मंगलवार, 17 जून 2014

Politics of Opportunism

राजनीति में ना तो कोई दोस्त होता है ना दुश्मन .. ज़रूरत के हिसाब से रिश्ते बनते बिगड़ते रहते हैं ... अब जब एक बार फिर लगभग तीन दशक बाद देश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनी है तो क्षेत्रीय दलों में खलबली मच गई है ... ये खलबली अस्तित्व की लड़ाई से जुड़ी हुई है ... लिहाजा भारतीय जनता पार्टी के बढ़ते हुए प्रभाव को कम करने के लिए राजनीतिक ध्रुवीकरण होने लगा है ...
शुरुआत हुई है बिहार से जहां मुद्दे को आधार बनाकर राजनैतिक विरोधी जनता दल युनाइटेड और राष्ट्रीय जनता दल एक साथ आ गए हैं ... विरोधी होते हुए भी दोनों ही पार्टियां एक मुद्दे पर सहमत हैं कि बीजेपी को सत्ता में नहीं आने देना है .. लिहाजा जब नीतीश ने इस्तीफा दिया और पार्टी में टूट की खबरें आने लगीं तो मदद का हाथ बढ़ाया आरजेडी ने जो पिछले कई साल से बिहार की राजनीति में आमने सामने की लड़ाई लड़ रहे थे ...शुरुआत मुद्दा आधारित तालमेल से हुई है जो बहुत मुमकिन है कि आगामी चुनाव तक गठबंधन में बदल जाए ..
दोनों पार्टियों के तेवर देश की राजनीति में हुए बड़े बदलाव की वजह से बदले हैं ... दरअसल बीजेपी को मिली शानदार जीत ने कई राज्यों के क्षत्रपों का सूपड़ा साफ कर दिया .. लिहाजा अपने अपने राज्य में ये क्षत्रप अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए मजबूर दिखाई दे रहे हैं ... और ये हाल सिर्फ बिहार का नहीं है .. बल्कि उत्तर प्रदेश की दोनों बड़ी पार्टियों का भी यही हाल है .... बहुजन समाज पार्टी का लोकसभा से सूपड़ा साफ हो चुका है और समाजवादी पार्टी महज अपनी पारिवारिक सीट बचा पाई है .... दोनों ही पार्टियों को अपने ऐसे राजनीतिक हश्र का इल्हाम नहीं रहा होगा ... लिहाजा जब हार का स्वाद चखना पड़ा है और अस्तित्व बचाए रखने की जद्दोजहद चल रही है .. तो लगभग एक ही तरह क्राइसिस से जूझ रहे राजनीतिक दलों में आपसी सौहार्द बढ़ रहा है ....
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार मायावती के परिवार के खिलाफ किसी भी तरह की कार्रवाई से बच रही है .. मायावती के करीबी रिश्तेदारों का कारोबार विवादों के बाद भी निर्बाध चल रहा है ... बल्कि उनके कारोबार में इज़ाफा होता जा रहा है ... नोएडा प्राधिकरण में मायावती के करीबी यादव सिंह की बहाली भी इसी आापसी सौहार्द के तहत उठाया गया एक कदम है ... ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के चेयरमैन और सीईओ रमारमण भी मायावती के कार्यकाल से लेकर अभी अपने पद पर बने हुए हैं और इनके खिलाफ जांच ठंढ़े बस्ते में जा चुकी है .... नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेस वे में अहम पद पर काबिज रहे मोहिंदर सिंह का नाम भी इसी लिस्ट में शामिल है जिसके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप हैं और ऐसा लगता था कि मायावती की सरकार जाने के बाद इनके खिलाफ आरोपों की जांच होगी ... लेकिन इनके खिलाफ भी मामला ठंढ़े बस्ते में डाला जा चुका है ... मुलायम सिंह यादव का ये लचीला रुख शायद भविष्य के राजनैतिक गठबंधन के विकल्प को खुला रखने की कवायद है ... यहां इस बात का ध्यान भी रखना होगा कि तमाम कड़वाहटों के बीच दोनों पार्टियों के सामने एक ही तरह का संकट है और वो है अस्तित्व की लड़ाई ... ये बात भी गौर करने लायक है कि इन दोनों पार्टियों के बीच पहले भी गठबंधन हो चुका है और उस बार भी इनका समझौता बीजेपी को सत्ता से हटाने के लिए ही हुआ था ... ये भी सच है कि इनके गठबंधन का खात्मा बड़े ही नाटकीय अंदाज़ में हुआ जब गेस्ट हाउस में समाजवादी पार्टी के समर्थकों ने 2 जून 1995 को मायावती पर हमला कर दिया था, क्योंकि मायावती ने समाजवादी पार्टी से समर्थन वापस ले लिया था और समाजवादी पार्टी की सरकार गिर गई थी... फिर मायावती बीजेपी के समर्थन से मुख्यमंत्री बन गईं ... लेकिन ये भी सच है कि बीएसपी के संस्थापक कांशीराम पहली बार मुलायम सिंह यादव के सहयोग से ही इटावा की सीट से लोकसभा पहुंचे थे ...
अभी ये बात भले ही पढने और सुनने में अजीब लग रही हो लेकिन राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं है ... इतिहास इस बात का गवाह है कि सत्ता तक पहुंचने के लिए धुर विरोधी पार्टियां भी पास आती रही हैं ... और इस बार के चुनाव का जो गणित है वो इस बात को और बल देता है .... समाजवादी पार्टी हो या फिर बहुजन समाज पार्टी इनका वोट परसेंट अच्छा रहा है .... चुनाव आयोग के आंकड़े के मुताबिक वोट परसेंटेज के लिहाज से राष्ट्रीय स्तर पर बीएसपी तीसरे और एसपी पांचवें नंबर पर रही है .. बीएसपी को 4.1 फीसदी वोट मिले हैं लेकिन सीट के मामले में बीएसपी खाली हाथ है जबकी समाजवादी पार्टी 3.4 फीसदी वोटों के साथ 5 सीटों पर कब्जा करने में कामयाब हुई है .... सिर्फ उत्तर प्रदेश की बात करें तो सीटों के मामले में भले ही बीजेपी ने सभी पार्टियों को मात दे दी हो लेकिन वोट परसेंटेज के लिहाज से एसपी और बीएसपी की स्थिति अभी भी मजबूत दिखती है .. प्रदेश में बीजेपी को कुल 42.30% वोट मिले है वहीं समाजवादी पार्टी को 22.20 %  और बीएसपी को 19.60% वोट हासिल हुए हैं ... ऐसे में अगर ये दोनों पार्टियां साथ आती हैं तो बीजेपी के लिए कड़ी चुनौती साबित हो सकती हैं .... 

यही हाल बिहार में भी है ... बिहार में आरजेडी को 4 सीटें हासिल हुई हैं तो जेडीयू को 2 सीटों पर संतोष करना पड़ा है जो बीजेपी की अकेले दम पर हासिल की गई 22 सीटों के मुकाबले काफी कम है ... लेकिन इन पार्टियों के वोट शेयर पर नज़र डालें तो बिहार में जहां बीजेपी को 29.4% वोट मिले हैं तो आरजेडी 20.1 % और जेडीयू 16% वोेट पाने में कामयाब रही है .. ऐसे में अगर बीजेपी को सत्ता से बाहर रखने के नाम पर आरजेडी और जेडीयू का गठबंधन होता है तो इनकी स्थिति काफी मजबूत हो जाएगी ..  

ऐसे में ये इनकी सियासी मजबूरी भी है कि आपसी सौहार्द बनाए रखें ताकि अपने अपने दलों का राजनीतिक भविष्य सुरक्षित रख सकें … साथ ही दूसरी ताकतवर पार्टियों को चुनौती देने की हालत में रहें ... 

3 टिप्‍पणियां:

  1. इतने सारे महत्वपूर्ण बीट्स काम करने के बाद और २७ सालों का अनुभव होने बाद भी लेख स्तरहीन है और दिए गए आंकड़े सिरे से गलत हैं- आप लिखते हैं- दरअसल चुनाव आयोग के आंकड़े के मुताबिक वोट परसेंटेज के लिहाज से बीएसपी तीसरे और एसपी चौथे नंबर पर रही है ...और सीट के मामले में बीएसपी के हाथ खाली हैं जबकि समाजवादी पार्टी की झोली में 5 सीटें आई हैं... बीएसपी को 4.1 फीसदी वोट मिला है जबकि समाजवादी पार्टी को 3.4 फीसदी वोट मिले हैं .. जनाब, समाजवादी पार्टी को 22.2 फीसदी वोट मिला हैं और बीएसपी को 19. 6 वोटे. और बीएसपी तीसरे स्थान पर नहीं बल्कि समाजवादी पार्टी तीसरे स्थान पर है. आगे आप लिखते हैं- आरजेडी को जहां इस बार 1.3 फीसदी वोट मिले हैं वहीं जेडीयू 1.1% वोट हासिल कर पाई है. जनाब आरजेडी को इस बार 21 फीसदी और जेडीयू को करीब 17 फीसदी हैं.

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    1. Dear Rajat Abhinav

      Thanks for your valuable feedback. The vote percentage mentioned by you is absolutely correct in terms of Uttar Pradesh and Bihar, but what I have mentioned in this Article is a comparison on the national level. You can check it on the site of Election Commission, I am sharing the link for your convenience.

      http://eciresults.nic.in/

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    2. Mr. Vasindra Mishra, how the readers would read and understand what you have not clearly mentioned in your article? In your article you nowhere have written that the data which are you giving is of National level. See everybody knows that SP, RJD and JDU are state level parties (except BSP), so you had to mention that these vote share are calculated on national level and not on state level for the clear understanding of the readers.
      You just summed up your article by giving jumbled up vote shares. You should have mentioned how many seats these four parties had fought on National level and then the vote share they got.
      You are saying that data given by you are of national level then how come RJD1.3 percent and JDU 1.1 percent vote share would challenge BJP in Bihar? Did you mention how many percentages of votes BJP got either on National level or state level when you are talking about states politics?
      You article is based on state politics and you are giving vote shares of states’ parties on national level which is making this article full of flaws, and it is not at all expected from a journalist, who claims that you are having 27 years of experience of Indian Journalism industry.

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