट बड़ सब समुदाई॥
रामहि निरखि ग्राम नर नारी। पाइ नयन फलु होहिं सुखारी


जिसके बाद तुलसीदास आगे लिखते हैं कि ....
बीच बीच बर बास करि मग लोगन्ह सुख देत।
अवध समीप पुनीत दिन पहुँची आइ जनेत


यानि कि बीच बीच में सुंदर मुकाम पार करती हुई तथा मार्ग के लोगों को सुख देती हुई बारात शुभ मुहूर्त में अयोध्यापुरी के समीप आ पहुंची... जबकि वीएचपी ने ये बारात ऐसे वक्त में निकाली है जब दिशाशूल चल रहा है... यानि राम के जीवन को लेकर सबसे प्रामाणिक ग्रंथ माने जाने वाले रामचरित मानस में बारात के रूट का वर्णन नहीं है..लेकिन दूसरी लोकमान्यताओँ में बारात के मार्ग को लेकर जो सबसे ज्यादा प्रचलित मार्ग है उसका वीएचपी अनुसरण नहीं कर रही है...इतना ही नहीं अयोध्या में जो चौरासीकोस परिक्रमा का आयोजन था उसमें भी वीएचपी ने समय का ध्यान नहीं रखा...यानी बेवक्त आयोजन किया...अब सवाल ये कि फिर क्या खुद को सांस्कृतिक संगठन मानने वाली वीएचपी का पूरा एजेंडा राजनीतिक है....आखिर ऐसा हर बार क्यों होता है कि चुनावों के ठीक पहले वीएचपी को राम की याद आ जाती है...2009 के लोकसभा चुनावों के पहले वीएचपी ने मंदिर राग छेड़ा था तो 2014 के लोकसभा चुनावों के पहले भी...यूपी विधानसभा चुनाव के ठीक पहले भी वीएचपी ने मंदिर मुद्दे को गरमाने की कोशिश की थी...तो वहीं एक बार फिर जबकि बिहार और यूपी के चुनावों में कुछ सालों का वक्त बाकी रह गया है वीएचपी नई मुहिम पर चल पड़ी है

शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

'Gamechange' की कांग्रेसी रणनीति ?

लगातार हार का सामना कर रही कांग्रेस ने नेहरू जयंती के एक दिन पहले नेहरू जयंती मना ली, गुरुवार को तालकटोरा स्टेडियम में आयोजित समारोह में जिस तरह नेहरू के बहाने मौजूदा सत्ता तन्त्र पर सवाल खड़े किए गए और नेहरू की विचारधारा की प्रासंगिकता को आधुनिकता से जोड़कर दिखाने की कोशिश हुई है।  वो ये बताती है कि कांग्रेस खुद के मेकओवर के लिए एक बार फिर बड़े बदलाव की राह पर चलने को तैयार है। लेकिन सवाल ये कि क्या ये बदलाव वाकई कांग्रेस के लिए सार्थक साबित हो पाएगा ?


वक्त हमेशा खुद को दोहराता है, इतिहास हमेशा अपनी प्रासंगिकता साबित करता है। तालकटोरा स्टेडियम से कांग्रेसी दिग्गजों ने जिस तरह से नेहरू के योगदान और उनकी विचारधारा को आधुनिक परिवेश से जोड़कर देखने की कोशिश की ह, उसने इन दोनों जुमलों को सटीक साबित कर दिया है। कांग्रेस से शीर्ष नेतृत्व के बयान बता रहे थे कि पीछे होने की कसक क्या होती है और आगे बढ़ने के लिए जब रास्ता नहीं मिलता तो छटपटाहट क्या होती है। वो भी ऐसे दौर में जबकि उन प्रतीकों के मायने ही बदल दिए जाएं जिनपर कांग्रेस खुद का एकाधिकार मानती आई है। शायद इसीलिए राहुल गांधी को मोदी का सफाई अभियान फोटो खींचने का अभियान ज्यादा लगने लगा है। जबकि खुद राहुल गांधी के खाते में ऐसी तमाम घटनाओं की  फेहरिस्त जमा है जिसे आधार बनाकर उनके विरोधी लगातार उन्हें पब्लिसिटी का भूखा बताते रहे हैं, और ताजा बयान के बाद भी बता रहे हैं।

खैर ये तो सियासी बाते हैं, असल सवाल ये है कि अब कांग्रेस करने क्या वाली है? क्या अपने आयोजन में सिर्फ मोदी को ना बुलाने भर से कांग्रेस का मकसद पूरा हो जाएगा? या फिर नेहरू का नाम और उनकी विचारधारा का स्वामित्व कायम रहे इसके लिए वो कुछ खास करने जा रही है? क्या कांग्रेस फिर नेहरू के विशेष समाजवाद का दौर वापस लाने की जद्दोजहद में है जिसे वो नब्बे के दशक में उदारीकरण की मजबूरी में गंवा चुकी है? दरअसल फिलहाल कांग्रेस के पास इसके अलावा कोई चारा भी नहीं है। मोदी की राजनीतिक चतुराई से निपटने के लिए अब कांग्रेस के पास सिर्फ यही रास्ता है कि वो एक बार फिर उन पुराने मूल्यों की ओर लौटे, ताकि वो कम से कम आर्थिक मोर्चे पर तो मौजूदा सत्तातन्त्र से अलग दिख सके।

दरअसल नब्बे के दौर के बाद देश में उदारीकरण की बयार बही, दुनिया से सीधे जुड़ाव हुआ। पीवी नरसिम्हा राव के वक्त हुई उदारीकरण की आर्थिक क्रांति ने अर्थव्यवस्था पटरी पर ला दी । जिसके बाद गैर कांग्रेसी सरकारें भी उसी राह पर आगे बढ़ीं, और मौजूदा सरकार ने तो इसे लेकर कुछ ज्यादा ही कदम आगे बढ़ा दिए हैं। मोदी की जापान, ब्राजील, अमेरिका, आसियान की तमाम यात्राएं दरअसल इसी कोशिश का हिस्सा हैं। ऐसे में कांग्रेस अगर वापस नेहरू की विचारधारा को मजबूती से जेहन में रखते हुए आगे बढ़ती है तो उसके लिए अपना मेकओवर करने का ये बेहतर मौका साबित हो सकता है।

दरअसल नेहरू की विचारधारा में बहुत कुछ ऐसा है जिसे कांग्रेस वास्तव में आगे बढ़ाए तो उसके लिए ये संजीवनी साबित हो सकता है। नेहरू की विचारधारा में महात्मा गांधी के आदर्शवाद की छाप थी। ये विचारधारा सेकुलरिज्म, वैज्ञानिक सोच, लोकतांत्रिक मूल्य और समाजवाद के ताने बाने से बुनी थी। नेहरू जी कहीं ना कहीं साम्यवाद से भी प्रभावित थे। लेकिन भारतीय अर्थतन्त्र में निजी पूंजी और बाजार का पूरी तरह विरोध नहीं किया। स्थानीय पूंजीपतियों के लिए स्पेस बनाया और आधुनिक भारत की नींव रखी।

हालांकि नेहरू के बाद उनकी बेटी और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अलग तरीके से राजनीति की। प्रीवीपर्स को खत्म किया, बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया, गरीबी हटाओ का नारा दिया, लेकिन सार्वजनिक और निजी भागीदारी में संतुलन की वकालत की। हालांकि उसी दौरान उनके बेटे संजय गांधी बाजारवाद, पूंजीवाद और अमेरिकावाद की वकालत करते थे। 1977 में करारी हार झेलने के बाद इंदिरा का मोह समाजवादी नारों से भंग हुआ और वो विचारधारा के स्तर पर कुछ कर पातीं कि उनकी 31 अक्टूबर 1984 को  हत्या हो गई ।
इंदिरा गांधी के बाद पीएम बने राजीव गांधी आधुनिक माहौल में पढ़े लिखे थे, और प्रगतिशील सोच रखते थे। उन्हें पता था कि देश की तरक्की के लिए पूंजी चाहिए, और तकनीक भी, सत्ता के विकेन्द्रीकरण यानी पंचायतीराज का सपना भी राजीव गांधी का था। टेलीकॉम क्रांति भी राजीव ने ही शुरु की। जिसका असर ये हुआ कि आगे के दिनों में देश के लिए उदारीकरण का रास्ता खुला और नरसिम्हा राव की सरकार आते-आते कांग्रेस ने समाजवादी चोला उतार फेंका। लाइसेंस परमिट राज को खत्म किया गया, देश के दरवाजे खोल दिए गए।,नतीजा ये हुआ कि राजसत्ता नियन्त्रक की जगह रेगुलेटर बन गई ।

हालांकि नरसिम्हा राव के बाद कई सालों तक सत्ता से दूर रहने के बाद कांग्रेस ने सबक लिया और 2004 में बाजारवाद को आम आदमी से जोड़ने की कोशिश की। सूचना का अधिकार कानून बनाया, मनरेगा योजना लेकर आई, कर्जमाफी का ऐलान हुआ। 2009 में इसका फायदा भी उसे मिला, लेकिन भ्रष्टाचार की भूलभुलैया में कांग्रेस इस कदर उलझी की 2014 में वो सबसे बुरे दौर में पहुंच गई।

नेहरू का समाजवाद, इंदिरा-राजीव का मिश्रित समाजवाद, नरसिम्हा राव उदारीकरण  के बाद अब एक बार फिर कांग्रेस के लिए बदलने का वक्त है और इसके लिए नेहरू की विचारधारा उसके लिए गेमचेंजर साबित हो सकती है। लेकिन सवाल ये कि क्या वाकई घड़ी की सुई को उलटा घुमाया जा सकता है? क्योंकि कांग्रेस को भी पता है कि जिस राह पर वो इतना आगे बढ़ चुकी है वहां पीछे लौटने का मतलब है अपना सबकुछ दांव पर लगा देना। जिसके लिए ना केवल बड़ा हौसला चाहिए बल्कि एक ऐसा कुशल नेतृत्व भी जो सर्वस्वीकार्य हो। फिलहाल कांग्रेस की सबसे बड़ी मुसीबत यही है।

बुधवार, 5 नवंबर 2014

बीएसपी- बैक टू बेसिक !

पहले बामसेफ फिर डीएस 4, फिर बहुजन समाज पार्टी जिसकी सियासत शुरु हुई तिलक तराजू और तलवार के खिलाफ दिए नारे से...वक्त बदला तो सियासी जरूरतें भी बदली...और बीएसपी ने 'हाथी नहीं गणेश है.... ' के नारे भी उछाले... और पार्टी को इसका फायदा भी मिला, 2007 में हुए विधानसभा चुनावों में बदली हुई बीएसपी ने पूर्ण बहुमत हासिल कर लिया... लेकिन ये बहुमत महज पांच साल में ही अल्पमत में बदल गया और पार्टी को सत्ता से बेदखल होना पड़ा ... लेकिन ये हार की शुरुआत थी ...  2014 के लोकसभा चुनाव...और फिर राज्यों के विधानसभा चुनावों में हार दर  हार का ऐसा सिलसिला चला कि अब राष्ट्रीय पार्टी की पहचान भी खतरे में है... ऐसे में बीएसपी मुखिया मायावती ने वापस जड़ों की ओर लौटने का फैसला किया है... .. यानि एक बार फिर बीएसपी अपनी हिल चुकी जड़ों में जान फूंकने के लिए दलित राजनीति का सहारे लेने की तैयारी कर रही है ....अब सवाल ये कि क्या ये बीएसपी के मेकओवर की शुरुआत मानी जाए...या फिर खात्मे की पहली पटकथा...जिसका पहला अध्याय खुद मायावती ने लिख दिया है...

देश की सियासत में इन दिनों बीजेपी की रफ्तार क्या है इसे ज्यादा बताने की जरूरत नहीं है...तो वहीं यूपी की सियासत में इन दिनों अजब गजब रंग देखने को मिल रहे हैं...यहां कई पुराने धुरंधर अपनी राजनीति की दिशा बदलने में जुटे हैं तो कई ऐसे हैं जिन्हें ये पता नहीं कि आखिर आगे का रास्ता तय कैसे होगा...विचारधाराओं के द्वंद में फंसे ऐसे दलों की फेहरिस्त में इन दिनों में सबसे ऊपर बीएसपी का नाम दिखाई दे रहा है ... सवाल ये कि अपनी पुरानी विचारधारा की ओर यू टर्न ले रही बहुजन समाज पार्टी में पैदा हो रही अकुलाहट... कहीं पार्टी के वजूद पर तो भारी नहीं पड़ने वाली ..

सर्वजन की पार्टी बनने चले बहुजन समाज पार्टी की कर्ता धर्ता मायावती के हिस्से पिछले कुछ सालों में लगातार आई सियासी नाकामियों का असर दिखने लगा है.... ऐसा लग रहा है कि सर्वजन हिताय के अपने नारे से बीएसपी का मोहभंग हो गया है ... मायावती ने राज्यसभा के लिए अपने प्रत्याशियों के ऐलान के बहाने इसके संकेत भी दे दिए हैं... हालांकि ये बदलाव बदले माहौल में बीएसपी को कितना फायदा पहुंचा पाएगा .. ये कहना मुश्किल है खासकर तब जब  बदलाव के इस दौर में बीजेपी में अमित शाह और नरेंद्र मोदी की जोड़ी एक साथ कदम से कदम मिलाकर हाइटेक तरीके से देश को तरक्की के रास्ते पर ले जाने का दावा कर रही है ...  इनके एजेंडे से विवादित मुद्दे गायब हैं और दिल्ली के ताज पर कब्जे के बाद अब निशाना राज्यों की सत्ता है जिसमें लगातार कामयाबी मिल रही है ।

दूसरा बदलाव बीएसपी और दूसरी क्षेत्रीय पार्टियों में दिख रहा है जो रेगिस्तान में बैठे उस शुतुरमुर्ग सरीखा बर्ताव कर रही हैं जिसकी दुनिया सीमित है...इन्हें लगता है कि देश में बदलाव की चरम लहर में भी उनका घिसा-पिटा फॉर्मूला ही काम आएगा...बिहार में महादलित को मुख्यमंत्री बनाने से की गई नीतीश कुमार की शुरुआत ने यूपी में लगता है मायावती को भी नई राह दिखा दी है... और इसी फॉर्मूले के तहत मायावती ने राज्यसभा के लिए दोबारा दलित कार्ड खेल दिया है...इसके लिए मायावती ने पार्टी के जमे जमाए उन सिद्धांतों से भी समझौता करने से परहेज नहीं किया है जो किसी भी नेता को दो बार से ज्यादा नामित करने की इजाजत नहीं देता....माया की ताजा लिस्ट में वीर सिंह का नाम इस परम्परा को तोड़ रहा है जो तीसरी बार मायावती की लिस्ट में जगह पाने में कामयाब हुए हैं

बीएसपी अकेले ऐसी पार्टी रही है जो उम्मीदवारों की लिस्ट जारी करते हुए उनकी जाति का आंकड़ा भी जारी करती रही है...लेकिन नतीजों के सामने आने के बाद भी शायद पार्टी सबक लेने को तैयार नहीं है...लोकसभा चुनावों में बीएसपी ने 21 सीटों पर ब्राह्मण, 17 सीटों पर एससी एसटी, 15 पर ओबीसी, 19 पर मुस्लिम, 8 सीटों पर राजपूत, 29 सीटों पर अन्य अगड़ी जातियों के लोगों को मैदान में उतारा तो वहीं 7 महिलाओं को भी टिकट दिया था...लेकिन नतीजा ये हुआ कि लोकसभा में बीएसपी की एन्ट्री तक नहीं हो पाई...

 लोकसभा चुनाव के बाद हरियाणा में भी बीएसपी ने जाति के आधार पर ही टिकट बांटे ....यहां अरविंद शर्मा को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर, दलित-ब्राह्मण कार्ड खेलने की कोशिश की लेकिन कामयाबी मिली सिर्फ एक सीट पर ...और सिर्फ 4.4 फीसदी वोट ही मिले...वहीं महाराष्ट्र में भी बीएसपी ने इसी आधार पर उम्मीदवार उतारे लेकिन सिर्फ 2.3 फीसदी वोट ही मिल पाए...और पार्टी अपना पुराना प्रदर्शन तक नहीं दोहरा पाई ।

इतना सबकुछ होने के बाद भी ऐसी पार्टियों को शायद बदले हालात का अहसास नहीं होता दिख रहा है..आपको यहां ये भी याद दिलाना जरूरी है कि साल 2007 में यूपी में जनता ने गठबंधन की सियासत से तंग आकर ही मायावती को पूर्ण बहुमत की सत्ता दी थी, लेकिन सत्ता में आने के बाद भी जाति की सियासत से बीएसपी का पीछा नहीं छूटा ।  पांच साल सरकार भी इसी आधार पर चली, जिसका खामियाजा 2012 के विधानसभा चुनाव और 2014 के लोकसभा चुनाव में  बीएसपी को  भुगतना पड़ा ।

यानी सर्वजन हिताय का जो नारा मायावती ने दिया था...और इसके जरिए सोशल इंजीनियरिंग का जो दांव खेला गया था उसमें कामयाबी नहीं मिली तो एक बार फिर पुराने ढर्रे पर लौटने लगी है बीएसपी...लेकिन सवाल ये कि क्या ऐसे वक्त में जबकि जातिधर्म से उपर उठकर सियासी बिसात सज रही है, वोटिंग का पैटर्न तेजी से बदल रहा है... तो क्या बदले माहौल में सिर्फ जातीय अस्मिता का नारा बीएसपी के लिए सत्ता में पहुंचने भर के आंकड़ें जुटा देगा...