मंगलवार, 17 जून 2014

Politics of Opportunism

राजनीति में ना तो कोई दोस्त होता है ना दुश्मन .. ज़रूरत के हिसाब से रिश्ते बनते बिगड़ते रहते हैं ... अब जब एक बार फिर लगभग तीन दशक बाद देश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनी है तो क्षेत्रीय दलों में खलबली मच गई है ... ये खलबली अस्तित्व की लड़ाई से जुड़ी हुई है ... लिहाजा भारतीय जनता पार्टी के बढ़ते हुए प्रभाव को कम करने के लिए राजनीतिक ध्रुवीकरण होने लगा है ...
शुरुआत हुई है बिहार से जहां मुद्दे को आधार बनाकर राजनैतिक विरोधी जनता दल युनाइटेड और राष्ट्रीय जनता दल एक साथ आ गए हैं ... विरोधी होते हुए भी दोनों ही पार्टियां एक मुद्दे पर सहमत हैं कि बीजेपी को सत्ता में नहीं आने देना है .. लिहाजा जब नीतीश ने इस्तीफा दिया और पार्टी में टूट की खबरें आने लगीं तो मदद का हाथ बढ़ाया आरजेडी ने जो पिछले कई साल से बिहार की राजनीति में आमने सामने की लड़ाई लड़ रहे थे ...शुरुआत मुद्दा आधारित तालमेल से हुई है जो बहुत मुमकिन है कि आगामी चुनाव तक गठबंधन में बदल जाए ..
दोनों पार्टियों के तेवर देश की राजनीति में हुए बड़े बदलाव की वजह से बदले हैं ... दरअसल बीजेपी को मिली शानदार जीत ने कई राज्यों के क्षत्रपों का सूपड़ा साफ कर दिया .. लिहाजा अपने अपने राज्य में ये क्षत्रप अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए मजबूर दिखाई दे रहे हैं ... और ये हाल सिर्फ बिहार का नहीं है .. बल्कि उत्तर प्रदेश की दोनों बड़ी पार्टियों का भी यही हाल है .... बहुजन समाज पार्टी का लोकसभा से सूपड़ा साफ हो चुका है और समाजवादी पार्टी महज अपनी पारिवारिक सीट बचा पाई है .... दोनों ही पार्टियों को अपने ऐसे राजनीतिक हश्र का इल्हाम नहीं रहा होगा ... लिहाजा जब हार का स्वाद चखना पड़ा है और अस्तित्व बचाए रखने की जद्दोजहद चल रही है .. तो लगभग एक ही तरह क्राइसिस से जूझ रहे राजनीतिक दलों में आपसी सौहार्द बढ़ रहा है ....
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार मायावती के परिवार के खिलाफ किसी भी तरह की कार्रवाई से बच रही है .. मायावती के करीबी रिश्तेदारों का कारोबार विवादों के बाद भी निर्बाध चल रहा है ... बल्कि उनके कारोबार में इज़ाफा होता जा रहा है ... नोएडा प्राधिकरण में मायावती के करीबी यादव सिंह की बहाली भी इसी आापसी सौहार्द के तहत उठाया गया एक कदम है ... ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के चेयरमैन और सीईओ रमारमण भी मायावती के कार्यकाल से लेकर अभी अपने पद पर बने हुए हैं और इनके खिलाफ जांच ठंढ़े बस्ते में जा चुकी है .... नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेस वे में अहम पद पर काबिज रहे मोहिंदर सिंह का नाम भी इसी लिस्ट में शामिल है जिसके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप हैं और ऐसा लगता था कि मायावती की सरकार जाने के बाद इनके खिलाफ आरोपों की जांच होगी ... लेकिन इनके खिलाफ भी मामला ठंढ़े बस्ते में डाला जा चुका है ... मुलायम सिंह यादव का ये लचीला रुख शायद भविष्य के राजनैतिक गठबंधन के विकल्प को खुला रखने की कवायद है ... यहां इस बात का ध्यान भी रखना होगा कि तमाम कड़वाहटों के बीच दोनों पार्टियों के सामने एक ही तरह का संकट है और वो है अस्तित्व की लड़ाई ... ये बात भी गौर करने लायक है कि इन दोनों पार्टियों के बीच पहले भी गठबंधन हो चुका है और उस बार भी इनका समझौता बीजेपी को सत्ता से हटाने के लिए ही हुआ था ... ये भी सच है कि इनके गठबंधन का खात्मा बड़े ही नाटकीय अंदाज़ में हुआ जब गेस्ट हाउस में समाजवादी पार्टी के समर्थकों ने 2 जून 1995 को मायावती पर हमला कर दिया था, क्योंकि मायावती ने समाजवादी पार्टी से समर्थन वापस ले लिया था और समाजवादी पार्टी की सरकार गिर गई थी... फिर मायावती बीजेपी के समर्थन से मुख्यमंत्री बन गईं ... लेकिन ये भी सच है कि बीएसपी के संस्थापक कांशीराम पहली बार मुलायम सिंह यादव के सहयोग से ही इटावा की सीट से लोकसभा पहुंचे थे ...
अभी ये बात भले ही पढने और सुनने में अजीब लग रही हो लेकिन राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं है ... इतिहास इस बात का गवाह है कि सत्ता तक पहुंचने के लिए धुर विरोधी पार्टियां भी पास आती रही हैं ... और इस बार के चुनाव का जो गणित है वो इस बात को और बल देता है .... समाजवादी पार्टी हो या फिर बहुजन समाज पार्टी इनका वोट परसेंट अच्छा रहा है .... चुनाव आयोग के आंकड़े के मुताबिक वोट परसेंटेज के लिहाज से राष्ट्रीय स्तर पर बीएसपी तीसरे और एसपी पांचवें नंबर पर रही है .. बीएसपी को 4.1 फीसदी वोट मिले हैं लेकिन सीट के मामले में बीएसपी खाली हाथ है जबकी समाजवादी पार्टी 3.4 फीसदी वोटों के साथ 5 सीटों पर कब्जा करने में कामयाब हुई है .... सिर्फ उत्तर प्रदेश की बात करें तो सीटों के मामले में भले ही बीजेपी ने सभी पार्टियों को मात दे दी हो लेकिन वोट परसेंटेज के लिहाज से एसपी और बीएसपी की स्थिति अभी भी मजबूत दिखती है .. प्रदेश में बीजेपी को कुल 42.30% वोट मिले है वहीं समाजवादी पार्टी को 22.20 %  और बीएसपी को 19.60% वोट हासिल हुए हैं ... ऐसे में अगर ये दोनों पार्टियां साथ आती हैं तो बीजेपी के लिए कड़ी चुनौती साबित हो सकती हैं .... 

यही हाल बिहार में भी है ... बिहार में आरजेडी को 4 सीटें हासिल हुई हैं तो जेडीयू को 2 सीटों पर संतोष करना पड़ा है जो बीजेपी की अकेले दम पर हासिल की गई 22 सीटों के मुकाबले काफी कम है ... लेकिन इन पार्टियों के वोट शेयर पर नज़र डालें तो बिहार में जहां बीजेपी को 29.4% वोट मिले हैं तो आरजेडी 20.1 % और जेडीयू 16% वोेट पाने में कामयाब रही है .. ऐसे में अगर बीजेपी को सत्ता से बाहर रखने के नाम पर आरजेडी और जेडीयू का गठबंधन होता है तो इनकी स्थिति काफी मजबूत हो जाएगी ..  

ऐसे में ये इनकी सियासी मजबूरी भी है कि आपसी सौहार्द बनाए रखें ताकि अपने अपने दलों का राजनीतिक भविष्य सुरक्षित रख सकें … साथ ही दूसरी ताकतवर पार्टियों को चुनौती देने की हालत में रहें ... 

रविवार, 15 जून 2014

'कानून' पर मोदी का ज़ीरो टॉलरेंस

क्या कानूनों की जटिलता विकास की रफ्तार को धीमी कर देती है? क्या प्रक्रियाओं की उलझन में तरक्की के एजेंडे धरे के धरे रह जाते हैं? दरअसल बीते 10 सालों का राजनीतिक अतीत ये बताता है कि किस तरह देश में पिछली सरकार ने कानून तो कई लागू किए, लेकिन उनसे बजाय सहूलियत मुश्किलें और बढ़ती चली गईं। लिहाजा अब नई सरकार पिछली गलतियों से सबक लेने को तैयार है, जिसके संकेत अभी से मिलने शुरु हो गए हैं।
खबरें ये आ रही है कि शायद मोदी सरकार बहुत जल्द भूमि अधिग्रहण कानून से Social Impact Assessment को बंद कर सकती है। इसके तहत अधिग्रहण के पहले ये देखा जाता है कि इससे वहां के रहने वाले लोगों, उनके पीने के पानी की व्यवस्था और पूजा स्थल पर क्या असर पड़ता है।
दरअसल भूमि अधिग्रहण को लेकर देश भर के अलग अलग हिस्सों में मचे बवाल के बाद 2013 में यूपीए की सरकार ने कानून में कई बदलाव कर दिए थे। जो नया कानून बना उसके तहत ये ज़रूरी कर दिया गया कि ज़मीन अधिग्रहण के एवज़ में प्रभावित होने वाले 80 फीसदी लोगों की मंजूरी होनी चाहिए। इस कानून के बाद ज़मीन अधिग्रहण के मामले काफी कम हो गए, क्योंकि पूरी प्रक्रिया आसान नहीं रही। लिहाज़ा विकास की रफ्तार भी धीमी पड़ गई।
अब एनडीए की सरकार को ये अहसास हो रहा है कि अगर इसी तरह कानूनों का जाल बिछा रहा तो विकास को तेज़ रफ्तार देना मुमकिन नहीं होगा। लिहाजा कोशिश की जा रही है कि कानून में ज़रूरी बदलाव किए जाएं ताकि इंडस्ट्रीज़ को भी आसानी हो और ज़मीन मालिक को भी नुकसान ना हो। हालांकि इस मामले में बीजेपी अपने पुराने रुख से पलटती नजर आ रही है। बीजेपी ने विपक्ष में रहने के दौरान नए नए कानूनों की मांग करने से कभी भी परहेज नहीं किया। भ्रष्टाचार रोकने के लिए लोकपाल की मांग होती रही जबकि पहले से ही करप्शन के खिलाफ कई कानून मौजूद हैं। लेकिन अब जबकि बीजेपी सत्ता में है शायद उसे ये अहसास होने लगा है कि विपक्ष में बैठकर सवाल उठाना और बात है जबकि सत्ता में बैठक सरकार चलाना और बात। लिहाजा बीजेपी का रूख बदला है और पीएम नरेन्द्र मोदी इस बदलाव के अगुवा बने हैं।
दरअसल नई सरकार को ये बात अच्छी तरह पता चल चुकी है कि यूपीए के कार्यकाल में जो पॉलिसी
पैरालिसिस रहा है उसकी वजह कानूनों का जाल है जो पूरी प्रक्रिया को सुस्त कर देता है। लिहाजा मोदी सरकार की ओर से वो तमाम उपाय किए जा रहे हैं जिससे विकास की प्रक्रिया बाधित ना हो। इसीलिए एक ओर जहां सिंगल विंडो सिस्टम बनाए जाने की बात हो रही है तो वहीं एक्जीक्यूशन लेवल पर सरकार की भागीदारी बढ़ाने की भी बात हो रही है। इसी कोशिश में प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग ग्रुप को ये काम दिया गया है कि, वो ना केवल योजनाओं को क्लीयरेंस दिलाए, बल्कि ये भी देखे कि निर्धारित वक्त में इंडस्ट्री ने काम शुरु किया है या नहीं।
मोदी ने विकास को लेकर जीरो टॉलरेंस के रुख की झलक सत्ता संभालने के साथ ही देनी शुरु कर दी थी। सचिव स्तर के अधिकारियों के साथ हुई मोदी की बैठक में उन्होने सचिवों से ना केवल बेफिक्र होकर काम करने की छूट दी, बल्कि महज 24 घंटे के नोटिस पर उनसे सीधे मुलाकात का रास्ता भी खोल दिया। इतना ही नहीं अधिकारी खुलकर काम कर सके इसके लिए एंटी करप्शन लॉ में भी बदलाव की तैयारी चल रही है।
दरअसल किसी भी देश के समग्र विकास के लिए जरूरी है कि हर वर्ग के लिए सोची समझी रणनीति के साथ अहम बदलाव करते हुए समय के साथ फैसले किए जाएं। लेकिन ये तभी मुमकिन है जब इसके लिए ना केवल जरूरी साधन हों बल्कि प्रक्रिया भी आसान हो। बिना इसके विकास की रफ्तार कुंद पड़ जाती है। यहां प्रक्रिया का मतलब लालफीताशाही से है, और कानूनों से भी। वक्त के साथ कानून बदले जाने जरूरी है, लेकिन सियासी उतार चढ़ाव के हिसाब से बदले गए कानून किसी के हित में नहीं होते। अच्छी बात ये है कि नई सरकार ने शुरू में ही इस बात को समझ लिया है, और खालिस विकास के एजेंडे पर चलना शुरू किया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि ये कोशिश आने वाले दिनों में देश के लिए अच्छे दिनों की बुनियाद साबित होगी।

शुक्रवार, 13 जून 2014

विकास का मोदी मैकेनिज़्म

विकास की सुस्त रफ्तार की सबसे बड़ी वजह है परियोजनाओं का लम्बे वक्त तक अटकना और उनके क्लीयरेंस में ज्यादा वक्त लगना...लाखों करोड़ की परियोजनाएं मौजूदा वक्त में सिर्फ इसलिए ठंडे बस्ते में पड़ी हैं क्योंकि इन्हें या तो क्लीयरेंस नहीं मिला या फिर नौकरशाही और सियासत के चक्रव्यूह में ये लम्बी खिंचती चली गई.....मनमोहन सरकार ने प्रोजेक्ट्स की क्लीयरेंस के लिए प्रोजक्ट मॉनिटरिंग ग्रुप का गठन किया था जिसकी वजह से परियोजनाओं के लिए जरूरी क्लीयरेंस में रफ्तार तो आई लेकिन उनपर काम शुरु हुआ या नहीं सरकार के पास इसे चेक करने का कोई मैकेनिज़्म नहीं था ... अब मोदी सरकार ने पीएमजी यानि प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग ग्रुप को ही इस बात की जिम्मेदारी दे दी है कि PMG ना सिर्फ परियोजनाओं को क्लीयरेंस दें बल्कि इस पर भी नज़र रखें कि उन पर तय सीमा के अंदर काम शुरु हुआ या नहीं ... यानि केंद्र सरकार अब परियोजनाओं की सीधी निगरानी करने जा रही है...और इसके लिए बकायदा मैकेनिज्म विकसित किया जा रहा है...अब सभी लम्बित प्रोजेक्ट्स की डीटेल ऑनलाइन होगी और प्रोजेक्ट्स से जुड़े आवेदन इंटरनेट पर ट्रैक किए जा सकेंगे..
प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग ग्रुप दरअसल पिछली सरकार के दौरान जून 2013 में ही बनाया गया था ताकि क्लीयरेंस मिलने में देरी की वजह से विकास की रफ्तार सुस्त ना हो सके ... और तब से अब तक लगभग पांच लाख करोड़ की लागत वाली 151 परियोजनाओं को क्लीयरेंस दिया जा चुका है....हालांकि अभी भी 11 लाख करोड़ के 162 प्रोजेक्टस् लटके पड़े हैं जिनमें से 42 फीसदी परियोजनाएं पर्यावरण से जुड़ी हैं... इसकी एक वजह ये भी है कि क्लीयरेंस के लिए सबसे ज्यादा मामले पर्यावरण विभाग के पास ही आते हैं ...
परियोजनाओं को फास्ट ट्रैक क्लीयरेंस देने के लिए जब पीएमजी का गठन किया गया था तब शुरु शुरु में इसके अन्तर्गत 62 प्रोजेक्ट्स थे जो अब बढ़कर 438 तक पहुंच चुके हैं..जिनकी कुल लागत 21 लाख करोड़ की है...परियोजनाओं के क्लीयरेंस में तेजी के चलते उद्योगपतियों को भरोसा बढ़ा है लिहाजा योजनाओं की लागत भी बढ़ी है...
परियोजनाओं पर काम शुरु हुआ या नहीं इस पर सरकार पहले डिपार्टमेंट ऑफ फाइनेंशियल सर्विस के जरिए निगरानी रखती थी लेकिन अब ये काम भी प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग ग्रुप के पास ही है .. और पीएमजी ने इसके लिए एक खास मैकेनिज्म भी विकसित किया है... अब पूरे प्रकिया को ऑनलाइन डाला जा रहा है ... यानि निवेश के लिए तैयार इंडस्ट्री हो या फिर, क्लीयरेंस के लिए जिम्मेदार विभाग , सब एक साथ ही पूरी प्रक्रिया से जुड़े होंगे और सबको पता होगा कि परियोजना किस स्तर पर रुकी है या उसमें कहां काम किया जाना है ... इतना ही नहीं हर स्तर पर क्लीयरेंस के लिए एक समय सीमा भी तय कर दी गई है जिसके अंदर किसी भी प्रोजेक्ट को संबंधित विभाग को क्लीयरेंस देना ही होगा ...
इस सुविधा की शुरुआत पर्यावरण मंत्रालय से की गई है और धीरे धीरे इसे बाकी मंत्रालयों में भी लागू कर दिया जाएगा .. PMG का गठन केंद्र की सरकार ने जून 2013 में किया था ताकि केंद्रीय योजनाओं में तेजी आए लेकिन धीरे धीरे राज्य भी इससे जुड़ते जा रहे हैं … PMG 1 हज़ार करोड़ से ज्यादा रुपयों के निवेश वाली परियोजनाओं के लिए जिम्मेदार होती है लेकिन राज्यों में कई योजनाएं इससे कम पूंजी निवेश की होती हैं … और ऐसी योजनाओं केलिए राज्य सरकारें PMG के साथ मिलकर मैकेनिज्म विकसित कर रही हैं … ताकि राज्यों में भी 100 से लेकर 1000 करोड़ तक की परियोजनाओं को आसानी से क्लीयरेंस मिल सके और इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता हो.. …
पारदर्शिता से मतलब पूरी प्रक्रिया में सबको पता हो कि कहां दिक्कतें आ रही हैं और उसका कैसे निदान किया जा सके … इसके लिए प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग ग्रुप में 12 सब ग्रुप बनाए गए हैं … इनके चेयरमैन अनिल स्वरूप हैं … ये ग्रुप एक तय दिन पर बैठक करता है जिसमें निवेशक, संबंधित मंत्रालय के सब ग्रुप का प्रतिनिधि, चेयरमैन अनिल स्वरूप और प्रोजेक्ट को स्पॉन्सर करने वाला ग्रुप शामिल होता है …. और इस मीटिंग की पूरी अपडेट पोर्टल पर डाली जाती है...जाहिर है ये एक बेहतर कोशिश है और इससे निवेश का माहौल बेहतर होता है...लेकिन इसमें राज्यों की भूमिका भी अहम है...राज्यों का पक्ष सुनने के लिए पीएमजी के अधिकारी हर सोमवार और शुक्रवार को राज्यों में जा रहे हैं...फिलहाल पांच राज्यों में ये व्यवस्था शुरु हो चुकी है.. और आने वाले एक महीने में 5 और राज्य भी इस व्यवस्था को अपनाने जा रहे हैं ...
पीएमजी के कामकाज को लेकर कई राज्यों से अच्छी प्रतिक्रिया मिली है ...इन राज्यों के अधिकारी भी बढ़ चढ़कर इसमें सहयोग कर रहे हैं....राज्यों के अधिकारी भी समझने लगे हैं कि निवेश से उन्हें भी फायदा है...दरअसल ये एक बेहतर शुरुआत है पहले से बनी संस्थाओं के बेहतर इस्तेमाल की...पीएमजी भी उन्ही में से एक है...जिसने निगरानी सिस्टम का दायरा और भी ज्यादा बढ़ाया है....जाहिर है अगर इस नए मैकेनिज्म का हिस्सा सभी राज्य और सभी विभाग बनते हैं तो यकीनन ना केवल परियोजनाओं की रफ्तार बढ़ेगी...बल्कि उद्योग जगत में भी भरोसा बढ़ेगा

कर्ज़ माफी किस कीमत पर !

बैंकिंग सेक्टर में किसानों के लिए सरकारों की कर्ज माफी योजना के खिलाफ माहौल बन रहा है, डूब सकने वाले कर्ज से जूझ रहे बैंक किसानों के लिए सरकार की कर्ज माफी योजनाओं का रास्ता कानूनी रूप से बंद करवाने पर विचार कर रहे हैं । कर्ज माफी का हालिया मामला आंध्र प्रदेश की सरकार की तरफ से लिया गया है । आंध्र प्रदेश की तेलुगु देशम पार्टी की सरकार ने सत्ता में आते ही किसानों को दिए गए 54 हज़ार करोड़ रुपए की कर्ज माफी का ऐलान किया है । चंद्रबाबू नायडू ने दरअसल अपनी चुनावी रैलियों के दौरान कर्ज माफी का ऐलान किया था.. हालांकि तमाम बैंक इसके खिलाफ थे और उन्होंने वित्त मंत्री तक से इस मामले में हस्तक्षेप की अपील की थी, लेकिन चुनावी वादे के मुताबिक तेलुगु देशम पार्टी की सरकार ने किसानों को दिया गया कर्ज माफ कर दिया है ।
हालांकि तेलुगुदेशम पार्टी की सरकार के इस फैसले से प्रदेश की माली हालत पर असर पड़ना तय माना जा रहा है, और सरकार के इस कदम के खिलाफ बैंक भी कानूनी लड़ाई लड़ने का मन बना रहे हैं। जाहिर है अगर ऐसा होता है तो पहली बार ऐसा होगा कि बैंक और सरकार आमने सामने होंगे।
बैंकर्स किसानों की कर्ज माफी की योजना से सहमत नहीं हैं । बैंकर्स मानते हैं कि इससे ना सिर्फ लोन ना चुकाने की आदत को बढ़ावा मिलता है बल्कि फाइनेंशियल सेक्टर की हालत भी खराब होती है । ऐसे में बैंकर्स कई सुझाव भी देते हैं मसलन हर तरह के कृषि कर्ज़ का अनिवार्य बीमा कर दिया जाना चाहिए , ताकि भविष्य में दी जाने वाली कर्ज माफी से बचाव मिल सके । बैंक अपनी तरफ से स्कीम भी चलाते हैं जिसके तहत शॉर्ट टर्म लोन को लॉन्ग टर्म लोन में बदल दिया जाता है ताकि इसे चुकाने में किसानों को दिक्कत ना हो। बैंकिंग सेक्टर के लोग ये भी मानते हैं कि फाइनेंशियल सपोर्ट इस तरह का दिया जाना चाहिए जिससे किसानों की उत्पादकता बढ़े ।
भारत की एक बड़ी आबादी किसान है और किसानों के लिए लोकलुभावन योजनाओं का ऐलान कर सत्ता हासिल करने का फॉर्मूला कई पार्टियां अपनाती रही हैं । हालांकि उनके इस फॉर्मूले को पूरा करने की असल कीमत आम आदमी ही चुकाता है । ऐसे में सवाल उठने लाजिमी हैं कि इस तरह की योजनाएं कहां तक जायज़ हैं?
देश में चुनावों के दौरान किसानों को कर्ज़ माफी के ऐलान के साथ सत्ता की सीढ़ी चढने का फॉर्मूला पुराना हो चुका है। इसकी शुरुआत वी पी सिंह ने ही कर दी थी जब वो कांग्रेस के खिलाफ माहौल बनाकर चुनावी मैदान में आए थे। युनाइटेड फ्रंट की सरकार बनने पर पीएम का पद संभालने के बाद वी पी सिंह ने किसानों के कर्ज माफी के लिए तकरीबन 10 हज़ार करोड़ का पैकेज दिया था। किसानों का कर्ज माफ हो गया लेकिन इसका नुकसान उठाना पड़ा, फाइनेंशियल और बैंकिंग सेक्टर को, नतीजा ये हुआ कि कई सहकारी बैंक बंद ही हो गए।
उत्तर प्रदेश में भी समाजवादी पार्टी किसानों की कर्ज माफी का ऐलान कर सत्ता पा चुकी है। अखिलेश सरकार ने सत्ता में आने के कुछ दिनों बाद किसानों का लगभग 1650 करोड़ रुपए का कर्ज़ माफ कर दिया था।
यहां ये समझना ज़रूरी है जब किसानों का कर्ज माफ किया जाता है तो वो रकम सरकार बैंक को देती है और सरकार की तरफ से दी जाने वाली रकम सरकारी खज़ाने का होता है जो टैक्सपेयर अपनी जेब से देते हैं। ये पैसा विकास और बिजली, सड़क, पानी जैसी आधारभूत सुविधाओं के लिए होता है। ऐसे में सरकार अगर कर्ज माफ करती है तो परोक्ष रूप से आम आदमी पर ही इसका असर होता है। साथ ही साथ सरकारी ख़ज़ाना भी खाली होता है। ऐसे में पार्टी भले ही फायदे में रहे लेकिन फाइनेंशियल सेक्टर, बैंकिंग सेक्टर और आम आदमी को इसकी कीमत चुकानी होती है।
देश की वित्तीय हालत पहले से ही चिंताजनक है । देश का Public Debt यानि केंद्र सरकार पर
कर्ज़, जीडीपी का लगभग 67.59 फीसदी है वहीं जीडीपी का 5.2 फीसदी बजट डेफिसिट है । भारतीय बैंकों का NPA यानि नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स भी बढ़ता जा रहा है । पब्लिक सेक्टर के बैंकों का NPA लगभग 2 लाख करोड़ तक पहुंच चुका है। जिसे लेकर बैंकर्स अक्सर चिंता भी जाहिर करते रहे हैं। बहुत मुमकिन है कि जुलाई के पहले हफ्ते में आने वाले केंद्रीय बजट में नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स भी एक मुद्दा रहे।
ऐसे में सवाल ये कि क्या देश की वित्तीय हालत को देखते हुए केंद्र या राज्य़ सरकारों की तरफ से लिए जाने वाले कर्ज़ माफी के ऐसे फैसले कहां तक जायज़ हैं ? जबकि इसके लिए बैंकिंग सेक्टर की तरफ से सुझाई गई योजनाओं पर भी अमल किया जा सकता है । सियासी दलों ने अपने वादे पूरा करने की कीमत सरकारी ख़ज़ाने से चुकाई है । ऐसे में सवाल ये उठता है कि इससे देश के वित्तीय ढ़ांचे को हो रहे नुकसान के बारे में क्यों नहीं सोचा जाता ?... टैक्सपेयर्स का पैसा अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए लुटा देना कहां तक जायज़ है?

गुरुवार, 12 जून 2014

MCI में भ्रष्टाचार जड़ से खत्म करूंगा : डॉ हर्षवर्धन

वासिंद्र मिश्र - डॉ. हर्षवर्धन देश का जो सबसे महत्वपूर्ण विभाग है हेल्थ... वो कभी भी प्रायोरिटी सेक्टर में नहीं रहा चाहे कोई भी सरकार रही हो...आप किस तरह से हेल्थ को प्रयोरिटी सेक्टर में लाने की कोशिश करेंगे ?
डॉ. हर्षवर्धन- देखिए काम करके ही हेल्थ को प्रायोरिटी सेक्टर में लाया जा सकता है और मैं समझता हूं कि स्वास्थ्य और शिक्षा नरेंद्र मोदी जी की बड़ी प्रायोरिटीज में से हैं... मैं ये समझता हूं कि ये मेरा सौभाग्य है कि उन्होंने मुझे इस योग्य समझा की मैं देश की स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर करने की जिम्मेदारी संभालूं..और मुझे पूरा विश्वास है कि देश के सभी स्वास्थ्य मंत्रियों के साथ मिलकर ..अपने स्वास्थ्य विभाग की पूरी टीम और स्वयंसेवी संस्थाओं को साथ लेकर हम स्वास्थ्य को एक बड़ा जन आंदोलन बनाएंगे ..ये मेरा कमिटमेंट है..
वासिंद्र मिश्र - नब्बे के दशक में देश में एक नई अर्थव्यवस्था आई थी... अलग अलग क्षेत्रों में प्राइवेट सेक्टर का हस्तक्षेप बढ़ा ... देखा जाए प्राइवेट सेक्टर के जरिए हेल्थ और एजुकेशन के क्षेत्र में जितना exploitation हुआ, उतना किसी सेक्टर में नहीं हुआ..हम कह सकते हैं कि आम आदमी के हेल्थ को प्राइवेट सेक्टर और प्राइवेट कंपनियों ने जैसे पैसा छापने का एक जरिया बना लिया..तो ये जो गंभीर समस्या बन गई है पूरे देश की तो इस समस्या से आप किस तरह निपटेंगे ?
डॉ. हर्षवर्धन- देखिए... प्राइवेट सेक्टर में भी बहुत से ऐसे लोग हैं जो ईमानदारी से और कर्तव्यविष्ठ होकर काम कर रहे हैं... हां इसमें भी कोई शक नहीं है कि बहुत सारे लोग प्राइवेट संस्थानों पर या कई अन्य जगहों पर Exploit भी कर रहे हैं... मैं कई साल से मेडिकल काउंसिल से अपील करता रहता हूं कि MCI को अपने प्रोफेशन के लोगों को ऑडिट करने का, उनके अंदर अगर कोई ब्लैकशीप है ..तो उनको सज़ा देने का एक मैकेनिज्म डेवलप करना पड़ेगा । मुझे लगता है कि बड़ी संख्या में डॉक्टर ईमानदारी से अच्छा काम कर रहे हैं...अच्छा काम करना चाहते हैं । देश के लिए समाज के लिए..उनकी अच्छी भावना है । जब मैंने 1994 में स्वास्थ्य मंत्री के रुप में पोलियो उन्मूलन का अभियान शुरु किया तो सरकारी हों या प्राइवेट, सभी डॉक्टर्स को हमने सबको इन्वॉल्व किया..और इतना बडा़ अभियान खड़ा कर दिया.. कि बडे़-बड़े अस्पतालों के प्रोफेसर और सीनियर कंसलटेंट्स ने सड़कों पर उतर कर पोलियो उन्मूलन अभियान को सपोर्ट किया..मुझे लगता है कि जब स्वास्थ्य को बड़ा आंदोलन बनाना है..तो जिसका जितना सहयोग चाहिए उसे प्रेम से, उनकी हौसला अफज़ाई कर उनका सहयोग लेकर आगे बढ़ना होगा ... जो लोग गलत काम कर गए हैं ... उनके ऊपर भी मैकेनिज्म डेवलप करना पड़ेगा..
वासिंद्र मिश्र - डॉ साहब ये सच हे कि ...आपके नेतृत्व में बहुत ही शानदार काम हुआ ..और देश में शायद इतनी कामयाब और कोई योजना नही रही होगी...जितनी की पोलियो उन्मूलन की रही..कमोबेश उसी तरह की एक महामारी..का रुप धारण कर चुका है इंसेफ्लाइटिस ..इसकी जद में पूरा पूर्वांचल, पूर्वी बिहार से लगे हुए जिले आ चुके हैं ... उस दिशा में ना तो किसी एजेंसी का ध्यान जा रहा है ..और ना ही कोई सरकार इसपर ध्यान दे रही है ... चुनाव के दौरान सभी राजनीतिक दल और नेता इंसेफ्लाइटिस की बात करते हैं.... चुनाव जब खत्म हो जाता है तो बात वहीं की वहीं रह जाती है ...आपके पास क्या एक्शन प्लान है ..इस बीमारी से निपटने के लिए ?
डॉ. हर्षवर्धन- देखिए, एक डॉक्टर होने के नाते तो मुझे इंसेफ्लाइटिस के बारे में ये पता था कि ये बीमारी
है....किताबों में पढ़ता रहा हूं लेकिन जब इलेक्शन के दौरान कैंपेन करने पूर्वांचल गया तब मुझे इसकी गंभीरता का पहली बार अहसास हुआ... स्वास्थ्य मंत्रालय की जिम्मेदारी संभालने के बाद ..एक हफ्ते में मैंने जितनी मीटिंग की सबमें मैंने इसके बारे में बहुत गहराई से बात की... ये एक ऐसा विषय है जिसे बहुत गंभीरता से लेना है... .पिछले 3-4 दिनों में मुजफ्फरपुर और उसके आसपास के जिलो में 44 बच्चों की मौतें... हमने इसके लिए एक मीटिंग बुलाई थी, जिसमें वहां के स्वास्थ्य सचिवों, सांसदों को बुलायाऔर अपने राष्ट्रीय स्तर के अधिकारी भी इसमें शामिल हुए थे ....इसके साथ-साथ रिसर्च से जुड़े लोगों को बुलाकर भी विस्तार से मीटिंग की है... और उसके बाद मुझे लगता है कि सब प्रभावित जिलों में पल्स पोलियों की तर्ज पर टीकाकरण की जरूरत है .. इसके साथ साथ जरूरत है कि गोरखपुर मेडिकल कॉलेज के लिए 100 वेंटीलेटर हो, ..जिससे बच्चों के लिए आईसीयू हों, उन इलाकों में जिला अस्पतालों में इसके लिए स्पेशलाइज्ड वार्ड हों ...सर्विलांस की सुविधा हो जैसे पोलियो के लिए पूरे देश में बनाए गए हैं ... मैं इस महीने के अंदर अमेरिका के सेंटर फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेन्शन के अधिकारियों से भी मिलने वाला हूं... इनके साथ भी चर्चा करने वाला हूं...बिहार में पोलियो, स्माल पॉक्स जैसी कई और बीमारियों के इरेडिकेशन से जुड़े हुए बच्चों के डॉक्टर जैकब जॉन को बिहार भेजा हुआ है... कुल मिलाकर हमने इंसेफ्लाइटिस के इरेडिकेशन की कोशिशें तेज कर दी है, जल्दी ही गोरखपुर के लिए वेंटीलेटर वगैरह लाने का काम शुरु हो जाएगा... हमारी कोशिश है कि पुणे की नेशनल वायरोलॉजी लैब की तर्ज पर गोरखपुर मेडिकल कॉलेज और बिहार के तीन-चार मेडिकल कॉलेज में भी लैब बनाए जाएं
वासिंद्र मिश्र - डॉ, साहब सबसे बड़ी समस्या प्लानिंग की नहीं है.. दिक्कत ये है कि प्लानिंग के हिसाब से काम नहीं हो पाता ... दो सरकारों के बीच में तालमेल का अभाव दिखता है.... कई बार देखा गया है कि केंद्र सरकार की तरफ से जो भी शुरुआत की गई उसे पूरा करने में राज्य सरकार ने वह फुर्ती नहीं दिखाई या ये कहें कि जो उनका नज़रिया होना चाहिए था वो नहीं रहा ... इस बार आप क्या उम्मीद करते हैं ?
डॉ हर्षवर्धन--देखिए मुझे खुद पर पूरा विश्वास है कि चाहे कोई भी स्वास्थ्य मंत्री रहे ... कोई भी स्वास्थ्य अधिकारी हो मैं उसके साथ पूरा तालमेल बना सकता हूं ..मैं स्वयं मॉनिटर करुंगा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में देशभर में किसी भी तरह कि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष मैं अपने व्यवहार आचरण और अपने अधिकारियों के काम से किसी भी तरह की राजनीति नहीं आने दूंगा... मुझे पूरा विश्वास है कि राज्यों में जो स्वास्थ्य मंत्री हैं उनकी भी पूरी इच्छा होगी कि उनके राज्य में लोग स्वस्थ रहें ... उनके साथ विस्तार से बातचीत करेंगे..
वासिंद्र मिश्र - डॉक्टर साहब ये बहुत अच्छा इनिशिएटिव है कि हेल्थ को राजनीति से अलग रखना चाहिए, लेकिन हेल्थ सेक्टप में सबसे बड़ा रोल क्वालिटी एज्यूकेशन का होता है ..अगर आप डॉक्टर तैनात भी कर रहे हैं और अगर उसे समझ नहीं है वो सही डायग्नोसिस नहीं कर पाता .. अगर वो डिग्री खरीदकर लाया है तो वो किस तरह का इलाज करेगा ... आप अच्छी तरह समझ सकते हैं, मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया पिछले लगभग10 साल से लगभग चर्चा में है... जो उसके मुखिया रहे हैं वो घूस लेने के आरोप में कई महीने तक जेल में भी रहे.. कहा जाता है कि कानूनी कारणों से वो MCI से अलग रहते हुए भी अपना दखल रखते हैं .. MCI पर काबिज लोग उन्हीं के हैं .. और वो अपने ढंग से देश के मेडिकल कॉलेजों को कंट्रोल कर रहे हैं, इससे पहले आरोप लगते रहे हैं कि पहले के दो स्वास्थ्य मंत्री भी MCI के कुछ चुनिंदा अधिकारियों के दवाब में रहे हैं ... आप क्वालिटी एज्यूकेशन और क्वालिटी कंट्रोल के लिए बनाई गई इस संस्था की वर्किंग में कैसे सुधार लाएंगे ?
डॉ हर्षवर्धन- देखिए, मै दो बातें आपको कहूंगा कि मैं आपकी इस बात से सहमत हूं मेडिकल कॉउंसिल ऑफ इंडिया कि जो जिम्मेदारी रही है मेडिकल एज्यूकेशन को निष्पक्षता से स्वच्छ रखना, पारदर्शी रखना, अपग्रेड करके जनता के भले के लिए काम करना, शायद उस जिम्मेदारी को वो बखूबी निभा नहीं पाई, और पिछले अनेक वर्षों में ये भ्रष्टाचार के बड़े केंद्र के रुप में इसकी समाज में एक प्रकार से प्रतिष्ठा गिरी है, लेकिन एक बात मैं आपको विश्वास के साथ कह सकता हूं कि मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के अंदर जितनी भी गड़बड़ियां हो रही हैं उनको जड़ से समाप्त करने की इच्छा शक्ति मैं रखता हूं, और मुझे पूरा विश्वास है कि इसमें मुझे पूरे मेडिकल प्रोफेशनल्स का साथ मिलने वाला है ...मुझे हमारे नेतृत्व का भी साथ मिलने वाला है और हम इसमें किसी तरह की कोताही नहीं करेंगे ... मेडिकल एज्यूकेशन के मसले पर देश में जो भी गड़बड़ियां हो रही हैं ... पोस्ट ग्रेजूएशन के लिए प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में कैपिटेशन फीस ली जा रही है.. इस पर हम गंभीरता से काम करेंगे ... मैं इसके अंदर अपने प्रधानमंत्री जी से भी सहयोग लूंगा, अपने कैबिनेट के सहयोगियों से भी मदद लूंगा और सबके सहयोग से देश में मेडिकल शिक्षा का स्तर बेहतर करूंगा
वासिंद्र मिश्र - डॉक्टर साहब, थोड़ी सी राजनीति की बात हो जाए..दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी ने आपको एक फेस के रुप में प्रोजेक्ट किया था चुनाव में और पार्टी को काफी उससे फायदा भी मिला, और ये भी सच्चाई है कि दिल्ली में बीजेपी जिस तरह से डिवाइडेट हाउस थी, उस डिवाइडेट हाउस को अगर किसी सबल और सशक्त नेतृत्व दिया तो डॉक्टर हर्षवर्धन ने दिया, अब डॉक्टर हर्षवर्धन दिल्ली की राजनीति से केंद्र की राजनीति में हैं, और माना जा रहा है कि दिल्ली में जब भी विधानसभा का चुनाव होगा, तो ऐसी स्थिति पूरे देश के साथ साथ आपकी सरकार और आपकी पार्टी से दिल्ली की जनता भी काफी उम्मीदें रखती है ... ऐसी स्थिति में आप दिल्ली में अपने विकल्प के रुप में किसे मानते हैं ?
डॉ हर्षवर्धन- देखिए, इन विषयों हमारी पार्टी में पार्टी के वरिष्ठ लोग तय करते हैं, उनका बहुत अनुभव है, बहुत वर्षों से वो ये सब काम कर रहे हैं, तो इस संदर्भ में मैं अपना कोई भी विचार रखूं ये ऊचित नहीं होगा, मुझसे मेरा ओपिनियन मांगा जाएगा, मैं जरुर दूंगा, लेकिन डॉक्टर हर्षवर्धन के बारे में तो डॉक्टर हर्षवर्धन ने कभी कोई फैसला किया नहीं , और बिना मांगे हम सलाह आराम से देते भी नहीं हैं, लेकिन ये है कि पार्टी के जो बड़े हमारे नेता हैं, उनकी योग्यता, उनका अनुभव, उनकी दृष्टि, उनकी सोच, उनकी योजना पर हम लोगों को भरोसा है, वो जो भी पार्टी के लिए फैसला करेंगे, वो हमारी पार्टी के सभी कार्यकर्ता उसको मानकर उसके उपर आगे बढ़ेंगे
वासिंद्र मिश्र - आपके बारे में तो ये भी चर्चा रहती है कि दिल्ली के बारे में जब फैसला होना था..आपको उस फैसले की जानकारी लगभग डेढ़ दो साल पहले से थी, लेकिन आपने अपनी तरफ से उसको सार्वजनिक नहीं किया, हम ये जानना चाह रहे हैं कि जिस तरह से पिछले कुछ दिनों से अचानक दिल्ली की जनता बिजली, पानी जैसे मुद्दों को लेकर अपना धैर्य खो रही है तरह तरह की प्रॉब्लम अचानक सामने आ रही है...
डॉ हर्षवर्धन-इसमें कोई शक की बात नहीं है कि दिल्ली की जनता को एक चुनी हुई सरकार नहीं होने से बहुत तकलीफ हो रही है, अरविंद केजरीवाल जी से बहुत उम्मीदें थीं, उन्होंने भले ही गलत तरीके से सरकार बनाई , उसी भ्रष्ट कांग्रेस के साथ मिलकर बनाई जिसका विरोध करते थे, लेकिन उस 49 दिन में भी कुछ गहराई और गंभीरता से काम करते दिल्ली के लिए कुछ तो योजनाओं पर काम करते , कुछ दिशा देते, कुछ करते, लेकिन ना तो उन 49 दिन उन्होंने कोई भी काम किया गंभीरता से, सिर्फ प्रर्दशन, संविधान का अपमान करने में वो लगे रहे, और फिर 49 दिन के बाद भी झूठा बहाना बनाकर वो छोड़कर चले गए, तो निश्चित रुप से दिल्ली के लोगों को तकलीफ है, 15 साल के उन्होंने कुशासन से मुक्ति पाई, लेकिन जो है उसके बावजूद भी उनको एक सही मायने में सरकार मिली नहीं है, और अब लेफ्टिनेंट गवर्नर साहब और सरकारी अधिकारी हैं, उनके भरोसे दिल्ली की व्यवस्था चल रही है, उसमें परेशानियां निश्चित तौर पर पिछले दिनों आंधी-तूफान के कारण आई हैं, बिजली की कमी के कारण लोगों को बहुत तकलीफें हो रही हैं.., जो लेफ्टिनेंट गवर्नर साहब से हमारी आए दिन बात होती है वो यही कहते है कि कुछ ट्रांसमिशन लाइन खराब हो गई हैं, तो उनको ठीक करने में कुछ समय लग रहा है, स्वाभाविक है कि दिल्ली की जनता के लिए तकलीफ का विषय है, चुनी हुई सरकार दिल्ली को मिलेगी, वो दिल्ली के बेहतरी के लिए होगा,
वासिंद्र मिश्र - -डॉक्टर साहब आपकी नजर में इसका निदान क्या है... फिर जोड़-तोड़ करके सरकार बनाना, या दिल्ली विधानसभा को भंग कर एक बार फिर जनादेश के लिए जाना ?
डॉ हर्षवर्धन-अगर आप मेरी राय जानना चाहते हैं तो मैंने 8 दिसंबर को सार्वजनिक तौर पर कहा था जब चुनाव के नतीजे आए थे, उस समय भी मैने यही कहा था कि किसी भी जोड़-तोड़ से गलत तरीके से सरकार बनाने के पक्ष में हम नहीं हैं, अगर उस तरीके से हमारी पार्टी को सरकार बनानी होती, तो हमने 8 दिसंबर को ही बना ली होती, हमें विधानसभा में आकर शपथ लेने में कोई दिक्कत नहीं थी और हमें समर्थन देने वाले भी शायद बाद में बहुत लोग तैयार हो जाते, लेकिन वो तरीका जो है मैं उसको स्वच्छ राजनीति ना मानता हूं, और ना ही मुझको लगता है कि उस तरीके को अपनाने की आवश्यकता है, जो जनता के बीच में दोबारा जाकर और सरकार चुनी जाए, जनता का आशीर्वाद लिया जाए, शायद यही एक विकल्प अब दिल्ली वालों के लिए बाकी है
वासिंद्र मिश्र - बहुत-बहुत धन्यवाद डॉक्टर साहब