शनिवार, 4 जनवरी 2014

किसके हैं रामदेव ?

राजनीति भी शतरंज की एक बिसात की तरह होती है जहां चालें सोच-समझ कर चली जाती हैं, सियासी दल भी अपनी चाल चलते हैं और सियासी दिलचस्पी रखने वाले लोग भी, रामदेव भी उन्हीं में से एक हैं । कल तक नरेंद्र मोदी की तारीफ के कसीदे पढ़ते रहे रामदेव ने अब मोदी को समर्थन देने के लिए शर्तें रख दी हैं । ये वही रामदेव हैं जिन्होंने पहले कहा था कि बीजेपी को उनका समर्थन तभी हासिल होगा जब पार्टी मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करेगी । हालांकि तब देश का सियासी मिजाज़ कुछ और था, अब कुछ और... लिहाजा रामदेव के पैंतरे भी बदल गए हैं ।

रामदेव ने बीजेपी के सामने शर्तें रखी हैं कि अगर पार्टी विदेशों से काला धन वापस लेकर आने का वादा करती है तभी रामदेव बीजेपी को अपने समर्थन का औपचारिक ऐलान करेंगे, हालांकि रामदेव ने भरोसा भी जताया है कि बीजेपी भी काला धन देश में लाने के मुद्दे पर उनसे सहमत होगी, लेकिन इन सबके बीच एक योगगुरु की सियासत में इतनी दिलचस्पी कई सवाल खड़े करती है ।

रामदेव महज एक योगगुरु नहीं हैं, उनके पास देश और विदेश में सैकड़ों करोड़ की संपत्ति है, वो सियासी पार्टीज़ को फंडिंग भी करते हैं। दरअसल उनका कारोबार इतना बड़ा है कि योग सिखाने का उनका काम इन सबके ऊपर चढ़ा एक आवरण मात्र रह गया है । अपने इस कारोबार को बचाए रखने के लिए रामदेव वो सब करते हैं जो एक कॉरपोरेट घराने को करना चाहिए । कॉरपोरेट घराने किसी पार्टी विशेष को फंड इसीलिए देती है क्योंकि अपने पक्ष में नीतियां बनवा सके, उनकी सियासत में रुचि महज इन्हीं कारणों से होती है । ऐसे में रामदेव का सियासी लगाव समझना मुश्किल नहीं रह जाता ।
लेकिन यहां सवाल इस बात का है कि आखिर रामदेव अचानक बदले-बदले क्यों नज़र आ रहे हैं, क्या ये उसी सियासी बदलाव का हिस्सा है जिसने देश में राजनीति का रुख मोड़ दिया है ?  सवाल बड़ा ये कि रामदेव की बार-बार आस्था क्यों भटक जाती है...कभी मोदी की तारीफ करते हैं तो कभी आम आदमी की तरफ रुख मोड़ लेते हैं..क्या रामदेव इसके जरिए सिर्फ अपना कारोबारी हित साधने में जुटे हैं... ताकि उनके अरबों के साम्राज्य को राजनीतिक संरक्षण मिल सके ?
योगासन सिखाते-सिखाते सियासी आसन करने में जुटे रामदेव का बीजेपी को लेकर ये नया रवैया शायद दिल्ली में उपजी राजनैतिक स्थिति का परिणाम है. शायद रामदेव को लगने लगा है कि सियासी बदलाव की आंधी में बीजेपी अपने दम पर सत्ता में नहीं आ सकती है.. शायद ये कि आम आदमी पार्टी के उदय के साथ ही बीजेपी और उसके पीएम उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी का आभामंडल धुंधला हुआ है.. ऐसा लगता है जैसे रामदेव को देश में त्रिशंकु जनादेश की आशंका है ... रामदेव शायद ये सोच रहे हैं कि देश में सत्ता गैरबीजेपी और गैरकांग्रेसी पार्टी के हाथ भी जा सकती है.. ऐसे में शायद रामदेव अपने लिए विकल्प खुले रखना चाहते हैं जो उनका अरबों का साम्राज्य चलाने में उनकी मदद कर सके ।

रामदेव के बयान पर इस तरह के सवाल खड़े होना इसीलिए भी जायज़ है क्योंकि ये वही रामदेव हैं जिनके पास कई गंभीर सवालों के जवाब नहीं हैं .. मसलन उनके गुरु के गायब होने का मसला, उनके ट्रस्ट पर एक के बाद एक कई मामलों का दर्ज होना और उनके पतंजली योगपीठ में तैयार की गई कई चीजों की गुणवत्ता पर सवाल खड़े होना ... आदि. आदि

बीजेपी को समर्थन के बदले शर्तें गिनाने वाले रामदेव के लिए शायद अब विकल्प बहुत कम बचे हैं...खासकर दिल्ली में आम आदमी पार्टी के उदय के बाद....जिस आम आदमी पार्टी को रामदेव लगातार कोसते रहे उसकी सरकार बनने के बाद लगातार रामदेव के सुर नरम हुए हैं...रामदेव के लिए मुश्किल ये भी है कि वो आम आदमी पार्टी के साथ सीधे तौर पर खड़े भी नहीं हो सकते क्योकि केजरीवाल रामदेव को लेकर क्या नजरिया रखते हैं वो 2011 में रामलीला मैदान में अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान दिख चुका है जब केजरीवाल ने रामदेव को मंच पर नहीं आने दिया था....साफ है कि बदलते सियासी हालात में अब रामदेव बेचैन से दिखने लगे हैं...पूरी दुनिया में खड़े किए गए अपने एम्पायर और कंपनियों की चिंता भी उन्हें सता रही है...लिहाज़ा अब नए सिरे से अपनी प्रासंगिकता की बुनियाद तैयार करने में जुटे हैं रामदेव.... अब सवाल ये कि इस नए रुख से रामदेव का क्या वाकई सियासी तौर पर वो भरोसा पैदा कर पाएंगे जिसकी उम्मीद में वो हर तरह के हथकंडे अपना रहे हैं

1 टिप्पणी:

  1. शायद ऐसा भी हो सकता है, कि रामदेव यह बताने की कोशिश कर रहे हैं, कि उनके पास भी आम समर्थकों की भीड़ है! या फिर वर्तमान राजनीतिक हालात में वे अपनी जगह मुकम्मल करना चाह रहे हों! खैर जो भी हो, लेकिन रामदेव ने समय ग़लत चुना है, क्योंकि आने वाले समय में उन्हें इसका क़ानूनन वैयक्तिक और आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है!

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