शुक्रवार, 26 सितंबर 2014

सियासत और अवसरवादी 'ब्रेकअप'

बीजेपी-शिवसेना की 25 साल पुरानी दोस्ती, कांग्रेस-एनसीपी का 15 साल का साथ टूट चुका है ... जो दल कभी सिद्धांतों और विचारधारा की दुहाई देकर साथ आए थे अब सीट और सीएम की कुर्सी के मसले पर उनकी राहें अलग हो गई हैं ... सवाल ये कि क्या ये अवसरवादी ब्रेकअप  नहीं है..



ये सियासत है यहां बिना फायदे के ना कोई गठबंधन बनता है और ना ही टूटता है... महाराष्ट्र में भी दोनों राष्ट्रीय पार्टियों के गठबंधन टूटे हैं तो इसके पीछे भी फायदे की राजनीति है .... दरअसल इससे दोनों हीं राष्ट्रीय पार्टियों को फायदा है .. ये फायदा सपोर्ट बेस का है जो पार्टियां मैदान में उतर कर ही हासिल कर सकती हैं ... इसे एनसीपी और शिवसेना के साथ रहकर हासिल नहीं किया जा सकता ... लिहाजा बीजेपी शिवसेना का साथ छोड़कर स्वाभिमान शेतकारी संगठन, राष्ट्रीय समाज पक्ष और शिवसंग्राम जैसी छोटी पार्टियों के साथ गठबंधन करने जा रही है जिनके साथ महज 20 से 25 सीटों का समझौता होगा .. इसके लिए शिवसेना कभी तैयार नहीं होती क्योंकि उनकी नज़र मुख्यमंत्री की कुर्सी पर है ... दूसरे बीजेपी जितनी ज्यादा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी ... जीत मिले ना मिले ग्रासरूट पर उनकी पकड़ बेहतर हो जाएगी ..

महाराष्ट्र की सियासत के दूसरे बड़े खिलाड़ी कांग्रेस ने भी एनसीपी से किनारा करते हुए समाजवादी पार्टी से हाथ मिला लिया जिनके साथ 8 सीटों पर समझौता हो रहा है ... यहां कांग्रेस को सीटों के फायदे के  साथ सेक्युलर वोट मिलने की उम्मीद भी बढ़ गई है ... इससे पहले चाहे वो गुजरात हो या फिर मध्य प्रदेश..  समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस के खिलाफ उम्मीदवार उतार उनके सेक्युलर वोटबैंक में सेंध लगाई है ...अब जब दोनों साथ आ गए हैं तो दोनों पार्टियों को फायदा होगा ...

दरअसल राष्ट्रीय पार्टियों का ये सीधा सा गणित है .... ग्रासरूट पर ज्यादा से ज्यादा सपोर्टर्स बनाए रखना ... ताकि पार्टी की पकड़ बनी रहे ... दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियां अच्छी तरह से जानती हैं कि जब तक ग्रासरुट वर्कर्स पार्टी से नहीं जुड़ते हैं तब तक किसी भी राज्य में सपोर्ट बेस बढ़ाना मुमकिन नहीं है...लेकिन इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल उठता है, कि जिन मुद्दों और सिद्धांतों के लिए इन चारों पार्टियों ने सालों पहले गंठबंधन किया था क्या वो एक पल में ही हवा हो गए...क्या ये सभी पार्टियां अवसरवादी राजनीति में विश्वास करती हैं जहां ideology के लिए कोई जगह नहीं...

रविवार, 21 सितंबर 2014

Moderate Modi !

बीते तीन चार दिनों से मुसलमानों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान के कई मतलब निकाले जा रहे हैं...प्रतिक्रियाएं आ रही हैं... सियासत हो रही है .. कोई दल इसे भरोसे के लायक नहीं बता रहा तो कोई इसे सियासी बयानबाजी करार दे रहा है तो कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने तहे दिल से मोदी के इस बयान का स्वागत किया है ...

देखा जाए तो मोदी के इस बयान पर हो हल्ला क्यों .. कल तक एक कट्टरवादी नेता की छवि रखनेवाले मोदी का बदला हुआ रुप देश ने पिछले साल ही देख लिया है ..लोकसभा चुनाव के दौरान मोदी हमेशा अतिवाद और हार्डलाइन से बचते रहे...यहां तक कि जिस संघ परिवार से मोदी का ताल्लुक है... मोदी उससे भी कहीं दूर ही नजर आए...कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक सबका साथ सबका विकास का नारा देकर नरेंद्र मोदी ने हिंदुस्तान का दिल और भरोसा दोनों जीता...यही वजह है कि पीएम बनने के बाद भी मोदी ने कोई ऐसी बात या तकरीर नहीं की जिसमें सांप्रदायिकता, जातिवाद या क्षेत्रियता जैसी कोई भी बात झलकती हो...यहां तक कि स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले के प्राचीर से उनके भाषण ने कई लोगों को बेहद हैरान किया...क्योंकि उसमें हिन्दूवाद पर आधारित कोई ऐसी बात नहीं थी जिसकी कई लोग उम्मीद कर रहे थे.... बल्कि मोदी का बिना कागज के देश की समस्याओं पर आधारित भाषण उन्हें एक कुशल राजनेता के रूप में दिखाने में कामयाब रहा....पीएम मोदी के इस नए अंदाज ने एक बार फिर देश के लोगों में विकास की नई उम्मीद जगाई...

प्रधानमंत्री मोदी अपने हर भाषण में 120 करोड़ की आबादी को साथ लेकर आगे बढ़ने की बात कहते आए हैं...गरीब से गरीब और समाज के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति के विकास पर जोर देते आए हैं...साथ ही मोदी ये अच्छी तरह से जानते हैं कि किसी भी देश का विकास तभी हो सकता है जब आंतरिक व्यवस्था के साथ साथ पड़ोसी मुल्कों से उसके संबंध बेहतर हों...इसलिए पीएम बनने के बाद सबसे पहले उन्होंने सार्क देशों  से संबंध मजबूत करने की पहल की ... और अपनी इस कोशिश में वो काफी हद तक सफल भी रहे...

अपने छोटे से कार्यकाल में मोदी अटलजी के बाद संघ परिवार से सक्रिय राजनीति और सरकार में आए दूसरे बड़े नेता हैं, जिनकी विदेश नीति में पंडित नेहरु और इंदिरा की झलक दिखाई देती है...वहीं आंतरिक नीति में पंडित दीनदयाल उपाध्याय का Integrated Humanism, गांधी का ग्राम स्वराज और लाल बहादुर शास्त्री के जय जवान जय किसान की छाप देखने को मिल रही है... ये नरेंद्र मोदी का बदला अंदाज और उनकी बदली छवि है जो पीएम के तौर पर उनकी लोकप्रियता को और बढ़ा रही है ...और शायद इसी नए सोच ने मोदी को Moderate मोदी बना दिया है...

गठबंधन की 'गांठ' !

महाराष्ट्र में गठबंधन की गांठे दरक रही हैं...जहां एक ओर 25 साल का रिश्ता है तो दूसरी ओर 12 साल का रिश्ता... दोनों के रंग फीके पड़ रहे हैं... ये सवाल उठने लगे हैं कि  क्या गठबंधन की सियासत का दौर खत्म होने वाला है... क्या 2014 की शानदार कामयाबी के बाद बीजेपी अकेले दम पर हर संग्राम जीतने का हौसला पा चुकी है... दरअसल हरियाणा में अपनी पुरानी सहयोगी हरियाणा जनहित कांग्रेस का हाथ झटकने के बाद अब बीजेपी का महाराष्ट्र में शिवसेना से रण होता दिख रहा है... कई दिनों से Seat Sharing के मसले पर 25 साल पुराने सहयोगियों में सहमति नहीं बन पा रही है ... यही हाल 12 साल पुराने कांग्रेस और एनसीपी का भी है ..

गठबंधन की सियासत भले ही भारतीय राजनीति का हिस्सा बन चुकी हो लेकिन हर बार ये कामयाब रहे ये मुमकिन नहीं है...यहां दोस्तों को दुश्मन बनते देर नहीं लगती और ना ही दुश्मनी ताऊम्र निभाई जाती है...और मौजूदा वक्त में देश की दोनों प्रमुख पार्टियां इसी दौर से गुजर रही हैं जिनके सहयोगी ही उनके लिए मुसीबत बने हुए हैं..बीजेपी के सामने शिवसेना तो कांग्रेस के सामने एनसीपी खड़ी है...सवाल सीटों का है सो शिकायत, मानमनौव्वल, तल्खी, और धमकी ये सबकुछ एक साथ दिख रहा है...

गठबंधन की राजनीति का प्रयोग कई बार हुआ है लेकिन इसे कामयाबी से चलाने का श्रेय सिर्फ पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को है ... जिनके वक्त में एनडीए में कुल 24 सहयोगी हुआ करते थे...एनडीए की इसी कामयाबी ने कांग्रेस को भी यूपीए बनाने पर मजबूर किया था...लेकिन कांग्रेस गठबंधन की सरकार में शामिल अपने सहयोगियों के साथ उचित व्यवहार बनाकर नहीं चल पाई...और वक्त वक्त पर अपने राष्ट्रीय अधिवेशनों में एकल चलो की नीति पर आगे चलने की वकालत करती रही...लेकिन इसके लिए पूर्ण बहुमत की दरकार थी जिसे कांग्रेस हासिल नहीं कर पाई...यूपी में 2007 में बीएसपी और 2012 में एसपी को मिली कामयाबी ने इस बात के संकेत दे दिए थे कि जनता गठबंधन की राजनीति को अपनाने के मूड में नहीं है...और ये बात एक बार फिर पुख्ता तौर पर 2014 में तब साबित हो गई जब लोकसभा चुनावो में बीजेपी को अकेले दम पर बहुमत मिल गया...अब सवाल ये कि क्या महाराष्ट्र का चुनाव बदले हुए दौर का नया चैप्टर लिखने जा रहा है
महाराष्ट्र के चारों प्रमुख दल सुलह समझौते का रास्ता खोलने के दावे तो कर रहे हैं, साथ ही अपनी अपनी लिस्ट भी तैयार कर रहे हैं...जाहिर है अगर इस बार गठबंधन के तहत चुनाव नहीं हुआ तो महाराष्ट्र का महाभारत सबसे ज्यादा दिलचस्प होगा...

मंगलवार, 16 सितंबर 2014

मोदी का मैजिक खत्म ?

लोकसभा चुनाव में भले ही मुलायम सिंह यादव का जादू नहीं चला था लेकिन महज 100 दिनों के अंतराल में मुलायम ने अपना करिश्मे का ऐसा नजारा दिखाया है कि बीजेपी के सूरमा कांप उठे हैं...उपचुनावों में समाजवादी पार्टी की जोरदार जीत ने ये साबित कर दिया है कि मुलायम सिंह यादव अभी सियासी बिसात पर चूके हुए खिलाड़ी नहीं बल्कि मंझे हुए महारथी हैं....जो पासा कभी पलट सकते हैं... जैसा कि उन्होंने उपचुनावों में कर दिखाया है ... प्रदेश की 11 लोकसभा सीटों में समाजवादी पार्टी ने बीजेपी से 8 सीटें छीनने में कामयाबी पाई है.. इन 11 सीटों पर 2012 में प्रदेश में समाजवादी पार्टी की लहर के बावजूद बीजेपी ने कामयाबी हासिल की थी

लोकसभा में मिली शिकस्त के बाद मुलायम सिंह यादव ने सीधे तौर पर कार्यकर्ताओं और पार्टी नेताओं से राब्ता कायम किया  ... उपचुनाव की एक-एक सीटों पर जाति और संप्रदाय के स्थानीय समीकरण पर खासतौर से ध्यान दिया .. इन्हीं स्थानीय मुद्दों को ध्यान में रखते हुए ही मुलायम सिंह यादव ने प्रत्याशियों का चयन भी किया ...

दूसरी तरफ लोकसभा चुनावों में मिली शानदार कामयाबी से बेअंदाज हुई बीजेपी और उसके नेता जमीनी स्तर पर मेहनत करने के बजाय जज्बाती और सांप्रदायिक मुद्दों को उछाल कर ही एक बार फिर चुनाव जीतना चाहते थे .. इस उपचुनाव में केंद्रीय नेतृत्व की उदासीनता का आलम ये था कि मथुरा में हुई राज्य कार्यकारिणी में कोई बड़ा नेता नहीं आया ... राजनाथ सिंह से लेकर अमित शाह तक ने इस बैठक से दूरी बनाए रखी ... बीजेपी नेताओं को शायद इस बात का अंदाजा नहीं था कि अब देश में उनकी 100 दिन पुरानी सरकार है और केंद्र सरकार  के कामकाज और उनकी उपलब्धियों को भी मतदाता कसौटी पर कसने के बाद ही वोट देंगे
लोकसभा चुनावों में बीजेपी की कामयाबी पार्टी नेताओं के करिश्माई नेतृत्व के साथ साथ मनमोहन सरकार की नाकामयाबियों का नतीजा था ... अगर हम उत्तर प्रदेश की बात करें तो सांप्रदायिक और धार्मिक ध्रुवीकरण के साथ -साथ गैर बीजेपी दलों के बहुकोणीय मुकाबले का भी सबसे ज्यादा फायदा बीजेपी को मिला था

लेकिन इन उपचुनावों में राजनैतिक हालात काफी बदले हुए थे .. बीएसपी ने इन उपचुनावों में हिस्सा नहीं लिया ... बीएसपी का वोटबैंक सांप्रदायिक और धार्मिक ध्रुवीकरण की बजाय इसके उलट विचारधारा वाले प्रत्याशियों को ज्यादा तरजीह दिया है ... शायद यही कारण रहा कि भारतीय जनता पार्टी को 100 दिन के अंदर ही एक बार फिर मुलायम सिंह यादव शिकस्त देने में कामयाब रहे ...

बीजेपी की इस शर्मनाक हार के पीछे जहां एक तरफ पार्टी के बड़े नेताओं का उदासीन रवैया रहा वहीं दूसरी तरफ मुलायम सिंह यादव का बूथ लेवल का मैनेजमेंट था .... बीजेपी की तरफ से इन चुनावों के लिए जिन छुटभैये नेताओं को स्टार प्रचारक पेश किया गया उनकी पकड़ प्रदेश की जनता में इसके पहले भी कभी देखने को नहीं मिली थी .. इन उपचुनावों में बीजेपी को भरसक किसी चमत्कार का ही इंतजार था ...
लोकसभा चुनावों में मुलायम सिंह य़ादव भले ही 56 इंच की छाती दिखाने में नाकामयाब रहे हों लेकिन इन उपचुनाव के नतीजों ने एक बार फिर ये साबित कर दिया है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति और उसकी पैंतरेबाजी मुलायम सिंह यादव बखूबी समझते हैं ... 

गुरुवार, 11 सितंबर 2014

लव जेहाद बम से भी ज्यादा खतरनाक है : दिनेश शर्मा

वासिंद्र मिश्र : डॉक्टर दिनेश शर्मा युवा कोटे से भारतीय जनता पार्टी में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाये गये हैं, लखनऊ के मेयर हैं । राष्ट्रीय मेयर कॉन्फ्रेंस में और अंतराष्ट्रीय मेयर कॉन्फ्रेंस में इनकी एक अलग पहचान रही है .. दिनेश जी आपसे जानना चाहेंगे कि अमित शाह जी की अध्यक्षता में जो नई कमिटी बनी है उसमें ज्यादातर युवा चेहरे हैं या हम ये कहें कि कुछ लोगों को छोड़कर राजनीति दबाव के चलते कहें या अपवाद के चलते ज्यादातर ऐसे चेहरे हैं जो बेदाग हैं और अपने अपने-अपने राज्यों में इनकी बेहतर छवि रही है ..... ये जो नई कमिटी है इसका लक्ष्य क्या है ?
दिनेश शर्मा : देखिए सीधी सी बात है कि निचले स्तर तक कार्यकर्ताओं में पहुंच और जनता में सर्वग्राहिता का भाव जागृत हो सके, सरकार की नीतियों का भी प्रचार-प्रसार हो और हमारा जो संगठनात्मक ढांचा है, ताना-बाना है वो हमारी रीति-नीति सिद्धांतों के अनुसार सुचारू रुप से संचालित हो सके, उसके लिए ऐसे लोगों की जरूरत हमेशा रही है और पार्टी ने हमेशा ऐसे लोगों का उपयोग भी किया है । ऐसे लोग जो संवाद कर सकते हैं जो पार्टी की नीतियों से सुपरिचित है और लोगों को अपने साथ में जोड़ सकते हैं, सबकी भूमिका तय कर सकते हैं । मैं समझता हूं सारी बातों का समिश्रण इस नई टीम में रहा है और निश्चित रुप से मैं एक कार्यकर्ता के रूप में कार्य करता रहा हूं और ज्यादातर यूथ के पॉलिटिक्स में शामिल रहा हूं , 3 बार युवा मोर्चे का अध्यक्ष रहा कई बार उत्तर प्रदेश का प्रभारी रहा, तो मैंने देखा कि भारतीय जनता पार्टी दूसरी पार्टियों से बिलकुल अलग है । यहां पर अपने राष्ट्रीय नेताओं , बड़े से बड़े नेताओं से, छोटे से छोटे कार्यकर्ताओं का सीधा संवाद रहता है । हमारा हर वरिष्ठ कार्यकर्ता हमारे जूनियर कार्यकर्ता से सीखता है उसे सिखाता है । मैंने एक और भाव देखा है कि जो हमारे वरिष्ठ नेतागण हैं, वो भी अपने कनिष्ठों से एक मैत्री भाव के साथ कुछ ना कुछ ग्रहण करने की चेष्टा करते हैं, इससे पार्टी में एक बेहतर समन्वय रहता है ।
वासिंद्र मिश्र: कहा ये जा रहा है कि नरेंद्र मोदीजी ने संगठन में धीरे-धीरे वह कार्य संस्कृति लागू कर दी है जो एक जमाने में इंदिराजी की कार्य संस्कृति थी । इंदिरा जी ने तमिल नाडू के बड़े नेता के कामराज के जरिये संगठन से कांग्रेस के तमाम दिग्गज पुराने नेताओं का सफाया कर दिया था और वही काम नरेंद्र मोदी जी कर रहे हैं अमित शाह जी के जरिये । इसलिए चाहे उत्तर प्रदेश हो या देश के बाकि राज्य हों संगठन से ज्यादातर उन चेहरों को हटा दिया गया है जो एक अरसे से किसी ना किसी रुप में काबिज थे और आप जैसे नौजवान और बेदाग छवि वालों को मौका दिया गया है...
दिनेश शर्मा : मैं समझता हूं ये विचार ही मिथ्या है, इंदिरा जी के समय का जो विचार था वो था इंडिया इज इंदिरा, इंदिरा इज इंडिया । मोदी ने कभी ऐसा नहीं कहा,मोदीजी ने खुद को हमेशा एक कार्यकर्ता के रूप में ही प्रस्तुत किया है और जो संगठन का दिशानिर्देश है, उसका अक्षरश: पालन किया है। हमारे यहां वरिष्ठ जनों के बारे में कहें तो सभी समायोजन की कोशिश करते हैं । माननीय कल्याण सिंहजी ने कुछ दिन पहले ही राज्यपाल का पद ग्रहण किया है, माननीय केसरीनाथ त्रिपाठी राज्यपाल का पद ग्रहण कर चुके हैं । अगर उत्तर प्रदेश का सदर्भ हम लें तो अलग-अलग लोगों की अलग-अलग भूमिका होती है हर राजनीतिक दल में,लेकिन बीजेपी ही ऐसी पार्टी है जो अपने वरिष्ठ जनों के आशीर्वाद से और उनके दिशा निर्देशन में ही अपने कार्यों का संचालन करती है । ये बात अलग है कि निर्णय के पहले विभिन्न विचार होते हैं और लोग अपनी-अपनी राय और अपने-अपने विचार रखते हैं। हमारे यहां डिक्टेटरशिप नहीं है और जब विचारों का मेल हो जाता है तो निर्णय भी हो जाता है और जब निर्णय हो जाता है तो उसका सब मिलकर अनुपालन करते हैं तो फिर उसके बाद कोई मतभेद नही रहता । पहले हम सबको अपनी बातें रखने का अधिकार है ...
वासिंद्र मिश्र: इंदिरा इज इंडिया और इंडिया इज इंदिरा, इंदिराजी ने नहीं कहा था, देवकांत बरुआ ने कहा था उनकी चापलूसी में...
गेस्ट: पार्टी के लोगों ने कहा मैंने यही कहा कि पार्टी के लोगों ने ये नारा दिया था
वासिंद्र मिश्र: और एक वक्त ऐसा था कि अटलजी ने भी इंदिराजी की तारीफ की थी जब बांग्लादेश को उन्होंने पाकिस्तान से बांटकर अलगराज्य बनाया था । आपकी पार्टी में भी पिछला चुनाव पूरी तरह से मोदी जी के नाम पर लड़ा गया है... जितने कैंपेन, जितने स्लोगन रहे उसमें यही कहा गया कि मोदीजी की सरकार बनेगी । अब दबी जुबान में ये बात कही जा रही है कि मोदी के अनुशासन के चलते आपकी पार्टी के सांसद, केंद्रीय मंत्री काफी घुटन महसूस कर रहे हैं.. तो इसमें और इंदिराजी की कार्यशैली में क्या आपको सामानता नजर नहीं आ रही ?
दिनेश शर्मा :देखिये मेरी जो आपत्ति थी कि उनके लोगों ने ये प्रचारित किया कि इंदिरा भारत है और भारत इंदिरा है, भारत किसी व्यक्ति का नहीं हो सकता, भारत तो सभी का है, एक सौ पच्चीस करोड़ लोगों का है, ऐसा माननीय मोदीजी हमेशा बोलते हैं । मेरा जो मतभेद था उन शब्दों पर था इस लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने तो अपना कोई नेता घोषित ही नहीं किया या साहस ही नहीं कर पाये,दूसरे दलों का ये अस्तित्व ही नहीं था कि वो मिलकर भी अपना एक आदमी घोषित कर सकें, जो देश के प्रधानमंत्री के पद का दावेदार हो । ऐसे में बीजेपी ने अपना नेता मोदी जी को घोषित किया था .. ऐसे में बीजेपी की सरकार होगी और मोदीजी के नेतृत्व में होगी ये कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं था । ऐसा हम लोगों ने वास्तव में कर दिखाया है । हमारा 273 प्लस का नारा था उसे भी हमने पूरा किया , मोदीजी का जो कुशल शासनतंत्र और कांग्रेस के कुशासन की वजह से ही जनता की भावना बीजेपी के साथ जुड़ी ...
वासिंद्र मिश्र: उत्तर प्रदेश के संदर्भ में बात करें तो कुछ दिनों में यहां उपचुनाव होने वाले हैं .. और एक आम चर्चा है कि जब लोकसभा चुनाव होने वाले थे तो कई महीने पहले से उत्तर प्रदेश के सत्ता रूढ दल और आपकी पार्टी ने मिलकर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कराने की कोशिश की थी जिसका नतीजा ये हुआ कि यूपी के सत्तारूढ़ दल का सफाया हो गया और इसका सबसे ज्यादा फायदा भारतीय जनता पार्टी को मिला .. तो क्या एक बार फिर पोलराइजेशन के लिए आपकी पार्टी की उत्तर प्रदेश की सत्तारूढ़ पार्टी से कोई संधि हो गई है और उस संधि के चलते आप लोग कोशिश कर रहे हैं कि मैनपुरी की जो लोकसभा की सीट है वो समाजवादी पार्टी को मिल जाये और बदले में जो बाइ इलेक्शन में ज्यादातर सीटें हैं उस पर आपके लोग दोबारा काबिज हो जाएं ...
दिनेश शर्मा : मैं समझता हूं कि इस प्रकार की कल्पना करना भी एक तरीके का राजनीतिक पाप है, क्योंकि उनकी विचारधारा और बीजेपी की विचारधारा में जमीन-आसमान का अंतर है । जब लोकसभा के चुनाव थे तब भी लोगों ने अफवाह उड़ाई कि बीजेपी धुव्रीकरण चाहती है, जबकि मोदीजी ने अपने हर भाषण में कहा कि एक सौ पच्चीस करोड़ हिंदुस्तानियों के लिये मुझे काम करना है। उन्होंने ये नहीं कहा कि मुझे हिंदू के लिये करना है, मुसलमान के लिये करना है, तुष्टिकरण के लिये करना है, बांटकर करना है, जाति के लिये करना है, ऐसा बीजेपी की नीति-रीति सिद्धांतों में आता ही नहीं है । जहां तक उत्तर प्रदेश के संदर्भ में जो तनाव फैलाने की जो अफवाहें आयी हैं, मेरी चुनौती है आप निष्पक्ष जांच करा लीजिये, जो जांच एजेंसियां हैं वो नकारा नहीं हैं, आप उनसे जांच कराइये, पता चल जायेगा कि सहारनपुर में कौन दोषी है, मुजफ्फरनगर में कौन दोषी रहा । ये बच्चा -बच्चा जानता है कि दोषी कांग्रेस पार्टी के एक प्रतिनिधि है जो अब समाजवादी पार्टी में जाने वाले हैं । समाजवादी पार्टी खुद ही एक जांच समिति बैठा लेती है । लोकतंत्र में इससे ज्यादा हास्यास्पद स्थिति नहीं हो सकती कि जिसकी सत्ता हो वो जांच एजेंसी के बदले अपने ही एक मंत्री के नेतृत्व में जांच समिति बैठा ले ... समाजवादी पार्टी पर आरोप था कि इसने दंगा फैलाया... अपराध से ग्रसित यही पार्टी न्याय करने के लिये पहुंच गई यानि अपराधी न्यायधीश बन गया और न्यायधीश बनकर निर्णय सुना दिया .. हमारे जिस सांसद को उन्होंने दोषी करार दिया वो दंगा को रुकवाने के लिये महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहे थे, अखबारों में भी यही निकला था कि उनकी कोई भूमिका नहीं थी, उनको समाजवादी पार्टी की बनाई कमेटी ने दोषी बता दिया और जो दोषी था उसे निरपराध बता दिया । साथ में ये कहा कि कि डीएम और एसडीएम भी दोषी हैं, अगर डीएम,एसडीएम दोषी थे या हैं तो ये बताइए कि क्या कोई भी प्रशासन बगैर शासन के दिशानिर्देश से चल सकता है और अगर शासन के दिशा निर्देशन से चलता है तो शासन इसके लिये दोषी नहीं है क्या
वासिंद्र मिश्र: डॉक्टर साहब ये बात ठीक है कि अगर जिला प्रशासन नाकामयाब रहा तो उसके लिये राज्य प्रशासन की भी उतनी ही जिम्मेदारी है । लेकिन अगर हम इतिहास पर नजर डालें तो उत्तर प्रदेश में जब-जब समाजवादी पार्टी की सरकार रही है और उसके बाद जब भी विधानसभा के चुनाव हुए हैं तो भारतीय जनता पार्टी को राजनैतिक तौर पर सर्वाधिक फायदा हुआ है, चाहे अयोध्या में गोलीकांड करवाने की बात रही हो,उसके बाद जब चुनाव हुआ तो उत्तर प्रदेश सहित देश के चार राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी
दिनेश शर्मा :नहीं मैं इसको दूसरी तरह से बोलूंगा
वासिंद्र मिश्र: इस बार भी देख लीजिए यूपी में समाजवादी पार्टी की सरकार बनी और उसके बाद लोकसभा चुनाव हुए तो बीजेपी को रिकॉर्ड मतों से कामयाबी मिली है, और कुछ लोग तो ये भी कहते हैं कि अगर उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को इतनी शानदार कामयाबी नहीं मिली तो देश में जिस तरह की सरकार आज देखने को मिल रही है शायद नहीं बन पाती ?
दिनेश शर्मा : निश्चित रूप में उत्तर प्रदेश की सफलता हमें स्पष्ट बहुमत की तरफ ले गयी और उत्तर प्रदेश की जनता के हम लोग आभारी भी हैं, लेकिन ये बात सही नहीं कि ऐसा समाजवादी पार्टी की वजह से ऐसा हुआ है .. हां ये बात अलग है कि समाजवादी पार्टी जब-जब सरकार में आती है तो सत्ता का नंगा नाच होता है ।अपराध बढ़ने लगते हैं,भ्रष्टाचार बढ़ने लगता है,परिवारवाद बढ़ने लगता है और ऐसी दशा में जनता का आक्रोश सतही जमीन पर उतर आता है... बीएसपी का भी उन्होंने भ्रष्टाचार देखा है इसलिये उन्होंने विकल्प के रूप में बीजेपी को चुना ... सर्वे कहता है कि कल्याण सिंह के नेतृत्व में जो बीजेपी का शासन था वो सर्वश्रेष्ठ शासन था ... राजनाथ जी के नेतृत्व में जो शासन था उसमें जितने अच्छे निर्णय लिये गये आज तक किसी भी मंत्रिमंडल में नहीं लिये गये,तो ये एक स्वाभाविक प्रक्रिया है कि सरकार का नकारापन होता है उसे दूर कौन कर सकता है,जब ये प्रश्न उठता है तो सहजभाव में भारतीय जनता पार्टी का शासन लोगों को याद आता है
वासिंद्र मिश्र: क्या ये भी सच है कि जब समाजवादी पार्टी सत्ता में आती है तो राज्य में सांप्रदायिकता का बोल-बाला हो जाता है ?
दिनेश शर्मा : देखिये वो सांप्रदायिक आधार पर ही सत्ता में आते हैं, तुष्टिकरण और जातिवाद उनके दो हथियार हैं जिनका प्रयोग वो चुनाव के आने से पहले भी करते हैं और चुनाव के बाद जब सत्ता में आते हैं तब भी करते हैं । ये खतरनाक हथियार हैं ... समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी जातिवाद का जहर फैलाती है उससे ना केवल हमारा प्रदेश कमजोर होता है बल्कि जो राजनीतिक शुचिता है वो भी समाप्त होने लगती है
वासिंद्र मिश्र- एक और नया विवाद शुरू हुआ है लव जेहाद का..संघ और संघ से जुड़े जितने ऑर्गेनाइजेशन हैं, अरसे से इस पर बहस करते रहे हैं लेकिन अब जब केंद्र में आपकी सरकार बनने के बाद इस पर चल रही और आक्रामक हो गई है ... इसका क्या कारण है..क्या इससे पहले लव जेहाद का शिकार हुए लोग डर की वजह से अपनी जबान नहीं खोलते थे और अब उनको कहीं न कहीं ये उम्मीद दिख रही है कि केंद्र में हमारी सरकार है और अब जुबान खोलने पर हमें प्रताड़ित नहीं किया जाएगा ?
दिनेश शर्मा- देखिए..प्यार और स्नेह के बंधन में कोई निर्णय..व्यावहारिक निर्णय लेना एक सहज प्रक्रिया हो सकती है..इसमें जाति और धर्म के बंधन टूटते हैं..और कहीं-कहीं ये भी देखा गया है कि उसमें कोई प्रतिक्रिया भी नहीं होती है.. लेकिन अगर इसे एक सतत प्रक्रिया बना लें और वर्ग विशेष के खिलाफ एक अभियान के तौर पर चलाया जाए, जोर ज़बरदस्ती किया जाए । महिलाओं के साथ दुष्कर्म करने के बाद उसकी फिल्म बनाकर, प्रदर्शित करके, उसे ब्लैकमेल करके, उसके घर वालों को ब्लैकमेल करके, जबरन उनका धर्म परिवर्तन किया जाए उसको अपने साथ में रखने के लिए मजबूर किया जाए..तो इस प्रक्रिया का विरोध स्वाभाविक है । ये प्रतिक्रिया किसी दल की तरफ से नहीं होती बल्कि लोग करते हैं .. जनमानस खड़ा हो जाता है .. और जब बड़े स्तर पर प्रतिक्रिया होती है..तो लोग कहते हैं ये बीजेपी का षडयंत्र है.. ये आरएसएस का षडयंत्र है.... लेकिन मैं आपको बता दूं कि बीजेपी और आरएसएस ने ये सब चीजें नहीं कराई है.... इन दिनों तारा शाहदेव का मामला आ रहा है ... सहारनपुर, मुज़फ्फरनगर और अलीगढ़ से भी ऐसे वाकये आ रहे हैं .. क्यों हो रहा है ऐसा .. क्योंकि एक षडयंत्र के तहत इस प्रक्रिया को कई लोग संचालित करते हैं.. चाहे वो किसी धर्म के हों..अगर किसी धर्म विशेष के लोगों द्वारा ये किया गया और उसपर आपत्ति हो रही है तो उसपर दूसरे लोगों को भी मिलकर सहयोग करना चाहिए.. कि ऐसी प्रक्रिया जिसमें जबरन धर्म परिवर्तन. कराया जा रहा हो ....ना तो हिंदू धर्म इसका समर्थन करता है और ना ही इस्लाम करता है.. जबरन धर्म परिवर्तन का किसी भी धर्म ग्रंथों में कोई उल्लेख नहीं है.. लेकिन इस तरह की प्रक्रिया होती है और सरकार की ओर से उसे प्रोटेक्ट भी किया जाता है... ये जो एक प्रक्रिया चली है खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में.. ना केवल खतरनाक है बल्कि देश को तोड़ने की प्रक्रिया है ये..ये बम और एटम बम से ज्यादा खतरनाक है..
वासिंद्र मिश्र- तो आपको लग रहा है कि इस समय जो मुहिम संघ या संघ से जुड़े हुए संगठन चला रहे हैं... इससे सामाजिक समरसता बढ़ रही है..
दिनेश शर्मा - किसी वर्ग विशेष के प्रति कहीं देशभाव जागृत नहीं किया गया है.. एक प्रक्रिया का विरोध किया गया है..कि इस प्रकार की प्रक्रिया होती है तो उससे सतर्क रहना है सबको और ये प्रक्रिया देश को तोड़ना चाहती है, ये यहां के नागरिकों में भेद पैदा करना चाहती है । अगर इसको कोई रोकने का काम करता है तो ये देशभक्ति का काम है, इसका विरोध या आलोचना का भाव नहीं है । सरकार के पास तो कानून है, इसके लिए भारतीय संविधान बनाया गया है... सरकार को चाहिए कि वो इसका प्रयोग करे, जब सरकार नहीं करती है तो सामाजिक संगठनों को बढ़कर आगे आना पड़ता है..
वासिंद्र मिश्र - डॉक्टर साहब.. मेयर की हैसियत से आपने काफी लंबे समय तक एक आंदोलन चलाया है, जो संविधान का 74वां संशोधन था जिसमें लोकल बॉडीज को रिवॉल्यूशन ऑफ पॉवर मुहैया कराने की बात कही गई थी.. लेकिन ये भी सच्चाई है कि जब कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे तब और उसके बाद जो भी सरकारें रहीं.. किसी ने भी संविधान संशोधन में लोकल बॉडीज को अधिकार दिए जाने की बात को बहुत सकारात्मक तरीके से नहीं लिया.. अब केंद्र में आपकी सरकार है..तो क्या आपको उम्मीद है कि संविधान में जो प्रदत्त अधिकार हैं, वो लोकल बॉडीज़ को मिल पाएंगे..
दिनेश शर्मा - मैं समझता हूं कि बीजेपी की सरकार के समय स्थानीय सरकारों में चुने हुए जनप्रतिनिधियों के अधिकारों को बढ़ाने की प्रक्रिया प्रारंभ हो गई थी... 18 ऐसे अधिकार हैं.. जिन्हें तत्काल प्रभाव से संविधान संशोधन के अंतर्गत...निचली इकाई, नगर निकाय , नगर पंचायत और महापौर या नगर निगम को हस्तांतरित हो जाने चाहिए थे । उत्तर प्रदेश की पिछली सरकार ने एक एफिडेविट दिया था कि नवंबर 2011 तक उन्हें इन अधिकारों को दे दिया जाए.... भारत सरकार द्वारा इसी आधार पर तमाम केंद्रीय राशि प्रदान की गई.. लेकिन आज की स्थिति ये है कि महापौर जिसको लोग नगर पिता कहते हैं..एक महापौर जिसको लॉर्ड मेयर कहते हैं.. मोस्ट ऑनरेबल मेयर कहते हैं..उस मेयर को आज कठपुतली बना कर रख दिया गया है.. .एक सरकार आती है.. फिर दूसरी आती है.. और अधिकारों को कम करती जाती है.. एक मेयर को आज एक चपरासी का भी ट्रांसफर करने का अधिकार नहीं है.. 10 लाख रुपये तक के जो खर्च होंगे वो नगर आयुक्त करेंगे.. आज जो विकास प्राधिकरण है, जो यहां के पीडब्ल्यूडी क्षेत्र के कार्य हैं, जो टूरिज्म है , जो फायर पुलिस के काम हैं....उन तमाम कार्यों को एक साथ एक अम्ब्रेला सिस्टम के अंतर्गत होना चाहिए... ये 74वां संशोधन कहता है.. और इस संशोधन के अंतर्गत जो सिटी गवर्नमेंट कॉन्सेप्ट है, स्थानीय सरकार की जो अवधारणा है.. उसको पूरा किए बगैर सरकार दिन प्रतिदिन जो महापौरों के अधिकार हैं जो स्थानीय निकायों के अधिकार हैं..उनमें कटौती करती जा रही है..
वासिंद्र मिश्र - तो क्या इसका कारण ये है कि ज्यादातर लोकल बॉडीज़ में या जो अर्बन बॉडीज़ हैं.. उसके चीफ , मेयर , चेयरमैन .. बीजेपी से जुड़े हुए हैं..और इस समय जो सरकार है वो समाजवादी पार्टी की है..
दिनेश शर्मा - देखिए.. पूरे देश की अधिकांश जगहों में बीजेपी के मेयर हैं.. जो शहरी क्षेत्रों से जीतकर आए हैं.. और उत्तर प्रदेश में 12 में से हम लोग 10 हैं.. हम 10 महापौर बीजेपी से हैं.. और दो महापौर हैं जो बीजेपी से नहीं हैं..उसमें हमारे जो कॉरपोरेटर है उनकी संख्या ज्यादा है.. और केंद्र में पिछली बार तो था कि प्रदेश में दूसरी सरकार, नगर निगम में दूसरी सरकार और केंद्र में तीसरी सरकार.. अभी सौभाग्य हमारे सामने है कि केंद्र में और स्थानीय सरकार एक सी हैं... स्थानीय निकायों के मजबूत होने के बगैर हम देश की लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को मजबूत नहीं कर सकते हैं.. अगर उसे अधिकार युक्त नहीं किया जाएगा तो जनता के द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों का औचित्य क्या है.. पहले तो यूपी में महापौर को कॉरपोरेटर चुन लेते थे ... अब हमलोग सांसद से ज्यादा वोटों से बड़े संसदीय क्षेत्र से चुनकर आते हैं.. और जो व्यक्ति लड़ने के बाद चुनाव जीतकर आता है.. तो वो जनता के प्रति जबावदेह होता है.. और सरकार का एक छोटा सा अदना सा अधिकारी उसके अंडर में काम करने के लिए रखा जाता है कि महापौर जो नगर पिता है..वो नगर में एक आईएएस अधिकारी के अधीन कमेटियों में संचालित होगा क्या..
वासिंद्र मिश्र - तो वहीं तो मैं जानना चाह रहा हूं कि क्या इस लिए हो रहा है कि उत्तर प्रदेश में जो सरकार हैं वो भारतीय जनता पार्टी विरोधी है..
दिनेश शर्मा - इस बारे में मेरा स्पष्ट मंतव्य है और मैने प्रदेश सरकार से आग्रह किया है.. कि सरकारें आती-जाती हैं.. दलों की सरकारें लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बाधित ना करे.. क्यों कि हो सकता है कभी किसी ना किसी दलों का प्रतिनिधि स्थानीय सरकारों में होता है.. इसलिए जनप्रतिनिधियों को अधिकार विहीन करना और ब्यूरोक्रैट्स को अधिकार युक्त करना.. ये प्रक्रिया ठीक नहीं है.. हमलोगों ने मुख्यमंत्री जी को, नगर विकास मंत्री जी को, राज्यपाल को और केंद्र को ज्ञापन दिया है.. और हमने आग्रह किया है कि केंद्र की तरफ से दी गई धनराशि पर सीधे स्थानीय सरकारों का नियंत्रण होना चाहिए .. और होने वालों कामों पर भी सरकार का नियंत्रण हो ..ये अच्छी चीज है.. लेकिन नियंत्रण के अलावा जो उनको अधिकार विहीन करने की प्रक्रिया है.. उनको रोका जाना चाहिए.. उदाहरण के तौर पर लखनऊ है कानपुर है.. यहां सड़क बनाने काम करता है नगर निगम.. पीडब्ल्यूडी भी सड़क बनाता है.. आवास विकास भी बनाता है.. वहीं पर विकास प्राधिकरण भी बनाता है.. जो आता है वही सड़क को खोदता है..सीवर डालने का काम जल निगम कर रहा है.. और जब सड़कें खुदती हैं और फिर ठीक नहीं की जातीं तो उसका सारा दोष नगर निगम और उसके जनप्रतिनिधियों को दिया जाता है.. जबकि जनप्रतिनिधि का उसमें कोई अधिकार ही नहीं होता है.. जल निगम को निर्देशित नहीं किया जा सकता क्योंकि वो शासन के अधीन है.. विकास प्राधिकरण को या पीडब्ल्यूडी को या आवास विकास को कह नहीं सकता.. सारी सड़कों की अवस्थापना की जिम्मेदारी नगर निगम की है.. लेकिन विडंबना देखिए कि दो प्रतिशत जो इस टाइम ड्यूटी का अंश नगर निकायों को. मिलता था उसमें से मात्रा आधा परसेंट हमको दिया जा रहा है.. बाकि विकास प्राधिकरण, आवास विकास और पीडबल्यूडी को दिया जाता है.. क्यो दिया जाता है जब नाली हम बनाएं.. खड़ंजा हम बनाएं..लाइट हम लगाएं.. पार्क की देखभाल हम करें, श्मशान को हम देखें.. तो ये पैसा दूसरे किसलिए लेंगे.. इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ा फंड नगर निकायों को मिलता था .. उसे भी बांट दिया गया ... यानी नगर निकायों का आर्थिक रूप से विकलांग करने का आदेश दे दिया गया ... 40 फीसदीजो राशि प्रदेश को देनी थी वो उन्होंने दी नहीं.. अब नगर निकाय अगर टैक्स बढ़ाते हैं जो जनता के प्रति जवाबदेह बनेंगे.. टैक्स नहीं बढ़ाते हैं तो उनको तनख्वाह देने तक के पैसे सरकार ने रोक दिए हैं.. सरकारी स्तर से कर्मचारियों के तनख्वाह बढ़ाने की घोषणा करके वाहवाही लूटी जाती है..लेकिन जो राशि उनको देनी होती है.. वो अपना शेयर भी नहीं देते.. तो ऐसी स्थिति में मैं तो समझता हूं ये अपंग करने का काम होता है..

वासिंद्र मिश्र - चलिए ये उम्मीद करते हैं कि अगली बार जब उत्तर प्रदेश में चुनाव हों तो उसमें आपकी पार्टी की सरकार बने.. तब आपकी भी समस्या दूर हो जाएगी.. बहुत-बहुत धन्यवाद.. हमारे चैनल से बात करने के लिए..