रविवार, 9 फ़रवरी 2014

दक्षिण में मोदी का दलित प्रेम !

राजनीति भी गजब की विधा है...ये भाई को भाई से, समुदाय को समुदाय से और इंसान को इंसान से अलग करने की कूवत रखती है... सत्ता और कुर्सी के लालच में अनजान लोग भी एक साथ रहने लगते हैं...अपने ड्राइंग रूम में अपने माता- पिता की जगह सत्ता तक पहुंचाने वाले नेताओं की तस्वीरें टांग लेते हैं.... राजनीति में जिस प्रतिबद्धता और महापुरुष का नाम लेकर आते हैं, बाद में उसी को भूलकर वोट दिलाऊ फॉर्मूले पर चल देते हैं... अपनी सोच को तिलांजलि देकर पीआर एजेंसी के तैयार किए गए भाषणों पर तालियां बटोरते हैं ...

चुनावी रैलियों में ये ट्रेंड साफ झलकता है जब नेता किसी हद तक जाकर कुछ भी बोलने को तैयार नज़र आते हैं ... अब चाहे वो मुलायम सिंह यादव हों, नरेंद्र मोदी हों ... मायावती हों या फिर ममता बनर्जी सब इस बहती गंगा में हाथ धोने को बेताब हैं .. नीतीश कुमार, जयललिता, नवीन पटनायक, और अरविंद केजरीवाल भी इनसे अलग नहीं हैं ...
देश के अलग-अलग राज्यों में धड़ाधड़ हो रही रैलियों में नरेंद्र मोदी के भाषणों में ये पैंतरेबाज़ी साफ नज़र आती है । वेस्ट बंगाल में जाकर श्यामा प्रसाद मुखर्जी से ज्यादा प्रणब मुखर्जी की शान में कसीदे पढ़ना, केरल में दलितों की दुर्दशा पर आंसू बहाना और उत्तर भारत की रैलियों में भईया लोगों की चिंता करना उनका शगल बन गया है...
नरेंद्र मोदी 9 फरवरी को केरल पहुंचे तो उन्हें याद आया कि शिड्यूल कास्ट में आने वाले लोग भी इस समाज का अभिन्न अंग हैं ... भारत की सामाजिक संस्कृति को जानने वाले लोगों को पता होगा कि उत्तर भारत के मुकाबले दक्षिण भारत में जाति व्यवस्था की जड़ें ज्यादा गहरी हैं ... लिहाजा वहां जाति-समुदाय की बातें बेहद आम हैं ... इसीलिए नरेंद्र मोदी का अंदाज़ भी केरल जाकर बदल गया ... उत्तर भारत में विकास की नई शुरुआत की बात करने वाले मोदी दक्षि ण भारत में जाति की बात करने लगे ...उनका निशाना महाभारत के अर्जुन की तरह एकदम सीधा और साफ था...और वो था दलित वोट बैंक..साफ है कि मिशन 2014 को फतेह करने के मकसद में लगे मोदी दलित वोट बैंक को अपने पाले में करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे है .. वैसे बीजेपी के वो पहले नेता नहीं हैं..जिनका चुनावी महासमर के दौरान दलित प्रेम जागा हो... इससे पहले राजनाथ सिंह ने भी यूपी के मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए अति दलित और अति पिछड़ा वर्ग के दो बच्चों को गोद लेने का ऐलान किया था... उस वक्त विधानसभा चुनाव होने वाले थे ... हालांकि अब वो बच्चे कहां हैं किसी को पता नहीं ..
खास बात ये है कि उस वक्त यूपी विधानसभा चुनाव होने ही वाले थे..ऐसे में उन्होंने दलित वोटर्स को लुभाने के लिए ये दांव खेला था...मगर विधानसभा चुनाव के बाद उनके इस वादे का कोई अता-पता नहीं चला..अब नरेंद्र मोदी भी लोकसभा चुनाव से ठीक पहले राजनाथ सिंह के नक्शे कदम पर चलते हुए दलित कार्ड खेलकर दलितों की बात करने लगे हैं ...
भारत में जाति आधारित राजनीति की जड़ें इतनी गहरी हैं कि कोई नेता इससे दूर नहीं रह पाया है ... राहुल गांधी का दलित प्रेम भी जगज़ाहिर है .. राहुल गांधी भी कश्मीर से कन्या कुमारी तक का दौरा करके दलितों के घरों में रात गुजारने का राजनैतिक स्वांग कर चुके हैं...
सवाल ये उठता है कि क्या बगैर सत्ता के समाज सेवा नहीं की जा सकती... सामाजिक बदलाव नहीं लाया जा सकता... राजा राम मोहन राय, छत्रपति साहूजी महाराज, पेरियार, मदर टेरेसा जैसी हजारों शख्सियतें क्या चीफ मिनिस्टर और प्राइम मिनिस्टर बन कर ही बदलाव कर सकीं ...
सिय़ासी रैलियों में सामाजिक बदलाव लाने का दावा करने वालों को अपनी ग्लोरियस हिस्ट्री के पन्नों पर अपनी नजर डालनी चाहिए... क्या डॉ. हेडगवार, आचार्य विनोबा भावे और नानाजी देशमुख सहित संघ के कार्यकर्ताओं ने बगैर सत्ता और कुर्सी के देश की सेवा नहीं की.... पार्टी और अपनों द्वारा अलग-थलग किए जा चुके एलके आडवाणी जी तो अभी भी सक्रिय राजनीति में रहते हुए देश सेवा का मंसूबा पाले हुए हैं.... तो क्या राजनीति में जगह और समय देखकर अपनी फिलॉसॉफी बदलने वालों को इतिहास से सीखना नहीं चाहिए ?

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