गुरुवार, 30 जनवरी 2014

दंगों पर दंगल कब तक ?

साल 1984 – देश भर में सिख विरोधी दंगे
साल 1992 – देश भर में हिंदू-मुस्लिम दंगे
साल 2002 – गोधरा कांड, गुजरात दंगे
साल 2013 – मुज़फ्फरनगर हिंदू मुस्लिम दंगा

एक बार फिर देश के इतिहास के काले अध्यायों के पन्ने पलटे जा रहे हैं ... फिर एक बार कुछ लोगों में मानवता जाग गई है  और वो इन काले पन्नों की काली स्याही को कम करने की कोशिश में लग गए हैं .. लेकिन ये कोशिशें गाहे-बगाहे उन सालों में होती हैं जिनमें लोकसभा चुनाव होने को होते हैं ... कांग्रेस को अगर साल 2002 में गुजरात में हुए दंगे याद आ रहे हैं तो बीजेपी को साल1984 में हुए सिख विरोधी दंगे ... एक आम आदमी, जिसकी जिंदगी उसकी नौकरी और उसके परिवार के लिए उसकी जिम्मेदारियों के बीच कट रही है ...ऐसे में वो उन बीती बातों को कभी याद नहीं करना चाहता होगा भले ही वो इऩ काले अध्यायों का हिस्सा ही क्यों ना रहा हो,... उसके लिए उसकी आज की ज़िंदगी और आने वाले कल की चिंता ही सबकुछ है .. लेकिन शायद सियासी दल और नेताओं को उन काले अध्यायों की कालिमा इतनी पसंद है कि वो उससे अपने लिए लंबी लकीर खींचने में लगे हुए हैं .. ताकि विरोधियों की लकीरों को छोटा दिखाया जा सके .. 

हर चुनाव के पहले देश के सभी प्रमुख नेता और राजनीतिक दल बिजली, पानी, सड़क, रोज़गार, भ्रष्टाचार और गवर्नेंस की बातें करते हैं .. लेकिन जैसे-जैसे चुनाव प्रचार की सरगर्मी बढ़ने लगती है .. वैसे-वैसे सांप्रदायिक मुद्दे हावी होने लगते हैं । सभी राजनीतिक दल, नेता यहां तक कि देश की मीडिया भी इसमें बढ़-चढ़कर अपनी भागीदारी निभाने लगती है .. 120 करोड़ की आबादी वाले इस देश में क्या ये मुमकिन नहीं है कि देश के लिए होने वाले चुनाव में इन मुद्दों को दरकिनार कर positive issues और आम जनता की जिंदगी से जुड़े मुद्दों को लेकर जनता के बीच में जाया जाए..

एक तरफ हमारे देश में सभी political parties और नेता नौजवानों की बढ़ती भागीदारी, बेरोज़गारी की बढ़ती तादाद, भ्रष्टाचार का बढ़ता प्रभाव और poor governance  की बातें करते है, दूसरी तरफ घूम-फिर कर हर चुनाव में बज चुके उन्हीं cassettes को बजाने लगते हैं । क्या हमारे नेताओं को इस बात का भरोसा नहीं है कि देश के जागरुक मतदाता उनको positive issues पर वोट देंगे  अगर ऐसा होता तो सैम पित्रोदा से लेकर नरेंद्र मोदी, मुलायम सिंह यादव और मायावती सरीखे नेताओं को बार-बार अपनी जाति का हवाला क्यों देना पड़ता... देश के बड़े नेताओं ने महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरु, सरदार वल्लभ भाई पटेल, इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी को कभी भी अपनी जाति बताकर जनता से वोट नहीं मांगा था । डॉ लोहिया, आचार्य नरेंद्र देव, मधु लिमए, आचार्य कृपलानी, मधु दंडवते सरीखे नेताओं की जात के बारे में ज्यादातर लोगों को पता भी नहीं होगा । Statesman बनने की ख्वाहिश और देश की सरकार चलाने का मंसूबा रखने वाले नेताओं को इतिहास पुरुषों की जीवनी से सबक लेना चाहिए और जाति-धर्म रूपी ट्रंप कार्ड से दूर रहते हुए 2014 का चुनाव Positive issues के आधार पर लड़ने की कोशिश करनी चाहिए  

2 टिप्‍पणियां:

  1. सर अगर शहरी मतदाता नेताओं के पुराने cassettes पर थिरकते हैं तो ग्रामीण और सुदूर ग्रामीण मतदाओं के पास नये स्लोगन और हिपहॉप कहां से मिलेगा । सर आपकी राय से सौ प्रतिशत सहमत हूं...और मुझे लगता है कि इस देश के मतदाता और युवा दोनों आपकी राय से सहमत होंगे...तो फिर ऐन वक्त पर चुक कहां होती है...।

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  2. जब तक इस देश के अंदर धर्म,जाति की राजनीति होगी.... यह देश कभी तरक्की नहीं कर सकता हैं.....
    इस देश के वासियों को यह समझना होगा जो नेता धर्म और जाति के नाम पर वोट मांगते है,, वो दरअसल देश की अखंड़ता और एकता को तोड़ने की कोशिश करते हैं जिससे उनकी सत्ता बनी रहे.. और लोग विकास की बात करने की बजाय देश में संप्रदायिकता की बात करें.......
    किसी भी देश की तरक्की के पीछे सभी जाति और धर्म के लोग जुड कर साथ काम करने वाले होते है, तभी वह देश सही मायने में विकास के सभी पैमाने पर खरा उतरता हैं.......

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