शुक्रवार, 25 अप्रैल 2014

`मिशन रॉ` के कुछ सीक्रेट्स

इस समय किताबों को लिखने और उसको लेकर जो राजनीति हो रही है उसका सिलसिला काफी तेज है। इसी कड़ी में एक नाम आर के यादव की भी है जिनकी लिखी किताब जल्द ही बाजार में आने वाली हैं। लोकसभा चुनावों के परिणामों पर ये किताबें कितना असर डाल पाएंगी ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन इन किताबों को लेकर सियासी माहौल जरूर गरमा गया है। भारतीय खुफिया एजेंसी के पूर्व अधिकारी आर.के. यादव से बातचीत के कुछ महत्वपूर्ण अंश...

वासिंद्र मिश्र :आपकी किताब में ऐसी क्या खास बात है जिसको लेकर किताब के बाजार में आने से पहले ही इतनी चर्चा हो गई है। 
आर.के. यादव :देखिए इस किताब की टाइमिंग का इस इलेक्शन से कोई लेना देना नहीं था। ये मैं पिछले 10 साल से लिख रहा हूं जो कि काफी बड़ा रिसर्च वर्क है जिसमें मैंने हिंदुस्तान के इंटेलिजेंस का.. जब से देश आजाद हुआ है ..तब से अब तक क्या योगदान हैं इनकी क्या नाकामियां हैं, क्या इसमें सुधार होना चाहिए। यह महज़ इत्तेफाक है कि इसकी टाइमिंग इस इलेक्शन के आस-पास हो गई। वैसे ये किताब मेरे हिसाब से पिछले साल ही रिलीज हो जानी चाहिए थी।
 
वासिंद्र मिश्र :आपके किताब में अटल बिहारी वाजपेयी के भी शासन काल का ज़िक्र है कि जब अटल जी देश के प्रधानमंत्री थे तो प्रधानमंत्री कार्यालय में एक अधिकारी तैनात था जिसका CIA से संबंध था।
आर.के. यादव :मुझे लग रहा है कि इसको गलत समझा गया। जो मेरे ज्ञान में बात है वो पीएमओ में नहीं था वो RAW में था। रविंद्र सिंह नाम का एक ज्वाइंट सेक्रेटरी था जो CIA का एजेंट था। किसी ने अगर ये कहीं जिक्र किया है तो ये बात गलत है। प्रधानमंत्री अटलजी के दफ्तर में ऐसा कोई जासूस नहीं था।
 
वासिंद्र मिश्र :तो RAW का जो वो अधिकारी था वो आज की तारीख में कहां है और भारत सरकार ने उसको भारत लाने के लिए अभी तक क्या कार्रवाई की है?
आर.के. यादव :देखिए वो ज्वाइंट सेक्रेटरी रैंक का अफसर था। रविंद्र सिंह उसका नाम था। इस किताब में मैंने उसपर पूरा खुलासा किया है कि उसको CIA यहां से कैसे भगा ले गई और उसमें रॉ के कुछ अफसर भी शामिल थे जिन्होंने उसे भगाने में मदद की क्योंकि अगर वो यहां पर पकड़ा जाता और उससे पूछताछ की जाती तो यह सब जो हैं इन पर कानूनी कार्रवाई होती और यह सब अंदर होते तो इन्होंने अपनी चमड़ी बचाने के लिए उसको भागने में मदद की और वो नेपाल के जरिए देश से बाहर भाग गया। इसमें मैंने वो दस्तावेज भी दिए हैं जो अमेरिकी सरकार की CIA ने पासपोर्ट बनवाया था। नेपाल से उसके दस्तावेज लगाए हुए हैं और यह भारत सरकार के दस्तावेज नहीं है। यह अमेरिकी सरकार के दस्तावेज हैं।

वासिंद्र मिश्र :तो अभी तक भारत सरकार ने उसको वापस लाने के लिए कार्रवाई क्यों नहीं की?
आर.के. यादव :इसके प्रत्यर्पण को लेकर मैंने भी सवाल उठाया था। जब CBI जवाबदेह थी RTI के अंदर तो मैंने CBI से पूछा था तो CBI के दस्तावेज जो मेरे पास हैं उसमें यह खुलासा है कि इंटरपोल ने जब इसके बारे में कुछ जानकारी रॉ से मांगी तो रॉ ने वो जानकारी नहीं दी। उसका नतीजा यह हुआ लेकिन इंटरपोल उसको रेड कार्नर जारी नहीं कर पाई लेकिन यह आज भी अमेरिका में हैं। हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का अमेरिका में आना जाना सबसे ज्यादा रहा हैं। किस कमजोर विदेशी नीति के तहत इन्होंने इस आदमी को यहां लाने के लिए अमेरिकी सरकार पर जोर नहीं दिया ये वो जाने, एमके नारायणन जाने जो कि अंदर से थे क्योंकि मुझे लग रहा है कि इनका मुख्य एजेंडा जो कि न्यूक्लियर डील हुई थी अमेरिका से उसको लाने के लिए था और इसी वजह से उन्होंने इस मुद्दे को थोड़ा मामूली समझा और आगे नहीं बढ़ाया।

वासिंद्र मिश्र :तो आपको लगता है कि महज कमजोर विदेश नीति की वजह से उसको भारत नहीं ला पा रहे हैं या कोई और समीकरण भी हैं प्रधानमंत्री के बीच में और उस रविंद्र सिंह के बीच में।
आर.के. यादव :देखिए ये तो कमजोर विदेश नीति ही है नहीं तो अमेरिका की क्या हिम्मत थी कि देवयानी खोबरागड़े के मामले में उसके नौकर को और नौकर के बच्चों को आप डायरेक्ट ले जाएं और भारत सरकार को पता भी ना चले। मैं तो अमेरिका की दादागीरी कहूंगा। 

वासिंद्र मिश्र :तो आपको लगता है कि प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बने रहने के लिए या अमेरिकापरस्त नीतियों को आगे बढ़ाने के लिए मनमोहन सिंह ने जो राष्ट्रीय हित था उसको नजरअंदाज किया है?
आर.के. यादव :देखिए इसे आप लोगों को देखना है कि उनकी कमजोर विदेश नीति हैं या उनकी खुद की या मैं कहूंगा कि मजबूती नहीं थी इस मामले में, नहीं तो अटल बिहारी होते तो वो इस चीज पर अड़ जाते। मुझे याद है क्लिंटन यहां आए थे चिट्टेसिंहपुरा में। उस दिन घटना हुई थी सरदारों के साथ और क्लिंटन उसके बाद पाकिस्तान जा रहे थे तो उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस में कहा था कि इनसें पूछिए मुशर्रफ के सामने मामला उठाएंगे या नहीं उठाएंगे। तो ये तो कमजोरी की निशानी तो है ही।

वासिंद्र मिश्र :मुल्कों से मिलते रहते हैं, एक बहुत बड़ा आरोप लगता रहा हैं बीच-बीच में कि वे लोग जो फंड मिलता है सीक्रेट फंड उसका बहुत दुरुपयोग करते हैं इसमें कितनी सच्चाई हैं?
आर.के. यादव :देखिए ये अपनी इच्छा पर निर्भर करता है। रॉ के एक सेक्रेटरी थे जिनका नाम जैन हवाला केस में आया था और उनपर यह आरोप लगा था कि उनको एक लाख रुपये जैन ने दिए हैं। जैन की डायरी में एक लाख रुपये की एंट्री थी। मैंने उनसे बात की थी तो उन्होंने मुझे यह कहा था कि यादव साहब मेरे यहां अलमारियां नोटों से और विदेशी मुद्रा से भरी रहती हैं तो मैं क्या उसमें से एक लाख रुपये जैन से लूंगा। मुझे जितने चाहिए मैं उसमें से लेकर घर जा सकता हूं। मेरे कहने का मतलब ये कि रॉ में जो भी काम होता है चाहे हम विदेश में करते हैं या यहां करते हैं जो हमारे अफसर हैं वो सिर्फ पैसे के जरिए ही करते हैं। सोर्स बनाते हैं जो पैसे से बनता हैं। अब ये उसकी इच्छा शक्ति पर है अगर कोई बेईमान होना चाहे तो कमी नहीं है, लेकिन आज भी रॉ के एक सेक्रेटरी पर मैंने केस डाला हुआ है। CBI ने उसमें जांच का आदेश कर दिया है। उसकी संपत्ति इतनी ज्यादा है कि उसकी सैलरी बनती थी कोई आठ-दस लाख रुपये और उसकी दौलत 1990 में ही करोडों में थी। सीबीआई ने उसमें जांच की हैं। 

वासिंद्र मिश्र :तो हम मानें कि रॉ और सीबीआई के जो भ्रष्ट अधिकारी हैं वे एक दूसरे को मदद करते हैं और उनपर जब कार्रवाई की बात आती है तो उस भ्रष्ट अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय उसको बचाने के लिए इन विभागों के अधिकारी जुट जाते हैं।
आर.के. यादव :कौआ कौआ को नहीं काटता। ये एक दूसरे का बचाव करते हैं। 

वासिंद्र मिश्र :आपके विभाग में जो भ्रष्टाचार रहा है खास तौर पर बड़े पदों पर जो अधिकारी आते हैं वो आकंठ भ्रष्टाचार में डूब जाते हैं। आज रॉ की कोई स्टेंडिंग नहीं है जब हम फॉरेन एजेंसीज की बात करते हैं रॉ के मुकाबले। 
आर.के. यादव :ये गिरावट आई है 1987 के आसपास जब एलटीटीई के ऑपरेशन हुए और रॉ के अधिकारी जो इसे हैंडल कर रहे थे जिसमें रॉ का सेक्रेटरी भी था उस वक्त जो फंड डायवर्ट हुए पर्सनल गेंस के लिए अपने एसेट्स बनाने के लिए कई बार उन्होंने अमेरिका में अपने पैसे ट्रांसफर कराए। दूसरे देशों बैंकॉक से फर्जी एजेंट बनाकर पैसे दिखाए गए। एक तरह से तभी से गिरावट का एक रास्ता खुल गया। उससे पहले करप्शन का नाम नहीं था रॉ के अंदर।

वासिंद्र मिश्र :तो ये जो करप्शन हुआ उसमें पॉलिटिशियन भी शामिल थे या सिर्फ रॉ के अधिकारी?
आर.के. यादव :नहीं...पॉलिटिशियन का इसमें कोई लेना देना नहीं है। ये रॉ के ऑफिसर ही थे और ये भी एक कोटरी होती है जो एक दूसरे को बनाते हैं।

वासिंद्र मिश्र :ये किस लेवल के अधिकारी होते हैं? 
आर.के. यादव :सेक्रेटरी लेवल के जो रॉ के चीफ हैं वो अगर चाहेगा तो यहां करप्शन होगी और रोकेगा तो रुक जाएगी।

वासिंद्र मिश्र :उसमें जो अभी हाल में रिटायर हुए हैं ये अधिकारी भी शामिल थे रॉ की बर्बादी के लिए? 
आर.के. यादव :सारे तो नहीं थे लेकिन कुछ हैं।

वासिंद्र मिश्र :कुछ के नाम बताएंगे जो शामिल थे?
आर.के. यादव :एके वर्मा जिनपर सीबीआई ने केस चलाया हुआ है।

वासिंद्र मिश्र :उनके अलावा?
आर.के. यादव :उसके अलावा प्रजेंट चीफ जिसकी मैंने शिकायत की है।

वासिंद्र मिश्र :क्या नाम है उनका?
आर.के. यादव :आलोक जोशी। उसकी भी मैंने प्रधानमंत्री से शिकायत की है और उनके एसेट्स की डिटेल भेजी है।
 
वासिंद्र मिश्र :इसमें संजीव त्रिपाठी का भी कोई रोल है?
आर.के. यादव :संजीव त्रिपाठी भी काफी करप्ट आदमी था।
`मिशन रॉ` के कुछ सीक्रेट्स

वासिंद्र मिश्र :तो क्या आपको पता है कि ये अधिकारी आजकल किस पार्टी में शामिल हैं?
आर.के. यादव :भाजपा में शामिल हुए हैं। हमने इसका विरोध किया है। हमने राजनाथ सिंह को भी उसकी करतूत बताई हैं और नरेंद्र मोदी को भी उसी चिट्ठी भेजी है। साथ ही सुब्रमण्यम स्वामी से भी बात हुई थी। चिट्ठी में कहा है कि आपने स्ट्रैटजी कमेटी जो बनाई है जिसमें आपने रॉ के इस अधिकारी को लिया है ये तो कांग्रेस पार्टी का आदमी है। ये भी मैंने उसमें लिखा है, कांग्रेस के एक सीनियर लीडर हैं जिन्होंने उस अधिकारी को रॉ का चीफ बनवाया था। 

वासिंद्र मिश्र :वो कौन से नेता थे जिन्होंने इसको बनवाया था?
आर.के. यादव :10 जनपथ के नजदीक ही थे वो।

वासिंद्र मिश्र :लेकिन आपके जो विरोधी हैं वो आप पर आरोप लगाते हैं कि आपने पहली बार विभाग में यूनियन बनाया और यूनियन बनाकर जो विभाग का अनुशासन था, विभाग की जो सीक्रेसी थी उसको आपने बर्बाद किया नष्ट किया। इसका असर हुआ कि पूरे विभाग की फंक्शनिंग पर इसका असर हुआ।
आर.के. यादव :ये अगर आरोप है तो अच्छी बात है। देखिए, 1977 में जब मोरारजी देसाई की जनता पार्टी सत्ता में आई तो रॉ पर आरोप था कि रॉ ने देश के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप किया है। मोरारजी देसाई कुछ अड़ियल किस्म के प्रधानमंत्री थे। उन्होंने आर एन काव को कहा कि आप घर जाइए। नंबर टू जो थे उनको कहा कि आप पाकिस्तान में जितने ऑपरेशन हो रहे हैं उनको खत्म कीजिए, बांग्लादेश में जो ऑपरेशन हो रहे थे सब खत्म करिए। उन्होंने ये करने से मना कर दिया तो उनको भी कहा कि आप भी घर जाइए। तीसरे को उन्होंने कहा कि स्ट्रेंथ को आप वन थर्ड खत्म कर दीजिए। नए-नए यंग ऑफिसर वहां लगे थे और हमें वहां अपना भविष्य खत्म होता दिख रहा था। तो हमारे जैसे जो दूसरे लोग थे वो इकट्ठे हो गए। उन्होंने कहा कि कुछ अपने बाल बच्चों के लिए करिए कि ये नौकरी चली गई तो क्या करेंगे। तो मैंने उस बैकग्राउंड को देखते हुए अपने राइट्स के लिए उसमें एक यूनियन बनाई थी। उसको बकायदा रजिस्टर्ड कराया था और उसको एक किस्म का कानूनी रूप दिया था। इसमें कोई हर्ज नहीं, इसमें जो कोई क्रेडिट या डिसक्रेडिट देना चाहे, बुरा नहीं मानता। 

वासिंद्र मिश्र :आप ये मानते हैं न कि दुनिया के किसी मुल्क में इस तरह के सीक्रेट ऑपरेशन में लगी हुई जो एजेंसियां हैं उसमें यूनियनबाजी की इजाजत नहीं है, लेकिन आपने यूनियनबाजी की। 
आर.के. यादव :देखिए यूनियनबाजी मैं इस उम्र में जाकर समझता हूं लेकिन उस वक्त जब हमें अपना भविष्य नजर नहीं आ रहा था, हमारे साथ जो लोग थे जिसमें कई ऑफिसर थे उनको जब डिसमिस कर घर भेज दिया गया उनकी जो हालत हुई, पैसे-पैसे के लिए जो मोहताज हुए। हमें पता है हम कैसे उनका सपोर्ट किया करते थे तो ये एक महज सरकार की ओर से गलत निर्णय था जिसकी वजह से रॉ के कर्मचारियों को यूनियन में आना पड़ा। 90 फीसदी लोग एंप्लाई यूनियन के मेंबर थे। यहां तक कि सीनियर ऑफिसर भी मेंबर थे तो जनता पार्टी सरकार का जो एक्शन था उसकी वजह से हमें लगा कि हमारा भविष्य यहां सुरक्षित नहीं है। 

वासिंद्र मिश्र :यादव जी, सिक्किम मर्जर में क्या रोल था रॉ का और किस तरह से उस ऑपरेशन को आप लोगों ने अंजाम दिया था?
आर.के. यादव :आपने अभी कहा था कि एजेंसी जिस काम के लिए बनी थी उसके लिए सही तरह से यूज नहीं हुई जिसमें मैंने कहा था कि उसमें एक ऑपरेशन बांग्लदेश का था जिसमें रॉ का योगदान था। दूसरा सबसे बड़ा ऑपरेशन जो आर एन काव ने किया वो सिक्किम का मर्जर था। तीन हजार माइल्स की टैरेटरी जो हिंदुस्तान की बाउंड्री में आर एन काव ने मिलाई थी बगैर किसी दिक्कत के इसको मैं ब्लड लेस स्कूप कहता हूं वो भी चाइना की नाक के नीचे। चाइनीज फोर्सेज़ उस वक्त सिक्किम बॉर्डर पर तैनात थी। किताब में भी इस बारे में खुलासा है। रॉ के सिर्फ चार ऑफिसर ने ये किया था। पांचवें को मालूम नहीं था। काव साहब के डिप्टी हुआ करते थे के. शंकरा नायर जिनको काव साहब का शेडो कहा जाता था। मैंने उससे पूछा था, मैनें उनका एक इंटरव्यू रिकॉर्ड किया था जिसकी प्रेरणा से ये किताब लिखी गई। शंकरा नायर ने मुझे बताया कि मुझे इस बारे में मालूम नहीं कि काव साहब ने कैसे प्लान किया और किस तरह किया लेकिन उन चार ऑफिसर ने दो ढाई साल के अंदर इस ऑपरेशन को पूरा किया जिसमें बहुत कम जूनियर ऑफिसर शामिल थे। ये क्लोजली गाइडेड ऑपरेशन था जिसमें चाइना से बहुत बड़ा खतरा भी मोल लिया गया था। 

वासिंद्र मिश्र :गुजराल साहब का क्या रोल रहा है रॉ की फंक्शनिंग को लेकर? 
आर.के. यादव :छोटा सा कमेंट मैंने इस बारे में किताब में दिया है। गुजराल पाकिस्तान से आए हुए शरणार्थी थे। जब वो यहां के प्रधानमंत्री बने तो उनका भी पाकिस्तान प्रेम कुछ ज्यादा ही उमड़ रहा था क्योंकि पुरानी धरती से उनका लगाव था। इसी बैकग्राउंड को मैं देखता हूं कि रॉ के जो ऑपरेशन उस वक्त चल रहे थे पाकिस्तान में उन्होंने सब बंद करवा दिया जिससे देश को बहुत बड़ा धक्का लगा। इन ऑपरेशन को बंद नहीं करनी चाहिए था और उनकी भूमिका को मैं शक के दायरे में लाता हूं कि उनको ऐसा नहीं करना चाहिए था। किताब में ये भी लिखा है कि गुजराल की जान रॉ ने ही बचाई थी। उनपर भी आतंकवादियों का हमला होना था।

मोदी का एक ही लक्ष्य है डेवलपमेंट फॉर ऑल: एम जे अकबर

वासिंद्र मिश्र- अकबर साहब से जानने की कोशिश करेंगे कि नई पार्टी में आने के बाद उनका क्या अनुभव है और नई पार्टी ज्वॉइन करने के पीछे उनकी क्या फिलॉसफी है... 
एमजे अकबर- देखिए पार्टी तो नई नहीं है... 

वासिंद्र मिश्र- आपके लिए... 
एमजे अकबर- देखिए इस बारे में मैं लिख चुका हूं... अंधकार भरा दशक देखने के बाद... इस बार मुझे वाकई लग रहा कि देश के लिए अगले 10 साल बहुत अच्छे जाने वाले हैं... क्योंकि बहुत दिनों के बाद एक किसी भी पॉलिटिकल पार्टी को एक नेतृत्व मिला है......जिस नेतृत्व और जिस नेता का... अर्जुन वाली आंख की तरह सिर्फ एक ही लक्ष्य है डेवलपमेंट ...मैं समझता हूं कि जो आदमी वोट मांगता हो हिन्दुस्तान की इकोनॉमी के लिए वो हिन्दुस्तान के भविष्य के लिए मांग रहा है वो अपने लिए सिर्फ नहीं मांग रहा है...और दूसरी बात,...डेवलपमेंट फॉर ऑल...सबके लिए...सब का मतलब बहुत बड़ा होता है... छोटा नहीं होता है...तो सबके लिए जब मांग रहा है...तो सबका मतलब बड़ा clear signal है कि कोई भी हिन्दुस्तानी जो है उसको पीछे नहीं छोड़ा जाए...तीसरी बात... मैं बहुत इंप्रेस हुआ...देखिए हम जब भी टीवी पर... आपसे मुलाकात हो ..या भाषण देने जाएं...या कुछ भी करने जाएं...तो हम कुछ सोच कर जाते हैं कि भई ये बोलना है, ये बोलना है... बहुत कड़े सवाल करेंगे आप... तो तैयार होकर जाओ.....लेकिन ऐसे माहौल में जहां हम बैठे हैं... अगर यहां एक क्राइसिस हो ... खासकर ऐसा क्राइसिस जिसमें जीवन मरण का सवाल उठ जाए...तो उस क्राइसिस में दिमाग सब कुछ भूल जाता है... और सिर्फ वहीं रहता है जो दिल की बात हो... नब्ज़ की बात हो....पटना में जब नरेंद्र मोदी भाषण दे रहे थे...तो वहां पर जब बम का हमला हुआ... ये हमला सभा में भाषण देने आए लाखों लोगों पर हुआ था ... उस क्राइसिस के वक्त .. जब दिमाग हट कर दिल सामने आता है तब नरेंद्र मोदी ने क्या कहा था ... नरेंद्र मोदी ने कहा हिंदुओं को तय करना पड़ेगा कि वो मुसलमान से लड़ाई करेंगे या ग़रीबी से लड़ाई करेंगे...और मुसलमानों को तय करना पड़ेगा कि हिंदुओं से लड़ाई करेंगे या ग़रीबी से लड़ाई करेंगे... मुझे लगा कि उन्होंने ये कितनी बड़ी बात कही .... हमारे सामने यही चैलेंज है कि मैं और आप एक दूसरे से लड़ें... इसमें किसका नुकसान होता है... आपका होता है मेरा होता है...लेकिन हमसे बढ़कर भी एक चीज है...इससे देश का नुकसान होता है ....ये देश आगे नहीं बढ़ सकता है... मैंने सुना तो मुझे लगा कि इनका मार्ग सही है....और इस मार्ग में हमें बिल्कुल मौका देना चाहिए... और आगे बढ़ना चाहिए... 

वासिंद्र मिश्र- अकबर साहब आप तो कांग्रेस की राजनीति को अच्छी तरह से जानते हैं...और आपने तो बहुत नजदीक से देखा है...आप मेंबर ऑफ पार्लियामेंट रहे..कांग्रेस के टिकट से.. 
एमजे अकबर- हां लेकिन याद दिला दीजिए ना 22 साल पहले की बात कर रहे हैं... ज़माना बहुत बदल गया है... 

वासिंद्र मिश्र- नहीं मैं इंदिरा जी के भी जमाने की बात करना चाहता हूं आपसे...कि कहीं न कहीं आपको लग रहा है कि जैसे इंदिरा जी का एक दौर था.. और इंदिरा वर्सेज़ ऑल हुआ करता था.. तब विपक्ष इंदिरा हटाओ का नारा लगाता था.. इंदिरा जी कहती थीं..हम गरीबी हटाना चाहते हैं.. आज के इस चुनाव में भी मोदी वर्सेज ऑल हो गया है... मोदी डेवलपमेंट की बात कर रहे हैं..और बाकी लोग मोदी को रोकने की बात कर रहे हैं... तो इन दोनों में क्या बेसिक अंतर आपको दिखाई देता है... 
एमजे अकबर- पहले तो मैं इस चीज़ से सहमत नहीं हूं..कि ये मोदी वर्सेज ऑल है.. वाजपेयी जी के वक्त में इनके साथ कितनी पार्टियां थीं ... 23 से 28 तक .... आज बीजेपी की समर्थक पार्टियों की संख्या 25 हो गई है... तो ऐसी बात नहीं है... ये कहना कि ये अकेले हैं, एक षडयंत्र है... सबसे बड़ी बात है कि जनता इनके साथ है... आप कहेंगे कि मुसलमान साथ नहीं हैं.. .यही है ना कहने को...अभी मैं नाम लूं या नहीं... पता नहीं कि उचित होगा या नहीं...पर मैं ले लेता हूं.. इंडिया टुडे का अभी ओपिनियन पोल आया... अभी इस हफ्ते...लेटेस्ट ओपिनियन पोल आया है... आपको आंकड़े सुनकर हैरानी हो जाएगी... बीजेपी के पास बिहार में 23 पर्सेंट मुस्लिम सपोर्ट है... 23 पर्सेंट... जब बीजेपी-जेडीयू गठबंधन था तब ये सपोर्ट 10-11 पर्सेंट होता था... आज वो दोगुना हो गया है... ज्यादा हो गया है... क्योंकि मुसलमान भी समझता है...मैनिफेस्टो देखता है... सुनता है कि एक व्यक्ति कह रहा है कि मैं ऐसा मुसलमान देखना चाहता हूं..जिसके एक हाथ में कुरान हो..और दूसरे हाथ में कंप्यूटर ...इससे ज्यादा और क्या चाहिए... हमें तालीम चाहिए... मुसलमान बच्चे-बच्चियों को क्या नौकरी नहीं चाहिए.. आप हर वक्त उनको एक खौफ के धुंध में फंसा के ले जाते हैं...वोट दिलवा देते हैं...मैं पूछना चाहता हूं... जो खौफ़ की पॉलिटिक्स करते हैं...भय की पॉलिटिक्स करते हैं.. जो धुंध की पॉलिटिक्स करते हैं... कि भइया आलू और प्याज का कोई मज़हब होता है... आज मैनिफेस्टो में लिखा है..इतनी बड़ी बात लिखी है.. आप गौर कीजिएगा...लिखा है कि वक्फ में जो लूट हो रही है... वक्फ में जो लूट हुई है...उसको हम खत्म करेंगे.. उस पर कार्रवाई करेंगे...लड़कियों के लिए हम ज्यादा तवज्जो देंगे... गर्ल चाइल्ड...मदरसा को हम मॉडर्नाइज़ करेंगे... कि जो लड़का बेचारा मदरसे में है...उसको हम साइंस और कंप्यूटर भी सिखाएंगे... वहां पर ऐसी बातें लिखी हैं...जिसको मुस्लिम लड़के और लड़कियों को भी एक मॉर्डन आधुनिक भविष्य नज़र आए.. हर वक्त आपने मुसलमानों के साथ...मैं क्या कहूं.. ..यानी अभी तक मुसलमान नेतृत्व कर रहे हैं...वो मुनाफे के साथ... 

मोदी का एक ही लक्ष्य है डेवलपमेंट फॉर ऑल: एम जे अकबर

वासिंद्र मिश्र- यानी अभी तक...आजादी से लेकर अभी तक जो भी पार्टियां मुसलमानों को हक दिलाने के नाम पर...उनको शिक्षा देने के नाम पर.. उनके धर्म और शरीयत के कानून को बचाए रखने के नाम पर वोट लेती रहीं..वो सब मुसलमानों को धोखा देती रहीं ... ? 
एमजे अकबर- आप देख लीजिए...खुद सच्चर कमेटी की रिपोर्ट देख लीजिए... सच्चर कमेटी की रिपोर्ट तो किसी और ने नहीं बनाया है... ये मनमोहन सरकार ने बनाया है... आप सच्चाई देख लीजिए उसमें...हर पार्टी ने मुसलमान से कुछ लिया है..वोट लिया है..कुछ दिया नहीं है... अब वक्त आ गया है कुछ देने का... भले कुछ लें ना लें....क्योंकि हर हिंदुस्तानी मुसलमान..बड़े फक्र के साथ कहता है कि मैं हिंदुस्तानी हूं... और उसका हक बनता है...और उस हक को अदा करें.. 

वासिद्र मिश्र- अकबर साहब जब आप राजीव गांधी.. के करीबी दोस्तों में थे... और जब आप मेंबर ऑफ़ पार्लियामेंट बने.. तो राजीव गांधी भी क्या इसी ख्यालात के थे..जो मौजूदा कांग्रेस नेतृत्व है.. 
एमजे अकबर- देखिए मैं अब क्या कहूं या न कहूं.. अभी की बात करते हैं.. अभी तो मैंने पिछले दस साल देखे हैं... और इस दस साल में मैं देखा हूं कि मुसलमान जो है... गरीबी के नर्क में है.. उनको धकेल दिया गया है... आप कहीं भी जाकर देख लीजिए ना... मुझसे बात मत कीजिए..किसी भी मुहल्ले में जाकर देखिए... और देखिए इनकी क्या हालत है.. और देखिए दो बार इन्होंने वोट दिया... यूपीए को दो बार... कई बार वोट दिया है... क्या मिला..उसी तरह कहीं ना नौकरी.. कहीं ना तालीम.. आप जो है कितना exploit करेंगे.. बहुत हो गया..और हर बार जब आपसे नौकरियां मांगते हैं.. तो आप किसी न किसी तरह दिखा देते हैं कि भई ये हो जाएगा..वो हो जाएगा... मुसलमान को कांग्रेस एक डरपोक कम्युनिटी समझती है.. समझती है कि हर वक्त वो भय के जाल में फंसाकर वोट.. लेते रहे हैं.. वो जमाना गया... मैं समझता हूं ..खत्म हो गया.. 

वासिंद्र मिश्र- अकबर साहब अभी तक मुसलमानों से उनके दिलो दिमाग में fear psychosis क्रिएट करके उनका वोट लिया जाता रहा...और उनकी जो मूलभूत समस्याएं थीं उसकी तरफ किसी भी सरकार ने ध्यान नहीं दिया तो इस बार का जो मैनिफेस्टो आया है जिसका जिक्र आपने पहले भी किया उसमें दो बातें खास हैं... एक तो ये कि हम equal opportunity देंगे और दूसरा ये कहा गया है कि हम राम जन्मभूमि या बाबरी मस्जिद का जो विवाद है उसका अदालत के जरिए समाधान खोजने की कोशिश करेंगे... आप पत्रकार हैं और नेता भी हैं ... आपसे जानना चाहेंगे कि ...इस तरह के वायदे तो पहले भी अलग-अलग टाइम में अलग-अलग राजनीतिक दलों ने किए हैं तो आपको इतना यकीन कैसे हो रहा है कि जो इस बार का मैनिफेस्टो है इसमें जो बातें कही गई हैं वो हूबहू लागू होंगी अगर सरकार में आने का मौका मिला बीजेपी को ? 
एमजे अकबर- सबसे पहली बात तो मैं ये कह दूं कि जो जो भी वहां लिखा गया है... बहुत सोच-समझ कर लिखा गया है ऐसा नहीं है कि जो बरसों से कहते रहे हैं या पुराने मैनिफेस्टो जो था उसी को फिर से डाल दो..बहुत सोच-समझकर लिखा है....मंदिर का विषय बहुत पुराना है बीजेपी के बनने से पहले का विषय है... ये तो 1857 से पहले का है यहां पर जो शुरू हुई है पूजा... वो जवाहर लाल के जमाने से शुरू हुई है...उनके जमाने में इजाज़त मिली...शिलान्यास राजीव गांधी के जमाने में हुआ तो ये लंबा विषय है..लेकिन इस बार खास बीजेपी ने कहा है कि ये कल्चरल मुद्दा है ये इलेक्शन का मुद्दा नहीं है.. ये कहा है कि हां हम मंदिर बनाएंगे लेकिन सबसे बातचीत करके सबसे सहमति लेके बनाएंगे... ये डेमोक्रेसी है ... हम democratic process से करेंगे... तो मैं समझता हूं कि इसी तरह मुल्क बढ़ेगा आगे... 

वासिंद्र मिश्र- ये बातें तो पहले भी कही जाती रही हैं अकबर साहब, चंद्रशेखर जी ने तो एक अलग सेल बना दिया था 
एमजे अकबर- बात सही है लेकिन बीजेपी ने जो commitment किया है इस बार वो बीजेपी का commitment है और बीजेपी का commitment इसलिए है कि क्योंकि उनके खिलाफ ये प्रचार चलता है कि जबरदस्ती से काम करेंगे...

वासिंद्र मिश्र- नहीं बाबरी मस्जिद का जो ढांचा गिरा उस समय भी commitment था. 
एमजे अकबर - जी नहीं वो जो जमाना था वो और था... उस जमाने में जो था मैंने तो आपको याद दिला दिया कि शिलान्यास किसने किया था....अब बीस साल गुजर गए हैं. 

वासिंद्र मिश्र- अब आपको लग रहा है कि बीजेपी को लग रहा है कि राम मंदिर के नाम पर वोट नहीं मिलेगा इसलिए डेवलपमेंट की बात करो... 
एमजे अकबर- जी नहीं, बीजेपी वोट की राजनीति नहीं करती इन सब चीजों में...और बीजेपी ने ये तय कर लिया है कि अब ये कल्चरल मुद्दा है और इस कल्चरल मुद्दे का सर्वसम्मति से हम एक सॉल्यूशन निकालेंगे और निकालना चाहिए... 10 साल से यही जो सरकार थी इसके पास मौका था. 10 साल से लोगों से बात करके कुछ तो आगे बढ़ते...10 साल से खामोशी क्यों...तो इसलिए एक ये है...आपने और बातें कही हैं. मैनिफेस्टो में मैं समझता हूं बहुत जरूरी हैं...एक तो नौकरी...10 साल से बच्चों की आप ये मुसलमानों की बात कर रहे हैं, मैं मुसलमान, हिंदू सबकी बात कर रहा हूं. जो बच्चा 20 साल का था 2004 में, जो बच्ची 20 साल की थी 2004 में, आज वो 30 साल की हो गई. अगर बच्ची है तो मां बन गई है, बच्चा है तो बाप बन गया है, लेकिन उसकी किस्मत में नौकरी नहीं आई...आपसे मैं कहता हूं आपके 20 से 30 के बीच में नौकरी न मिल पाए तो आपका सेल्फ कॉन्फिडेंस टूट नहीं जाएगा...टूट जाएगा... आपकी जिंदगी बर्बाद हो जाएगी, तो इस यूपीए ने तो एक जेनरेशन की जिंदगी बर्बाद की है...आज अगर गुस्सा है कि इस सरकार के खिलाफ तो इसके बड़े कारण हैं. इसके बड़े सॉलिड कारण हैं...तो ये जो है अगले 10 सालों में नौकरी वापस लाओ, रोटी वापस लाओ... मुझे एक सज्जन ने अभी जब मैं बंबई गया था. तो जब गाड़ी चला रहा था तो उन्होंने बहुत अच्छी बात कही... बॉम्बे के बारे में, कहा कि देखिए अगर ऐसा ही चलता रहा तो 5 साल में बॉम्बे से मिडिल क्लास गायब हो जाएगा.यानी मिडिल क्लास इतना गरीब बन जाएगा कि अपने आप को मिडिल क्लास कहने के लायक नहीं रहेगा...ये है जनता के दिल की आवाज़... और ये जो है इसलिए... अब और आप जो कह रहे हैं मैनिफेस्टो में, उर्दू की हम जो माइनॉरिटी की हैरिटेज को बचाएंगे और उर्दू को प्रमोट करेंगे, ये सब जो हैं कई वादे हैं जो बीजेपी ने दिए हैं...और मैं ये समझता हूं कि ये बहुत सोच समझ के दिए हैं राइट और मेरा पूरा यकीन है कि ये गुमराह करने के लिए नहीं है. 

वासिंद्र मिश्र- माने ये महज चुनावी वायदे नहीं हैं बीजेपी को सत्ता में लाने के... एक बहुत गंभीर आरोप लग रहे हैं नरेंद्र मोदी पर बार-बार कि एक तो नरेंद्र मोदी पार्टी से ऊपर होकर काम कर रहे हैं, और दूसरा आरोप ये लग रहा है कि नरेंद्र मोदी कॉर्पोरेट घरानों के प्रोजेक्टेड प्राइमिनिस्ट्रियल कैंडिडेट हैं 
एमजे अकबर- लोगों के पास कहने के लिए कुछ नहीं रहता है तो ये सब पता नहीं कहां उड़ा के आते हैं...नरेंद्र मोदी तीन इलेक्शन जीत चुके हैं. ये कॉर्पोरेट के कहने पर वहां की जनता इलेक्शन जिता रही है क्या ? ... आज नरेंद्र मोदी ह्रदय सम्राट हैं देश के... ज़ी ने ओपिनियन पोल की है आपने भी किए हैं...किए हैं कि नहीं, तो जनता क्या कह रही है, जनता की आवाज़ सुनो. जनता कह रही है कि ये हमारी बात कर रहा है. ये wasted interest की बात नहीं कर रहा है. 

वासिंद्र मिश्र- अकबर साहब आपको नहीं लग रहा है इस समय देश का जो राजनैतिक माहौल है वो पोस्ट इमरजेंसी जैसा बनता जा रहा है कि जनता आगे आ गई थी और राजनैतिक दल पीछे हो गए थे कांग्रेस के खिलाफ...कमोबेश वैसी ही स्थिति दिख रही है इस बार... 
एमजे अकबर- पता नहीं अब इतिहास बताता है कि कोई एक आईना नहीं है. कोई भी एक वक्त पिछले का पूरा आईना नहीं होता क्योंकि वक्त एक नई दिशा लेता है हर वक्त और जब नए सिचुएशन होते हैं तो कोई exact comparison नहीं कर सकता मैं...लेकिन इतना जरूर है कि ये इलेक्शन एक शुरुआत है..नई शुरुआत 

वासिंद्र मिश्र- बदलाव की ? 
एमजे अकबर- अब ये हिंदुस्तान बदलेगा... अभी तक जो हिंदुस्तान करवट लेकर नीचे की तरफ जा रहा था...इस बार करवट लेकर खड़ा हो रहा है...और जब मुल्क खड़ा होता है तब बहुत पावरफुल होता है मुल्क और खास तौर पर हमारे हिंदुस्तान की और हमारे भारत की जो ताकत है वो एकता में है ... .मैं समझता हूं दुनिया कांप जाएगी इस ताकत से.

वासिंद्र मिश्र- आजकल एक विवाद शुरू हुआ है और डिबेट हो रहा है उस पर. दो किताबें आई हैं एक किताब परख साहब की और दो दिन पहले आपके शायद जूनियर कलीग रहे होंगे एक समय में... 
एमजे अकबर- नहीं मेरे कलीग नहीं 

वासिंद्र मिश्र- संजय बारू. हम लोगों ने टाइम्स ऑफ इंडिया में काम किया है ...उस समय संजय भी थे टाइम्स ऑफ इंडिया में...ये दो किताबें आई हैं. एक लेखक होने के नाते आपने भी ढेर सारी किताबें लिखी हैं उन किताबों से ज्यादा उन किताबों के रिलीज़ होने के टाइमिंग पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं.और कहा जा रहा है इन किताबों के जो लेखक हैं उनका कहीं न कहीं पॉलिटिकल एजेंडा है....और इन किताबों के ज़रिए वो मौजूदा सरकार को, मौजूदा सत्तारूढ़ पार्टी को डैमेज करना चाहते हैं चुनाव में...कंटेंट पर कम उनके टाइमिंग और intetion पर ज्यादा debate हो रहा है... आपकी नजर में एक राइटर के नाते, एक वेटरन जर्नलिस्ट के नाते उन किताबों में जो बातें लिखी गई हैं. उसमें कितनी आपको रियलिटी नज़र आ रही है. 
एमजे अकबर- देखिए सच तो वो जानता है जो अंदर था मैं तो अंदर नहीं था आप तो अंदर नहीं थे इस हुकूमत के...ये तो वो लोग थे जो प्राइम मिनिस्टर के साथ काम किए थे, ये रोज देखते थे कि क्या हो रहा है, देखते थे कि प्राइम मिनिस्टर और मिसेज सोनिया गांधी में रिमोट कंट्रोल कितना है कौन ऊपर है कौन नीचे है. कौन व्यक्ति जो है वो यहां की बात वहां पहुंचाता है, कहां से असल ऑर्डर आते हैं और कहां पे नकली चेहरा दिखाया जाता है. यही लोग जानते हैं तो ये जो हैं अब सामने आए हैं. इससे ये ज़ाहिर होता है कि सच्चाई को आप कुछ देर तक धुंध में छुपा सकते हैं लेकिन सच्चाई कभी गायब नहीं होती. एक न एक दिन तो सच्चाई उठकर आकर अपने आप को ज़ाहिर करेगी. 

वासिंद्र मिश्र- Truth Always Prevails
एमजे अकबर- yes truth always prevails

वासिंद्र मिश्र- नहीं ....उसमें जो कंटेंट है... 
एमजे अकबर- वो खुद ये कह रहे हैं, कि ये मैंने खुद देखा था. अब मैं ये क्यों कहूं कि वो झूठ कह रहे हैं, दूसरी बात कि वो कौन सा वक्त चुने हैं पब्लिकेशन के लिए, भई अब तो ये उनकी मर्जी है और उनके पब्लिशर का फैसला है वो तो अपनी जगह है उस डिबेट में शामिल होने से मेरा क्या फायदा है...लेकिन एक बात ज़रूर है मैं खुद सोचता हूं एक व्यक्ति की तरह not as a party person, एक व्यक्ति की तरह मैं सोचता हूं अगर आप देख रहे थे कि कुछ हालात ऐसे हो रहे हैं जिससे मुल्क की बर्बादी हो रही है, मुल्क की बर्बादी हो रही है तो आपका conscience कहां था. 

वासिंद्र मिश्र- उस समय आपने क्यों नहीं विरोध किया... 
एमजे अकबर- उस समय आपको विरोध करना चाहिए था. आप जो भी पूर्व सेक्रेटरी हों या जो भी... 

वासिंद्र मिश्र- मीडिया एडवाइज़र ही थे... 
एमजे अकबर- हां और आप मीडिया एडवाइज़र थे और आप देख भी रहे थे कि मेरा मुल्क बर्बाद हो रहा है तो शायद उस वक्त ही आपको कुछ कहना था और उस वक्त अगर कहते तो शायद ये बातें इतनी बुरी तरह से बाहर नहीं जातीं...लेकिन चलिए जो भी हुआ हो ... I don`t want to criticise ... लेकिन देर आए दुरुस्त आए. 
वासिंद्र मिश्र- बहुत-बहुत धन्यवाद 

गरीबों के विनाश पर, वाड्रा का विकास: अग्निवेश

वासिंद्र मिश्र.. स्वामी अग्निवेश अलग-अलग समय में अलग-अलग कारणों को लेकर चर्चित रहे हैं चाहे बंधुआ मुक्ति आंदोलन हो या इंडिया अगेंस्ट करप्शन हो या जो आदिवासी है गरीब तबके के लोग हैं उनके हक और हकूक दिलाना हो.. कई सारे मुद्दो को लेकर अग्निवेश जी ने अपने सार्वजनिक जीवन में एक लंबा वक्त बिताया है... अग्निवेश जी सबसे पहले हम आपसे जानना चाहेंगे कि जो मुहिम आपने शुरू की थी गरीबों की जमीन आदिवासियों की ज़मीन भू माफिया के हाथ में न जाएं.. पिछले दस वर्षों में आपका क्या अनुभव रहा हैं......और कहां तक पहुंचा आपका ये आंदोलन?
स्वामी अग्निवेश- हम ने जब बंधुआ मुक्ति का आंदोलन शुरू किया.. 1980-81 में उससे पहले में शिक्षा मंत्री था हरियाणा सरकार में और मुझे खुद भी नहीं पता था की बंधुआ मजदूरी एक लानत हैं और इस प्रकार कानून भी बना हुआ है...1976 का कानून लेकिन जब मैं उस प्रसंग में जुडा और मैंने इस्तीफा देकर के मंत्री पद से सीधे पत्थर खदान मजदूरों में जाकर फरीदाबाद में काम करना शुरू किया तब मुझे पता चला कि ये जो आज हमारे देश में बंधुआ मजदूर हैं वो सौं दो सौं या दस बीस हजार नहीं है.. लाखों करोड़ो हैं और ये करोडों लोग कौन हैं जिनकी ज़मीने किसी और ने हथिया ली हैं जो परंपरागत तरीको से सैकड़ों साल से या हजारों साल से अपने जल जमीन जंगल पर बसे हुए थे और वहां से अपनी जीविका चलाते थे लेकिन जो षड़यंत्रकारी तरीके से विकास की अवधारणा बनती चली गई आजादी के बाद से खास कर के पिछले दस पंद्रह सालों में बीस सालों में मैंने यह महसूस किया की हमारा पूरा का पूरा ढ़ांचा जिसे विकास का नाम दिया जाता हैं वो गरीबों के विनाश पर खड़ा हैं। 

वासिंद्र मिश्र- हम इसी पर आएंगे आपसे बात करेंगे.. आप हरियाणा की बात कर रहे हैं. हरियाणा, छत्तीसगढ़, उड़िसा, राजस्थान इन राज्यों में पिछले दस वर्षो का अगर आकड़ उठाकर देखे तो जितनी सरकारी योजनाएं बनी है.. जल जंगल जमीन आदिवासी गरीब तबके के नाम पर उनकी भलाई के नाम पर उसका अगर सर्वाधिक फायदा उसे मिला .. जो की पांच सतारा होटलों में बठता हैं जो माफ़िया हैं जिनकी साठगाठ है सरकार में ऊंचे पदो पर बैठे हुए लोगों से और इसमें अभी जो हाल में चर्च एक बार फिर शुरू हुई हैं... रॉबर्ट वाड्रा कि उनको लेकर भी आपने एक याचिका दाखिल कर रखी है.....उस याचिका में आपने क्या तथ्य लगाए हैं सुप्रीम कोर्ट के सामने और आज उस याचिका का क्या स्टेटस है?
गरीबों के विनाश पर, वाड्रा का विकास: अग्निवेश

अग्निवेश जी- देखिए रॉबर्ट वाड्रा क्योंकि एक ऐसे परिवार से संबंधित हैं जिसको देश का प्रथम परिवार कहा जाएगा.. सत्ता की दृष्टि से उसको फायदा पहुंचवाना उसके लिए हमारे देश का जो सबसे बड़ा बिल्डर जिसको मैं बिलडर माफिया भी कह सकता हूं DLF उसको आगे किया उसने जा करके रॉबर्ट वाडरा को बहुत गलत तरीके से फायदा पहुंचाया... कुछ लाख रूपये पहले तो अपने एकाउंट से वो दिया उधार उससे उनको जमीन खरीद कर दी वो जमीन खरीदी हुई को फिर खुद खरीद लिया DLF ने कई गुना ज्यादा दामों पर तो इस तरीके से आपस की जैसे मिलीभगत से वो लखपति से करोड़पति से अरबपति बनते चले गए और देखते देखते कुछ चंद महिनों में ही वो 300-350 करोड़ रुपये के मालिक बन गए रॉबर्ट वाड्रा जी अब उनके ऊपर तो कोई हाथ ड़ाल नहीं सकता ये जनता है DLF बड़ी आसानी से ..अब DLF से कोई चैरिटी के लिए तो कह नहीं रहा था ..ये न कोई रॉबर्ट वाड्रा की गरीबी को देखकर दिल पसीज़ गया और उसको कहा कि लो ये लेलो .. ऐसा नहीं था उसको अपना ऊल्लू सीधा कराना था तो हरियाणा सरकार ने कहा कि भई ये काम तो तुम्हारा मैंने ही कर दिया ..इस प्रथम परिवार में मैंने अपनी घुसपैठ ऐसी जमा ली अब तुम जो भी कुछ करोगें उसकी भी कोई जांच नहीं हो पाएंगी...अब मेरा फायदा करो हरियाणा सरकार चाहती थी हमारे भूपेंद्र सिंह हुड्डा जी की सरकार कि हमे DLF को बहुत बड़ा कुछ देना हैं तो ये गुड़गांव का एक वजीराबाद एक गांव हैं वहां सैकड़ो एकड़ जमीन गांव जहां पर जंगल लगे हुए ग्रीन हैं जो फॉरेस्ट के अंतर्गत आता हैं तो उसको उन्होंने कहा कि ये तुम को दे देते हैं उसके लिए तिकडम बाजी की दो तरीके के पहले विज्ञापन किए पहले को रिजेक्ट किए दूसरे विज्ञापन में कहा कि हम खुद परमीशन लेकर देंगे सरकार से जो ग्रीन ट्रिब्युनल ..ये उसके साथ जो होता हैं Ministry of Enviorment वगैरह से अब Ministry of Enviorment से न लेकर के उन्होंने एक और तीसरा रास्ता निकाला।

वासिंद्र मिश्र- स्वामी जी ये जो कहानी आप बता रहें हैं ये कोई नई नहीं हैं पिछले दो तीन वर्षों से लगातार किश्तो में देश के अखबारों में T.V चैनलों में अलग-अलग रुप में देखने को मिली हैं पढ़ने को मिली हैं आपको नहीं लगता की इसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष सब शामिल हैं इस तरह के साठगांठ को एक्सपोज़ करने में इस तरह के जो साठ गांठ में शामिल लोग हैं उनके विरुद्ध कार्यवाही कराने में किसी की कोई दिलचस्पी नहीं हैं चाहे वो सत्ता पक्ष हो या विपक्ष हो?
अग्निवेश जी- नहीं एक्सपोज करने में तो मुझे नहीं लगता कि सत्ता पक्ष और विपक्ष की कोई ख़ास दिलचस्पी हैं....क्योंकि दोनो इसमें पूरी साठ-गाठ जो आप कह रहें हैं उस तरह बना हुआ हैं क्योंकि वो कहते हैं हम तुम्हारा न करे एक्सपोज हम तुम्हारा न करें इस तरह से मिल बांट करके खाते रहें लेकिन जब एक्सपोज हो गया तो इसके अलावा हमारे पास कोई चारा नहीं था कि हम सुप्रीम कोर्ट मे जाएं सुप्रीम कोर्ट के द्वारा नियुक्त C.E.C Centraly Empowerd जो कमेटी हैं उस व्यक्ति को इस्तमाल करने के लिए हरियाणा सरकार ने क्या किया कि वो उन्होंने उसमें याचिका ड़ाली अपनी और वो रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अपने C.E.C से कि भी देखों ये ज़मीन कैसी हैं देखकर के बताओं तो वो उस ज़मीन को जो forest हैं उसे गैंर Forest Area या इस तरीके से इसको यहां से हटाकर के Compensatory foresting कर सकते हैं यानी सरकार और ये माफिया गठजोड का सबसे नापाक गठजो़ड जिसको कह सकते हैं कि आपने सुप्रीम कोर्ट को आप ने एक अंधेरे में रखा सुप्रीम कोर्ट के सबसे विश्वसत व्यक्ति जिसके ऊपर जज आंख मुंद कर विश्वास करते हैं आपने उसको मैनीपुलेट किया अपने फेवर में।

वासिंद्र मिश्र- इसमें एक घटना याद आ रहीं हैं इंदरा गांधी का जमाना था जब और संजय गांधी राजनीति में उनका वर्चस्व बढ़ रहा था धीरे-धीरे खास तौर से दखद आंदाजी बढ़ रहीं थी शासन के काम काज में तो उस जमाने में भी तमाम मुख्यमंत्रियों ने संजय गांधी को खुश करने के लिए या इंदरा जी को खुश करने के लिए तमाम ऐसी योजनाएं शुरू कर दी थी अपने अपने राज्यों में जिससे की जनता का तो भला नहीं हो रहा था लेकिन संजय गांधी और उनसे जुड़े हुए लोगो का भला हो रहा था उस समय भी आपका हरियाणा जो आगे था और इस समय भी जो घटनाएं देखने को मिल रहीं हैं आपका हरियाणा राजस्थान ये जो राज्यों के मुख्यमंत्री रहे हैं पिछले कुछ वर्षो में इन्होंने बहुत ही Calculated तरीकों से चाहें land law change करने का मामला हो या land aquisition का मामला हो या land aquisition act बनाने का मामला हो उसी तरीके के कानून बनाए गए जिससे रॉबर्ट वाड़रा को फायदा पहुंचे अब आपको नहीं लग रहा हैं जब यह कानून बन रहा था उस समय उस समय विपक्ष क्यों चुप ता उस समय सरकार की बाकी Agencies क्यों चुप थी और अब जब चुनाव का time हैं तो फिर एक बार इसे मुद्दा बनाया जा रहा हैं?
अग्निवेश जी- नहीं आपका कहना ठीक हैं ये इमानदारी से मुद्दा बना करके उसे अंतिम निष्कर्श तक नहीं ले जाएंगे ये उछाल उछाल करके बीच में से उसका छोटा सा दोहन कर लेंगे उसमें से राजनीतिक लाभ लेंगे लेकिन यदि विपक्ष के लोग भी ईमानदार हो तो ये बहुत सी चीज़े निकलेंगी इसके अंदर तो ये जो हैं थोड़ा या उछाल देना फिर पीछे हठ जाना ये इस तरह की रणनीति हैं मैं समझता हूं ये बहुत गंदा कर रहा हैं... विश्वसनीयता खत्म हो रहीं हैं.. यानी किसी के ऊपर आरोप लगाएगें भी और फिर पीछे हठ जाएंगे काले धन के बारें में भी ये करेंगे ज़मीन के सौदेबाजी के बारे में ये करेंगे और जैसे राजस्थान में भी वो जिस समय आशोक गहलोत जी मुख्यमंत्री थे उस समय भी रॉबर्ट वाड्रा को काफी कुछ ज़मीने वहां दी गई तो ये जो सारा का सारा एक बार उछालना और फिर चुप हो जाना तो ये जो हैं एक ब्लैक मेलिंग का तरीका है।

वासिंद्र मिश्र- क्या तरीका हैं इस तरह के लोगो से निपटने का लड़ने का इस तरह के जो असमाजिक तत्व है उनसे निज़ात पाने का या जनता को निज़ात दिलाने का आपकी नजर में क्या माकूल तरिका हैं?
अग्निवेश जी- देखिए माकूल तरिका तो यही था भ्रष्टाचार के खिलाफ जैसे हम लोगो ने लड़ाई शुरू की थी इंडिया अगेंस्ट करप्शन के नाम से और हमें उम्मीद थी की ये बहुत दूर तक जाएगा केवल ये जनलोकतंत्र के सवाल तक ही समित नहीं रहेगा लेकिन हर तरीके हर तरीके के भ्रष्टाचार को उठाते उठाते देश को एक ईमानदार समाज की तरफ ले जाएगा वो था हमारा वो तरीका अब वो बीच में ही जैसे भ्रूण हत्या हो गई।

वासिंद्र मिश्र- ब्रेक के बाद आपका स्वागत हैं स्वामी जी हम चर्चा कर रहे थे कि भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए एक मुहिम शुरू हुई थी उस मुहिम के शुरूआती दौर में आप भी थे अन्ना हजारे थे और भी तमाम लोग थे लेकिन ज्यों ज्यों मुहिम आगे बढ़ी फिर उसमे कलब शुरु हो गई ..जिसका नतीज़ा यह हुआ के आपने कुछ दिन बाद ही उस मुहिम से अपने को अलग कर लिया उसके बाद जो धीरे-धीरे आज जो उस मुहिम का हश्र हुआ वो देश की जनता के सामने है इस नाकामी के लिए आप किसको सीधे तौर पर जिम्मेदार मानते हैं?
अग्निवेश जी- देखिए जब ये आंदोलन शुरू हुआ था ये हमारा दफ्तर हैं 7 जंतर मंतर रोड पर यहीं पर सारी मंत्रणाए सारे विचार चलते थे अरविंद केजरीवाल जी, मनीष सिसौदिया जी, किरण बेदी जी आयी फिर चर्चित संतोष हेगड़े और तमाम हम लोग जुड़ते जुड़त प्रशांत भूषण जी उनके पिता श्री सब लोग कहने का मतलब जब ये आंदोलन शुरू हुआ था इसमें सहयोग बड़े जोर शोर से मिला बाबा रामदेव जी का श्री श्री रविशंकर जी का आर विशंसकंसरा़व का सब लोगो को लगा कि यह बहुत तेज बड़ी मुहिम बन सकती हैं और सब लोग काफी ईमानदारी से साथ जुड के काम करना चाहते थे अब जैसे जैसे आंदोलन सचमुच में व्यापक बनता चला गया तो उससे कुछ निकालने का विचार यदि किसी के मन में बना तो वो महत्वकांक्षा जगी अरविंद केजरीवाल के मन में और उन्होंने उस समय अन्ना हजारे को अपने पूरी पकड़ में रखकर के उन्होंने कोशिश की अब मैं किसी तरिके से ये शहिद हो जाए इस आंदोलन में तो मैं सिधे इनका उत्तराधिकारी बनकर के आगे जो मैं आगे चलाऊ उसको अन्ना हजारे को खुद भी जब समझ में आयी तब उन्होंने अपनी जान बचाई विलास रॉव देशमुख के घर पर अपने लोगो को भेजा रालेगण गांव सिद्धि के जो कार्यकर्ता थे और उन्होंने आकर के फिर एक चीट्ठी वीट्ठी का बीच बचाव करके अन्ना जी के अनशन तुड़वा दिया।

वासिंद्र मिश्र- ओ सही है.. वो तो देश की जनता ने देखा था जब राम लीला ग्राउंड में जिस तरिके से उसका खात्मा हुआ आंदोलन का मैं यह जानना चाह रहा हूं आपको नहीं लगता कि जो भ्रष्टाचार मिटाने के नाम पर जो मुहिम शुरू हुई थी उस मुहिम में जो लोग शामिल थे वो खुद भ्रष्टाचार मे लिप्त हो गए उसी तरह की चंदा उगाही उसी तरह की डोनेशन उसी तरह की फंडिंग वे भी लेने लगे जिस तरह कि फंडिंग और डोनेशन लेकर बाकी पार्टियां भ्रष्टाचार को परवान पर चढ़ाई हुई हैं?
अग्निवेश जी- अब ये तो कोई जांच होगी तो पता लगेगा ज्यादा अच्छी तरह से अभी तो। 

वासिंद्र मिश्र- नहीं आपने भी तो ज़िक्र किया था जब फंडिंग की बात आयी थी इंडिया अंगेस्ट करप्शन का दुरुपयोग हो रहा है?
अग्निवेश जी- मैंने कहा था कि जो 5 करोड़ रुपये भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के पैसे थे उस अकाउंट को कंट्रोल कर रहे थे मनीष सिसौदियां और अरविंद केजरीवाल पब्लिक रिसर्च फाउंडेशन के नाम से अकाउंट खोला हुआ था हम जैसे जो लोग काम कर रहे थे हमे भी पता नहीं था की सारा पैसा जो जनता एक भावुकता और उसके साथ समर्पण भाव से दे रही हैं वो जा कहा रहा हैं तो पांच करोड़ रुपये से भी ज्यादा रुपया था जो बाद में वो आंदोलन को दरकिनार कर के और पार्टी बना ली गई आम आदमी पार्टी तो गया कहा वो पैसा तो उस समय पूरा यह संदेह हुआ की सारा का सारा पैसा उसी account में उन्ही लोगो के द्वारा अपनी पार्टी को आगे चमकाने के लिए इस्तमाल किया गया।

वासिंद्र मिश्र- तो मानें कि आंदोलन में जो बिखराव आया जो भटकाव आया उसका एक प्रमुख कारण यही वहीं था चंदा था जिसको लेकर बंदर बाट शुरू हुई एक तो पॉलिटिकल माइलेज लेने की मंशा थी दुसरा आर्थिक मंशा धन जुटाने की?
अग्निवेश जी- नहीं आर्थिक जुटाने का जो लोग स्वता स्फूर्त भी दे रहे थे तो बड़ा लोगो में जो जोश पैदा हुआ ये तो अच्छा बात थी लेकिन वो जो जनशक्ति थी उसमें से जो धन शक्ति निकल कर आई तो उसके ऊपर एकाधिकार करना और फिर उसमे से आपकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरी करने के लिए तो में क्या बताऊ देश की राजनीति में जो प्रयोग हुए इस तरह का जो प्रयोग हुआ उससे काफी कुछ लोगो में एक उम्मीद की किरण जगी भी फिर उनमें निराशा भी हो रही हैं तो ये दोनो तरह की बाते धाराएं चल रही हैं।

वासिंद्र मिश्र- स्वामी जी इस बार के चुनाव में एक बड़ा मुद्दा है प्राकृतिक संसाधनों की लूट चाहे कोयला हो स्पेक्ट्रम की लूट हो 2G हो ये जितने बड़े बड़े घोटालो की चर्चा हो रही हैं पिछले लगभग दो वर्षो से चुनाव के दौरान भी हो रहीं हैं. इसमें आप किसको खास तौर पर जिम्मेदार मानते है..क्या इसमें सरकार ही जिम्मेदार हैं या राजनीतिक दल जिम्मेदार है या सिस्टम जिम्मेदार हैं या सब मिल जुल के इस लूट में शामिल हैं?
अग्निवेश जी- देखिए ये लूट केवल भारत में नहीं हो रहीं है पूरे आप मध्य अफ्रिका के तमाम नाईजीरिया से लकर के फांगो का उनका देखे और भी लेटिन अमेरिका के देशो का देखे तो पूरी दुनिया के अंदर बड़े बड़े जो कॉरपोरेट्स हैं.... और उन्होंने जो विकास का मॉडल बनाया हैं वो इस खनिज संपदा के दोहन पर इनकी लूट पर खड़ा हुआ है...और वो भारत में पूरी ताकत इस लिए लगाए हुए है.. कि जिसको हम रेड कॉरिडोर कहते हैं जो आदिवासी बहुल ईलाका हैं..वही पर हमारे देश की सारी संपदा केंद्रित हैं अब यदी वहां पर उस खनिज संपदा को निकाल कर के कॉरपोरेट्स के हवाले करना और उसमें से GDP को 7% से 9% पहुंचाना तो ये यदि एक लक्ष्य है हमारी सरकारो को तो बाकी कानूनो को घटा बढा करके और कानून कानून को नहीं उन आदिवासियों को जो सदियों से वहां बसे पड़े हैं वे गरीब है बेशक लेकिन सीधे साधे सरल लोग है उनके पास भूमी का पट्टा भी इस तरीके से नहीं हैं जो एक कानूनी ढ़ग से होना चाहिए वास्तविक मालिक वो लोग है अब उन लोगो को वहां से उजाड़ा जाए एक सर्वा जुलूम पैदा किया जाएगा उनके गांव के गांव खाली करा दिए जाएंगे लाखो लोगों को और फिर पूरी ताकत लगा दी जाएगी पुलिस और ये सब लगा करके CRPF की उनको हटा दिया जाएं उनकी मल्कियत से अब लो अपनी रक्षा के लिए कुछ धनुष बाण उठाए मुकाबला नहीं कर सकते तो उनके लिए आगे आ जाते हैं माओवादी आ जाते हैं नक्सलवादी तो कहते है ये नकसलवादि को मिटाना हैं इस नाम से नक्सलवादी तो कम मरते हैं गरीव आदिवासी ज्यादा मरते हैं।

वासिंद्र मिश्र- उन नक्सली गतिविधियों में जो शामिल हैं...जो एक तरफ जैसे आप जैसे लोग जो एक्सट्रीम में जाकर इस तरह के जो तत्व है उनके बचाव में आप खड़े होते हैं वे कॉरपोरेट घराने जो एक तरफ सरकार की मदद कर रहें हैं जो Natural Resource है उसपर इनका एकाधिकार हो दूसरी तरफ नक्सलियों की भी मदद कर रहें हैं उनको आर्थिक मदद कर रहे हैं जैसे की उस Area में Insurgency बनी रहे और जो आम लोग है जो Civil life हैं वो Disturb रहें तो Corporate और नक्सलियों के बीच की जो साठ- गांठ हैं उसका फायदा उठा कर वो Natural संपदा का दोहन भरपूर मात्रा में कर सके?
अग्निवेश जी- बिलकुल ठिक कह रहे हैं आप ये जो Nexus ऐसा बना हुआ हैं की नक्सली इधर कर रहे हैं आदिवासियों को कि हम तुम्हारी रक्षा कर रहे हैं तुम्हारी जल जमीन जंगल की कुछ हद तक कर भी रहे होंगे लेकिन उनकी साठ-गांठ उन बड़े बड़े Corporate और लूटेरे परिवारों से उनसे लेन देन भी उनसे चल रहा हैं अब सरकार क्या कह रही हैं कि हम शांति लाने के लिए वहां और स्कूल और अस्पताल खोलने के लिए हमे पुलिस और CRPF भेज करके सफाई करनी हैं नक्सलवादियों से इस नाम से वो आदिवासियों को मार रहे हैं उनकों निर्दोष लोगो को जेलों में सढ़ा कर के Torture कर रहे हैं यह सब काम एक तरफ हो रहा हैं।

वासिंद्र मिश्र- लेकिन आप उन नक्सलियों का क्यों मदद करते हैं?
अग्निवेश जी- नहीं बिलकुल नहीं कर रहा मैं ...... मैं न नक्सलियों की मदद कर रहा हूं न Corporates की कर रहा हूं न सरकार की कर रहां हूं मेरा काम केवल इतना था जब 76 हमारे जवान मारे गए तो उनकी निंदा करके बाकायदा नक्सलियों की निंदा करे और मैं अपने तमाम दोस्त मित्रो के साथ जिसमें प्रभुत्व गांधी वाधी और वैज्ञानिक सब लोग हम लोग राय पुर से दंत्ते वाड़ा यात्रा लेकर गए हमारा नारा यह था कि गोली से नहीं बोली से हम नक्सलियों को ये कह रहे थे कि तु्म्हारी गोली से जो निर्दोष हमारे बचारे गरीब किसानो के बेटे है CRPF के जवान वे मारे जा रहे हैं और सरकार से हम कर रहे हैं कि तुम इसके मुकाबले नक्सलियों को तो नहीं मार पा रहें तुम जो मार रहे हो गरीब आदिवासियों को मार रहे हो तो Cross Fire में आदिवासी मारा जा रहा हैं. हमने कहा था कि ये जो गोलियों से बातचित मत करो आपस में बल्कि बातचित के द्वारा Dialouge के द्वारा इस समास्या का समाधान करो तब मुझे तब भारत सरकार के तत्कालिन ग्रह मंत्री पी चिंदबरम ने पत्र देकर के कहा जो ये आपने कहा हैं हम आपको अधिकारित हैं Introlaw cuter बनाते है आप ये काम कीजिए और जब मैंने उस काम में सफलता ला करके 20 दिन के अंदर उनको लाकर दे दी नक्सलियों के जो सबसे प्रमुख उनके नेता जो उनके प्रवक्ता था उन्होंने दस्तख़त करके पत्र भेज दिया मुझे हम बातचीत के लिए तैयार हैं चिंदबरम जी चाहते थे 72 घंटे के लिए अर्थात तीन दिन के लिए बंदूके दोनो तरफ बंद हो जाए उन्होंने कहा कि हम तीन दिन नहीं तीन महिने और छह महिने के लिए तैयार थे अब जब ये पत्र मैने चिंदबरम जी को दिया मुझे उम्मीद थी की अब वो आगे बढ़कर के कहते कि स्वामी जी आपने कमाल कर दिया वो तैयार है तो आओ जल्दी करे हम मैं उसी चिट्ठी को लेकर के चिंदबरम जी की चिट्ठी को लकर तिहाड़ जेल जो दिल्ली में जो है वहा कोबाड़ गांधी जो नक्सली Polit bureau के Member जो जेल में है उनसे में मिला उन्होंने भी कहा कि मैं बहुत बढ़िया है बातचीत के द्वारा हल हो मैं नारायण सनियाल जी से जाके रायपुर की Central jail में मिला उन्होंने भी इसका स्वागत किया तब में चाहता था कि बातचीत से यदि संभव हो जाएं तो ये जो सारा अंदर का जो गठजोड़ है ये भी मीडिया के सामने साफ आ जाएगा किस किस Corporate घराने का नक्सलियों को Supportदी जा रही हैं छिपे तौर पर।

वासिंद्र मिश्र- तो माने जो डेड लॉ़क पैदा किया तो उसमे फिर एक बार सत्ता की साज़िश शामिल है?
अग्निवेश जी- आजाद को मार डाला गया फेक एनकाउंड में वो बहुत बड़ा सेट बैक था ये लोग नहीं चाहते थे न सरकार न कॉरोपोरेट चाहते थे की ये बातचीत सफल हो और उसको जो उनकी तरफ से तैयारी आयी थी उसको उन्होंने खत्म कर दिया। 

वासिंद्र मिश्र- बहुत बहुत धन्यवाद! 

शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014

Accidental Prime Minister ?


इसमें कोई शक नहीं है कि संजय बारू की किताब 'Accidental Prime Minister: The making and Unmaking on Manmohan Singh' में जो खुलासे हुए है उससे ना सिर्फ भारतीय जनता पार्टी की तरफ से लंबे वक्त से लगाए जा रहे आरोपों को बल मिला है बल्कि इन खुलासों की वजह से कांग्रेस के लिए मुश्किलें भी बढ़ती दिख रही हैं ... विरोधियों को एक और मौका मिला है कि वो कांग्रेस को कठघरे में खड़ा कर दे ...

मनमोहन सिंह के बारे में विपक्ष लगातार दस साल तक ये आरोप लगाता रहा कि सत्ता की चाभी सोनिया के हाथ में है ... और ये देश के हित में नहीं है कि प्रधानमंत्री पद पर ऐसा व्यक्ति हो जो फैसले रखने का अधिकार तक नहीं रखता हो या जो अपने अधिकार दूसरे ''पावर सेंटर'' के हाथ में सौंप दे ... हालांकि विपक्ष की तरफ से लगाए जा रहे आरोपों का कई बार मनमोहन सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके खुद खंडन किया है ... लेकिन उनके मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू कि किताब ने मनमोहन सिंह की उन सारी कोशिशों पर पानी फेर दिया है जिसमें वो कहते रहे कि किसी के हाथों की 'कठपुतली' नहीं हैं .... संजय बारू ने बहुत ही बेबाकी से इस बात को सामने रखा है कि कैबिनेट की बैठकों में भी मनमोहन सिंह के सुझावों को खारिज किया जाता रहा .... एक बात अब साफ हो गई है कि बीजेपी की तरफ से लगाए जा रहे आरोप सही थे... मनमोहन सिंह एक कमजोर प्रधानमंत्री के तौर पर देश चलाते रहे ... जिसकी वजह से देश में एक के बाद एक घोटाले होते रहे, देश की तमाम प्राकृतिक संपदा की लूट होती रही फिर चाहे वो कोल घोटाला हो या फिर स्पेक्ट्रम या फिर 2 जी घोटाला ही क्यों ना हो ... खुद मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू ने अब इसकी पुष्टि कर दी है ...

संजय बारू का मनमोहन सिंह को एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर कहना ही इस बात की पुष्टि करता है कि मनमोहन सिंह को सिर्फ कुर्सी प्यारी थी... उन्हें ना तो देश की चिंता थी ना ही अपनी सार्वजनिक छवि की .. इसके लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हर तरह के समझौते करते रहे, अपने सहयोगी मंत्रियों, अधिकारियों के साथ समझौता किया .. यूपीए चेयरपर्सन के सामने घुटने टेके .... और इसके पीछे उनका एक ही मकसद था कि वो प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बने रहें ... फिर चाहे उन्हें रिमोट कंट्रोल से ही क्यों ना संचालित किया जाता रहे ... मनमोहन सिंह ने लगभग दस साल तकइसी रुप में काम किया है ...


हालांकि इस किताब की टाइमिंग पर ज़रूर सवाल उठाए जा सकते हैं कि ऐन चुनाव के दौरान ही ये किताब क्यों रिलीज़ हुई ... क्या इसमें उनके विरोधियों का हाथ है फिर चाहे वो पार्टी के अंदर ही क्यों ना हों ... लेकिन यहां इस बात का ध्यान रखना ज़रूरी है कि ये खुलासा कांग्रेस पार्टी की तरफ से नहीं हुआ है ... ये खुलासा ये पीएम के पूर्व मीडिया एडवायजर संजय बारू की तरफ से हुआ है जो देश के वरिष्ठ पत्रकार रहे हैं ...खासतौर से आर्थिक जगत के जाने-माने नाम हैं ... ऐसे में उनकी बातों को सियासी चश्मे से देखना उचित नहीं होगा और शायद इस किताब की क्रेडिबिलिटी पर शक जाहिर करना भी गलत होगा ...

मनमोहनसिंह की घुटना टेकू नीति के चलते वो भले ही दस साल तक प्रधानमंत्री पद की कुर्सी पर बने रहने में कामयाब रहे हों लेकिन देश और देश की 120 करोड़ जनता को विरासत के तौर पर जो भ्रष्टतंत्र और भ्रष्टाचार का बुके मिल रहा है उससे निजात पाने में सालों लगेंगे