मंगलवार, 27 मई 2014

Modi Nawaz Meet : Well beginning is Half Done ?

बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पहला दिन बेहद खास माना जा सकता है .. मोदी ने अपने शपथ ग्रहण में सार्क देशों के प्रतिनिधियों को न्योता देकर पड़ोसी मुल्कों से रिश्तों को लेकर जो गंभीरता दिखाई थी उस पर आज वो एक कदम आगे बढ़ते दिखे ... उन्होंने ना सिर्फ मेहमान बनकर आए प्रतिनिधियों से मुलाकात की बल्कि संबंधित राष्ट्राध्यक्षों से उन मसलों पर भी बात की जो भारत के पड़ोसी मुल्कों से रिश्ते को लेकर अहम हैं ...
नरेंद्र मोदी ने अपने इस कदम को लेकर संकेत तभी दे दिए थे जब उन्होंने शपथ ग्रहण में सार्क देशों के राष्ट्राध्यक्षों को न्योता दिया था ... राष्ट्राध्यक्षों से मुलाकात के दौरान मोदी ने एक एक कर उन सभी मसलों को छुआ जो पड़ोसी मुल्कों के साथ रिश्तों में दुखती रग बना हुआ है ... मोदी ने इस बात के भी संकेत दिए कि वो पड़ोसियों से अच्छे रिश्ते रखना चाहते हैं लेकिन राष्ट्र हित उनके लिए सर्वोपरि है ..

श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे से मुलाकात के दौरान नरेंद्र मोदी ने तमिलों का मसला उठाया .. मोदी ने राजपक्षे से श्रीलंका में तमिलों के पुनर्वास की प्रक्रिया को तेज करने, उन्हें समानता, न्याय, सम्मान की जिंदगी देने और शांति को बढ़ावा देने की बात की तो वहीं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ से आतंकवाद के खिलाफ कड़े रुख की मांग की तो 26/11 के जांच की प्रक्रिया तेज़ करने और दोषियों को कड़ी सज़ा दिए जाने की भी मांग की ...

इसके बाद नवाज़ शरीफ का रवैया भी काबिले तारीफ है ... उन्होंने जिस तरह से मीडिया को संबोधित करते वक्त एक साथ दोनों मुल्कों की अवाम की बात की, दोनों मुल्कों के aspiration और approach की बात की उससे एक सकारात्मक रवैया झलकता है ...

ऐसे में ये कहा जा सकता है कि नरेंद्र मोदी का पहला diplomatic exposure कामयाब रहा है ... diplomacy की सबसे बड़ी खासियत यही है कि वो सामने वाले से अपनी शर्तों और अपने एजेंडे के मुताबिक बात करे, अपने intention और अपने interest को ऊपर रखकर बात करे ... और मौजूदा वक्त में दोनों देशों के हालात को देखते हुए ये कहा जा सकता है कि इस मामले में नरेंद्र मोदी और नवाज़ शरीफ दोनों ही कामयाब हुए हैं ... कहा जाता है well beginning is half done .. तो डिप्लोमैटिक रिश्तों को लेकर मोदी ने पहले ही दिन आधी कामयाबी हासिल कर ली है

नवाज़ शरीफ ने अपनी मीडिया ब्रीफिंग में लाहौर डिक्लेरेशन का जिक्र भी किया ... Lahore Declaration 1999 में दोनों मुल्कों के बीच हुए द्विपक्षीय समझौते को कहा जाता है ... जिसमें परस्पर सहयोग की बात की गई थी जिसमें परमाणु हथियारों के अनाधिकृत और आकस्मिक इस्तेमाल  पर रोक, कश्मीर जैसे पारंपरिक और गैर पारंपरिक मसलों का हल करने ...1972 के शिमला समझौते को प्रतिबद्धता से लागू करने, आतंकवाद का मुकाबला करने, मानवाधिकार की रक्षा करने और एक दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप ना करने जैसे मसलों पर जोर दिया गया था .. दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली को लेकर ये एक सकारात्मक कदम था लेकिन करगिल युद्ध हो जाने के बाद सद्भाव की ये कोशिश फेल हो गई ..

हालांकि अब हालात काफी बदल चुके हैं ... दोनों देशों की अवाम की लगभग एक जैसी समस्या है ... सरहद पार भी लोग आतंकवाद, गरीबी, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं .. भारत के साथ साथ पाकिस्तान में भी लोगों का अपनी सरकार और पॉलिटिकल सिस्टम पर भरोसे में कमी आई है ..  दोनों देशों की अवाम ऐसे मसायल का हल चाहती है .. ऐसे में दोनों ही मुल्कों के हुक्मरानों के लिए ये ज़रूरी हो गया है कि वो सकारात्मक मुद्दों को लेकर आगे बढ़ें .. peace, prosperity, co-operation और hope की बात करें ... ताकि अपनी अवाम का भरोसा हासिल कर सकें ...

अपनी अवाम के बदले मूड को भांपते हुए पाकिस्तान की तरफ से भी मोदी की इस पहल को सकारात्मक तरीके से लिया गया है ... दोनों मुल्कों के बीच अविश्वास खत्म करने को लेकर एक आमराय बनी है .. एक बार फिर सचिव स्तरीय वार्ता शुरु होने जा रही है ... और इसका फायदा दोनों मुल्कों की अवाम को मिल सकता है...

शुक्रवार, 23 मई 2014

मोदी का मिशन वर्ल्ड !

नरेंद्र मोदी की शख्सियत से अब पूरा देश वाकिफ हो चुका है ... मोदी विदेशी मीडिया में भी छा चुके हैं और भारत में हुए सत्ता परिवर्तन पर दुनिया भर की नज़रें टिकी हुई हैं .... ना सिर्फ देश के लोग दुनिया के अलग अलग मुल्क भी भारत के अगले कदम को लेकर कयास लगा रहे हैं ... ऐसे में मोदी ने भी अभी से पड़ोसी मुल्कों से संबंधों को लेकर अपनी रणनीति साफ करनी शुरु कर दी है ... शपथ ग्रहण समारोह में SAARC देशों के नेताओं को निमंत्रण भेजना भी इसी रणनीति का हिस्सा है ... 26 मई को शाम 6 बजे जब नरेंद्र मोदी जब प्रधानमंत्री पद की शपथ लेंगे तब वहां सार्क देशों के प्रतिनिधि भी नज़र आएंगे ... ये महज़ एक नई परंपरा की शुरुआत नहीं है बल्कि ये शपथ ग्रहण के बहाने नए रिश्तों के शुरुआत की कवायद है ... पाकिस्तान, चीन, बंगलादेश, भूटान, श्रीलंका और मालदीव जैसे देशों को आमंत्रित करने के पीछे मोदी का नजरिया बिल्कुल साफ है...मोदी ये संदेश देना चाहते हैं कि वो पड़ोसियों से बेहतर रिश्तों की शुरुआत करेंगे...
देश में धाक जमाने के बाद अब मोदी की नजर दुनिया के उन गिने-चुने कामयाब नेताओं की फेहरिस्त में शामिल होने की है....जिन्होंने अपनी कुशलता और नेतृत्व क्षमता के जरिए दुनिया भर के लिए एक मिसाल कायम की...फिर चाहे वो पंडित नेहरू का गुटनिरपेक्ष आंदोलन की अगुआई करने का इतिहास रहा हो...इंदिरा गांधी का आयरन लेडी का व्यक्तित्व, जब उन्होंने अमेरिका की चुनौति को भी सीधा स्वीकार किया, या फिर चर्चिल और लिंकन जैसी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने वाली शख्सियतों का...मोदी की नजर अब वहां है जहां से इतिहास में सुनहरे अध्याय लिखने का दायरा शुरु होता है...
दरअसल मोदी जानते हैं कि देश को अगर विकास के रास्ते पर ले जाना है तो पड़ोसी मुल्कों के साथ बेहतर रिश्ते जरूरी है...सीमापार अगर तनाव की बजाय सद्भाव होगा तो सरकार की ऊर्जा सकारात्मक कामों में लगेगी...मोदी की महत्वाकांक्षा दरअसल देश की सीमाओं के पार जाने की है जिसकी शुरुआत वो सार्क देशों से कर रहे हैं..कुछ मामलों में मोदी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के सिद्धातों का अनुसरण भी कर रहे हैं...जिन्होने प्रधानमंत्री रहते हुए पड़ोसी देशों के साथ रिश्ते सुधारने के लिए ऐतिहासिक पहल की थी...फिर चाहे वो लाहौर तक की बसयात्रा रही हो या फिर आगरा शिखर सम्मेलन....ये और बात है कि ये दोनों कोशिशों पाकिस्तान के भीतर चल रहे आंतरिक उठापटक का शिकार हो गईं...लेकिन अटल जी की इस शुरुआत ने कहीं ना कहीं एक बेहतर रिश्तों के सिलसिले की नींव जरूर डाली थी...ये और बात है कि आगे की सरकारें इस सिलसिले को कायम नहीं रख पाईं
बात अटलजी की हो रही है तो उस दौर को भी याद करना जरूरी है जब जनता पार्टी की सरकार में अटलजी विदेश मंत्री हुआ करते थे और विदेश मंत्री रहते हुए अटलजी ने कई देशों के साथ रिश्ते बेहतर बनाने में अहम रोल अदा किया था...फिर चाहे वो वीजा नियमों में ढील देने का मामला रहा है या फिर खाड़ी देशों से रिश्ते मजबूत करने का...जिसके परिणामस्वरुप हजयात्रा में सहूलियतें बढ़ गईं थी...इसके पहले भी अटलजी ने भारत चीन युद्ध के बाद चीन से रिश्ते सुधारने की पहल की थी...
नरेन्द्र मोदी विदेश नीति के मामले में अटलजी के सिद्धांतों पर चलते हुए वैश्विक तौर पर अपनी शख्सियत की एक नई लकीर खींचना चाहते हैं...चुनावों के दौरान मोदी ने सार्वजनिक मंचों से कई बार भारत की विशाल आबादी की दलीलें रखते हुए ये सवाल उठाया है कि अगर चीन अपने मैनपावर के आधार पर विकसित देशों की कतार में खड़ा हो सकता है तो भारत क्यों नहीं...मोदी ने कई बार कमजोर विदेश नीति को लेकर भी तंज कसा है...
अब सत्ता में मोदी हैं तो यकीनन उनकी निगाह इन तमाम मसलों पर है...मोदी भारत को उस दौर में ले जाना चाहते हैं जब भारत ने शीतयुद्ध के दौर में गुटनिरपेक्ष आंदोलन का नेतृत्व किया था और दक्षिण एशिया में एक बडे नेता की भूमिका में खड़ा रहा था...तो वहीं 1971 में इंदिरा गांधी के वक्त पूर्वी पाकिस्तान को जीतने के बाद भी जियो और जीने दो की नीति पर अलग देश का निर्माण कराकर इंदिरा गांधी ने एक मिसाल दुनिया के सामने और पेश की थी...यकीनन मोदी का एजेंडा विकास के रास्ते...हिन्दुस्तान के श्रम का इस्तेमाल हिन्दुस्तान के लिए करके...दुनिया के सामने देश की प्रतिभा का लोहा मनवाने का है...जिसकी अग्रणी भूमिका में वो खुद आना चाहते हैं....ताकि मोदी का कार्यकाल सदियों के लिए एक नजीर बन जाए...मोदी की ये शुरुआत इसी का हिस्सा है

बुधवार, 21 मई 2014

बदल गया जीत का मंत्र !

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में जीत का मंत्र बदल गया है ... ये मंत्र वो नहीं है पिछले 6 दशक से ब्रह्मास्त्र की तरह काम कर रहा था ना ही ये मंत्र वो है जिसने क्षेत्रीय दलों को भी उनकी उम्मीद से ज्यादा कामयाबी दिलाई थी ... बात सिर्फ लोकसभा चुनाव के नतीजों की नहीं है .. बल्कि राज्यों में विधानसभा चुनाव के नतीजे भी ये बताते हैं कि भारत में एक नए युग की शुरुआत हो गई है

देश में एक बार फिर जनादेश ने ये साबित कर दिया है कि अब सोशल इंजीनियरिंग का फॉर्मूला पहले जैसा असरदार नहीं रहा ... ये बात भी साबित हो गई है कि लॉलीपॉप और मुफ्तखोरी के फॉर्मूलों से भी सवाल हल नहीं हो सकते ... जनता इन फॉर्मूलों को सिरे से खारिज कर रही है ... जाति संप्रदाय से ऊपर उठकर सोच रही है... विकास और पारदर्शिता को पसंद कर रही है और जो सरकारें जनता के वेलफेयर के लिए सजग हैं उन्हीं के पक्ष में वोट कर रही है ...

इस लोकसभा चुनाव के नतीजों ने भी इस बात को साबित किया है कि जनता ने विकास के वादों पर मुहर लगाया है .. लेकिन इसके साथ ही अलग अलग राज्यों में आए विधानसभा चुनावों के नतीजों से भी यही बात साबित होती है ...

उड़ीसा में बीजू जनता दल की जीत भी इसी का नतीजा है .... एक अच्छे लेखक के तौर पर भी अपनी पहचान रखने वाले नवीन पटनायक ने सिर्फ विकास की राजनीति के सहारे अपनी पार्टी को सत्ता के अर्श पर पहुंचाया है ... और विकास के मंत्र ने उन्हें लोकसभा के साथ साथ विधानसभा में भी प्रचंड बहुमत दिया और नवीन पटनायक चौथी बार उड़ीसा की सत्ता पर काबिज हुए हैं ...

लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और तमिलनाडू में जयललिता की पार्टी AIADMK को मिली ऐतिहासिक कामयाबी भी इसी बात को बल देती है कि जीत का मंत्र अब बदल चुका है ...
अब चाहे  नवीन पटनायक हों, जयललिता हों या फिर ममता बनर्जी हों ..अगर ये जनता की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे होते तो मोदी लहर में ये भी बह जाते .....एक तरफ देश में मोदी लहर ने इतिहास रचा है तो दूसरी तरफ इन राज्यों में इन नेताओं ने इतिहास बनाया है .... शायद इसीलिए क्योंकि बीजेपी ने जो समुचित विकास, और पारदर्शिता के वादे किए थे  इन राज्यों में जनता को पहले से ही वो सब कुछ हासिल हो रहा था इसीलिए जनता को किसी बदलाव की दरकार नहीं थी ...

सिक्किम भी उन राज्यों में से एक है जहां सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट की सरकार बनी है ... विधानसभा चुनावों में जीत हासिल कर पवन चामलिंग लगातार पांचवी बार मुख्यमंत्री बनकर नया इतिहास बना चुके हैं ... अपने गठन से लेकर अब तक सिक्किम में पवन चामलिंग की पार्टी सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट को कोई मात नहीं दे पाया है ... और उनकी कामयाबी की सबसे बड़ी वजह विकास और शांति व्यवस्था ही बनाए रखना ही है ...
ऐसे में सवाल ये है कि जिस मोदी की लहर के बूते बीजेपी ने ऐतिहासिक कामयाबी हासिल की उस लहर में इन राज्यों की सत्तारूढ पार्टियां क्यों नहीं बह पाईं ... क्या ये सत्तारूढ़ दल की जनता प्रति बरती गई ईमानदारी का नतीजा नहीं है

एक तरफ विकास को अपनी जीत का मंत्र बनाकर इन नेताओं और पार्टियों ने देश भर में मची उठापटक के बाद भी शानदार कामयाबी हासिल की तो दूसरी तरफ कई राज्य ऐसे  हैं जहां सत्तारूढ़ पार्टियों के पास सिवाय मंथन करने के और कुछ नहीं बचा ... ये वो पार्टियां हैं जो अपनी परंपरागत सियासत से ऊपर ना उठ पाने की वजह से अपनी साख भी नहीं बचा पाईं ...

उन राज्यों में सत्तारूढ़ पार्टियों को करारा झटका लगा है ... जहां सत्तारूढ पार्टियां समय के साथ अपनी नीतियां बदलने में नाकामयाब रही हैं ... जो इस बार भी चुनाव के मैदान में या तो कास्ट कार्ड प्ले करते रह गईं या फिर मुफ्तखोरी का मैनिफेस्टो बनाकर जीत हासिल करने की कोशिश की ...

फिर चाहे वो बिहार में नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू ही क्यों ना रही हो ... नीतीश की स्टेट्समैन बनने की कोशिशें कब खत्म हो गईं इसका अंदाजा शायद खुद नीतीश भी नहीं लगा पाए क्योंकि सेक्युलरिज्म के नाम पर बीजेपी से किनारा करने वाले नीतीश महादलितों और महापिछड़ा पंचायतों से ऊपर नहीं उठ पाए और उनके समझने से पहले उनके पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई ...

मुफ्तखोरी के मैनिफेस्टो को अपनी जीत का मंत्र बनाने वाले मुलायम सिंह यादव के साथ भी उत्तर प्रदेश में ऐसा ही हुआ ...सरकार के दो साल के बुरे परफॉर्मेंस का जवाब जनता ने लोकसभा चुनावों में दिया  ... जनता ने विकल्प के तौर बीजेपी को पसंद किया जिसने सबको साथ लेकर सबका विकास करने का वादा किया है ...
उत्तराखंड में भी कांग्रेस के पिछले दो साल के काम काज का हिसाब जनता ने उनका सूपड़ा साफ करके दिया है... बदलाव की आंधी में यहां बड़े बड़े दिग्गज भी हवा हो गए

यही हाल राजस्थान में भी हुआ जहां पहले विधानसभा से कांग्रेस के हाथ से सत्ता छिनी बाद में लोकसभा चुनावों में भी कांग्रेस को जनता ने पूरी तरह नकार दिया ......

जम्मू कश्मीर में भी सत्तारूढ़ पार्टी से जनता का मन इतना खट्टा हो चुका था कि जनता ने किसी भी सीट पर नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस के गठबंधन वाले उम्मीदवारों पर भरोसा नहीं जताया ... और प्रदेश में इस गठबंधन को अब तक की सबसे बड़ी हार का स्वाद चखना पड़ा ...

दरअसल ये नतीजे इस बात को साबित करते हैं कि देश में कई दशक से चली आ रही जाति पाति की राजनीति से जनता अब ऊब चुकी है ... और लहर उसी की है जो जनता की उम्मीदों पर खरा उतरता है ... 

रविवार, 18 मई 2014

सीधा हिसाब....

16वीं लोकसभा में जो मेंडेट सामने आया है वो कई मायनों में खास है। आजादी के बाद राजनीति में इस तरह के बदलाव पहली बार देखने मिल रहा है। लोगों ने गठबंधन की राजनीति को नकार दिया है। आजादी के बाद भारतीय राजनीति में ऐसा पहली बार हुआ है। जब किसी गैर कांग्रेसी दल को प्रचंड बहुमत मिला है। आजादी के बाद कांग्रेस लंबे समय तक बहुमत की सरकार चलाती रही, फिर गठबंधन सरकार का दौर आया। लेकिन बैसाखी पर चल रही सरकारों को अब लोगों ने नकार दिया है। 

गठबंधन की सरकार का दौर सिर्फ केन्द्र में ही नहीं, राज्यों में भी चल पड़ा था। जब सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में बीजेपी और बीएसपी की सरकार के बीच गठबंधन हुआ था। लेकिन सत्ता के लोभ में गठजोड़ टूट गया और फिर लोगों का मोह भंग होने लगा।

गठबंधन खत्म होने की शुरुआत भी यूपी से ही हुई.. 2007 में मायावती को पूर्ण बहुमत मिला, तो 2012 में अखिलेश सरकार अपने दम पर सत्ता में आई। और अब केन्द्र में एक पार्टी को पूर्ण बहुमत से देश ने साफ-साफ संदेश दे दिया है कि वे गठजोड़ की राजनीति से ऊब चुका है। 

दरअसल देश ने अलाइंस की सरकारों का दंश झेला है। किसी एक दल को बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में पहले बीजेपी ने  एनडीए बनाई। सत्ता के लिए दागियों से भी हाथ मिला लिया, फिर कांग्रेस भी बहुमत नहीं मिलने पर यूपीए बनाकर सत्ता पर काबिज हो गई। इतिहास गवाह है कि गठबंधन की वजह से कई बार मूल्यों और सिद्धांतों की बलि दी गई, सत्ता में बने रहने के लिए हर समझौते किए गए, शिबू सोरेन, सुखराम, तसलीमुद्दीन जैसे दागी नेता एनडीए और यूपीए में मंत्री तक रहे। 

पिछले 10 साल से सत्ता में रही यूपीए में तो दागियों की भरमार रही। गठबंधन के गणित में करप्शन जड़े जमाती रही। 2 जी घोटाले में DMK के ए राजा सहित कई बड़े नेताओं पर आरोप लगे लेकिन कांग्रेस मूकदर्शक बनी रही। कोयला घोटाले के आरोपी शिबू सोरेन से कांग्रेस ने परहेज नहीं किया। चारा घोटाले के दोषी लालू यादव यूपीए के साथ बने रहे।

DMK, AIADMK, INLD, अकाली दल के कई नेताओं के खिलाफ पहले से ही आर्थिक और प्रशासनिक भ्रष्टाचार के मामले देश की अलग-अलग अदालतों में लंबित हैं। ये सभी कभी ना कभी गठबंधन में शामिल रहे। सत्ता में रहने के लिए सिर्फ नीतियों से ही समझौता नहीं किया गया बल्कि देश हित को भी ताक पर रख दिया गया। हर छोटी पार्टियां अपना हित साधने में लगी रही, इतने घोटाले हुए कि देश त्राहिमाम करने लगा।
देश ने जब भी एनडीए और यूपीए से भ्रष्टाचार का हिसाब मांगा। साफ- सुथरी सरकार मांगी, तब-तब दोनों सरकारों ने गठबंधन की मजबूरियां गिना दी। 

गठजोड़ की मारी मजबूर सरकारों की वजह से देश खोखला होने लगा। आजादी के 6 दशक बाद भी देश बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसता रहा। लोगों के पास अब कोई चारा नहीं था। 2014 के इस चुनाव में लोगों ने एक मजबूत सरकार देने की ठानी। 16 मई को जब ईवीएम का लॉक खुला तो देश ने कहा दिया लो अब मेंडेंट की सरकार दे दी है, अब परफॉर्म करो। लोगों को उम्मीद है कि मिलीजुली सरकारों ने देश को जितना दर्द दिया, एक मजबूत सरकार उस दर्द को खत्म कर विकास की नई इबारत लिखेगी।

परिवार तय करेगा प्रियंका गांधी की भूमिका: कमलनाथ

वासिंद्र मिश्र: कमलनाथ जी आपने कहा कि इन चुनावों में हार परिवर्तन के परिणाम हैं....इसके पीछे और कोई कारण नहीं है...इसमें मंथन की जरूरत है...थोड़ा और बताएंगे कि परिवर्तन क्या कुशासन और भ्रष्टाचार से मुक्ति का परिवर्तन है?
कमलनाथहमारी जो उपलब्धियां थी...जो समाज विकास के हमारे कार्यक्रम थे.जो विश्व के इतिहास में किसी देश में नहीं हुए...अपने देश में भी कभी नहीं हुए...ये हम जनता को कभी समझा नहीं पाये..दूसरी चीज की परिवर्तन.. 10साल बादUPAसरकार से आम मतदाताओं को थकावट थी और ये थकावट एक कारण था जिससे परिवर्तन की लहर बनी और ऐसे परिणाम आए... 
वासिंद्र मिश्र: :कमलनाथ जी,अगर हम आपके तर्क को सच माने की जनता थक गई थी या हम अपने शब्दों में कहें ऊब चुकी थी...और दूसरा तर्क जो आप दे रहे हैं कि आप अपनी सरकार की उपलब्धियों को जनता तक नहीं पहुंचा पाये तो ये परिवर्तन की बात आप कर रहे हैं..ये तर्क बीजेपी शासित राज्यों में क्यों नहीं देखने को मिला पिछले दिनों जहां जहां चुनाव हुए...चाहे मध्यप्रदेश हो...राजस्थान हो...या उसके कुछ साल पहले जब गुजरात में चुनाव हुए वहां भी.. पिछले 10से15साल से लगातार एक ही पार्टी बीजेपी की सरकार चल रही है...और वहां तीन मुख्यमंत्री पिछले 10से 15साल से शासन कर रहे हैं..तो वहां की जनता क्यों नहीं ऊबी...उनके कामकाज से..जनता में थकावट क्यों नहीं आयी..कांग्रेस या यूपीए2की सरकार को लेकर जनता क्यों थकावट महसूस करने लगी... ?
कमलनाथ :आपने कर्नाटक,उत्तरांचल और हिमाचल की बात की..वहां बीजेपी की सरकार थी...जहां कांग्रेस की सरकार बन कर आयी । मध्यप्रदेश में10सालों में बीजेपी ने केन्द्र की योजनाओं का लाभ उठाया और राज्य सरकार की योजनाओं का रूप दिया, उसमे वो सफल हुए । अपनी बात वो पहुंचा पाये...ये अंतर था । वैसे ही गुजरात सरकार अपनी बात जनता को पहुंचा पायी...हमारी ये कमी रही...ये कमी रही..कि हम अपनी बात अपनी उप्लब्धियां..और जब भ्रष्टाचार की बात हुई तो हकीकत क्या है...सच्चाई क्या है..जिस प्रकार से हमें जनता को समझाना चाहिए था..हम समझा नहीं पाये...और यही कारण था कि ये एक लहर बनती गई...एक थकावट आयी और ये परिवर्तन आये ।
वासिंद्र मिश्र:  कमलनाथ जी,देश में आपकी सरकार थी,सभी संस्थानों पर आपका नियंत्रण था...सूचना विभाग से लेकर संचार मीडिया में भी आपलोग चाहते तो वो आपकी बात उन माध्यमों के जरिये..जनता तक पहुंचा सकती थी...बावज़ूद इसके अगर आप ये तर्क दे रहे हैं कि आप अपनी उप्लब्धियां जनता तक नहीं पहुंचा पाये तो क्या इसका आरोप आप पार्टी के मुखिया...या यूपीए की चेयरपरसन या पार्टी के जो स्टार कैंपेनर थे राहुल गांधी,उन लोगों को जिम्मेदार नहीं मानते हैं...उनके पास उस तरह की कोई प्लानिंग नहीं थी...उस तरह की प्रभावशाली वाणी नहीं थी...जिसके जरिये वे अपनी उप्लब्धियों को,अपनी सरकार की उप्लब्धियों को जनता तक पहुंचा पाये?
कमलनाथ :मैं ये मानता हूं ये सब कमियां थी...सरकार को पार्टी से अलग नहीं किया जा सकता,और पार्टी को सरकार से अलग नहीं किया जा सकता , पर हमारी सरकार का सबसे पहले कर्तव्य था,तो अगर इसमे कोई असफलता हुई तो ये पूरे सरकार की हुई...किसी एक व्यक्ति की नहीं है...ये हर विभाग की योजना थी और हर विभाग को सूचना,संचार का उपयोग करना चाहिए था...जो हो नहीं पाया । जिस प्रकार से हमें करना चाहिए था..हमने नहीं किया...क्योंकि हमारे दृष्टिकोण में हमारे नज़रिये में हमें ये एहसास हो रहा था कि जनता इसे समझ रही है,पर अब हमें बात समझ आयी है कि आम जनता हमारी उप्लब्धियों को, हमारे कार्यकर्मों को समझ नहीं पायी ,इसलिए ये परिणाम हुआ ।
वासिंद्र मिश्र:  कमलनाथ जी आप कांग्रेस के उस बुरे वक्त में भी पार्टी के साथ थे..कांग्रेस नेतृत्व के साथ थे जब इंदिरा गांधी जी अलग थलग पड़ गई थी राजनीति में...तब आपने इंदिरा जी को ताकत दी,कांग्रेस को दुबारा आप लोग सत्ता में लाए और इंदिरा जी फिर से देश की प्रधानमंत्री बनी । एक बार फिर इस समय कांग्रेस हम कह सकते हैं कि राजनीतिक तौर पर राजनीति के मानचित्र में हाशिये पर पहुंच गई है ..और इस समय फिर एक आवाज़ उठने लगी है कि जो मौजूदा नेतृत्व है,संगठन का ,वो उतना प्रभावी नहीं है ।आम जनता से उसका संपर्क नहीं है और उनके मुकाबले अगर प्रियंका गांधी को आगे लाया जाता है तो बेहतर विकल्प हो सकता है मौजूदा समय में । क्या आप इस राय के साथ हैं? आप इस तकह की कोई बातचीत करेंगे जब आत्म मंथन का वक्त आएगा और आपके साथ बाकी जो साथी हैं वो बैठकर कोई विचार विमर्श करेंगे ।आप मानते हैं नेतृत्व परिवर्तन इस समय की सबसे बड़ी आवश्यक्ता है?
कमलनाथ ये परिवर्तन की बात नहीं है,सबको मिलकर,जिसमे प्रियंका जी भी हैं, सब को मिलकर इस पर मंथन करना पड़ेगा । क्या रूप प्रियंका जी लेना चाहेंगी ये उनका परिवार तय करेगा । पर इस समय सबकी आवश्यक्ता है,राहुल जी,प्रियंका जी की आवश्यक्ता है..सोनिया गांधी जी कि आवश्यक्ता है,हर कांग्रेस कार्यकर्ता की आवश्यक्ता है ।ये आज समय की पुकार है ।अब मंथन के बाद,आत्म चिंतन के बाद इस पर जरूर विचार करेंगे ।
वासिंद्र मिश्र: इतिहास में वापस जाते हैं फिर,चूंकि आप इसके साक्षी रह चुके हैं आपातकाल के बाद जिस तरह से इंदिरा जी और उनका पूरा परिवार पूरी तरह से निराश बैठ गया था । उस स्थिति में और आज जो परिणाम देखने को मिल रहे हैं,इसमें क्या समानता हैं,आपकी नजर में?
 कमलनाथ : इसमे कोई शक नहीं कि इस परिणाम से दुख होगा,लेकिन कोई हिम्मत हारने वाला नहीं है क्योंकी गांधी परिवार कभी हिम्मत नहीं हारते । मुझे पूरा विश्वास है कि आगे आने वाले समय में गांधी परिवार का जो रोल रहा है इस बुरे समय में वही रोल रहेगा । और फिर से कांग्रेस उभर कर आएगी । संगठन में परिवर्तन होगा,संगठन में मजबूती होगी और आने वाले समय में फिर से केन्द्र में कांग्रेस की सरकार बनेगी । नारों की राजनीति जिसका प्रयोग बीजेपी ने किया ये ज्यादा समय नहीं चलता । आज उपल्ब्धियों की राजनीति है,हम देखे की पिछले10सालों में आर्थिक दृष्टि में,अपने देश की अर्थव्यवस्था में,अपने देश की क्रय शक्ति,बढ़ती हुई क्रय शक्ति,अपने देश में ग्रामीण क्षेत्रों में कितने ट्रैक्टर थे,10साल पहले,कितने 2व्हीलर थे,कितने4व्हीलर थे,हमारे किसानों को कितना भाव मिलता है,ये अगर हम बातें देखे तो ये भी एक रिकार्ड था ।
वासिंद्र मिश्र: यही बात हम आपसे समझना चाह रहे हैं, जब हमने बातचीत की शुरूआत की तब आपने माना कि अपनी उपलब्धियां आप लोग जनता तक नहीं पहुंचा पाये । तो इसके लिए कौन ज़िम्मेदार है? ये किसका काम है? नेतृत्व का काम है,जो लीड कर रहे उनका काम है । आमतौर पर राहुल गांधी के बारें में कहा जाता है कि वो कनेक्ट नहीं कर पा रहे हैं आम लोगों से । जिस आवाम को वो संबोधित करने जा रहे हैं, उनकी भाषा ना तो राहुल समझ रहे हैं और ना ही वो राहुल की भाषा समझ पा रहे हैं । राहुल गांधी की वर्किंग स्टाइल को लेकर पार्टी के तमाम वेटेरन चुनाव में शांत हो गए थे । ये कह सकते हैं कि मूक दर्शक बन कर बैठे थे । तो इसके लिए आप नेतृत्व की नाकामी नहीं मानते?राहुल गांधी की नाकामी नहीं मानते?
कमलनाथ मैं नहीं मानता कि किसी एक व्यक्ती की नाकामी है । ये अगर नाकामी है तो सबकी है,सरकार की है,कांग्रेस के पूरे संगठन की है,क्योंकी अगर हम परिणाम देंखे,देश भर में परिणाम देखें,जहां जहां कांग्रेस संगठन फेल हुआ है ये बात साफ उभर के आयी है । ये एक व्यक्ति की बात या दो व्यक्ति की बात नहीं है,मै इसे नहीं मानता ।
वासिंद्र मिश्र:  लेकिन एक बात तो सच है ना कि जिस तरीके से राहुल गांधी ने पूरा कैंपेन किया.,उसमे लग रहा था कि अकेले वहीं चुनाव लड़ रहे हैं । पार्टी के तमाम दिग्गज नेता जो10सालों तक सरकार में रहकर मलाई खाते रहे,वे दिग्गज नेता जो10साल तक पार्टी में रहकर सत्ता का सुख भोगते रहे,वे चुनाव कैंपेन के दौरान दूर दूर तक नज़र नहीं आए । इसका क्या कारण था और जो आये भी उन्होंने पार्टी के लिए मुसिबत ज्यादा पैदा की अपने गैरज़िम्मेदाराना बयानों से ।
कमलनाथ : ऐसी बात नहीं है,क्योंकि मै अपना उदाहरण लूं तो मैने अन्य जगहों पर भी प्रचार किया ।बहुत सारे कांग्रेस नेता खुद चुनाव लड़ रहे थे । चुनाव क्योंकी लगभग डेढ़ दो महिने का था,तो इस,चुनाव में लोग अपने क्षेत्र में ही फंसे रहे । तो ये कारण था कि बहुत सारे दिग्गज नेता थे जो अलग अलग जगह नहीं पहुंच पाये । वो अपने खुद के चुनाव में व्यस्त थे । पर ये बात कहना की राहुल गांधी अकेले थे और वे अकेले प्रचार कर रहे थे,ये बात सही नहीं है । ये तो स्वभाविक है कि राहुल गांधी का सबसे ज्यादा प्रचार हुआ और राहुल गांधी जी इसमें लगे रहे । लेकिन ये कहना की दिग्गज नेता दर्शक बन तक बैठे रहे,ये बात सही नहीं है ।
वासिंद्र मिश्र: कमलनाथ जी,जो कैंपेन का तरीका था,जो नज़ारा देखने को मिला देश की जनता को,उससे लग रहा है कि राहुल गांधी भी एक करह से रिमोट तरीके से जो स्पीच दी जाती है,उस तरह उनकी बातचीत का तरीका था । और बीच बीच में एंग्री यंग मैन के रूप में जो दिखते थे वो पार्टी को फायदा पहुंचाने के बजाए नुकसान ज्यादा पहुंचा गया । आपको लगता है कि राहुल गांधी की वो बॉडी लैंग्वेज और जो भाषा शैली थी उसमे सुधार और परिवर्तन की जरूरत है,आने वाले समय में?
कमलनाथ :देखिए समय समय पर अलग अलग जगह पर अलग स्टाइल होता है । क्योंकि एक ही बात अलग अगल स्टाइल से कहनी पड़ती है । पर मैं सोचता हूं कि इसमें सब सोच विचार करेंगे और कोई ना कोई निर्णय इसमे जरूर होगा । पर सबसे बड़ी चीज है कि आत्मचिंतन करें,मंथन करें कि हम कहां पिछड़ गए और अब सुधार कैसे लाया जाए ।
वासिंद्र मिश्र: एक सबसे गंभीर आरोप जो आपकी सरकार पर10सालों तक लगता रहा कि आपके सरकार के जो मुखिया थे मनमोहन सिंह,वो अमेरिका परस्त थे । उनकी नीतियां अमेरिका परस्त थी । दूसरा आरोप लगता रहा कि आप लोग नीति बनाते हैं बड़े औद्योगिक घरानों के हितों को ध्यान में रख कर । लेकिन क्या कारण था की चुनाव के दौरान जिन लोगों को कारण पूरे5साल आप पर गंभीर आरोप लगते रहे । गरीबों के हितों की उपेक्षा का आरोप लगता रहा । प्रचार के दौरान जिनके लिए आप बदनाम हुए,वो भी आपके साथ खड़े नहीं हुए और जिनके हितों की रक्षा करते हुए आपने देश के करोड़ो गरिबों के हितों की अनदेखी की वे भी आपके खिलाफ हो गए । कहां आपसे चूक हई,आपकी सरकार से और आपके सरकार की मुखिया से?
कमलनाथ : ये बात सही है कि सूचना प्रसार में हम कमज़ोर रहे । ये भी बात है कि10साल में मध्यम वर्ग को सबसे ज्यादा फायदा हुआ । हमारे सबसे कमज़ोर वर्ग को सबसे ज्यादा फायदा हुआ । पर जिस प्रकार से हमने अपनी बात पहुंचानी थी कि हमारी नीतियां हैं और ये इन नीतियों का परिणाम है, ये प्रगति और विकास है । ये पूरे देश में दिखता है कि किस प्रकार से विकास और प्रगति हुई,कहीं कम तो कहीं ज्यादा हुआ ।इन सब बातों को जनता समझ नहीं पायी । कहना कि मनमोहन सिंह जी की अमरिका की नीति थी,ये सही नहीं है । मैं भी वाणिज्य मंत्री रहा हूं । नीतियां बनाने में मेरा भी बहुत बड़ा हिस्सा था । ये नीतियां देश हित में बनायी गई । हमने अमरिका को नहीं देखा ।मनमोहन सिंह ने अमरिका को नहीं देखा । हमने देश को सामने रख कर नीतियां बनाई ।
वासिंद्र मिश्र:  सबसे दिलचस्प बात ये कही जाती है आपके बारें में कि आपकी  जितनी स्वीकार्यता कांग्रेस पार्टी के अंदर है,उससे ज्यादा गैर कांग्रेसी दलों में है । शायद इसलिए फ्लोर मैनेजमेंट का जब जब संकट आया तब आपको वो ज़िम्मेदारी दी गई संसद के अंदर । इस समय तीन तरह के बयान देखने को मिल रहे हैं देश की जनता को । खास तौर से बीजेपी के नेता दे रहे हैं । आडवाणी जी का बयान हैं कि आरएसएस की मेहनत का नतीजा है । आरएसएस के संगठनों की मेहनत का नतीजा है । मौजूदा सरकार की जो नाकामी रही है,भ्रष्टाचार रहा है उसका नतीजा है । शुषमा स्वराज जी कह रही हैं कि बीजेपी की जीत है । आपके रिश्ते सब से रहे हैं । अभी सरकार जाते जाते भी जिस तरह से आपकी सरकार नरेन्द्र मोदी के खिलाफ आयोग बनाने का अथक प्रयास कर रही थी और जज खोज रही थी । उस समय भी आपने स्टैंड लिया और कहा कि अभी ये काम आने वाली सरकार पर छोड़ देना चाहिए । ये जो कामयाबी मिली है बीजेपी को और एनडीए को इसका क्रेडिट आप किसको देंगे?मोदी को,बीजेपी को,आरएसएस को या अपनी सरकार की नाकामी और पुअर गवर्नेंस को..
कमलनाथ : मैं दो चीजों को क्रेडिट देता हूं,एक प्रचार-प्रसार में हमारी कमी और दूसरी चीज परिवर्तन की लहर को । बीजेपी किसको क्रेडिट दे, ये वो खुद तय करे पर इसमें कोई शक नहीं कि एक भयानक परिवर्तन की लहर थी और हमारी जो कमी थी,ये सूचना-संचार की कमी,ये एक बहुत बड़ा कारण रहा ।
 कमलनाथ ज़ी हमसे बात करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

मंगलवार, 13 मई 2014

मोदी के मैजिक का सीक्रेट

एक पुरानी कहावत है कि लहरों के साथ तो कोई भी चल लेता है....लेकिन असल तैराक वो है जो लहरों को चीर कर आगे बढ़ता है...बचपन में वडनगर के तालाब में मगरमच्छों से लड़ते हुए मंदिर पर पताका फहराने की कहानी मोदी के बारे में कई बार कही और सुनी गई है...लेकिन ये बात 52 साल पहले की है...52 साल बाद मोदी ने खतरों से खेलते हुए रास्ता बनाने की अपनी उसी अदा को दोहराया है....तमाम एग्जिट पोल्स की रिपोर्ट्स जिन नतीजों का अनुमान लगा रही हैं उससे ये साफ है कि मोदी को दिल्ली के ताज तक पहुंचने में ज्यादा मेहनत नहीं करनी है...जाहिर है अगर ऐसा हुआ तो इतिहास बनना तय है और चर्चा इस बात की भी होगी कि आखिर नरेन्द्र मोदी के लिए वो क्या फॉर्मूला रहा जिसने मोदी को चुनावी सियासत के सिर्फ 14 सालों में शिखर तक पहुंचा दिया, आखिर क्या है मोदी मैजिक का सीक्रेट...
तमाम एग्जिट पोल्स के आंकड़े ये गवाही दे रहे हैं कि देश में मोदी मैजिक चल गया है...अगर ये सच है तो फिर यकीनन उन वजहों की पड़ताल जरूरी है जिसके चलते मोदी का फैक्टर मैजिक में तब्दील हुआ...या यूं कहें कि लहर से सुनामी में बदल गया...सवाल ये है कि आखिर ऐसा क्या हुआ....जिसने महज 14 साल की चुनावी सियासत में मोदी को देश के सर्वोच्च पद का दावेदार बना दिया...
मोदी ने पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ा तो सीधे मुख्यमंत्री का पद मिला...और पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ा तो सीधे शीर्ष पद के दावेदार बन गए...सियासत में ऐसा नसीब शायद ही किसी को हासिल होता हो ...लेकिन यहां बात सिर्फ किस्मत पर छोड़ दी जाए तो ये गैरवाजिब . अन्याय होगा मोदी के उस सतत परिश्रम और रणनीति के साथ जब मोदी ने बिना अपनी निजी जिन्दगी परवाह करते हुए पूरी जिंदगी बिता दी ...
दरअसल मोदी नाम की लहर के निर्माण की प्रक्रिया में मोदी के मैजिक से जुड़े तमाम सवालों के जवाब छिपे हैं...वो प्रक्रिया जिसने ना सिर्फ बीजेपी के मृतप्राय पड़े संगठन में जान फूंक दी...बल्कि एक ऐसे चेहरे के सहारे सियासी दांव खेला जिसने तमाम विवादों से जूझते हुए अपनी उस कमजोरी को अपनी ताकत बना ली जिसके सहारे विरोधी ये उम्मीद पाले बैठे थे कि कम से कम हिन्दुस्तान की सियासत में परम्परावादी तरीकों से बनने वाली रणनीति में ये चेहरा कारगर साबित नहीं होगा...लेकिन कम से कम फिलहाल जो संभावनाएं बनती दिख रही है उनमें विरोधियों की तमाम रणनीतियां हवा हो चुकी हैं...
दरअसल मोदी मैजिक के सीक्रेट को समझने के लिए मोदी के अतीत पर गौर करना होगा..वो अतीत जो आडवाणी की ऐतिहासिक रथयात्रा से जुड़ा है...जिसमें सारथी बने थे नरेन्द्र मोदी...वो अतीत जो मुरलीमनोहर जोशी की कन्याकुमारी से श्रीनगर की यात्रा से जुड़ा है जिसमें मोदी जोशी की जोड़ी ने लाल चौक पर तिरंगा फहराया था...वो अतीत जो 1995 की उस सांगठनिक क्षमता से जुड़ा जिसके चलते मोदी ने पहली बार गुजरात में केशुभाई पटेल के नेतृत्व में बनी सरकार के लिए बिसात बिछाई थी..वो अतीत जिसमें मोदी के अथक परिश्रम ने उन्हें संघ और पार्टी नेतृत्व का इतना प्रिय बना दिया कि 2001 में जब गुजरात में बीजेपी पर सियासी संकट गहराया तो उससे निपटने के लिए मोदी को आगे कर दिया गया
दरअसल मोदी के इस अतीत में ही वर्तमान की पृष्ठभूमि का अक्स दिखता है...चौबीसों घंटे बिना थके बिना रूके मेहनत करने का माद्दा...जिसे संघ ने हवा दी...2004 में मिली बीजेपी की करारी शिकस्त ने अगर संघ की सोशल इंजीनियरिंग का रास्ता खोला तो इसके लिए संघ के रडार पर आए सिर्फ नरेन्द्र मोदी...एक पिछड़े वर्ग के चेहरे, एक हिन्दुत्व के पैरोकार के चेहरे, एक विकास पुरुष के चेहरे और एक कभी ना थकने वाले निष्ठावान कार्यकर्ता के चेहरे के तौर पर...संघ के लिए मोदी उसके एजेंडे के हिसाब से फिट थे...तो संघ ने भी सीधी दखल शुरु कर दी...महाराष्ट्र के एक लो प्रोफाइल नेता नितिन गडकरी को बीजेपी का अध्यक्ष बनाना दरअसल संघ का लिटमस टेस्ट था जिसमें दिल्ली में बैठे पुराने धुरंधरों के लिए खतरे की घंटी पहले ही बजा दी थी...शायद गडकरी की कंपनी पूर्ति में कथित तौर पर गड़बड़ियों के आरोप और नितिन गडकरी का इस्तीफा नहीं हुआ होता तो मोदी की उम्मीदवारी के ऐलान के लिए अक्टूबर 2013 का इंतजार नहीं करना पड़ता...लेकिन जो भी हुआ वो संघ के रणनीति के मुताबिक था....
राम लहर में पूरी ताकत लगाने के बाद भी बीजेपी को खिचड़ी सरकार बनाने पर अगर मजबूर होना पड़ा तो इसका मतलब संघ को पता था...इसका मतलब था क्षेत्रीय ताकतों के वर्चस्व को तोड़े बगैर एजेंडा पूरा नहीं हो सकता...संघ को ये बात समझ में तो काफी पहले आ गई थी...लेकिन माया, मुलायम, नीतीश, लालू जैसे क्षेत्रीय धुरंधरों की ताकत का तोड़ उसे नही मिल रहा था...और जब तोड़ मिला तो लहर आई...लहर सुनामी में बदली और सबकुछ वैसे ही हुआ जैसी रणनीति बनाई गई थी...

2014 का चुनाव कई मायनों में अहम है...इस बार मतदान का भी रिकॉर्ड बना है...इस बार हर वोट बैंक में सेंध लगी है...मोदी में अगर पिछड़ों का स्वाभिमान दिखा है तो अतिपिछड़ों पर मायावती जैसे क्षत्रपों के एकाधिकार को चुनौती भी मिली है...विकास के रोडमैप को अगर नई पीढ़ी ने स्वीकारा है तो हिन्दुत्व के कॉकटेल ने उन कार्यकर्ताओं को उत्साहित किया है जो बीजेपी के कद पर हावी हुए एनडीए के दौर में उपेक्षित महसूस कर रहे थे...सही मायनों में अगर देखें तो मोदी मैजिक का सीक्रेट दरअसल वो प्लानिंग है...जिसे तैयार भले ही संघ ने किया था...लेकिन इसके लिए शायद मोदी से बेहतर और कोई चेहरा नहीं था...

कांग्रेस की कसक !

देश अब 16 मई का इंतज़ार कर रहा है जिस दिन जनादेश सबके सामने होगा ... 16 मई को ये भी साफ हो जाएगा कि आने वाले दिनों में देश की कमान किसके हाथ होगी ... जनता अपना आदेश सुना चुकी है और एक्जिट पोल भी सामने आ चुका है .... अब रिजल्ट आने की बारी है ... और जैसे तैयारी के आधार पर स्टूडेंट को पता होता है कि रिजल्ट कैसा हो सकता है वैसे ही सियासी पार्टियों को भी उनका परिणाम पता है ... एक खेमे में जीत को लेकर तैयारी की जा रही है तो दूसरा खेमा हार की जिम्मेदारी तय करने में लगा है ... एक्जिट पोल कहता है कि कांग्रेस को इस बार मायूसी हाथ लगने वाली है ... ऐसे में एक्जिट पोल को सही मानें तो कांग्रेस के सामने सवाल ये है कि आखिर क्या हैं इस जनादेश की वजहें, कहां चूकी है कांग्रेस और उससे भी बड़ी बात ये है कि आखिर इस हार की जिम्मेदारी किसकी होगी ?
चुनाव के नतीजे आने में महज कुछ घंटों का वक्त बचा है और चरम पर पहुंच चुकी सियासी गहमागहमी के बीच बीजेपी ने नतीजे आने से पहले ही खुद को विनर मान लिया है तो कांग्रेस के खेमे में मायूसी है .. असल में कांग्रेस की इस मायूसी के पीछे वजह है महंगाई और भ्रष्टाचार को लेकर बना देशभर में वो माहौल जिसका ट्रेलर बीते साल के विधानसभा चुनावों में दिख चुका है और जिसके पूरे पिक्चर के डर ने कांग्रेस पार्टी के नेताओं की नींदे उड़ा दी हैं....कांग्रेस लगभग मान चुकी है कि नतीजे माकूल नहीं होंगे...लिहाजा हार की जिम्मेदारी को लेकर मंथन भी शुरु हो गया है.... कई तरह के सवाल हैं मसलन .. क्या क्या राहुल गांधी इस हार के लिए जिम्मेदार माने जाएंगे जिनके कंधों पर प्रचार की पूरी जिम्मेदारी थी ... या फिर बीते 10 साल सरकार में रहे मंत्री जिम्मेदार माने जाएंगे जिन पर सरकार चलाने की जिम्मेदारी थी ... या फिर संगठन जिम्मेदार माना जाएगा जिसके नेताओं की बयानबाजी ने सरकार के सामने मुश्किलें खड़ी कर दीं । जनता के लिए काम करने के नाम पर कांग्रेस ने खाद्य सुरक्षा कानून दिया, मनरेगा दिया, सूचना और शिक्षा का अधिकार भी दिया....लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस के ज्यादातर नेता इन मुद्दों को प्रभावी तरीके से उठाने की बजाय सिर्फ व्यक्तिविशेष पर ही केन्द्रित रहे....मोदी विरोधी बयानों की बाढ़ आ गई...और ऐसा लगने लगा जैसे कांग्रेस के चुनावी अभियान का केन्द्र सरकार की उपलब्धियां नहीं बल्कि मोदी का विरोध भर ही है... वहीं दूसरी ओर खुद राहुल गांधी अपनी रैलियों में आरटीआई मनरेगा जैसे कानूनों की जिक्र तो करते रहे....लेकिन जनता पर प्रभाव छोड़ने में कामयाब नहीं हुए...
इसके साथ ही कांग्रेस देश में आए उस बदलाव के असर को भांपने में भी चूक गई जो देश में बीते कुछ सालों में हुए
आंदोलनों के चलते पैदा हुई थी...और इस बदलाव ने लोगों को पहली बार शिद्दत से ये सोचने को मजबूर कर दिया कि जातिगत और धार्मिक राजनीति से अलग अब उनकी बुनियादी जरूरतें क्या हैं...उन्हें नौकरी कैसे मिलेगी...उनके घर में चूल्हा कैसे जलेगा...उनकी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य कैसे सुरक्षित होगा....कांग्रेसी नेता अपनी राग में गाते रहे....जाति औऱ धर्म के नाम पर एजेंडे लाते रहे....वोट बैंक के हिसाब से रणनीतियां बनाते रहे...नतीजा ये कि जमीन नीचे से कब खिसक गई पता ही नहीं चला ... वरिष्ठ नेताओं की तरफ से बयान दिए गए ...ध्रुवीकरण की कोशिश की गई लेकिन दांव उलटा पड़ गया...अल्पसंख्यक वोट बैंक का हिस्सा पहले ही बदले माहौल में बंट चुका था....रही सही कसर अतिपिछड़े वर्ग की हलचल ने पूरी कर दी.....
चुनाव अभियान में कई बार ऐसा लगा कि कांग्रेस ये तय ही नहीं कर पा रही है कि आखिर वो किस एजेंडे पर आगे बढ़ें...कांग्रेस नेताओं का एक बड़ा तबका ऐसा रहा जो सिर्फ ऊलजूलूल बयानबाजी में लगा रहा...मोदी को सिर्फ उनके अतीत के आधार पर घेरने की कोशिश की....ये भूलकर कि मौत का सौदागर वाले जुमले ने मोदी को किसी जमाने में हिट कर दिया था....इन सबके बीच महंगाई भ्रष्टाचार से परेशान हो चुकी जनता ने जब एक बार राष्ट्रीय पार्टियों की ओर रुख किया तो क्षेत्रीय क्षत्रपों के साथ साथ कांग्रेस की ओर से वोट बैंक की सियासत को पचा नहीं पाई...रही सही कसर जाते जाते सरकार के अहम पदों पर काबिज वरिष्ठ नेताओं ने पूरी कर दी...जिनमें अपने चहेतों को अहम पदों पर बिठाने की ललक थी...
कुल मिलाकर कांग्रेस इस चुनाव में पूरी तरह कन्फ्यूज नजर आई...रणनीति से लेकर चुनाव प्रचार तक के मोर्चे पर...और तो और कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता और मंत्रियों ने तो लड़ाई से पहले ही हथियार डाल दिए...इन सबके बीच कांग्रेस के सेनापति अकेले पड़ गए और बिखरा चुनावी अभियान चूर चूर हो गया...

शुक्रवार, 9 मई 2014

RSS का प्लान OBC !

सियासत के लिए कोई भी जमा जमाया फॉर्मूला कभी काम नहीं करता...वक्त के साथ और बदलते माहौल के साथ फॉर्मूले बदलने पड़ते हैं...ये काम सभी करते हैं लेकिन असल खिलाड़ी वो होता है जो अपने फॉर्मूले  पर कामयाबी हासिल कर ले...मौजूदा वक्त में बीजेपी के जरिए आरएसएस का एक फॉर्मूला कामयाब होता दिख रहा है...ये वो फॉर्मूला है जिसके एक प्रयोग की नजीर 2007 में दिख चुकी है जब मायावती ने तमाम समीकरण ध्वस्त करके यूपी में बहुमत की सरकार बनाई थी...कैडरबेस संगठन आऱएसएस ने बीजेपी के साथ मिलकर वही किया है...और सफलता के मुहाने पर खड़ा दिख रहा है...

सियासत की असल जरूरत क्या होती है...इस सवाल के जवाब में अमूमन विकास का नारा दिया जाता है...लेकिन ये महज कहने-सुनने की चीज है...मौजूदा वक्त में बदली सियासी फिजा जो जाति धर्म के इर्द-गिर्द सिमटती नजर आ रही है, दरअसल यही असल में सियासत की जरूरत है जिसका इस्तेमाल जिसने भी..जब भी...सबसे बेहतर तरीके से किया कामयाबी उसी को मिली...एक बार फिर माहौल कुछ वैसा ही बन चुका है..सियासत की फिजाओँ में फिर एक बार जाति की हवा चल रही है..

दरअसल इस बात को समझने के लिए उस दौर में लौटना होगा जब आज की सबसे बड़ी वोटर पीढ़ी उस वक्त पैदा हुई थी...यानी लगभग 25 साल पहले..ये दौर था मंडल कमंडल की सियासत का... जब वीपी सिंह ने मंडल कमीशन के हथियार से कमंड़ल यानी धार्मिक राजनीति को ध्वस्त किया था..बदले हुए दौर में आरएसएस ने 25 साल बाद वीपी सिंह के प्रयोग को ही दोहराया है...और उसी हथियार से उन ताकतों को ध्वस्त कर दिया है जो मंडल कमीशन के असर से पैदा हुई थीं...मंडल कमीशन के वक्त भी सोशल इंजीनियरिंग के जरिए विकास की बात कही गई थी...ये और बात है कि वक्त के साथ वीपी सिंह इसे आगे नहीं बढा पाए

लेकिन इतिहास से सबक लेते हुए आरएसएस और उसके सहयोगी संगठनों ने इसी सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूले पर ठीक से काम किया है...और नरेन्द्र मोदी के रुप में उस दौर से भी बड़ा कद देश के सामने पेश कर दिया...जिसकी झलक उसी वक्त मिल गई थी जब चुनावी अभियान की हिलोरें उठी थीं.... और नरेंद्र मोदी ने खुद को ट्रेन में चाय बेचने वाला बच्चा बताकर ये ज़ाहिर करने की कोशिश की थी कि वो किस तबके से संबंध रखते हैं ... जैसे जैसे वक्त बढ़ता गया...माहौल और भी दिलचस्प होता गया...जब सियासत की ऊंच-नीच भी दुनिया के सामने आ गई ... अपने परिवार पर हमला बोले जाने को गांधी परिवार ने नीच राजनीति करार दिया तो जवाब में नरेंद्र मोदी ने कास्ट कार्ड प्ले कर दिया ... नतीजा भी सामने है कांग्रेस के नेता मोदी की जाति का डीएनए टेस्ट करने में जुट गए हैं ...

अब विकास और भ्रष्टाचार को असल मुद्दा मानने वाले चाहे अपना सिर जितना पीट लें...लेकिन हकीकत बदल चुकी है...मुद्दा जाति धर्म बन चुका है...और अब इसी मुद्दे के सहारे चुनावी मौसम की आखिरी फसल काटी जानी है...अब गुजरात में मोदी की जाति को ओबीसी में शामिल चाहे खुद मोदी ने किया हो या फिर कांग्रेस शासनकाल के दौरान हुआ हो...मसला ये नहीं है बल्कि मसला अब ये है कि सियासत की राह वैसे ही है .. अब जरा इतिहास भी खंगाल लेते हैं इसे समझने के लिए...दरअसल जनता पार्टी के विघटन के बाद जब बीजेपी अस्तित्व में आई थी उस वक्त भी पार्टी ने गांधी के समाजवाद को साथ लेकर चलने का फैसला किया था....अटलजी के नेतृत्व में ये काम शुरु भी हुआ लेकिन नाकामी ही हाथ लगी...लिहाजा आरएसएस ने यू टर्नलिया और आडवाणी को आगे कर दिया...नतीजा सत्ता तक का सफर तय हुआ...लेकिन इस बीच संघ ने चेहरा बदलने की चाहत नहीं छोड़ी...नतीजा ये कि  जब बीजेपी सत्ता में आई तो पीएम पद पर अटलजी को बैठाया गया

दरअसल चूक की शुरुआत यहीं से हो गई...पार्टी ने सत्ता में बने रहने के लिए अपने सिद्दांतों और मूल्यों से समझौते किए तो मूल कैडर दूर हुआ...नतीजा ये कि सत्ता एक के बाद एक करके फिसलती चली गई...लेकिन 2009 के बाद से आरएसएस ने अपने असल एजेंडे पर काम शुरु किया और लोहे की काट के लिए लोहे को तैयार करने का फैसला किया...यानी मंडल कमीशन के बाद जो दर्जनो क्षत्रप पैदा हो गए थे उन्हें कैसे ठिकाने लगाया जाए...इसके लिए आरएसएस ने ऑपरेशन शुरु किया...और जिन राज्यों में बीजेपी सत्ता में आई वहां पिछड़े वर्ग के लोगों को सीएम बनाया गया...साथ ही बीजेपीके संगठन में भी ऐसे लोगों का प्रतिनिधित्व बढ़ाया गया...और आखिर मास्टर स्ट्रोक आरएसएस का मोदी के तौर पर सामने आया...संघ ने पूरी प्लानिंग के साथ एक पिछड़े वर्ग के नेता को देश के सामने लाने का रिस्क ले लिया...अब 16 मई करीब है...लेकिन चुनावों के अब तक सफर में बीजेपी और आरएसएस के प्लान मोदी को जो रिस्पांस मिला है...उसे देखकर कहना गलत ना होगा कि संघ का मिशन काफी हद तक कामयाब रहा है

बुधवार, 7 मई 2014

सत्ता का हैंगओवर

देश में लोकसभा चुनाव आखिरी चरण में है...पूरे देश में आचार संहिता लागू है और अगले नौ दिनों में नई सरकार की तस्वीर साफ होने वाली है...लेकिन इन सबके बीच अभी भी कांग्रेस के नेताओं के सिर से सत्ता का हैंगओवर उतरने का नाम नहीं ले रहा...सुशील शिंदे से लेकर कपिल सिब्बल तक कई केन्द्रीय मंत्री जिस तरह की बयानबाजी कर रहे हैं उससे लगता ही नहीं कि देश में आम चुनाव हो रहे हैं...अब सवाल ये कि क्या कांग्रेस निश्चिंत हो चुकी है कि अगली सत्ता भी उसी की होगी...या फिर ये सबकुछ किसी रणनीति के तहत हो रहा है...
मौजूदा सरकार जिसका अधिकार नई सरकार बनने तक है लेकिन उसके सर पर इस कदर सत्ता का हैंगओवर है कि मौजूदा सरकार के कई मंत्री विवादास्पद नीतिगत मामलों में दखल देने से नहीं चूक रहे....ये सही है कि नई सरकार के गठन तक पुरानी सरकार को फैसले लेने का अधिकार होता है...फिर भी इस दौरान डिफेंस, फाइनेंस और आंतरिक सुरक्षा जैसे मसलों को छोड़कर बाकी मसलों पर बड़े फैसले नहीं किए जाते रहे हैं...ये परम्परा पहले से रही है...अब सवाल ये कि ऐसे में क्या कारण है कि कपिल सिब्बल और सुशील शिंदे जैसे नेता नीतिगत मामलों पर बयानबाजी करने से बाज नहीं आ रहे ?
अब सवाल ये कि पार्टी के वो नेता जो बीते 10 साल से कुम्भकर्णी नींद में सोए हुए थे...वो अब अचानक से जाग गए हैं...ऐसे में जबकि नई सरकार के गठन में कुछ ही वक्त बचा है...आखिर क्यों नीतिगत फैसलों को लेने की जल्दबाजी दिखाई जा रही है ... फिर चाहे स्पेशल सीबीआई डायरेक्टर के पद पर नियुक्ति का मामला हो...जिसके लिए आनन-फानन में बैठकों का दौर चला और कांग्रेस विरोधियों के निशाने पर रही, या फिर नए सेनाध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर विवाद रहा हो...यूपीए-2 की सरकार आखिरी वक्त में जाते जाते इसे भी लेकर सक्रिय दिखी...रक्षा मंत्रालय की तरफ से लेफ्टिनेंट जनरल दलबीर सिंह सुहाग का नाम आगे कर दिया गया....जिस पर अभी चुनाव आयोग का फैसला लम्बित है.... सरकार ने लोकपाल के गठन को लेकर भी जल्दबाजी दिखाई हालांकि सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर होने की वजह से इस पर फैसला नहीं हो सका... सरकार ने भी कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए कदम वापस खींच लिए...

एक कहावत है कि रस्सी जल गई लेकिन ऐंठन नहीं गई....ये कहावत सिब्बल, शिंदे, और चिदंबरम के तौर तरीकों पर साफ दिखती है...कि अभी भी इन लोगों के सिर से सत्ता का हैंगओवर उतरा नहीं है लिहाजा चुनाव होते होते वो अहम पदों पर नियुक्तियां कर लेना चाहते हैं.... दरअसल हकीकत तो ये है कि दस साल तक सरकार में महत्वपूर्ण विभागों में बैठे ये मंत्री, खासतौर पर चिदंबरम और एंटनी, जब आम चुनाव लड़ने की बारी आई तो अपनी ही जनता से पीठ दिखाकर भाग गए...अब ये इनके अंदर का डर नहीं तो और क्या है कि ये अपनी ही संसदीय क्षेत्र की जनता से रूबरू नहीं हो पाए...ये वो नेता हैं जो तमाम अहम मसलों के लिए ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स में शामिल रहे हैं...तो सवाल उठते हैं कि ऐसे अहम पदों पर रहने के बाद आखिर क्या कारण है कि इनमें जनता से रूबरू होने की हिम्मत नहीं है...बीते सालों में ज्यादातर ये नेता एसी कमरों में बैठकर लिप सर्विस करते रहे...और अब जबकि कार्यकाल में महज कुछ दिन बचे हैं खुद को अतिसक्रिय दिखाकर ये क्या हासिल करना चाहते हैं ये बड़ा सवाल है...

गांधी परिवार का अभेद्य दुर्ग ?

क्या अमेठी में रायबरेली का इतिहास दोहराया जाएगा, ये सवाल इसलिए क्योंकि अमेठी में ऐसे हालात देखने को मिल रहे हैं जैसे कि गांधी परिवार अपनी सीट बचाने की लड़ाई लड़ रहा हो 1977 के इमरजेंसी के बाद जब पूरे देश में कांग्रेस और इंदिरा विरोधी लहर थी उस वक्त इंदिरा गांधी रायबरेली से हारीं थीं चार दशक बाद एक बार फिर कुछ कुछ वैसा ही माहौल बनता दिख रहा है, जब गांधी का दुर्ग अभेद्य रहेगा या नहीं इसे लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं

1977 के आम चुनाव से पहले भी देश में कांग्रेस विरोधी माहौल था ... परिवार नियोजन को लेकर संजय गांधी के तौर तरीकों और उनके तानाशाही रवैयों ने इस माहौल को जन्म दिया था लोगों में संजय गांधी के Extra constitutional authority की भूमिका को लेकर भी नाराजगी थी .. बाद में अपनी कुर्सी बचाए रखने के मकसद से इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू कर दिया था ... और ये आपातकाल लगाना 1977 के चुनावों में कांग्रेस के लिए घातक साबित हुआ ... नतीजा ये हुआ था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को राजनारायण ने उनके ही गढ़ रायबरेली में मात दे दी थी

हालांकि लोकतन्त्र में गढ़ की भाषा नैतिक और किताबी तौर पर नहीं होती.... लेकिन व्यवहारिक तौर पर ऐसा देखने को मिल जाता है ... अमेठी और रायबरेली , ये दो लोकसभा सीटें गांधी परिवार का गढ़
मानी जाती हैं ...वजह ये कि यहां से गांधी परिवार का कोई ना कोई नुमाइंदा चुनाव लड़ता रहा है और जनता हर बार उसे सिर-आंखों पर बिठाती रही है... लेकिन इस बार माहौल थोड़ा अलग दिख रहा है ... अमेठी और रायबरेली में गांधी परिवार की मशक्कत ये बता रही है कि या तो ये दोनों किले अब अभेद्य नहीं रहे या फिर गांधी परिवार ने अतीत से सबक लेकर पहले ही सतर्कता के तौर पर पसीने ज्यादा बहा दिए हैं...वो अतीत जो 1977 के इमरजेंसी के बाद के दौर में गांधी परिवार का हिस्सा बना था...वो अतीत जिसने अभेद्य माने जाने वाले इंदिरा गांधी के गढ़ रायबरेली को सोशलिस्ट नेता राजनारायण के हाथों गंवाने को मजूबर कर दिया था....वो अतीत जहां मुद्दों की आंधी में भावनाओं का ज्वार हवा हो गया था और गांधी परिवार की साख अपने गढ़ में ही ध्वस्त हो गई थी, एक बार फिर सामने आने को तैयार दिख रहा है ?

दरअसल एक बार फिर माहौल कुछ हद तक वैसा ही दिखता है...10 साल बाद सोनिया गांधी का अमेठी में जनसभा करने के लिए मजबूर होना ये बताता है कि आशंकाओं ने दस जनपथ की अमूमन खामोश रहने वाली दीवारों के दरम्यान हलचल तेज कर दी है...प्रियंका गांधी की अतिसक्रियता और भावुकता भरे भाषण ये बताते हैं कि दस साल के यूपीए शासन के खिलाफ बने माहौल से उबरने और खुद को अलग दिखाने के लिए सिवाय पीढ़ियों की दलीलें देने के अलावा इनके पास कुछ नहीं बचा है...वो भी तब जब सूबे की सत्ताधारी पार्टी एसपी ने इन दोनों सीटों पर कांग्रेस को वॉकओवर दे रखा है... फिर भी इन दोनों सीटों पर सोनिया गांधी और राहुल गांधी को दो गैर राजनीतिक भाजपाई उम्मीदवारों के सामने लोहे के चने चबाने पड़ रहे हैं

बीजेपी ने अमेठी में स्मृति ईरानी को मैदान में उतारा है...जो नरेन्द्र मोदी की करीबी हैं...लेकिन राहुल गांधी के मुकाबले कद के तौर पर बड़ा नाम नहीं हैं...ईरानी एक बार दिल्ली के चांदनी चौक से कपिल सिब्बल के खिलाफ चुनाव हार चुकी हैं...लेकिन बदले माहौल में अमेठी में स्मृति ईरानी की कैम्पेनिंग ने गांधी परिवार को चढ़ते पारे के बीच पसीना बहाने को मजबूर कर दिया है...कुछ यही हाल रायबरेली का भी है...जहां बीजेपी से अजय अग्रवाल उम्मीदवार हैं...सुप्रीम कोर्ट के वकील अग्रवाल की पहचान बोफोर्स, सीडब्ल्यूजी, तेलगी और ताज कॉरीडोर जैसे मामलों में याचिकाकर्ता की है...यानी सोनिया गांधी की शख्सियत के सामने अजय अग्रवाल का राजनीतिक कद काफी छोटा नज़र आता है.... देश के अलग-अलग हिस्सों में आपदा की घड़ी आने पर भले ही गांधी परिवार वहां ना जाता हो लेकिन अमेठी और रायबरेली में ये छोटी से छोटी घटना पर ये वहां जाते रहे हैं ... इसके बावजूद इस बार जितनी मशक्कत इन्हें अपनी इन दो सीटों को बचाने के लिए करनी पड़ी हो इससे पहले शायद हीं इन्हें कभी इतनी चुनौती मिली हो ..



दरअसल इस चुनाव में बहुत कुछ नया हो रहा है...जिसके चलते लम्बे वक्त बाद कैम्पैनिंग का दायरा अघोषित राजनीतिक भाईचारे से ऊपर उठ चुका है...ऐसे में गढ़ किसी का हो...रास्ते किसी के आसान नहीं हैं ..ऊपर से कांग्रेस दस सालों के कुशासन, महंगाई, भ्रष्टाचार, और पॉलिसी पैरालिसिस के आरोपों में घिरी है...जिसके शीर्ष नेता खुद को चाहकर भी इनसे अलग नहीं कर सकते तो कीमत चुकाने से भला कैसे बच पाएंगे... अमेठी और रायबरेली की लड़ाई भी इसीलिए मुश्किल हुई है...और ये सवाल भी इसीलिए उठे हैं कि क्या गांधी परिवार का किला अभेद्य रह पाएगा