रविवार, 30 मार्च 2014

अटल की राह पर संघ !

आरएसएस खुद को हमेशा ही सांस्कृतिक संगठन के तौर पर पेश करता है, लेकिन ये बात किसी से छिपी नहीं है कि ये संघ का दखल ही है जो बीजेपी आज के दौर में भी ना केवल देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है बल्कि आज सत्ता की होड़ में भी शामिल है और तमाम सर्वे की रिपोर्टों के मुताबिक आगे भी है। बीजेपी को इस स्थिति में लाने में संघ के योगदान से कभी इनकार नहीं किया जा सकता जो वक्त वक्त पर हालात के हिसाब से बीजेपी की धारा को मोड़ता आया है। ऐसे वक्त में जबकि एक बार फिर चुनावी मौसम चल पड़ा है, आरएसएस अपने उसी एजेंडे में पर काम कर रहा है हालांकि मुद्दे और तरीके बदल गए हैं।
संघ के मुखपत्र ऑर्गनाइजर के सर्वे में एक बात फिर से साफ हो गई है कि संघ एक बार फिर अपनी सियासी मुहिम में खुलकर आगे आ गया है। जिसका लक्ष्य है कि नरेन्द्र मोदी को देश का प्रधानमंत्री बनाया जाए। इस सर्वे के जरिए ये साबित करने की कोशिश भी की गई है। संघ के मुताबिक जिन 380 लोकसभा सीटों पर उसने सर्वे कराया है वहां 300-300 लोगों से रायशुमारी की गई है,  इसका मतलब साफ है कि संघ ने अपने पूरे कॉडर को एक बार फिर सक्रिय कर दिया है ताकि मोदी की राह आसान की जा सके।
वैसे ये पहली बार नहीं है जब संघ ने सियासत में इस तरह की दखल दी हो। अतीत में ऐसे कई
मौके आए हैं जब संघ लीक से हटकर राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी राय जाहिर करता रहा है। एक दौर में राममंदिर आंदोलन के पीछे संघ की भूमिका भी इस बात को साबित करती है कि संघ का ना केवल राजनीतिक एजेंडा है बल्कि उसे साधने के लिए वो बीजेपी को मुद्दे भी देता रहा है। ये कोई छिपा हुआ रहस्य नहीं है कि राममंदिर आंदोलन के पीछे संघ की ही ताकत थी जिसके बाद बने माहौल ने आगे चलकर बीजेपी को एनडीए के तौर पर सत्ता का स्वाद पहली बार दिया। राममंदिर आंदोलन में संघ ने अपने पूर्णकालिक स्वंयसेवकों को लगाया और इनके जरिए वीएचपी का गठन कराया। इसमें अशोक सिंघल और विष्णु हरि डालमिया मूलतः संघ के ही कॉडर थे, लेकिन बाबरी विध्वंस के बाद राममंदिर आंदोलन की लहर कमजोर पड़ी तो संघ को ये अहसास होने लगा कि सिर्फ राममंदिर के सहारे सत्ता तक पहुंचना मुश्किल है।
बदली परिस्थितियों और देश के बदले मिजाज के मद्देनजर 70 फीसदी युवा  शक्ति, ग्लोबलाइजेशन का बढ़ता प्रभाव, रोजी रोटी और विकास का मुद्दा, गुड गवर्नेंस और एंटी करप्शन की मुहिम, पारदर्शिता की मुहिम के प्रति देश के जनमानस के बढ़ते रुझान को देखते हुए संघ ने अपनी रणनीति बदली है,  और नरेन्द्र मोदी इसी बदली रणनीति के तहत पेश किए गए हैं। मोदी की मार्केटिंग और ब्रांडिंग पर जो अरबो रुपए खर्च हो रहे हैं वो सब संघ के मार्गदर्शन में हो रहा है। और ये सब सुनियोजित रणनीति का हिस्सा है। संघ को लगने लगा है कि ग्लोबलाइजेशन,  बेरोजगारी की समस्या के बीच युवा भारत का जो स्वरुप सामने आया है। इसमें अब जातीयता और साम्प्रदायकिता के रास्ते पर चलने से बहुत ज्यादा राजनीतिक लाभ नहीं मिलने वाला। शायद इसीलिए नरेन्द्र मोदी की पीएम उम्मीदवारी की घोषणा के बाद मोदी ने जिन 200 रैलियों को संबोधित किया है। उसमें कट्टरता और हिन्दुत्व सरीखे मुद्दे गायब रहे हैं। और शायद यही वजह है कि कट्टर छवि वाले नेताओं जैसे लालकृष्ण आडवाणी, उमा भारती, और विनय कटियार जैसे नेताओं को हाशिए पर डाल दिया गया है।
 संघ के मुखपत्र ऑर्गनाइजर में प्रकाशित सर्वे रिपोर्ट पर अगर बारीकी से गौर किया जाए तो उसमें भी संघ के बदले नजरिए और सोच की झलकियां मिलती हैं। संघ परिवार की ओर से कराए गए सर्वे में काफी चालाकी और खूबसूरती से रामजन्मभूमि बनाम विकास का मुद्दा रखा गया है। इससे पहले संघ के पुराने ट्रैक रिकॉर्ड को देखा जाए तो हमेशा ही बहस सांस्कृतिक राष्ट्रवाद बनाम छद्म राष्ट्रवाद, पंथनिरपेक्षता बनाम छद्म पंथनिरपेक्षता और जातीयता बनाम सामाजिक समरसता जैसे मुद्दों पर बहस हुआ करती थी। लेकिन अब संघ परिवार ने शायद एनडीए वन की तरह निहायत विवादित और कट्टर मुद्दों से कन्नी काटने  का फैसला किया है। ये मानते हुए कि ऐसे मुद्दों के सहारे बहुत दूर तक जाना मुश्किल है।
इस कड़वी सच्चाई के पीछे संघ की ओर से होने वाली वो प्रातःकालीन शाखाएं भी हैं जिनमें बताया जाता है कि इनकी संख्या और इनमें शामिल होने वाले लोगों की तादाद में रिकॉर्ड गिरावट आई है। जिस तरह से पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने बीजेपी के एक राष्ट्रीय अधिवेशन में ऐलान किया था कि 'हमारी हार का सबसे बड़ा कारण नियम अनुशासन और मूल्यों का पालन करते हुए राजनैतिक खेल में हिस्सा लेना है जबकि हमारे विरोधी राजनीति के इस खेल में नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए आगे बढ़ते रहे हैं। ऐसी स्थिति में अगर अब हमको भी सत्ता की दौड़ में शामिल होकर शीर्ष तक पहंचना है तो हमे भी वही सब हथकंडे अपनाने होंगे जो हमारे विरोधी हमारे खिलाफ अपनाते रहे हैं।'
इसके बाद अटल जी की अगुवाई में एनडीए का गठन हुआ था और कॉमन मिनिमम प्रोग्राम तैयार हुआ जिसमें कॉमन सिविल कोड, रामजन्मभूमि और धारा 370 जैसे मुद्दों को अलग रखा गया। अब एक बार फिर सत्ता की दौड़ में शामिल बीजेपी और उसका पैतृक संगठन संघ शायद अटल जी के फॉर्मूले को लेकर ही आगे बढ़ने का मन बना चुका है।

मंगलवार, 25 मार्च 2014

काशी की कसौटी पर...


लोकसभा चुनाव पास आते हीं राजनैतिक गर्मी बढ़ रही है और इसके साथ ही काशी देश समेत पूरी दुनिया में चर्चा का केंद्र बना हुआ है ... वजह है बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का वाराणसी से चुनाव लड़ना .. काशी Religious tourism, cultural heritage और दुनिया के प्राचीनतम शहर के रूप में मशहूर है ... काशी की आबोहवा में संस्कृति, आध्यात्म और विद्वता सतत महसूस की जा सकती है ... और अक्सर काशी इन्हीं चीजों की वजह से जाना जाता है .. लेकिन इन दिनों काशी की चर्चा नरेंद्र मोदी के वहां से चुनाव लड़ने को लेकर ज्यादा हो रही है ...

दिलचस्प बात ये है कि नरेंद्र मोदी ने अभी तक वहां से नामांकन पत्र भी दाखिल नहीं किया है ... बावजूद इसके उनके समर्थकों की तरफ से शुरु किया गया कैंपेन इतना विवादित हो गया कि मोदी को खुद ट्वीट करके अपने समर्थकों से संयम बरतने और काशी के लोगों की भावनाओं का आदर करने की अपील करनी पड़ी ... सबसे ज्यादा विवाद हर-हर मोदी, घर-घर मोदी नारे को लेकर हुआ .... वाराणसी में मोदी समर्थकों ने ये नारा ठीक उसी तरह लगाना शुरु किया जिस तरह हर-हर महादेव का नारा लगाया जाता है .. लिहाजा काशी के धर्माचार्यों और काशी के रहने वाले लोगों की आस्था को ठेस पहुंची और विवाद इतना ज्यादा बढ़ गया कि बीजेपी के चोटी के नेताओं समेत, नरेंद्र मोदी तक को, पब्लिक प्लेटफॉर्म पर ये कहना पड़ा कि हर हर मोदी नारा न लगाया जाए ...
काशी के बारे में एक कहावत मशहूर है ..

'रांड सांड सीढ़ी संन्यासी

इनसे बचै तो सेवै काशी'

इस कहावत का मतलब बनारस में ठगी की पराकाष्ठा से है ... मतलब ये कि काशी में विद्वता, संस्कृति, कला हर चीज की पराकाष्ठा है तो ठगी की भी है .... दरअसल काशी में इतने सारे गुण हैं कि जो भी यहां आता है वो किसी ना किसी रूप में प्रभावित हुए बिना नहीं रहता और जो प्रभावित करने के विचार से आता है उसे काशी की आबोहवा प्रभावित कर देती है ... और वो ठगे से रह जाते हैं... काशी के लोगों ने हज़ारों साल से अपनी cultural, intellectual, religious, historical सुपरमैसी को बनाए रखने की कोशिश की है ...काशी का अल्हड़पन पूरी दुनिया में मशहूर है .. लेकिन ये भी सच है कि यहां विद्वानों, महापुरुषों, साहित्यकारों और कलाप्रेमियों की जितनी बड़ी तादाद काशी में है उतनी शायद ही कहीं और है ... शायद यही वजह है कि बाहर से आने वाले लोग यहां आकर काशी के मुरीद हो जाते हैं ...

ऐसे में जब ये शहर चुनावी माहौल को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा में है और देश की सभी पॉटिलिटिकल पार्टियों की नज़र इस सीट पर है और जब 2014 के रण में यहां का मुकाबला दिलचस्प होने जा रहा है तो देखना ये होगा कि काशी की अल्हड़ जनता किसके साथ कैसे पेश आती है क्योंकि काशी ऐसी जगह है जहां आदिगुरु शंकराचार्य को भी चैलेंज किया गया था और चैलेंज करने वाले ब्राह्मण के साथ 8 दिनों तक आदिगुरु का शास्त्रार्थ चलता रहा तब तक, जब तक उस ब्राह्मण को अहसास नहीं हो गया कि वो किसके साथ शास्त्रार्थ कर रहा है ... काशी वो जगह है जहां राजा हरिश्चंद्र को डोमराजा की सत्ता स्वीकार करनी पड़ी थी .... काशी ही वो जगह है जहां शैव परंपरा को भी चुनौती का सामना करना पड़ा था जिसके समानान्तर बौद्ध परंपरा का विकास हुआ था ऐसे में देखना ये है कि क्या अब यहां से एक नई परंपरा की शुरुआत होगी ?

लेकिन काशी का एक दूसरा पक्ष भी है जो सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है...वो है काशी में विकास की कमी.. काशी में दुनिया भर से लोग आते हैं ... काशी को मिनी भारत कहा जाता है क्योंकि यहां देश के लगभग हर संस्कृति के लोग रहते हैं लेकिन इसके बावजूद यहां विकास के नाम पर कुछ नहीं है .... सैकड़ों साल पुरानी तंग गलियों में आज भी कोई बदलाव नहीं है ... घाटों पर भीड़ के बीच गंदगी नज़र आती है ..... सड़कें बुरी हालत में हैं ...लगभग साल भर लोग यहां जाम से जूझते हैं ... तंग गलियों में दुकानें अटी पड़ी हैं जिनके ठीक नीचे खुले नाले बहते हैं... गंगा की गंदगी तो एक मुद्दा है ही ... ऐसे में जब ये सीट नरेंद्र मोदी के चुनाव लड़ने की वजह से काफी अहम हो गई है तो काशी के लोगों की उम्मीद है कि शायद इस बार यहां से चुन कर जो भी व्यक्ति जाएगा वो काशी के Integrated और all round development की बात करेगा ...

शनिवार, 22 मार्च 2014

दलों की किच-किच !

लोकसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आते जा रहे हैं .. जैसे-जैसे कैंपेन में तेजी आ रही है और जैसे-जैसे टिकटों का बंटवारा हो रहा है .. सभी राजनीतिक दलों में सुरक्षित सीट की तलाश और टिकट पाने की लालसा नेताओं में बेचैनी बढ़ा रही है .... बेचैनी के शिकार लगभग सभी दलों के नेता हैं .. .. ऐसा नहीं है कि इस तरह का माहौल देश में पहली बार देखने को मिल रहा है ..... चुनाव से पहले ऐसा होता आया है .. यूपीए विरोधी दलों के नेताओं को लगता है कि अगर उनको अपने पसंद की जगह से टिकट मिल जाए तो लोकसभा तक पहुंचना आसान हो सकता है .. शायद इसीलिए सबसे ज्यादा खींचतान बीजेपी के अंदर देखने को मिल रही है .. .. भारतीय जनता पार्टी में मुरली मनोहर जोशी, लाल कृष्ण आडवाणी और जसवंत सिंह सरीखे तमाम कद्दावर नेता भी अपने पसंदीदा संसदीय क्षेत्रों से टिकट पाने को लेकर पार्टी नेतृत्व के लिए मुसीबत खड़ी कर रहे हैं ... इन नेताओं को भी ऐसा लग रहा है कि नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता की लहर पर सवार होकर दिल्ली की सरकार में शामिल हो सकते हैं ... तमाम धुर बीजेपी विरोधी नेताओं का बीजेपी में शामिल होना और चुनाव लड़ना देश में बीजेपी के पक्ष में चल रही लहर का संकेत भी माना जा रहा है ... टिकट ना पाने से नाराज नेताओं की तादाद कांग्रेस में भी है लेकिन बीजेपी की तुलना में कांग्रेस में सतही तौर पर ये तनाव कम दिखाई दे रहा है ... शिवसेना, डीएमके, एडीएमके, एसपी और बीएसपी भी कमोबेश अंदरूनी कलह का शिकार है ...
राजनीति में आए लोगों की चाह होती है कि चुनाव के दौरान पार्टी से टिकट मिले और राजनीतिक भविष्य संवर जाए .. ऐसे में अगर किसी नेता को टिकट ना मिले तो हर चुनाव में इस तरह की किच किच होती है ... ऐसे में जब इस बार ऐसा लग रहा है कि चुनाव निर्णायक और महत्वपूर्ण होने जा रहा है तो इस तरह की किच किच बढ़ गई है... साथ ही दूसरे दलों के कई नेताओं को ऐसा लगने लगने लगा है कि इस बार अगर बीजेपी का हाथ थामेंगे तो फायदा होगा उसी का नतीजा है कि लोग अपनी पार्टी छोड़कर बीजेपी का हाथ थाम रहे हैं ... फिर चाहे वो उत्तराखंड में सतपाल महाराज हों बिहार में एन के सिंह या राम विलास पासवान हों या फिर उत्तर प्रदेश में जगदंबिका पाल हों ...

एक तरफ लोग बीजेपी से जुड़ते जा रहे हैं तो दूसरी तरफ बीजेपी में टिकट को लेकर Infighting भी बढ़ती जा रही है ... इसकी वजह देश में बन रहा चुनावी माहौल है ... बीजेपी को लेकर जो उसका मूल कैडर है उसमें ये धारणा बन चुकी है कि बीजेपी सत्ता के करीब है.. इसीलिए इनमें महात्वाकांक्षा भी ज्यादा है ... लेकिन कांग्रेस के लिए पूरे देश में अलग तरह की धारणा बनी हुई है कि शायद इस बार पार्टी anti incumbency का शिकार हो जाए ... ऐसे में पार्टी में खींचतान कम ही दिख रही है ...

टिकटों को लेकर मचे घमासान के बीच इस बार चुनाव धीरे-धीरे BI-POLAR होता जा रहा है ... देश की दोनों बड़ी राजनीतिक पार्टियां भी यही चाहती हैं कि चुनाव बाइपोलर हो.. चुनाव मोदी बनाम राहुल हो जाए .. ताकि क्षेत्रीय दलों की राजनैतिक दादगिरी से निजात मिले ... और इस बीच बीजेपी की पूरी कोशिश है कि कांग्रेस की अगुआई में जो यूपीए की सरकार चली है उसकी नाकामी का पूरा फायदा उठाया जाए ... बीजेपी को पूरा भरोसा भी है और पार्टी के नेता पूरे विश्वास के साथ ये दावा भी कर रहे हैं कि वो जीत जाएंगे और उनका मिशन 272+ कामयाब होगा ... लेकिन देखना होगा कि सत्ता के लिए बढ़ी हुई नेताओं की महात्वाकांक्षाएं पूरी होती है या नहीं ...

गुरुवार, 20 मार्च 2014

बीजेपी का साउथ में 'समझौता'

केन्द्र में सत्ता पाने की कोशिशों में जुटी बीजेपी लगातार एनडीए का कुनबा बढ़ाने में जुटी है .. तमिलनाडु की पांच पार्टियां एनडीए में शामिल हो गई हैं। इनमें एस रामदौस की पीएमके, वाइको की एमडीएमके और विजयकांत की डीएमडीके भी शामिल है ...
बीजेपी ने इन पार्टियों के साथ सीट को लेकर समझौता भी कर लिया है ... तमिलनाडु में बीजेपी 8 सीटों पर चुनाव लड़ेगी जबकि उसकी सहयोगी पार्टियां डीएमडीके 14, पीएमके 8, एमडीएमके 7 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी जबकि KMDK और IJK एक- एक सीट पर चुनाव लड़ेंगीं ...
बीजेपी में इन पार्टियों के साथ समझौते को लेकर खासा उत्साह नज़र आ रहा है ... इसी उत्साह के बल पर बीजेपी कांग्रेस के राज से मुक्ति और एक नए भारत के निर्माण का ऐलान कर रही है ... लेकिन इस उत्साह के बीच बीजेपी शायद ये भूल गई है कि बीजेपी ने जिन पार्टियों के साथ गठबंधन किया है उसमें ऐसी पार्टियां भी हैं, जिन पर गंभीर आरोप हैं ... जो बीजेपी उत्तर भारत में भ्रष्टाचार का विरोध करती है.. देश की अखंडता को चुनौती देने वाली ताकतों का विरोध करती है वही बीजेपी दक्षिण भारत में एनडीए का कुनबा बढ़ाने के लिए उन पार्टियों से समझौता करती है जिसपर इसी तरह के आरोप हैं ...
पीएमके के संस्थापक और वर्तमान अध्य़क्ष एस रामदौस पर जाति आधारित दंगे भड़काने के आरोप हैं .. रामदौस वन्नियार समुदाय से ताल्लुक रखते हैं औन इन पर आरोप हैं कि ये दलित विरोधी राजनीति करने आए हैं और कई बार रामदौस के उकसाने पर दलित विरोधी दंगे भी हुए हैं ... 2009 में भी चुनावों के दौरान तमिलनाडु में इस तरह के दंगे भड़के थे ..
एमडीएमके के वाइको प्रतिबंधित संगठन लिट्टे के समर्थक माने जाते हैं ... वाइको ने कई बार राजीव गांधी के हत्यारों का खुलेआम समर्थन किया है और ये कहते आए हैं कि वो बेगुनाह हैं ... लिट्टे के पुरजोर समर्थन के बाद इन पर देशद्रोह के आरोप भी लगे हैं और इस आरोप में ये जेल जा चुके हैं ... इसके अलावा ये एंटी हिंदी एजिटेशन के आरोप में भी जेल की हवा खा चुके हैं ...
दक्षिण में सुपरस्टार रह चुके विजयकांत की पार्टी DMDK की क्षेत्रीय राजनीति में दखल है लेकिन ये भी सच है कि 2009 लोकसभा चुनावों में DMDK एक भी सीट नहीं जीत पाई थी
बाकी दोनों पार्टियों IJK और KMDK का स्थानीय तौर पर भी कोई अस्तित्व नहीं है .. ना ही इन दोनों पार्टियों का कोई जनाधार है .. KMDK के संस्थापक सदस्यों में से एक इस्वरन 2009 में अपनी सीट भी नहीं जीत पाए थे ..
दक्षिण की राजनीति की दो सबसे बड़ी पार्टियों AIADMK और DMK ने पहले ही बीजेपी के साथ आने से इनकार कर दिया है ... ऐसे में इन छोटी पार्टियों के सहारे बीजेपी कहां तक जा पाएगी ये देखने वाली बात होगी ... बीजेपी को ये भी सोचना चाहिए कि कहीं ऐसे विवादास्पद लोगों से हाथ मिलाने से उत्तर भारत में उनका नुकसान ना हो जाए जहां वो एकता की बात करते हैं, भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम चलाते हैं ..

No-Trust Syndrome में आडवाणी !

बीजेपी के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी अपनी ही पार्टी के लिए बीते कुछ समय से मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं ... इन सबकी शुरुआत उसी वक्त से हो चुकी है जब से नरेंद्र मोदी का नाम आगे आया है ... लेकिन इस वक्त जब भारतीय जनता पार्टी मोदी के सहारे 2014 में मिशन 272 + में लगी हुई है तो आडवाणी की तरफ से हो रहा ये विरोध अपने चरम पर है ...
अपनी मौजूदा सीट गांधीनगर छोड़ भोपाल से चुनाव लड़ने को लेकर आडवाणी की जिद ने एक बार फिर ये बात साबित कर दी है कि आडवाणी और मोदी के बीच सबकुछ ठीक नहीं है ...  दुनिया को दिखाने के लिए भले ही दोनों नेता सार्वजनिक रूप से कई बार गलबहियां कर चुके हों लेकिन आडवाणी, नरेंद्र मोदी को लेकर no-trust syndrome से गुज़र रहे हैं... आडवाणी गांधीनगर से लड़े तो उन्हें हारने का डर है,  और अगर वो एक बार हार गए तो उनका पॉलिटिकल करियर ख़त्म हो जाएगा ... इसीलिए  वो, किसी भी कीमत पर जीवन के इस पड़ाव पर रिस्क नहीं लेना चाहते ... भोपाल से चुनाव लड़ना उन्हें सुरक्षित लग रहा है क्योंकि शिवराज सिंह चौहान और लाल कृष्ण आडवाणी के बीच अच्छे संबंध हैं ... आडवाणी को शायद ये भरोसा है कि शिवराज उनकी जीत सुनिश्चित करेंगे ... और आडवाणी विरोधी खेमा वहां साज़िश नहीं कर पाएगा ... लिहाजा आडवाणी टिकट के मुद्दे पर इतने अड़ियल नज़र आते रहे...
आडवाणी जिस no-trust syndrome से गुज़र रहे हैं वो एक दिन में नहीं बना है .. दरअसल  नरेंद्र मोदी से लेकर मौजूदा वक्त में बीजेपी के बड़े पदों पर काबिज तमाम बड़े नेता, 1991 में आडवाणी के इशारे पर चलते थे... लेकिन आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं ... आज वही नेता आडवाणी के भाग्य विधाता की भूमिका में हैं ... अब ये नेता तय कर रहे हैं, कि बीजेपी में बुजुर्ग नेताओं की भूमिका क्या होगी ... यही वजह है कि आज आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और सुषमा स्वराज जैसे नेता कहीं न कहीं खुद को असुरक्षित और अपमानित महसूस कर रहे हैं। पिछले एक साल से पार्टी नेतृत्व अपने ही बुजुर्ग नेताओं के खिलाफ़ ख़बरें लीक करता रहा है, और उन्हें अपमानित करता रहा है... यही कारण है, कि पूरी की पूरी पार्टी दो खेमों में दिख रही है और बीजेपी के बुजुर्ग नेताओं में पार्टी के मौजूदा नेतृत्व पर भरोसे की कमी दिखाई दे रही है ... कुछ दिन पहले ख़बरें पार्टी की तरफ़ से लीक हुई थी, कि संघ चाहता है, कि बुजुर्ग नेताओं को लोकसभा चुनाव से अलग किया जाए और उन्हें राज्यसभा में भेजा जाए... इसी के बाद आडवाणी और जोशी जैसे नेताओं को किनारे करने की तैयारी की जा रही थी .. हालांकि बाद में संघ परिवार भी एक कदम पीछे हटा और जोशी को कानपुर से और आडवाणी को गांधीनगर से टिकट दिया गया... 
बीता हुआ तकरीबन एक साल बीजेपी में काफी उथल-पुथल वाला रहा है ... बीजेपी ने नेतृत्व परिवर्तन देखा है .... बुजुर्ग और पहली पंक्ति के नेता अब हाशिए पर हैं, मोदी, राजनाथ और जेटली सेंटर स्टेज पर आ चुके हैं ... इस दौरान आडवाणी कई बार खुल अपनी नाराजगी भी जाहिर कर चुके हैं .... ये बता चुके हैं कि सत्ता के लिए पार्टी सिद्धांतों से समझौता कर रही है ... नाराज़ आडवाणी पार्टी नेतृत्व को चिट्ठी तक लिख चुके हैं .. कि पार्टी नेतृत्व जिस तरीके से काम कर रहा है, वो न तो संघ की विचारधारा से मेल खाता है, और न ही पार्टी के सिद्धांत से.. यही वजह है कि पार्टी नेतृत्व ने भी ऐसा कोई भी मौका नहीं छोड़ा है जब वो आडवाणी को अपमानित कर सके । दरअसल जब सत्ता पाने का लक्ष्य लेकर राजनीति की जाती है तो महात्वाकांक्षाओं को लेकर लड़ाई होनी स्वाभाविक है .. ये पार्टी के अंदर भी है और पार्टी के बाहर भी .. पार्टी नेतृत्व को लगता है कि अगर इस बार सत्ता सुख नहीं मिला तो फिर अगले 10 साल तक के मुश्किल हो जाएगी लिहाजा पार्टी में नेताओं के बीच महात्वाकांक्षा की लड़ाई हो रही है । चाहे इसके लिए पार्टी को अपने सिद्धांतों की तिलांजलि ही क्यों ना देनी पड़े ...
ये सच है कि बीजेपी में सिद्धांतो से परे हटने की शुरुआत अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में ही शुरु हो चुकी थी ... जब नेशनल डेमोक्रैटिक अलाएंस बना था लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी ने एनडीए को बचाने के लिए आरएसएस और भगवा ब्रिगेड को खुद पर कभी हावी नहीं होने दिया ... इसी वजह से अटल बिहारी वाजपेयी ऐसे नेता रहे जिन्हें भगवा ब्रिगेड के बाहर भी स्वीकार किया गया .. बीजेपी में जो political untouchability थी वाजपेयी जी ने उसे दूर कर दिया था.. उन्हें राजनीतिक विरोधाभासों को मैनेज करने में महारत हासिल थी... जिसकी वजह से वो 24 समर्थक पार्टियों के साथ भी सरकार चलाने में कामयाब रहे थे ...  लेकिन अब ना तो बीजेपी में वैसा कोई नेता है ना ही अब वैसे सियासी हालात हैं .... शायद यही वजह है कि पार्टी में चल रही विचारधारा और महात्वाकांक्षा की लड़ाई हर बार सतह पर आ जाती है और ऐसे में ये भी तय है कि फिलहाल देश में चल रही मोदी की लहर पर बह कर जो नेता पार्टी की तरफ आ रहे हैं वही अगर लहर खत्म हो जाती है तो उल्टे पैर लौट भी सकते हैं ... ऐसे में पार्टी का अंतर्विरोध पार्टी को कहां ले जाएगा ये देखने वाली बात होगी ...

मंगलवार, 18 मार्च 2014

अटल-आडवाणी युग की समाप्ति ?

बीजेपी के लिए 2014 का चुनाव कई मायनों में अलग है ... इस बार अटल बिहारी वाजपेयी नहीं हैं ... इस बार आडवाणी भी बहुत कम ही दिखाई देते हैं ... सुषमा स्वराज के वो भाषण भी आजकल कम ही  सुनाई देते हैं जिन्हें सुनने के लिए एक ज़माने में कॉलेज से स्टूडेंट्स और प्रोफेसर्स भी रैलियों में नज़र आया करते थे तो क्या ये बीजेपी के लिए एक युग का अंत है .. क्या ये नए युग की शुरुआत है  ?

बीजेपी में हुए टिकट बंटवारे ने एक बात साफ कर दी है कि पार्टी में ट्रांजिशन ऑफ पावर भी हो चुका है ... खासकर उत्तर प्रदेश या फिर हिंदी हार्टलैंड में हुए टिकटों के बंटवारे ने ये दिखा दिया है कि बीजेपी के अटल आडवाणी ERA का अंत हो चुका है ... लंबी बहस और मान मनौवल के बाद वाराणसी की सीट नरेंद्र मोदी के पास है और लखनऊ की सीट राजनाथ सिंह के पास ... बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पार्टी के पूर्व अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी को अपनी सीट नरेंद्र मोदी के लिए खाली करनी ही पड़ी ... क्य़ोंकि मोदी वाराणसी से चुनाव लड़ना चाहते थे ताकि राजनीति के लिहाज से सबसे अहम राज्य उत्तर प्रदेश से ही अपनी दावेदारी पेश करें .. अयोध्या आंदोलन के दौरान पूर्वांचल में बीजेपी की जबरदस्त लहर रही थी और इस लिहाज से प्रूर्वांचल की सबसे अहम सीट वाराणसी बीजेपी के लिए बेहद खास है ... अगर मोदी अपनी जगह यहां से बना लेते हैं तो बीजेपी के पुराने और वरिष्ठ नेताओं के बराबर खड़े हो जाएंगे ...

 वहीं 1991 से  बीजेपी के पास रही लखनऊ सीट राजनाथ सिंह ने अपने पास रखी है ... ये वो सीट है जहां सक्रिय राजनीति से दूर हो चुके अटल बिहारी वाजपेयी का जादू अब भी कायम है ... हालांकि जब मोदी को पार्टी के चुनाव प्रचार अभियान की कमान सौंपी गई थी तभी ये बात साफ हो गई थी कि बीजेपी में पुराने और वरिष्ठ नेता अब सेंटर स्टेज पर नहीं रहे... और अब कमान नरेंद्र मोदी के हाथ में है ... मोदी के साथ कदम मिलाकर चल रहे हैं पार्टी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह और इसके बाद पार्टी में किसी नेता ने कमान संभाली हुई है तो वो हैं अरुण जेटली ... राज्यसभा में नेता विपक्ष की कमान संभाल रहे जेटली इस बार लोकसभा जाने की तैयारी में हैं और उन्हें अमृतसर से टिकट दिया गया है .... आडवाणी और सुषमा हाशिए पर जा चुके हैं तभी तो उऩके खुले विरोध के बावजूद येदियुरप्पा और श्रीरामुलू जैसे नेता पार्टी में जगह पा चुके हैं ...  टिकटों के बंटवारे के साथ साथ जिस तरह से NDA के लिए सहयोगी पार्टियों पर फैसला लिया गया है इसने साफ कर दिया है कि अब पार्टी की कमार पूरी तरह इन्हीं तीनों के हाथ में है और मोदी सेंटर स्टेज पर हैं ...

बीजेपी नहीं रही पार्टी विद ए डिफरेंस...

पार्टी विद ए डिफरेंस का नारा देने वाली बीजेपी में अब कुछ भी अलग नहीं रहा ... यहां भी सत्ता के लिए संघर्ष शुरु हो चुका है .. पिछले कुछ दिनों में टिकट को लेकर बीजेपी में जो मारामारी दिखाई दे रही है उसने ये साबित कर दिया है कि पार्टी हर कीमत पर सत्ता के लिए ही लड़ रही है ... अब बीजेपी के लिए सत्ता ही धर्म है और सत्ता ही उनका कर्म बन चुका है ...लेकिन इन सबके बीच पार्टी में बढ़ रहा असंतोष भी सतह पर आ गया है ... चाहे वो गाज़ियाबाद में वी के सिंह को लेकर हुआ हंगामा हो या फिर वाराणसी-लखनऊ सीटों पर विवाद ... चाहे लखनऊ में बीजेपी के दफ्तर पर कार्यकर्ताओं का जगदंबिका पाल के विरोध में किया गया हंगामा हो या फिर देवरिया सीट को लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं का विरोध के रूप में राजनाथ सिंह का पुतला फूंका जाना ...यहां तो पार्टी के कुछ पदाधिकारियों ने पार्टी छोड़ना बेहतर समझा है..

बीजेपी का ये विवाद उत्तर प्रदेश तक ही सीमित नहीं है ... ताजा मामला चंडीगढ़ में अभिनेत्री किरन खेर को टिकट दिए जाने के विरोध का है .... चंडीगढ़ में भी पार्टी के लिए काम करते आ रहे स्थानीय नेताओं को हाशिए पर रखकर किरन खेर को टिकट दिए जाने को लेकर कार्यकर्ता नाराज हैं ... बीजेपी के आला नेता ये बखूबी जानते रहे होंगे कि इस तरह टिकट बांटे जाने को लेकर कार्यकर्ताओं का विरोध झेलना होगा लेकिन जिताऊ फॉर्मूले पर चल रही बीजेपी ने जब सुषमा स्वराज, मुरली मनोहर जोशी जैसे वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी की परवाह नहीं की तो कार्यकर्ताओं के विरोध का पार्टी पर क्या असर होगा ...
कर्नाटक में भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरने पर एक बार पार्टी से बाहर हो चुके येदियुरप्पा की पार्टी में वापसी पर आडवाणी नाखुश थे तो कर्नाटक में दागी नेता श्रीरामुलु की पार्टी बीआरएस कांग्रेस के बीजेपी में विलय का विरोध सुषमा स्वराज ने सोशल मीडिया पर किया था... लेकिन दोनों ही आज पार्टी में हैं ...
बीजेपी जोर-शोर से भ्रष्टाचार और वंशवाद का विरोध करती रही है ... कांग्रेस के खिलाफ पार्टी ने दिन मुद्दों पर मोर्चा खोल रखा है उनमें से वंशवाद और भ्रष्टाचार बड़े मुद्दे हैं ... नरेंद्र मोदी अक्सर अपने भाषणों में इसकी चर्चा करते रहे हैं लेकिन सत्ता तक पहुंचने की जुगत में धीरे धीरे बीजेपी खुद इसका शिकार होती नज़र आ रही है ... येदियुरप्पा, श्रीरामुलू, राम विलास पासवान जैसे नेताओं के पार्टी में आने, प्रमोद महाजन, यशवंत सिन्हा और कैप्टन जयनारायण निषाद के बेटे-बेटियों को टिकट देकर पार्टी ने वंशवाद के विरोध को खुद ही खोखला साबित कर दिया है ..

हरियाणा में कुलदीप बिश्नोई की पार्टी हरियाणा जनहित कांग्रेस के साथ बीजेपी का गठबंधन है ... कुलदीप बिश्नोई भजनलाल के बेटे हैं .. ... भजनलाल के सक्रिय रहते हरियाणा की राजनीति में दलबदलू नेताओं का बोलबाला था और आयाराम-गयाराम की पॉलिटिक्स अपने चरम पर थी ... आज कुलदीप विश्नोई भजनलाल की विरासत को ही आगे बढ़ा रहे हैं .. लेकिन बीजेपी को हरियाणा जनहित कांग्रेस के साथ गठबंधन में कोई परहेज नहीं है ... बीच बीच में हरियाणा में ओम प्रकाश चौटाला की पार्टी इंडियन नेशनल लोकदल से भी बीजेपी के गठबंधन की बातें सुनाई दे रहीं थीं .. फिलहाल ओम प्रकाश चौटाला और अजय चौटाला टीचर भर्ती घोटाला मामले में जेल की हवा खा रहे हैं ... इनकी पार्टी के साथ बीजेपी का गठबंधन आखिरी रूप नहीं ले पाया लेकिन बीजेपी को INLD के साथ आने से परहेज़ नहीं था ...
सत्ता को अपना एकमात्र लक्ष्य बना चुकी बीजेपी के तेजी से उठ रहे इन कदमों को उनके कार्यकर्ता ही नहीं पचा पा रहे ... पार्टी कार्यकर्ता उन लोगों को स्वीकार ही नहीं कर पा रहे जो अपनी अपनी पार्टी छोड़ बीजेपी में शामिल हो गए हैं या फिर अपना राजनीतिक मकसद पूरा करने के लिए पार्टी में आए हैं, जिनका पार्टी के सिद्धांतों से कोई लेना-देना नहीं है । हालांकि कार्यकर्ताओं की इस कशमकश से पार्टी के वरिष्ठ नेतृत्व को कोई फर्क पड़ता नहीं दिख रहा .. तभी तो पार्टी हर भ्रष्ट और जिताउ नेताओं का भी रेड कार्पेट वेलकम कर रही है जो सत्ता दिलाने में उनके मददगार साबित हो सकते हैं .. पार्टी इसके लिए दीन दयाल उपाध्याय के Integrated Humanism के सिद्धांतों को भुला चुकी है ... बीजेपी के लिए अब सिद्धांत, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, ईमानदारी और भ्रष्टाचार मुद्दा नहीं रहा

मंगलवार, 11 मार्च 2014

CRISIS OF CREDIBILITY

इन दिनों संवैधानिक और लोकतांत्रिक संस्थानों पर जो सवाल खड़े हो रहे हैं वो आने वाले दिनों के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं ... बीते एक-दो साल में भारत की राजनीतिक, सामाजिक सोच और स्थिति में काफी बदलाव आ गया है .. जो स्थितियां बन और बिगड़ रही हैं वो ये दिखाती हैं कि लोग Impatient होते जा रहे हैं और
impatience की वजह से जैसे ही कोई नया व्यक्ति आता है, जो बदलाव की बात करता है.. नए-नए वादे करता है.. लोग सहज ही उस पर विश्वास कर लेते हैं .. बड़ी- बड़ी उम्मीदें पाल लेते हैं कि कोई जादू की छड़ी सालों से जड़े जमाए धारणाओं और व्यवस्था को एक झटके में बदल देगी ... लेकिन ऐसा ना तो पहले कभी हुआ ना ही अब हो सकता है लिहाजा लोग कुछ साल या कुछ महीने बीतते उस जादू की दुनिया से बाहर आ जाते हैं और तब उस disillusionment की वजह से ही anarchy  के हालात बन जाते हैं ...
अफसोस इस बात का है कि जिन महान शख्सियतों की फिलॉसफी की बातें कर लोग आंदोलन की शुरुआत करते हैं वो निजी ज़िंदगी में उस फिलॉसॉफी को कभी नहीं अपनाते .. पिछले कुछ साल में कई नेताओं और नए बने नेताओं ने राजघाट पर जाकर अपने श्रद्धा सुमन चढाए हैं और गांधी के दर्शन के आधार पर बदलाव की बुनियाद रखने की बात कही है लेकिन क्या ऐसा हो पाया है ?
महात्मा गांधी ने जो आंदोलन चलाया था उसका एकमात्र लक्ष्य था अहिंसा के रास्ते पर चलते हुए देश को
सैकड़ों साल की गुलामी से आज़ादी दिलाना
... और उन्होंने वही किया.. देश को आज़ादी दिलाई .. इसके पीछे उनका कोई अपना एजेंडा नहीं था ... उन्होंने इस दौरान ना तो सच्चाई का रास्ता छोड़ा ना ही भारतीय संस्कृति और मूल्यों को तिलांजलि दी ... महात्मा गांधी ने वही किया जो सही था ... यही वजह है कि आज तक हर वो शख्स जो बड़ा नेता बनना चाहता है जो कथित तौर पर देश में बदलाव लाना चाहता है वो महात्मा गांधी की बात करता है ...

लोग महात्मा गांधी, राम मनोहर लोहिया और आचार्य नरेंद्र देव जैसी शख्सियतों का नाम महज अपने स्वार्थ के लिए लेने लगे हैं फिर चाहे वो जय गुरुदेव, अन्ना हज़ारे, श्री श्री रविशंकर, रामदेव, अरविंद केजरीवाल ही क्यों ना हों ..ये लोग ने भले ही महान शख्सियतों की फिलॉसफी को अपनाने का दम भरते आए हों लेकिन गहराई से देखा जाए तो इन सबका पॉलिटिकल या बिजनेस स्वार्थ रहा है ... समाज सुधार का दम भरने वाले इन लोगों की देश के अलग अलग हिस्सों में हज़ारों करोड़ की संपत्ति है या फिर इन्हें देश की राजनीति रास आ गई है ... और निजी स्वार्थों को ही बढ़ाने या बचाने के लिए इन्होंने आंदोलनों का सहारा लिया है .... और जब perform करने का मौका आया है तो इनके झूठ का आडंबर सबके सामने आ गया है ..

इस सबके बीच वो लोग खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं जो भावुक हैं और बदलाव की बड़ी इस सबके बीच वो लोग बड़ी-बड़ीउम्मीदें पालने लगते हैं ... ऐसे में ज़रूरत ये है कि समाज के ऐसे तत्वों की पहचान कर उनका सामाजिक और राजनीतिक बहिष्कार कर दिया जाए .. उन्हें इस बात का अहसास कराया जाए कि झूठ की बुनियाद पर आंदोलन नहीं खड़ा किया जा सकता ... जो रामदेव खुद टैक्स चोरी के आरोपों से घिरे हैं, जिनका हज़ारों करोड़ का business empire है वो अगर नैतिकता के आधार पर आंदोलन की बात करते हैं तो इसके अच्छे परिणाम कैसे आ सकते हैं ... श्री श्री रविशंकर की भी अलग अलग जगहों पर करोड़ों की प्रॉपर्टी है ... आखिर महात्मा गांधी ने तो ऐसी प्रॉपर्टी नहीं बनाई ... ऐसे में इस तरह के लोग इस तरह के आंदोलन की बात करते हैं तो ये समाज का हक़ बनता है कि सवाल करे कि किस तरह का आंदोलन चलाया जा रहा है ...
हालांकि इन सबके बीच इस बात का ख्याल रखा जाना ज़रूरी है कि आंदोलनों को बड़ा बनाने में सीधे
-सीधे या परोक्ष रूप से मीडिया का हाथ रहा है ... ऐसे में अगर आंदोलन चलाने वाले मीडिया का इस्तेमाल करें तो हैरानी की बात नहीं है ... आज़ादी के आंदोलन में भी मीडिया का अहम रोल रहा था... गांधी जी की बात आम लोगों तक पहुंचाने में मीडिया ने अहम भूमिका अदा की थी चाहे वो उस समय निकलने वाले अखबार हों या फिर छोटे छोटे प्रिटिंग प्रेस में छपने वाले पोस्टर या पैंफलेट्स ... इनके बिना तो एकजुटता और मुखर आंदोलन की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती थी ...

इमरजेंसी के दौरान भी मीडिया ने अहम भूमिका निभाई इसका विरोध मीडिया ने ही जमकर किया था ...  जयप्रकाश नारायण ने जो आंदोलन छेड़ा उसकी सफलता में भी मीडिया का बहुत बड़ा हाथ था ...ये कहना भी गलत नहीं होगा जेपी आंदोलन के दौरान भी कुछ मुट्टी भर पत्रकार थे जिन्होंने आंदोलन के प्रभाव का इस्तेमाल अपने हक में किया था लेकिन वो लोग बहुत जल्द मुख्यधारा से बाहर भी हो गए थे ... इन आंदोलनों की सफलता में बड़ा रोल मीडिया का होता है ऐसे में मीडिया पर सवाल भी उठते हैं .. जरूरी ये है कि मीडिया कथनी और करनी का फर्क समझे ... आर्थिक, राजनैतिक प्रलोभनों से दूर रहे और समाज के ऐसे आलमबरदारों पर भरोसा करने और उनका समर्थन करने से पहले उनके interest की जांच करे ..

रविवार, 9 मार्च 2014

सत्ता का जिताऊ फॉर्मूला...

लोकसभा के लिए जैसे-जैसे राजनीतिक दलों ने टिकट बांटने शुरु किए हैं ... वैसे वैसे मायूस प्रत्याशियों की नाराजगी की खबरें भी सुर्खियां बन रही हैं .... दरअसल टिकट बांटने का फॉर्मूला ही कुछ ऐसा होता है जो टिकट पाने वालों में सीट को लेकर और इससे वंचित रहने वाले लोगों में टिकट को लेकर नाराजगी पैदा कर देता है ....
सत्ता के संघर्ष में हर चीज़ जायज़ होती है ... चाहे विपक्ष पर हमला करने की रणनीति छोड़कर जाति धर्म की बात करना हो या फिर टिकटों के बंटवारे में सिर्फ और सिर्फ जिताऊ उम्मीदवारों को चुनना .. चाहे वो भ्रष्टाचार के खिलाफ छेड़ी गई तथाकथित लड़ाई के बीच भ्रष्टाचारियों से हाथ मिलाना हो ...

इन मुद्दों को समझने के लिए हमें इस देश की सियासत को समझना होगा... किसी भी राजनीतिक दल का एक ही लक्ष्य होता है और वो है सत्ता ... सत्ता के लिए सभी दल हर छोटी-बड़ी चीजों को बारीकी से देखते हुए अपना फैसला लेते हैं ... टिकटों के बंटवारे में जिताऊ फॉर्मूले को ध्यान में रखा जाता है ... कोई भी राजनीतिक दल उसी कैंडिडेट को टिकट देता है जिससे उसे जीत की उम्मीद हो ... इसके लिए ग्राउंड लेवल के समीकरण देखे जाते हैं .... और भले ही देश 21वीं सदी में हो और विकास के बड़े-बड़े सपने देख रहा हो ...अभी भी देश की कई सीटें ऐसी हैं जहां ग्राउंड लेवल पर जाति और संप्रदाय का समीकरण ही मायने रखता है ...

शायद यही वजह है कि राजनैतिक दल जब टिकटों का बंटवारा करते हैं तो इसी समीकरण का ध्यान रखते हैं ...
लेकिन इस आधार पर अपना गणित सुधारने वाली पार्टियों के आंकड़े के तब गड़बड़ाने लगते हैं जब इस जिताऊ फॉर्मूले की वजह से अंतर्विरोध शुरु हो जाता है .... साल भर मूल्यों की बात करने सुनने वाला कैडर अचानक आए इस फॉर्मूले को पचा नहीं पाता और reject कर देता है ... और शायद इसी वजह से अलग अलग पार्टी कार्यालयों में कैडर का विरोध सामने आ जाता है ... इस अंतर्विरोध का शिकार कैंपेन के दौरान या चुनाव के वक्त लगभग सभी दलों को होना पड़ता है चाहे वो पार्टी अनुशासित होने का कितना भी दावा क्यों ना करती हो ...   इस बार भी टिकट बंटवारे के साथ ही अलग अलग दलों और जगहों से विरोध के सुर उठ रहे हैं ...
 
  • वाराणसी सीट को लेकर बीजेपी में उठा विवाद इन दिनों राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बना हुआ है .. 13 मार्च को इस सीट पर फैसला होगा लेकिन ये सीट मोदी को दिए जाने को लेकर मुरली मनोहर जोशी का विरोध जगजाहिर हो चुका है .. कर्नाटक के बेल्लारी सीट से श्रीरामुलु को टिकट दिए जाने की चर्चा पर बीजेपी में इतनी खींचतान हुई कि अभी तक श्रीरामुलु का नाम उम्मीदवारों की लिस्ट में शामिल नहीं किया गया है ...
  • वहीं टिकट ना मिलने से नाराज उत्तर प्रदेश के मोहनलालगंज से कांग्रेस नेता श्यामलाल पुजारी को पार्टी के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंकने की वजह से बाहर का रास्ता दिखाया जा चुका है ...
  •  भोपाल में भी कांग्रेस को झटका लगा है .. भिंड से टिकट दिए जाने के बावजूद भागीरथ प्रसाद ने 24 घंटे बीतते-बीतते कांग्रेस छोड़ बीजेपी ज्वाइन कर ली है ...
  • आरजेडी में पाटलिपुत्र सीट को लेकर भी जमकर घमासान हुआ है ... लालू यादव की बेटी मीसा भारती और आरजेडी के वरिष्ठ नेता रामकृपाल यादव के बीच छिड़े इस घमासान की प्रतिक्रिया के तौर पर राम कृपाल यादव पार्टी छोड़ चुके हैं ...
  • हरियाणा में विवादित नेता विनोद शर्मा के कांग्रेस पार्टी छोड़ हरियाणा जनहित कांग्रेस ज्वाइन करने की खबरों पर भी सुषमा स्वराज कड़ी आपत्ति दर्ज करा चुकी हैं.. हरियाणा में बीजेपी और कुलदीप बिश्नोई की पार्टी हरियाणा जनहित कांग्रेस में गठबंधन है ...
  • भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाकर सियासी गलियारो में कदम रखने वाले अरविंद  केजरीवाल भी इन दिनों सत्ता की राजनीति ही कर रहे हैं ... टिकट बंटवारे में जिताउ फॉर्मूला देखा जा रहा है भले ही उम्मीदवार सिर से पैर तक भ्रष्टाचार में ही क्यों ना डूबा हो ... डिफॉल्टर घोषित किए जा चुके खालिद परवेज और 300 करोड़ की धोखाधड़ी के आरोपी योगेश दहिया उन्हीं में से एक है ..
ऐसे में साफ है कि हर पार्टी का लक्ष्य एक ही है और वो है सत्ता हासिल करना चाहे इसके लिए उन्हें किसी भी तरह के समीकरण क्यों ना बनाने पड़ें ...

बुधवार, 5 मार्च 2014

किस राह पर केजरी...

गांधी के नाम पर राजनीति करने वाले केजरीवाल और उनके समर्थक अपने आचरण के जरिए, गांधीवादी मूल्यों और सिद्धांतों की रोज़ तिलांजलि देते नज़र आ रहे हैं। गुजरात, दिल्ली, लखनऊ सहित देश के अलग-अलग हिस्सों में आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं की तोड़फोड़ और हिंसक प्रदर्शनों से एक बार फिर ये बात साबित हुई है, कि केजरीवाल और उनके साथियों का मक़सद सिर्फ और सिर्फ अराजकता फैलाकर अपना राजनीतिक एजेंडा पूरा करना है।

गुजरात की राजधानी अहमदाबाद में सड़क जाम करके अराजकता फैलाने की कोशिश कर रहे केजरीवाल को महज़ कुछ मिनट के लिए detain किया गया था, लेकिन उस कार्रवाई के खिलाफ़ केजरीवाल ने अपने समर्थकों के ज़रिए जिस तरह से दिल्ली और लखनऊ में बीजेपी दफ्तर पर तोड़फोड़ करवाई है, वो कहीं से भी स्वस्थ्य राजनीतिक परंपरा नहीं हो सकती। गांधी ने लंबे राजनीतिक जीवन में कभी भी हिंसा और अराजकता को बढ़ावा नहीं दिया। कई मौके ऐसे आए, जब गांधी जी ने अपने आंदोलन को हिंसक होने से बचाने के लिए, उसे स्थगित करना ज़्यादा मुनासिब समझा। सामाजिक सद्भाव कायम करने और उसे बनाए रखने के लिए, गांधी ने अपने प्राण तक की आहूति दे दी। लेकिन अराजक और सांप्रादायिक ताकतों से कभी समझौता नहीं किया। आज गांधी के नाम पर व्यवस्था बदलाव के लिए निकले अरविंद केजरीवाल सत्ता के लिए एक तरफ परोक्ष रूप से कांग्रेस से गठबंधन करते दिख रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ मौलाना तौकीर और प्रमोद कृष्णन जैसे सांप्रदायिक और संदिग्ध व्यक्तित्व वाले लोगों के साथ गलबहियां कर रहे हैं।

मौलाना तौकीर और प्रमोद कृष्णन का इतिहास किसी से छिपा नहीं है। कांग्रेस के दिग्विजय सिंह से इन लोगों की नज़दीकियां भी जग जाहिर है। उत्तर प्रदेश के बरेली में पिछले साल हुए दंगे में, मौलाना तौकीर रज़ा की भूमिका आज भी पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज है। ठीक उसी तरह से राजस्थान के अज़मेर में हुए बम धमाके के आरोपी के साथ प्रमोद कृष्णन के रिश्ते भी पिछले दिनों सुर्खियों में रहे हैं।
 
दिलचस्प बात ये है कि, इन दो नेताओं ने 'HUM' हिंदुस्तान यूनाइटेड मूवमेंट पार्टी का ऐलान कर दिया है। साथ ही नरेंद्र मोदी के खिलाफ़ अरविंद केजरीवाल की उम्मीदवारी के समर्थन की घोषणा भी कर दी।
 
HUM के संयोजक प्रमोद कृष्णन का तो ये भी कहना है, कि बीजेपी विरोधी सभी राजनीतिक दलों को नरेंद्र मोदी के मुकाबले, केजरीवाल को समर्थन देना चाहिए। और केजरीवाल के खिलाफ अपना उम्मीदवार नहीं उतारना चाहिए।
 
कांग्रेस की मदद से दिल्ली में लगभग 40 दिन तक सरकार चलाकर केजरीवाल और उनके साथी पहले ही बेनकाब हो गए हैं। अपनी प्रशासनिक अक्षमता और अराजकता के लिए भी केजरीवाल कुख्यात हो चुके हैं।
 
नरेंद्र मोदी के बढ़ते प्रभाव से खुद को बगैर लड़े पराजित मान चुकी कांग्रेस पार्टी, केजरीवाल, तौकीर रज़ा, प्रमोद कृष्णन सरीखे सांप्रदायिक, अराजक और संदिग्ध ताकतों के ज़रिए, 2014 के चुनावी महासमर में अपनी नैया को डूबने से बचाने की कोशिश में लगी है।
ऐसी स्थिति में देश की आवाम को ऐसे विघटनकारी, अराजक और छद्म वेश में घूम रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं और धर्मगुरुओं से सजग रहने की ज़रूरत है।

सोमवार, 3 मार्च 2014

सत्ता हर कीमत पर...

सियासत में सत्ता के लिए तमाम हथकंडे अपनाए जाते हैं ... चाहे वो विरोधियों पर वार हो या अपनी जय जयकार ... लेकिन सियासत के मैदान में उतरी पार्टियां दिन के साथ ही अपनी नीतियां बदलने लगें तो ये कितना सही है .... नेता ज़रूरत के हिसाब से रंग बदलते हैं ... दल भी बदल लेते हैं ऐसे में उनकी नीतियों की बात तो नहीं की जा सकती लेकिन एक विचारधारा को लेकर राजनीति में उतरीं पार्टियां अगर सत्ता के लिए सियासत में अपनी विचारधारा से हाथ धो लें तो ऐसा करना कहां तक उचित है ...

भारतीय जनता पार्टी में भी आजकल ना सिर्फ मुद्दों बल्कि विचारधारा को लेकर भी इतना भटकाव नज़र आ रहा है कि खुद बीजेपी के कार्यकर्ता भी समझ नहीं पा रहे होंगे कि पार्टी आखिरकार किस ideology की बात करती है ...
पार्टी ने अपने कैंपेन की शुरुआत भ्रष्टाचार के मुद्दे पर की ... कांग्रेस को भ्रष्टाचार में गले तक डूबा हुआ बताया नरेंद्र मोदी ने हर रैली में इस मुद्दे को उठाया ... लेकिन जहां इन रैलियों में कोलगेट की बात होती है तो सुविधा के मुताबिक ऑयल, नैचुरल गैस, नैचुरल रिसोर्सेज़ और स्पेक्ट्रम से जुड़े घोटालों पर चर्चा नहीं की जाती ... ऐसा क्यों होता है ये सियासतदान बखूबी समझते होंगे ... अब ये मोदी ही बता पाएंगे कि आखिर क्यों भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आक्रामक हुए मोदी के भाषणों में अदानी समूह और अंबानी का नाम नहीं आता ... जबकि पूरा देश जानता है कि इन व्यापारिक घरानों पर किस हद तक घोटालों के आरोप लगते रहे हैं ...
 
भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आगे बढ़ रही बीजेपी को अचानक येदीयुरप्पा वापस अच्छे लगने लगते हैं ... वही येदीयुरप्पा जिन्हें करप्शन के फेर में फंसने पर पार्टी छोड़नी पड़ी थी ... लेकिन अब वही येदीयुरप्पा पार्टी को नई सोच और नई उम्मीद देते दिॆखाई दे रहे हैं
सत्ता किसी कीमत पर पाने को तैयार बीजेपी को अब ना तो जयललिता से दिक्कत है ना ही करुणानिधि से... जब जयललिता को NDA के खेमे में लाने की कोशिशें नाकाम हो गईं तो पार्टी करुणानिधि से नजदीकियां बढ़ा रही है ... जयललिता और करुणानिधि और उनकी पार्टी पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों को शायद पार्टी भूल गई है या फिर सत्ता के लिए भुला दिया है ...
दरअसल चाल, चरित्र और चेहरे के Contradiction को लेकर बीजेपी में इतना घमासान मचा हुआ है कि कैंपेन की दिशा ही बदलती जा रही है ... चुनाव आते-आते NDA की जो तस्वीर उभर रही है वो कई सवाल खड़े कर रही है ... बीजेपी को रामविलास पासवान के रूप में राम भी मिल गए हैं ... वही राम विलास पासवान जिन पर स्टील मंत्री रहते हुए बोकारो स्टील प्लांट में भर्ती में अनियमितता के आरोप लगे हैं ..... वही रामविलास पासवान जो पिछले चुनाव में अपनी सीट भी नहीं बचा पाए थे लेकिन बीजेपी को लगता है कि ये राम ही उसकी नैया पार लगाएंगे ... वही राम विलास पासवान जो गुजरात दंगों के मुद्दे पर मोदी का विरोध करते हुए बीजेपी से एक बार किनारा भी कर चुके हैं ...
सिद्धांत और आदर्श की दुहाई देने वाले नरेंद्र मोदी का मंच से परोसा जाने वाला राजनीति का आदर्शवाद उत्तर प्रदेश में हाशिए पर आ गया दिखता है... बीजेपी को अब बलरामपुर से समाजवादी पार्टी के टिकट पर 2009 में लोकसभा जा चुके बृजभूषण शरण सिंह भी प्यारे लग रहे है ... बृजभूषण शरण सिंह का टाडा के तहत जेल की हवा खाकर आना भी बीजेपी को बुरा नहीं लग रहा... सियासत में बाहुबल की जरूरत तो होती ही है शायद बीजेपी बृजभूषण शरण सिंह को पार्टी में लाकर उत्तर प्रदेश में बाहुबलियों के लिए अपने लगाव का इतिहास दोहरा रही है ..
बीजेपी इससे पहले उदित राज को तो पार्टी में शामिल कर ही चुकी है ... वही उदित राज जो कभी बीजेपी के धुर विरोधी माने जाते थे... जो आरएसएस के ब्राह्मणवादी सोच पर कई बार हमला बोल चुके हैं.... वही उदित राज जो हिंदू से बौद्ध और ईसाई धर्म में धर्मांतरण करवाने के कार्यक्रम में भी मौजूद रहे हैं .. अब संघ को उदित राज से दिक्कत हो या ना हो लेकिन बीजेपी के रणनीतिकारों को दलित वोटबैंक में सेंधमारी के लिहाज से कोई दिक्कत नहीं है

राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की विचाराधारा प्रखर राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की रही है....इसी विचारधारा को आगे बढ़ाने के मकसद से आरएसएस ने पॉलिटिकल विंग को खड़ा किया था....जो अब बीजेपी के रुप में सबके सामने है...लेकिन क्या बीजेपी आरएसएस के उसी एजेंडे पर आगे बढ़ रही है या फिर सत्ता के फेर में अपने सिद्धांत, अपनी विचारधारा को भुला बैठी है ?

शनिवार, 1 मार्च 2014

सियासतदानों का Crowd Management

लोकतंत्र का महापर्व जब भी नज़दीक आता है, तो रैलियों का शोर और सियासदानों का शो अपने चरम पर होता है ... देश के सभी प्रमुख राष्ट्रीय दल अपनी ताक़त की नुमाइश शुरु कर देते हैं ... इस नुमाइश के लिए चुन चुन कर शहरों में रैलियां आयोजित की जाती हैं .. और इन रैलियों में लाखों लोग जुटाए जाते हैं ... अपनी रैली से ज्यादा से दूसरों की रैलियों में जुट रही भीड़ पर चर्चा की जाती है और फिर उस भीड़ में सेंधमारी की रणनीति तैयार की जाती है ....
सचमुच रैलियों में भीड़ का जुटना और जुटाना भी राजनीति की रणनीति है ... अब इसके लिए वादे करने पड़ें, गर्व की बात की जाए, समभाव,समरसता की याद दिलाई जाए या फिर प्रखर राष्ट्रवाद और बेहतर गवर्नेंस के दावे किए जाएं ... हर राजनीतिक पार्टी का एक ना एक फॉर्मूला होता है जिसपर पार्टियां आगे बढ़ रही है ...

बीजेपी उत्तर प्रदेश में अपनी खोई ज़मीन को हासिल करने के लिए...और नरेंद्र मोदी को 7 रेसकोर्स रोड तक पहुंचाने के लिए विजय शंखनाद रैली का सहारा ले रही है....यूपी में अब तक नरेंद्र मोदी 6 विजय शंखनाद रैली कर चुके हैं...इन रैलियों में जुटी भीड़ से गदगद...बीजेपी अब ब्रह्मास्त्र का सहारा लेने जा रही है...2 मार्च को लखनऊ में विजय शंखनाद महारैली करने जा रही है...लखनऊ के रमाबाई मैदान में हो रही महारैली में 2 या 4 लाख नहीं...बल्कि 15 लाख कार्यकर्ताओं के जुटने का दावा किया जा रहा है ...बीजेपी ने भी महारैली के लिए महाइंतजाम किए हैं... पार्टी की तरफ से मोदी को एक सुपरमैन और ड्रीम सेलर के रूप में प्रोजेक्ट किया जा रहा है .... ये बताने की कोशिश की जा रही है कि मोदी के हर मर्ज की दवा हैं ... और मोदी जब भी अपनी रैलियों को संबोधित करते हैं तो प्रखर राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, बेहतर गवर्नेंस और ट्रांसपेरेंसी की बात ज़रूर करते हैं ...

मोदी की रैलियों के साथ-साथ उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की रैलियां भी हो रही हैं... और दोनों हीं पार्टियों के बीच इन रैलियों में दावे, वादों और आरोपों की झड़ी ज़रूर लगती है ..इस सबके बीच समाजवादी पार्टी अपने वादों का पुलिंदा दिखाकर लोगों को अपने खेमे मे लाने की कोशिश करती है ... मुफ्तखोरी के मैनिफेस्टो के साथ ज्यादा से ज्यादा भीड़ जुटाने की कोशिश की जाती है ... जनता को अपने पाले में लाने के लिए मुफ्त बिजली, पानी, दवाई, पढ़ाई, कर्ज माफी का लॉलीपॉप दिया जाता है ... केस वापस ले लेने के वादे किए जाते हैं, लैपटॉप और टैबलेट के जरिए तरक्की के रास्ते पर ले जाने की तस्वीर दिखाई जाती है ..
बीएसपी प्रखर राष्ट्रवाद और मुफ्त की सुविधाओं की बात नहीं करती .. बीएसपी का फॉर्मूला सेल्फ प्राइड से जुड़ा है .. बीएसपी उस बहुत बड़े वर्ग को उनका सम्मान दिलाने की बात करती है जिसे समाज में काफी समय तक उपेक्षित रखा गया.... बीएसपी दलितों को सम्मान देने की बात कहती है लेकिन समाज के अगडी जाति के गरीब वर्ग के लिए भी अपनी फिक्र जताती है ...

भ्रष्टाचार, महंगाई जैसे मुद्दों पर बैकफुट पर जा चुकी कांग्रेस अब, मैं नहीं हम के फॉर्मूले पर आगे बढ़ रही है.. कांग्रेस सबको साथ लेकर चलने के वादे कर रही है.. जिसमें वर्ग विशेष की चर्चा नहीं है .. लेकिन समभाव, समरसता समायोजन, समन्वय और सहअस्तित्व का सपना ज़रूर है ....
फॉर्मूला चाहे जो भी हर राजनीतिक दल का एक ही फंडा, एक ही मोटिव है कि रैलियों में भीड़ जुटे ... उनका शक्ति प्रदर्शन कामयाब हो .. और भीड़ वोट बैंक में तब्दील हो जाए... तो ऐसे में जनता के सामने सारे फॉर्मूले मौजूद हैं जो फॉर्मूला कारगर लगे उसे जनता अपना सकती है ...