बुधवार, 7 मई 2014

सत्ता का हैंगओवर

देश में लोकसभा चुनाव आखिरी चरण में है...पूरे देश में आचार संहिता लागू है और अगले नौ दिनों में नई सरकार की तस्वीर साफ होने वाली है...लेकिन इन सबके बीच अभी भी कांग्रेस के नेताओं के सिर से सत्ता का हैंगओवर उतरने का नाम नहीं ले रहा...सुशील शिंदे से लेकर कपिल सिब्बल तक कई केन्द्रीय मंत्री जिस तरह की बयानबाजी कर रहे हैं उससे लगता ही नहीं कि देश में आम चुनाव हो रहे हैं...अब सवाल ये कि क्या कांग्रेस निश्चिंत हो चुकी है कि अगली सत्ता भी उसी की होगी...या फिर ये सबकुछ किसी रणनीति के तहत हो रहा है...
मौजूदा सरकार जिसका अधिकार नई सरकार बनने तक है लेकिन उसके सर पर इस कदर सत्ता का हैंगओवर है कि मौजूदा सरकार के कई मंत्री विवादास्पद नीतिगत मामलों में दखल देने से नहीं चूक रहे....ये सही है कि नई सरकार के गठन तक पुरानी सरकार को फैसले लेने का अधिकार होता है...फिर भी इस दौरान डिफेंस, फाइनेंस और आंतरिक सुरक्षा जैसे मसलों को छोड़कर बाकी मसलों पर बड़े फैसले नहीं किए जाते रहे हैं...ये परम्परा पहले से रही है...अब सवाल ये कि ऐसे में क्या कारण है कि कपिल सिब्बल और सुशील शिंदे जैसे नेता नीतिगत मामलों पर बयानबाजी करने से बाज नहीं आ रहे ?
अब सवाल ये कि पार्टी के वो नेता जो बीते 10 साल से कुम्भकर्णी नींद में सोए हुए थे...वो अब अचानक से जाग गए हैं...ऐसे में जबकि नई सरकार के गठन में कुछ ही वक्त बचा है...आखिर क्यों नीतिगत फैसलों को लेने की जल्दबाजी दिखाई जा रही है ... फिर चाहे स्पेशल सीबीआई डायरेक्टर के पद पर नियुक्ति का मामला हो...जिसके लिए आनन-फानन में बैठकों का दौर चला और कांग्रेस विरोधियों के निशाने पर रही, या फिर नए सेनाध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर विवाद रहा हो...यूपीए-2 की सरकार आखिरी वक्त में जाते जाते इसे भी लेकर सक्रिय दिखी...रक्षा मंत्रालय की तरफ से लेफ्टिनेंट जनरल दलबीर सिंह सुहाग का नाम आगे कर दिया गया....जिस पर अभी चुनाव आयोग का फैसला लम्बित है.... सरकार ने लोकपाल के गठन को लेकर भी जल्दबाजी दिखाई हालांकि सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर होने की वजह से इस पर फैसला नहीं हो सका... सरकार ने भी कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए कदम वापस खींच लिए...

एक कहावत है कि रस्सी जल गई लेकिन ऐंठन नहीं गई....ये कहावत सिब्बल, शिंदे, और चिदंबरम के तौर तरीकों पर साफ दिखती है...कि अभी भी इन लोगों के सिर से सत्ता का हैंगओवर उतरा नहीं है लिहाजा चुनाव होते होते वो अहम पदों पर नियुक्तियां कर लेना चाहते हैं.... दरअसल हकीकत तो ये है कि दस साल तक सरकार में महत्वपूर्ण विभागों में बैठे ये मंत्री, खासतौर पर चिदंबरम और एंटनी, जब आम चुनाव लड़ने की बारी आई तो अपनी ही जनता से पीठ दिखाकर भाग गए...अब ये इनके अंदर का डर नहीं तो और क्या है कि ये अपनी ही संसदीय क्षेत्र की जनता से रूबरू नहीं हो पाए...ये वो नेता हैं जो तमाम अहम मसलों के लिए ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स में शामिल रहे हैं...तो सवाल उठते हैं कि ऐसे अहम पदों पर रहने के बाद आखिर क्या कारण है कि इनमें जनता से रूबरू होने की हिम्मत नहीं है...बीते सालों में ज्यादातर ये नेता एसी कमरों में बैठकर लिप सर्विस करते रहे...और अब जबकि कार्यकाल में महज कुछ दिन बचे हैं खुद को अतिसक्रिय दिखाकर ये क्या हासिल करना चाहते हैं ये बड़ा सवाल है...

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