गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

यंग इंडिया और मोदी

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के बीजेपी के पीएम उम्मीदवार बनने के पीछे सबसे बड़ी वजह रही है युवाओं के बीच उनकी लोकप्रियता। जिसके चलते बीजेपी को आडवाणी जैसे वरिष्ठ चेहरे की जगह पर मोदी को आगे करना पड़ा जाहिर है ये मोदी की राजनीतिक स्टाइल का ही कमाल है कि उम्र के छह दशक से ज्यादा पार करने के बाद भी वो युवाओं के चहेते बने हुए हैं, जबकि देश के सबसे बड़े राजनीतिक खानदान के वारिस राहुल गांधी खानदान की चमक दमक, सुनहरे इतिहास और प्रचार तन्त्र के बाद भी रोल मॉडल के तौर पर स्थापित नहीं हो पा रहे हैं।
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के सियासी समर में आमने सामने की आजमाइश में हर बार नरेन्द्र मोदी का पलड़ा भारी ही नजर आता है। फिर चाहे कुशल नेतृत्वकर्ता के तौर पर हो, या फिर पसंदीदा पीएम उम्मीदवार के तौर पर। मोदी की रैलियों में उमड़ने वाली युवाओं की भारी भीड़ भी इस बात तस्दीक करती है। जाहिर है ये एक चौंकाने वाला पक्ष है ऐसे लोगों के लिए जो ये मानते हैं कि युवाओं की सोच उनकी भावना और उनके भविष्य की सुनहरी तस्वीर सिर्फ एक युवा की तैयार कर सकता है। क्योंकि उम्र के छह दशक पार कर चुके मोदी कम से कम युवा की परिभाषा में तो नहीं ही आते हैं। तो फिर आखिर क्या है मोदी के करिश्मे की वजह?

इतिहास गवाह है कि जिस तरह इस देश में मुसलमानों का रहनुमा कभी मुसलमान नहीं हो सकता उसी तरह युवाओं को भी लीड करने वाला युवा कभी नहीं रहा। ये और बात है कि देश में कई बड़े बदलावों के पीछे युवाओं की ताकत का ही हाथ रहा। लेकिन उनके पीछे हमेशा ही गाइडिंग फोर्स कोई ना कोई वेटरन या तजुर्बेकार शख्स ही रहा है। हर बड़े बदलाव के पीछे की सोच वेटरन की ही रही है। उनका अनुभव, उसकी विश्वसनीयता का एक्जीक्यूशन युवाओं के जरिए किया गया। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी में यही बात मिसिंग है, और उनकी अनुभवहीनता फिलहाल उन पर भारी पड़ रही है। ये हालत कमोबेश सभी युवा नेताओं की है। फिर चाहे वो अखिलेश यादव हों, सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद, जयंत चौधरी या चिराग पासवान।

देश में सभी बड़े आंदोलनों को अनुभवी और उम्रदराज लोगों ने ही कामयाब बनाया है। फिर चाहे स्वतन्त्रता आंदोलन में गांधी का नेतृत्व हो जिनके अहिंसा रुपी अचूक शस्त्र ने सबसे क्रूर माने जाने वाले ब्रिटिश साम्राज्य की चूलें हिला दी या फिर आजादी के बाद जयप्रकाश नारायण और राममनोहर लोहिया का आंदोलन। जिसमें युवाओँ की ताकत तभी कारगर साबित हुई जब उसके पीछे की सोच और रणनीति किसी तजुर्बेकार शख्सियत ने बनाई।

लम्बे वक्त के बाद नरेन्द्र मोदी ने युवाओं की नब्ज को पकड़ने की कोशिश की है।फिर चाहे सोशल मीडिया का इस्तेमाल हो, गैजेट्स का प्रयोग। मोदी ने हर उस चीज को अपना राजनीतिक हथियार बनाया है जिसके जरिए युवा सीधे उनसे कनेक्ट होते हैं। इतना ही नहीं गुजरात में स्मार्ट सिटी परियोजना, और डिजिटल भारत का नारा भी इसी कवायद का हिस्सा है। जिसके जरिए ये संदेश जाता है कि मोदी की सोच उनका विजन भविष्य के भारत की इबारत लिख सकता है। इसके अलावा अपने भाषणों में नरेन्द्र मोदी का इस बात पर लगातार जोर देना कि भारत दुनिया का सबसे युवा देश है और युवा ही इस देश का भविष्य बनाएंगे, ये बात युवाओं को सीधे अपील करती है।

साफ है सियासी समर में मोदी ने युवाओं को जोड़कर जो मुहिम शुरु की है उसमें फिलहाल वो अपने सभी विरोधियों पर भारी पड़ते दिखते हैं। वो भी तब जब बीजेपी के पास कोई भी प्रभावशाली युवा चेहरा नहीं है। नरेन्द्र मोदी की राजनीतिक स्टाइल ने इस खालीपन को भी खत्म कर दिया है।

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