मंगलवार, 21 अक्तूबर 2014

'मंडल युग' का अंत !

हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनावी नतीजों ने  एक बार फिर सियासी करिश्मे और रणनीतिक दांवपेंच को लेकर नए सिरे से बहस का मंच मुहैया करा दिया है। बीजेपी ने एक-एक कर जिस तरह से सियासी किले भेदने शुरु किए हैं, उसका जवाब ना तो कांग्रेस के पास है और ना ही मंडल की लहर पर सवार होकर राजनीतिक फलक पर चमकने वाले क्षेत्रीय क्षत्रपों के पास,  जो अब सियासत की धुंधली जमीन पर अपने लिए गुंजाइश तलाश रहे हैं। सवाल ये कि आखिर ये हुआ कैसे, क्या ये मंडल युग का अंत है, क्या ये नई सियासत का आगाज है,  आखिर ये रणनीति है क्या?

इसका जवाब तलाशने के लिए हमें दो दशक पीछे जाना होगा। नब्बे के दशक में उभरे मंडल बनाम कमंडल के आंदोलन को गौर से समझना होगा। कमंडल यानी बीजेपी की धार्मिक सियासत के मुकाबले वीपी सिंह ने मंडल का प्रयोग किया। विरोध हुए,  आंदोलन हुआ, और इसके साथ ही जाति आधारित  राजनीतिक व्यवस्था मजबूत होने लगी। जिसका खामियाजा राष्ट्रीय पार्टियों ने सबसे ज्यादा भुगता है। इस माहौल से कांग्रेस ने सबक लिया कि नहीं ये तो पता नहीं लेकिन बीजेपी और आरएसएस के थिंकटैंक ने इसे जल्दी भांप लिया, और मंडल के हथियार से ही मंडल की ताकतों को निपटाने की रणनीति पर आगे बढ़ने लगे।

आरएसएस और बीजेपी ने सुनियोजित तरीके से ओबीसी लीडरशिप को प्रमोट किया। कल्याण सिंह, उमा भारती, मनोहर पर्रिकर, बीएस येदियुरप्पा, और खुद नरेन्द्र मोदी जैसे ओबीसी लीडर्स को सीएम बनाया। इस दौर में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बंगारू लक्ष्मण, कुशाभाउ ठाकरे, वेंकैया नायडू, जैसे नेता बनाए गए, तो वहीं गठबंधन की सियासत में भी बीजेपी ने इस गणित का खास ध्यान रखा। छोटे और बड़े स्तर पर इसका प्रबंधन किया गया, जिसके बाद सफलता भी मिलनी शुरु हुई।

कई साल पहले हुई इस शुरुआत में तय ये किया गया कि पुरानी छवि के आधार पर पार्टी आगे नहीं बढ़ सकती। लिहाजा पार्टी ने अपने आप को बदलने की शुरुआत की, और मंडल ताकतों को हाशिए पर पहुंचाने में कामयाब हो गई। लोकसभा चुनाव 2014 से पहले एमपी, छत्तीसगढ़, राजस्थान में बीजेपी ने अपने दम पर सत्ता हासिल की और अब इस लिस्ट में महाराष्ट्र और हरियाणा का नाम भी जुड़ गया है।

बीजेपी ने दरअसल ओबीसी कार्ड खेलकर जो रणनीति बनाई है, उसने कई सियासी दलों की जमीन छीन ली है खासकर क्षेत्रीय पार्टियों की। लोकसभा चुनाव में रैलियों में जब जब नरेन्द्र मोदी ने खुद को पिछड़ेवर्ग का बताते हुए चायवाला कहते हुए आम जनता से संवाद स्थापित किया,  जनता से वो कनेक्ट हुए, और यही कनेक्शन लहर के तौर पर सामने आया।

इस बीच कांग्रेस का वोट बैंक एक एक कर छिटकता गया। किसी जमाने में अपरकास्ट, दलित और मुस्लिम वोट बैंक की तिकड़ी के सहारे लम्बे वक्त तक सत्तासुख भोगने वाली कांग्रेस से अपरकास्ट का वोटबैंक बीजेपी ने पहले ही छीन लिया। दलित वोट बीएसपी समेत दूसरी पार्टियों में शिफ्ट हो गए और मुस्लिम वोट बैंक बड़े राज्यों में मुलायम नीतीश जैसे नेताओं की ओर चला गया। अब नई परिस्थिति में हालत ये है कि क्षेत्रीयता के दायरे में सिमटे क्षेत्रीय दल इससे आगे सोच नहीं पा रहे, और संघ के मजबूत कैडर के सहारे बीजेपी मंडल के हथियार से ही मंडल के महारथियों का शिकार कर रही है। ऊपर से क्षेत्रीय पार्टियों का वंशवाद उन्हे और रसातल में ले जा रहा है। यानी सियासी खेल पूरी तरह बदल चुका है, और संघ के साथ मिलकर बीजेपी ने मंडल की काट दो दशक में तलाश ली है, जिसके चक्रव्यूह में बड़े बड़ों की सियासत दांव पर है।

1 टिप्पणी:

  1. दो दशक पहले के दो बड़े अध्यायों से निकलती बीजेपी की आज की राजनीति! यकीनन प्रभावशाली विश्लेषण है सर। अब इस सूत्र को पकड़ते आगे देखता हूं तो दिखता है मध्यप्रदेश में उमा के हटने के बाद बाबूलाल गौर क्यों सीएम बने और गौर के बाद शिवराज क्यों...? एकदम साफ तस्वीर।

    जवाब देंहटाएं