मंगलवार, 6 मई 2014

'रामराज्य' और राजनीति

राजनीति में हर मुद्दे अपने समय से उठाए जाते हैं ....लिहाजा नरेंद्र मोदी जब फैज़ाबाद पहुंचे तो उन्होंने राम का नाम लिया .... मोदी जानते हैं कि राम देश की अस्मिता से जुड़े हैं और देश के डीएनए में हैं .... गांधी, लोहिया, राजीव गांधी हो या मोदी सबने समय-समय पर राम का नाम लिया है...इसीलिए ये बात अब साफ है कि फैज़ाबाद में जाना है,, तो वहां राम का नाम लेना ही है। मैनीफेस्टो में भी बीजेपी ने कहा है, कि अगर वो सत्ता में आते हैं, तो संविधान के दायरे में रहते हुए राम मंदिर का समाधान करेंगे...

मोदी की रैली के जो ऑर्गनाइजर हैं, उन्हें पता है, किस जिले में मंच पर किसकी तस्वीर लगानी है... मोदी की चुनाव प्रबंधन की टीम राजनीतिक समीकरण, क्षेत्रीय महत्व को ध्यान में रखते हुए, इमोशनल इश्यूज़ को ध्यान में रखते हुए, जनता को लुभाने की कोशिश करती है... और चुनावी प्रंबधन में मोदी की टीम काफी आगे दिखती है ...
दूसरे मोदी की वाकपटुता इस प्रबंधन को दूसरे लेवल पर ले जाती है ... अटल जी के बाद मोदी में ही ये कला दिख रही है और शायद इसी के रिजल्ट के रूप में लोगों में चुनाव को लेकर क्रेज़ नज़र आ रहा है ... जो कभी इंदिरा के वक्त में हुआ करता था ...
परिणाम चाहे जो हो, मोदी ने जो आकर्षण पैदा किया है,, गांधी परिवार के करीबियों की बोलती जिस तरह से बंद कर दी है, वो वाकई काबिलेतारीफ़ है... इस तरह की आक्रामकता इंदिरा के समय दिखती थी.. बहुत समय बाद समाज का हर वर्ग चुनाव पर चर्चा कर रहा है... मतदान केन्द्रों पर लंबी भीड़ दिख रही है और ऐसा बहुत समय बाद दिख रहा है, इसका क्रेडिट नरेन्द्र मोदी को दिया जाना चाहिए, उन्हीं के आकर्षण से ये हो रहा है...

मोदी बखूबी जानते हैं कि कौन सी जगह पर किस मुद्दे को हवा देनी है और उनके चुनाव प्रबंधन की टीम को ये पता है कि इस हवा को आंधी कैसे बनाना है .. लिहाजा बहुत सोच समझ कर फैज़ाबाद में राम के नाम का जिक्र आया ... अभी तक मोदी इससे बचते रहे थे लेकिन राम की धरती पर जाकर मोदी ने अपने भाषण में बार-बार राम का नाम लिया ... दरअसल भारत की संस्कृति में राम का नाम रचा बसा है .... चाहे दक्षिण हो या उत्तर ... पूरब हो या पश्चिम .. देश के हर कोने में राम के उपासक मिल जाएंगे ... ये भी कह सकते हैं कि देश के कोने कोने को भारतीय संस्कृति में रचा बसा राम का नाम हिंदू धर्म के मानने वालों को जोड़ता है .... जिस नाम से देश की बहुत बड़ी आबादी जुड़ी हुई है ... उस नाम से देश की सियासत कैसे अछूती रह सकती है ... वो भी तब-जब देश में आम चुनाव हों ... ये पहला आम चुनाव नहीं है जब सियासतदानों को राम की याद आई हो ....
आधुनिक समाज के सांप्रदायिक, धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी विचारधारा की राजनीति करने वाले लोग अपने-अपने ढंग से राम के नाम का इस्तेमाल करते रहे हैं...
गांधी जी भी राम को अपना आदर्श मानते थे ... उनके ज्यादातर कार्यक्रमों की शुरुआत.. रघुपति राघव राजा राम.. से होती थी ... वो भी रामराज्य की बात करते थे और उनके रामराज्य में स्वराज और सर्वोदय की बात होती थी..
राम के दर्शन का इस्तेमाल समाजवादी डॉ राम मनोहर लोहिया ने भी किया... उन्होंने ही रामायण मेले के आयोजन की शुरुआत की .... लोहिया ने राम को समाज में गैर बराबरी मिटाने वाले नायक के रूप में देखा...
कांग्रेस ने भी समय-समय पर राम के नाम का सहारा लिया ... उराजीव गांधी ने 1989 में आम चुनाव के अभियान की शुरुआत अयोध्या से की... राजीव ने भी रामराज्य स्थापित करने को ही अपना चुनावी नारा बनाया... हालांकि उस वक्त देश की जनता ने राजीव गांधी के रामराज्य की परिकल्पना को खारिज कर दिया और कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा...
जब भी चुनाव आए, देश की राजनीतिक पार्टियां रामराज्य की बात अपने अपने तरीके से करती रहीं... चाहे वो अटल बिहारी वाजपेयी हों या लालकृष्ण आडवाणी.. सबने सुराज और स्वराज की बात की और रामराज्य का सपना दिखाया... अब एक बार फिर नरेंद्र मोदी उसी रामराज्य की बात कर रहे हैं ...
अब इन नेताओं का रामराज्य कैसा होगा... क्या इस रामराज्य की परिभाषा तुलसीदास के रामराज्य की परिकल्पना के करीब होगी.. क्या इस रामराज्य में आपसी प्रेम और सदभाव बढ़ाने के साथ साथ गैरबराबरी को खत्म करने और समाज के हर तबके को शारीरिक, मानसिक और भौतिक तकलीफों से मुक्ति दिलाने की बात होगी जैसा कि तुलसीदास ने इस चौपाई में कहा है ....
'सब नर करहि परस्पर प्रीति, चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति-नीति..
चारिऊ चरन धर्म जग माही। पूरि रहा सपनेहुँ दुःख नाही'

और...
'फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन। रहहिं एक संग गज पंचानन
खग-मृग सहज बयरु बिसराई, सबन्हि परस्पर प्रीति बढाई'

यानी एक ऐसे राज्य की कल्पना जहां हाथी, शेर और हिरण एक दूसरे के साथ प्यार से रहते हैं ... सभी आपसी दूरियां मिटाकर एक साथ प्रेम और सहयोग के साथ जीते हैं ....
... हमारे नेता अगर रामराज्य की बात करते हैं तो क्या ऐसे आदर्श राज्य की स्थापना के लिए वो तैयार हैं ...

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