शुक्रवार, 26 सितंबर 2014

सियासत और अवसरवादी 'ब्रेकअप'

बीजेपी-शिवसेना की 25 साल पुरानी दोस्ती, कांग्रेस-एनसीपी का 15 साल का साथ टूट चुका है ... जो दल कभी सिद्धांतों और विचारधारा की दुहाई देकर साथ आए थे अब सीट और सीएम की कुर्सी के मसले पर उनकी राहें अलग हो गई हैं ... सवाल ये कि क्या ये अवसरवादी ब्रेकअप  नहीं है..



ये सियासत है यहां बिना फायदे के ना कोई गठबंधन बनता है और ना ही टूटता है... महाराष्ट्र में भी दोनों राष्ट्रीय पार्टियों के गठबंधन टूटे हैं तो इसके पीछे भी फायदे की राजनीति है .... दरअसल इससे दोनों हीं राष्ट्रीय पार्टियों को फायदा है .. ये फायदा सपोर्ट बेस का है जो पार्टियां मैदान में उतर कर ही हासिल कर सकती हैं ... इसे एनसीपी और शिवसेना के साथ रहकर हासिल नहीं किया जा सकता ... लिहाजा बीजेपी शिवसेना का साथ छोड़कर स्वाभिमान शेतकारी संगठन, राष्ट्रीय समाज पक्ष और शिवसंग्राम जैसी छोटी पार्टियों के साथ गठबंधन करने जा रही है जिनके साथ महज 20 से 25 सीटों का समझौता होगा .. इसके लिए शिवसेना कभी तैयार नहीं होती क्योंकि उनकी नज़र मुख्यमंत्री की कुर्सी पर है ... दूसरे बीजेपी जितनी ज्यादा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी ... जीत मिले ना मिले ग्रासरूट पर उनकी पकड़ बेहतर हो जाएगी ..

महाराष्ट्र की सियासत के दूसरे बड़े खिलाड़ी कांग्रेस ने भी एनसीपी से किनारा करते हुए समाजवादी पार्टी से हाथ मिला लिया जिनके साथ 8 सीटों पर समझौता हो रहा है ... यहां कांग्रेस को सीटों के फायदे के  साथ सेक्युलर वोट मिलने की उम्मीद भी बढ़ गई है ... इससे पहले चाहे वो गुजरात हो या फिर मध्य प्रदेश..  समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस के खिलाफ उम्मीदवार उतार उनके सेक्युलर वोटबैंक में सेंध लगाई है ...अब जब दोनों साथ आ गए हैं तो दोनों पार्टियों को फायदा होगा ...

दरअसल राष्ट्रीय पार्टियों का ये सीधा सा गणित है .... ग्रासरूट पर ज्यादा से ज्यादा सपोर्टर्स बनाए रखना ... ताकि पार्टी की पकड़ बनी रहे ... दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियां अच्छी तरह से जानती हैं कि जब तक ग्रासरुट वर्कर्स पार्टी से नहीं जुड़ते हैं तब तक किसी भी राज्य में सपोर्ट बेस बढ़ाना मुमकिन नहीं है...लेकिन इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल उठता है, कि जिन मुद्दों और सिद्धांतों के लिए इन चारों पार्टियों ने सालों पहले गंठबंधन किया था क्या वो एक पल में ही हवा हो गए...क्या ये सभी पार्टियां अवसरवादी राजनीति में विश्वास करती हैं जहां ideology के लिए कोई जगह नहीं...

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