गुरुवार, 30 अक्तूबर 2014

बदल गए सरकार !

कहते हैं सत्ता अक्सर मानसिकता बदल देती है...सोचने का नजरिया बदल देती है...अक्सर ऐसा देखा गया है कि विपक्ष में रहते हुए कोई भी राजनीतिक दल जिन मुद्दों को हथियार बनाता है सत्ता में आऩे के बाद उन्ही हथियारों की काट तलाशने में जुटा रहता है...बीते दिनों में केन्द्र की नई सरकार के कर्ताधर्ताओं का रुख भी इसी सियासी परम्परा को आगे बढ़ाने के संकेत दे रहा है...मोदी सरकार के मंत्री भी अब कांग्रेसी भाषा बोलते नजर आ रहे हैं...वो भाषा जिसे लेकर विपक्ष में रहते हुए खासा शोर मचाया था...फिर मुद्दा चाहे कोलगेट का रहा हो...कालेधन का रहा हो या फिर सीएजी की कार्यप्रणाली का...


10 साल तक सत्ता में रही यूपीए सरकार और बीते साढ़े पांच महीनों से सत्ता में बैठी एनडीए सरकार...दोनों में कालेधन और सीएजी के मुद्दे पर  हैरान करने वाली कुछ समानताएं देखने को मिली हैं...यूपीए ने कालेधन पर अंतर्राष्ट्रीय समझौतों का हवाला देते हुए कालेधन के कारोबारियों का नाम बताने से मना किया था...तो एनडीए सरकार ने भी वही किया...ये और बात है कि कोर्ट की सख्ती की आगे एक ना चली और नाम देने पड़े...दूसरा मामला सीएजी का है...यूपीए जब तक सत्ता में थी सीएजी की रिपोर्टों ने उसकी नींदे उड़ाई हुई थीं...कांग्रेस के नेता तब सीएजी पर सवाल उठाया करते थे...अब दौर बदल चुका है...अब सत्ता में बीजेपी है...लेकिन हैरानी ये कि बीजेपी के दिग्गज नेता अरुण जेटली भी अब कांग्रेस वाली भाषा बोलते हुए सीएजी को हद में रहने की नसीहतें दे रहे हैं...

जाहिर है सवाल तो उठेंगे...सवाल ये कि आखिर इस नसीहत का मतलब क्या है...कल तक सत्ता से बाहर रहते हुए जेटली साहब को सीएजी पर कांग्रेसियों का सवाल उठाना संवैधानिक संस्थाओं का अपमान लगता था तो अब क्यों नहीं लगता .. वैसे ये पहली बार नहीं है जब अरुण जेटली का रुख उनकी बदली हुई सोच का इशारा दे रहा हो...कोलगेट मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कोल ब्लॉक रद्द कर दिए तो सरकार अध्यादेश लेकर आई ...कालेधन के मामले में सरकार की दलीलें और कोर्ट की सख्ती के बाद दिखी बेबसी की मिसाल भी सामने है... ..भूमि अधिग्रहण का मामला भी कमोबेश ऐसा ही है ... किसानों के हितों की अनदेखी करने का आरोप बीजेपी विपक्ष में रहते हुए अक्सर यूपीए सरकार पर लगाती रहती थी..लेकिन अब सत्ता में आने के बाद सरकार जो सीधे किसानों से जुड़े प्रावधानों को बदलने की तैयारी कर रही है.. बहाना मैन्युफैक्चरिंग ग्रोथ के प्रभावित हो जाने का है ... लेकिन सवाल वही है कि पासा पलटने के अलावा क्या बदला है बीते दिनों में .. जो विपक्ष में थे सरकार में आ गए हैं .. तो क्या सत्ता ने मानसिकता बदल दी है .. नीतियों के लिए सोचने का नज़रिया बदल दिया है या फिर शोर मचाना और बात है और सरकार चलाना और ..

बुधवार, 29 अक्तूबर 2014

क्या बोफोर्स कांड जैसा होगा ब्लैक मनी कैंपेन का हश्र ?

काले धन पर जो कुछ भी इन दिनों चल रहा है वो भारतीय राजनैतिक इतिहास के एक दूसरे अध्याय की याद दिला रहा है। इन दोनों अध्यायों में पात्र बदल गए हैं लेकिन घटनाक्रम काफी कुछ एक जैसा है। सवाल अरबों करोड़ों रुपयों का है जिन पर आरोपियों को बचाने के आरोप लग रहे थे वो सत्ता से बाहर हैं लेकिन अभी तक आरोपी पर्दे में हैं। सवाल ये कि पहले जो मुहिम चली वो क्या सिर्फ चुनावी स्टंट था या फिर सचमुच ऐसा ही हुआ है कि खोदा पहाड़ और निकली चुहिया।
 
काले धन पर लंबी बहस हो चुकी है। ये लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान मुख्य मुद्दा भी रहा है। वादा किया गया था कि बीजेपी की सरकार बनेगी तो 100 दिन के भीतर कालेधन की वापसी होगी और उनके खातेदारों के नाम उजागर कर दिए जाएंगे। लेकिन सच्चाई ये है कि डेढ़ सौ से ज्यादा दिन बीत चुके हैं और काले धन की वापसी होना तो दूर बड़ी मुश्किल से तीन खातेदारों के नाम सार्वजनिक हो पाए हैं।

ब्लैक मनी का कैंपेन उसी तरह डीरेल होता नज़र आ रहा है जैसे बोफोर्स कांड के दौरान चला कैंपेन हुआ था । बोफोर्स सौदों के पीछे बहुत बड़ी दलाली की बात कही गई वीपी सिंह बोफोर्स स्कैंडल को हवा देकर प्रधानमंत्री की कुर्सी तक आने में कामयाब हो गए थे।  वी पी सिंह ने 1988 में कई प्रेस कॉन्फ्रेंस किए और एक के बाद एक कई स्विस अकाउंट्स का जिक्र किया था, लखनऊ में एक पब्लिक मीटिंग में वी पी सिंह ने लोटस नाम के एक अकाउंट का जिक्र किया था। इस अकाउंट से उनका इशारा राजीव गांधी के तथाकथित अकाउंट की ओर था, लेकिन गांधी परिवार ने इसे चैलेंज कर दिया और वी पी सिंह इस आरोप को कभी सही साबित नहीं कर पाए। 

हालांकि उस दौरान चुनावों में बोफोर्स उसी तरह छाया रहा था जिस तरह काले धन का मुद्दा इस चुनाव के दौरान छाया रहा है।  उस दौरान नतीजे के तौर पर राजीव गांधी को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी थी, इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ है। सरकार बनते ही काले धन पर SIT का गठन करने वाली बीजेपी सरकार अब विवादों में है। विवाद इसीलिए क्योंकि सत्ता मिलने के बाद सुर बदल गए हैं, बीजेपी दलील दे रही है कि जिन देश के बैंकों में पैसा रखा गया है .. उनके साथ हुई ट्रीटी की वजह से खातेदारों के नाम सार्वजनिक करना मुमकिन नहीं है । हालांकि ये वही ट्रीटी है .. जिसकी आड़ लेने वाली कांग्रेस को सुप्रीम कोर्ट कई बार फटकार लगा चुका है, और अभी भी सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद ही सरकार ने मामले की जांच कर रही स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम को 6 सौ से अधिक खातेदारों के नाम बताए हैं .. लेकिन ये नाम एक बार फिर सरकार सार्वजनिक नहीं कर रही । 
इससे  सुप्रीम कोर्ट 4 जुलाई 2011 के निर्णय में कह चुका है 1995 में जर्मनी के साथ हुआ करार यानि double taxation avoidance agreement इस जानकारी को उजागर करने से नहीं रोकता,  दरअसल ये करार उन लोगों को गोपनीयता की गारंटी देता है जो किसी एक देश में टैक्स दे रहे हों। उन्हें किसी तरह की गोपनीयता नहीं मिलती जो अवैध तरीके से पैसे जमा कर रहे हों। 
 सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा था कि केंद्र सरकार ने अभी तक ये भी सबूत पेश नहीं किए हैं जिससे ये साबित होता हो कि जर्मनी की सरकार खाताधारकों के नाम सार्वजनिक करने से इनकार कर रही हो।  
 सुप्रीम कोर्ट ने स्विटरज़रलैंड में बैंक खाता रखने वालों के मामलों में यूएनसीएसी यानि संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन का जिक्र किया था। जिसपर भारत और स्विट्जरलैंड की सरकारें हस्ताक्षर कर चुकी हैं।  
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ये कन्वेंशन कालेधन की रोकथाम की बात करता है। कालेधन जब्त करने की बात करता है और इस मुद्दे पर कन्वेंशन साइन करने वाले देशों के आपसी सहयोग की बात करता है, ना कि टैक्स अदा ना करने वालों को किसी तरह की छूट देने की । 

कुल मिलाकर सवाल यही उठता है कि क्या एक बार फिर ट्रीटी की आड़ में काले धन का शोर दब जाएगा।  सरकार अब दलील दे रही है कि पहले इस बात की जांच की जाएगी कि कितने लोगों के पास काला धन है। तो क्या ये सवाल नहीं उठते कि अगर पता ही नहीं था तो पहले किस आधार पर काले धन को लेकर आंकड़े बताए गए? और अगर पता है तो अब ट्रीटी की आड़ में नाम छुपाने की कोशिश क्यों?  क्या ये हल्ला बहुत हद तक वैसा ही नहीं जैसा कि बोफोर्स के वक्त हुआ था? कि अकाउंट के नाम के साथ रकम भी बताई गई। 20-22 साल की जांच और तकरीबन 250 करोड़ रुपए खर्च होने के बाद जांच एजेंसी ने हाथ खड़े कर दिए। यानि खोदा पहाड़ और निकली चुहिया। बीते 150 दिनों में सरकार के रवैये को देखकर एक बार फिर आशंका हो रही है कि क्या काले धन का मुद्दा भी देश की जनता को छकाने के लिए उठाया गया था और इसका परिणाम भी बोफोर्स जैसा होगा, या फिर सुप्रीम कोर्ट अपने सख्त रवैये से सरकार को मजबूर कर देगी कि काले धन के कुबेर किसी ट्रीटी का फायदा उठाकर बच ना पाएं .. और जिस तरह से 627 खातेदारों के नाम सुप्रीम कोर्ट को दिए गए हैं उसी तरह बाकी नाम भी सामने आएं और सार्वजनिक हों .. 

मंगलवार, 21 अक्तूबर 2014

'मंडल युग' का अंत !

हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनावी नतीजों ने  एक बार फिर सियासी करिश्मे और रणनीतिक दांवपेंच को लेकर नए सिरे से बहस का मंच मुहैया करा दिया है। बीजेपी ने एक-एक कर जिस तरह से सियासी किले भेदने शुरु किए हैं, उसका जवाब ना तो कांग्रेस के पास है और ना ही मंडल की लहर पर सवार होकर राजनीतिक फलक पर चमकने वाले क्षेत्रीय क्षत्रपों के पास,  जो अब सियासत की धुंधली जमीन पर अपने लिए गुंजाइश तलाश रहे हैं। सवाल ये कि आखिर ये हुआ कैसे, क्या ये मंडल युग का अंत है, क्या ये नई सियासत का आगाज है,  आखिर ये रणनीति है क्या?

इसका जवाब तलाशने के लिए हमें दो दशक पीछे जाना होगा। नब्बे के दशक में उभरे मंडल बनाम कमंडल के आंदोलन को गौर से समझना होगा। कमंडल यानी बीजेपी की धार्मिक सियासत के मुकाबले वीपी सिंह ने मंडल का प्रयोग किया। विरोध हुए,  आंदोलन हुआ, और इसके साथ ही जाति आधारित  राजनीतिक व्यवस्था मजबूत होने लगी। जिसका खामियाजा राष्ट्रीय पार्टियों ने सबसे ज्यादा भुगता है। इस माहौल से कांग्रेस ने सबक लिया कि नहीं ये तो पता नहीं लेकिन बीजेपी और आरएसएस के थिंकटैंक ने इसे जल्दी भांप लिया, और मंडल के हथियार से ही मंडल की ताकतों को निपटाने की रणनीति पर आगे बढ़ने लगे।

आरएसएस और बीजेपी ने सुनियोजित तरीके से ओबीसी लीडरशिप को प्रमोट किया। कल्याण सिंह, उमा भारती, मनोहर पर्रिकर, बीएस येदियुरप्पा, और खुद नरेन्द्र मोदी जैसे ओबीसी लीडर्स को सीएम बनाया। इस दौर में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बंगारू लक्ष्मण, कुशाभाउ ठाकरे, वेंकैया नायडू, जैसे नेता बनाए गए, तो वहीं गठबंधन की सियासत में भी बीजेपी ने इस गणित का खास ध्यान रखा। छोटे और बड़े स्तर पर इसका प्रबंधन किया गया, जिसके बाद सफलता भी मिलनी शुरु हुई।

कई साल पहले हुई इस शुरुआत में तय ये किया गया कि पुरानी छवि के आधार पर पार्टी आगे नहीं बढ़ सकती। लिहाजा पार्टी ने अपने आप को बदलने की शुरुआत की, और मंडल ताकतों को हाशिए पर पहुंचाने में कामयाब हो गई। लोकसभा चुनाव 2014 से पहले एमपी, छत्तीसगढ़, राजस्थान में बीजेपी ने अपने दम पर सत्ता हासिल की और अब इस लिस्ट में महाराष्ट्र और हरियाणा का नाम भी जुड़ गया है।

बीजेपी ने दरअसल ओबीसी कार्ड खेलकर जो रणनीति बनाई है, उसने कई सियासी दलों की जमीन छीन ली है खासकर क्षेत्रीय पार्टियों की। लोकसभा चुनाव में रैलियों में जब जब नरेन्द्र मोदी ने खुद को पिछड़ेवर्ग का बताते हुए चायवाला कहते हुए आम जनता से संवाद स्थापित किया,  जनता से वो कनेक्ट हुए, और यही कनेक्शन लहर के तौर पर सामने आया।

इस बीच कांग्रेस का वोट बैंक एक एक कर छिटकता गया। किसी जमाने में अपरकास्ट, दलित और मुस्लिम वोट बैंक की तिकड़ी के सहारे लम्बे वक्त तक सत्तासुख भोगने वाली कांग्रेस से अपरकास्ट का वोटबैंक बीजेपी ने पहले ही छीन लिया। दलित वोट बीएसपी समेत दूसरी पार्टियों में शिफ्ट हो गए और मुस्लिम वोट बैंक बड़े राज्यों में मुलायम नीतीश जैसे नेताओं की ओर चला गया। अब नई परिस्थिति में हालत ये है कि क्षेत्रीयता के दायरे में सिमटे क्षेत्रीय दल इससे आगे सोच नहीं पा रहे, और संघ के मजबूत कैडर के सहारे बीजेपी मंडल के हथियार से ही मंडल के महारथियों का शिकार कर रही है। ऊपर से क्षेत्रीय पार्टियों का वंशवाद उन्हे और रसातल में ले जा रहा है। यानी सियासी खेल पूरी तरह बदल चुका है, और संघ के साथ मिलकर बीजेपी ने मंडल की काट दो दशक में तलाश ली है, जिसके चक्रव्यूह में बड़े बड़ों की सियासत दांव पर है।