बुधवार, 29 अक्तूबर 2014

क्या बोफोर्स कांड जैसा होगा ब्लैक मनी कैंपेन का हश्र ?

काले धन पर जो कुछ भी इन दिनों चल रहा है वो भारतीय राजनैतिक इतिहास के एक दूसरे अध्याय की याद दिला रहा है। इन दोनों अध्यायों में पात्र बदल गए हैं लेकिन घटनाक्रम काफी कुछ एक जैसा है। सवाल अरबों करोड़ों रुपयों का है जिन पर आरोपियों को बचाने के आरोप लग रहे थे वो सत्ता से बाहर हैं लेकिन अभी तक आरोपी पर्दे में हैं। सवाल ये कि पहले जो मुहिम चली वो क्या सिर्फ चुनावी स्टंट था या फिर सचमुच ऐसा ही हुआ है कि खोदा पहाड़ और निकली चुहिया।
 
काले धन पर लंबी बहस हो चुकी है। ये लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान मुख्य मुद्दा भी रहा है। वादा किया गया था कि बीजेपी की सरकार बनेगी तो 100 दिन के भीतर कालेधन की वापसी होगी और उनके खातेदारों के नाम उजागर कर दिए जाएंगे। लेकिन सच्चाई ये है कि डेढ़ सौ से ज्यादा दिन बीत चुके हैं और काले धन की वापसी होना तो दूर बड़ी मुश्किल से तीन खातेदारों के नाम सार्वजनिक हो पाए हैं।

ब्लैक मनी का कैंपेन उसी तरह डीरेल होता नज़र आ रहा है जैसे बोफोर्स कांड के दौरान चला कैंपेन हुआ था । बोफोर्स सौदों के पीछे बहुत बड़ी दलाली की बात कही गई वीपी सिंह बोफोर्स स्कैंडल को हवा देकर प्रधानमंत्री की कुर्सी तक आने में कामयाब हो गए थे।  वी पी सिंह ने 1988 में कई प्रेस कॉन्फ्रेंस किए और एक के बाद एक कई स्विस अकाउंट्स का जिक्र किया था, लखनऊ में एक पब्लिक मीटिंग में वी पी सिंह ने लोटस नाम के एक अकाउंट का जिक्र किया था। इस अकाउंट से उनका इशारा राजीव गांधी के तथाकथित अकाउंट की ओर था, लेकिन गांधी परिवार ने इसे चैलेंज कर दिया और वी पी सिंह इस आरोप को कभी सही साबित नहीं कर पाए। 

हालांकि उस दौरान चुनावों में बोफोर्स उसी तरह छाया रहा था जिस तरह काले धन का मुद्दा इस चुनाव के दौरान छाया रहा है।  उस दौरान नतीजे के तौर पर राजीव गांधी को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी थी, इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ है। सरकार बनते ही काले धन पर SIT का गठन करने वाली बीजेपी सरकार अब विवादों में है। विवाद इसीलिए क्योंकि सत्ता मिलने के बाद सुर बदल गए हैं, बीजेपी दलील दे रही है कि जिन देश के बैंकों में पैसा रखा गया है .. उनके साथ हुई ट्रीटी की वजह से खातेदारों के नाम सार्वजनिक करना मुमकिन नहीं है । हालांकि ये वही ट्रीटी है .. जिसकी आड़ लेने वाली कांग्रेस को सुप्रीम कोर्ट कई बार फटकार लगा चुका है, और अभी भी सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद ही सरकार ने मामले की जांच कर रही स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम को 6 सौ से अधिक खातेदारों के नाम बताए हैं .. लेकिन ये नाम एक बार फिर सरकार सार्वजनिक नहीं कर रही । 
इससे  सुप्रीम कोर्ट 4 जुलाई 2011 के निर्णय में कह चुका है 1995 में जर्मनी के साथ हुआ करार यानि double taxation avoidance agreement इस जानकारी को उजागर करने से नहीं रोकता,  दरअसल ये करार उन लोगों को गोपनीयता की गारंटी देता है जो किसी एक देश में टैक्स दे रहे हों। उन्हें किसी तरह की गोपनीयता नहीं मिलती जो अवैध तरीके से पैसे जमा कर रहे हों। 
 सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा था कि केंद्र सरकार ने अभी तक ये भी सबूत पेश नहीं किए हैं जिससे ये साबित होता हो कि जर्मनी की सरकार खाताधारकों के नाम सार्वजनिक करने से इनकार कर रही हो।  
 सुप्रीम कोर्ट ने स्विटरज़रलैंड में बैंक खाता रखने वालों के मामलों में यूएनसीएसी यानि संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन का जिक्र किया था। जिसपर भारत और स्विट्जरलैंड की सरकारें हस्ताक्षर कर चुकी हैं।  
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ये कन्वेंशन कालेधन की रोकथाम की बात करता है। कालेधन जब्त करने की बात करता है और इस मुद्दे पर कन्वेंशन साइन करने वाले देशों के आपसी सहयोग की बात करता है, ना कि टैक्स अदा ना करने वालों को किसी तरह की छूट देने की । 

कुल मिलाकर सवाल यही उठता है कि क्या एक बार फिर ट्रीटी की आड़ में काले धन का शोर दब जाएगा।  सरकार अब दलील दे रही है कि पहले इस बात की जांच की जाएगी कि कितने लोगों के पास काला धन है। तो क्या ये सवाल नहीं उठते कि अगर पता ही नहीं था तो पहले किस आधार पर काले धन को लेकर आंकड़े बताए गए? और अगर पता है तो अब ट्रीटी की आड़ में नाम छुपाने की कोशिश क्यों?  क्या ये हल्ला बहुत हद तक वैसा ही नहीं जैसा कि बोफोर्स के वक्त हुआ था? कि अकाउंट के नाम के साथ रकम भी बताई गई। 20-22 साल की जांच और तकरीबन 250 करोड़ रुपए खर्च होने के बाद जांच एजेंसी ने हाथ खड़े कर दिए। यानि खोदा पहाड़ और निकली चुहिया। बीते 150 दिनों में सरकार के रवैये को देखकर एक बार फिर आशंका हो रही है कि क्या काले धन का मुद्दा भी देश की जनता को छकाने के लिए उठाया गया था और इसका परिणाम भी बोफोर्स जैसा होगा, या फिर सुप्रीम कोर्ट अपने सख्त रवैये से सरकार को मजबूर कर देगी कि काले धन के कुबेर किसी ट्रीटी का फायदा उठाकर बच ना पाएं .. और जिस तरह से 627 खातेदारों के नाम सुप्रीम कोर्ट को दिए गए हैं उसी तरह बाकी नाम भी सामने आएं और सार्वजनिक हों .. 

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