मंगलवार, 13 मई 2014

कांग्रेस की कसक !

देश अब 16 मई का इंतज़ार कर रहा है जिस दिन जनादेश सबके सामने होगा ... 16 मई को ये भी साफ हो जाएगा कि आने वाले दिनों में देश की कमान किसके हाथ होगी ... जनता अपना आदेश सुना चुकी है और एक्जिट पोल भी सामने आ चुका है .... अब रिजल्ट आने की बारी है ... और जैसे तैयारी के आधार पर स्टूडेंट को पता होता है कि रिजल्ट कैसा हो सकता है वैसे ही सियासी पार्टियों को भी उनका परिणाम पता है ... एक खेमे में जीत को लेकर तैयारी की जा रही है तो दूसरा खेमा हार की जिम्मेदारी तय करने में लगा है ... एक्जिट पोल कहता है कि कांग्रेस को इस बार मायूसी हाथ लगने वाली है ... ऐसे में एक्जिट पोल को सही मानें तो कांग्रेस के सामने सवाल ये है कि आखिर क्या हैं इस जनादेश की वजहें, कहां चूकी है कांग्रेस और उससे भी बड़ी बात ये है कि आखिर इस हार की जिम्मेदारी किसकी होगी ?
चुनाव के नतीजे आने में महज कुछ घंटों का वक्त बचा है और चरम पर पहुंच चुकी सियासी गहमागहमी के बीच बीजेपी ने नतीजे आने से पहले ही खुद को विनर मान लिया है तो कांग्रेस के खेमे में मायूसी है .. असल में कांग्रेस की इस मायूसी के पीछे वजह है महंगाई और भ्रष्टाचार को लेकर बना देशभर में वो माहौल जिसका ट्रेलर बीते साल के विधानसभा चुनावों में दिख चुका है और जिसके पूरे पिक्चर के डर ने कांग्रेस पार्टी के नेताओं की नींदे उड़ा दी हैं....कांग्रेस लगभग मान चुकी है कि नतीजे माकूल नहीं होंगे...लिहाजा हार की जिम्मेदारी को लेकर मंथन भी शुरु हो गया है.... कई तरह के सवाल हैं मसलन .. क्या क्या राहुल गांधी इस हार के लिए जिम्मेदार माने जाएंगे जिनके कंधों पर प्रचार की पूरी जिम्मेदारी थी ... या फिर बीते 10 साल सरकार में रहे मंत्री जिम्मेदार माने जाएंगे जिन पर सरकार चलाने की जिम्मेदारी थी ... या फिर संगठन जिम्मेदार माना जाएगा जिसके नेताओं की बयानबाजी ने सरकार के सामने मुश्किलें खड़ी कर दीं । जनता के लिए काम करने के नाम पर कांग्रेस ने खाद्य सुरक्षा कानून दिया, मनरेगा दिया, सूचना और शिक्षा का अधिकार भी दिया....लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस के ज्यादातर नेता इन मुद्दों को प्रभावी तरीके से उठाने की बजाय सिर्फ व्यक्तिविशेष पर ही केन्द्रित रहे....मोदी विरोधी बयानों की बाढ़ आ गई...और ऐसा लगने लगा जैसे कांग्रेस के चुनावी अभियान का केन्द्र सरकार की उपलब्धियां नहीं बल्कि मोदी का विरोध भर ही है... वहीं दूसरी ओर खुद राहुल गांधी अपनी रैलियों में आरटीआई मनरेगा जैसे कानूनों की जिक्र तो करते रहे....लेकिन जनता पर प्रभाव छोड़ने में कामयाब नहीं हुए...
इसके साथ ही कांग्रेस देश में आए उस बदलाव के असर को भांपने में भी चूक गई जो देश में बीते कुछ सालों में हुए
आंदोलनों के चलते पैदा हुई थी...और इस बदलाव ने लोगों को पहली बार शिद्दत से ये सोचने को मजबूर कर दिया कि जातिगत और धार्मिक राजनीति से अलग अब उनकी बुनियादी जरूरतें क्या हैं...उन्हें नौकरी कैसे मिलेगी...उनके घर में चूल्हा कैसे जलेगा...उनकी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य कैसे सुरक्षित होगा....कांग्रेसी नेता अपनी राग में गाते रहे....जाति औऱ धर्म के नाम पर एजेंडे लाते रहे....वोट बैंक के हिसाब से रणनीतियां बनाते रहे...नतीजा ये कि जमीन नीचे से कब खिसक गई पता ही नहीं चला ... वरिष्ठ नेताओं की तरफ से बयान दिए गए ...ध्रुवीकरण की कोशिश की गई लेकिन दांव उलटा पड़ गया...अल्पसंख्यक वोट बैंक का हिस्सा पहले ही बदले माहौल में बंट चुका था....रही सही कसर अतिपिछड़े वर्ग की हलचल ने पूरी कर दी.....
चुनाव अभियान में कई बार ऐसा लगा कि कांग्रेस ये तय ही नहीं कर पा रही है कि आखिर वो किस एजेंडे पर आगे बढ़ें...कांग्रेस नेताओं का एक बड़ा तबका ऐसा रहा जो सिर्फ ऊलजूलूल बयानबाजी में लगा रहा...मोदी को सिर्फ उनके अतीत के आधार पर घेरने की कोशिश की....ये भूलकर कि मौत का सौदागर वाले जुमले ने मोदी को किसी जमाने में हिट कर दिया था....इन सबके बीच महंगाई भ्रष्टाचार से परेशान हो चुकी जनता ने जब एक बार राष्ट्रीय पार्टियों की ओर रुख किया तो क्षेत्रीय क्षत्रपों के साथ साथ कांग्रेस की ओर से वोट बैंक की सियासत को पचा नहीं पाई...रही सही कसर जाते जाते सरकार के अहम पदों पर काबिज वरिष्ठ नेताओं ने पूरी कर दी...जिनमें अपने चहेतों को अहम पदों पर बिठाने की ललक थी...
कुल मिलाकर कांग्रेस इस चुनाव में पूरी तरह कन्फ्यूज नजर आई...रणनीति से लेकर चुनाव प्रचार तक के मोर्चे पर...और तो और कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता और मंत्रियों ने तो लड़ाई से पहले ही हथियार डाल दिए...इन सबके बीच कांग्रेस के सेनापति अकेले पड़ गए और बिखरा चुनावी अभियान चूर चूर हो गया...

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