शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

सेक्युलरिज्म देश के डीएनए में है : मदनी

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना महमूद मदनी पिछले कुछ दिनों से काफी चर्चा में हैं। अपने रेडिकल ख्यालों को लेकर भी मदनी पर चर्चा होती रही है। मैंने उनसे जानने की कोशिश की कि ये बदलाव अचानक से आया है या जहनी तौर पर वह खुद इस तरह के विचारों को काफी पहले से मानते रहे हैं, उसका प्रचार-प्रसार करते रहे हैं ......  मौलाना महमूद मदनी से खास बातचीत

वासिंद्र मिश्र :मदनी साहब, आप पर अचानक बाहर से ज्यादा आपकी कौम के लोग ही खफा नजर आ रहे हैं और वे लोग जो एक अरसे से कौम के नाम पर सियासी और मजहबी राजनीति करते रहे हैं तो इसके पीछे क्या कारण है?

मौलाना महमूद मदनी :मैं ऐसा नहीं समझता कि कौम के लोग नाराज़ हैं. इसलिए कि अगर कौम और कौम के लोग नाराज़ होते तो अभी 15 दिसंबर को हमने दिल्ली के रामलीला मैदान पर विश्व शांति सम्मेलन किया, जितने आदमी रामलीला मैदान के अंदर थे, उससे ज्यादा बाहर थे, और सब्जेक्ट भी वही था जिसको लेकर मैं सालों साल से लड़ाई लड़ रहा हूं. आतंकवाद के विरुद्ध, अमन-शांति, पीस, देश के लिए ...


वासिंद्र मिश्र :नहीं सवाल आपकी जो लड़ाई आतंकवाद के खिलाफ है उसपर किसी को कोई ऐतराज नहीं है और आपके credential पर किसी को doubt नहीं है... जहां तक आतंकवाद के बारे में आपका नज़रिया है... इससे पहले आपने लखनऊ में भी आतंकवाद के खिलाफ बहुत बड़ा जलसा किया, अलग-अलग राज्यों में भी किया है... अचानक जो विवाद शुरू हुआ है वो नरेंद्र मोदी जी को लेकर है और आपने जो उदाहरण दिया कि गुजरात के मुसलमानों ने वहां हुए दंगों को भुलाकर नरेंद्र मोदी को वोट कर सरकार बनवाई है.... उसको लेकर एक विवाद है, इस पर आपका क्या कहना है ?
मौलाना महमूद मदनी :ये विवाद मीडिया का Create किया हुआ है, क्योंकि कुछ दोस्तों की आदत है कि दूसरे के मुंह में अपने शब्द डाल देते हैं। दो बातें हुईं, एक ये कि हमारे लिए नरेंद्र मोदी ऑप्शन नहीं हैं, कोई अगर ये सोचता हो कि मैं इन सो कॉल्ड पॉलिटिकल पार्टीज़ को अपोज़ कर रहा हूंसका मतलब मोदी को सपोर्ट करना है तो वो समझता रहे, मुझे उसकी परवाह ज़रा सी भी नहीं, सच्चाई ये है कि कुछ लोग अपने वेस्टेड इंट्रेस्ट की वजह से ये बात कहकर कि ये इनको भी अपोज़ कर रहे हैं। एकतरफ गोपाल गढ़ की बात कर रहे हैं और मुजफ्फरनगर की भी बात कर रहे हैं. एक तरफ कांग्रेस को अपोज़ कर रहे हैं दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी के मिसगवर्नेंस को टारगेट कर रहे हैं तो इनकी जुबान बंद करो. तो मुझे ये साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि फलां का हिमायती हूं. अब उनके इस attitude की वजह से मैं सच बोलना छोड़ दूं. खाना खाना छोड़ दूं, अन्याय के खिलाफ बोलना छोड़ दूं, अत्याचारियों के सामने क्या रहम की भीख मांगता रहूं, ये कैसे होगा ...

वासिंद्र मिश्र :आपको लग रहा है कि आज की तारीख में जो कौम के मजहबी लोग हैं वो आपके बयानों को गलत तरीके से Interpret कर रहे हैं ?

मौलाना महमूद मदनी :नहीं, नहीं मजहबी लोग नहीं कर रहे हैं....

वासिंद्र मिश्र :क्यों तमाम बयान आए हैं पिछले दिनों कि आपने वस्तानवी को हटवाया क्योंकि उन्होंने मोदी की तारीफ की थी... और आप परोक्ष रूप से मोदी की मदद कर रहे हैं...

मौलाना महमूद मदनी :वस्तानवी साहब के मामले में हमारा कोई किरदार नहीं था, नंबर एक न हटवाने में न बनवाने में, नंबर दो किसी भी बड़े मजहबी रहनुमा ने इस देश के या ऑर्गेनाइजेशन ने मेरी बात का गलत मतलब निकाला होगा, हां कांग्रेसियों ने कहना शुरू किया कि इन्हें मोदी प्रेम हो गया, तो उनको लगा कि वो ये बात कहकर हथियार के तौर पर मेरे खिलाफ यूज़ करेंगे. या तो मुझे खामोश कर देंगे या तो मुझे अपनी बात बदलने पर मजबूर कर देंगे....

वासिंद्र मिश्र :सबसे बड़ी समस्या क्या है... और कौन सी पांच ऐसी समस्याएं हैं जिसका समाधान प्रमुखता से खोजा जाना जरूरी है ?

मौलाना महमूद मदनी :करपशन, कम्युनलिज्म, एजुकेशन, अनइम्प्लॉयमेंट और यूथ को सही डायरेक्शन में होना । हमारा यूथ, इस कंट्री के यूथ को डायरेक्शन देने का काम नहीं हो रहा है, घर से भी नहीं हो रहा है, स्कूल-कॉलेजों से भी नहीं हो रहा है। सोसायटी के बड़ों की तरफ से भी उस तरह नहीं हो रहा है, जिस तरह होना चाहिए था... तो न घर में नौजवानों को सही रास्ता दिखाने का काम हो रहा है, न स्कूल में हो रहा है और न सोसायटी के लेवल पर उस तरह हो रहा है, जितनी प्रमुखता से होना चाहिए ...जैसी ज़रूरत है इस ग्रोइंग एज के लोगों को संभालने की ... वैसी नहीं की जा रही ....

वासिंद्र मिश्र :इसका समाधान क्या है ? अगर prioritise किया जाए तो सबसे पहले किस समस्या पर आपकी नज़र जाती है ?

मौलाना महमूद मदनी :देखिए बच्चों की तालीम और तरबियत (upbringing) ये दो चीजें बहुत जरूरी है जिस पर इस देश को काम करने की ज़रूरत है ...

वासिंद्र मिश्र :आपकी नजर में आज की तारीख में कौन सी ऐसी पार्टी है जो सेक्युलर है जिसे आप विकल्प के तौर पर आप देखते हैं ?
मौलाना महमूद मदनी :एक नई रौशनी की शक्ल में लोग आम आदमी पार्टी की तरफ बहुत उम्मीद भरी निगाह से देख रहे हैं.... आने वाले वक्त में थोड़ा और साफ होगा, अभी ये कहना मुश्किल है । लेकिन मैं एक बात कहा करता हूं हमेशा, देश की ज्यादातर पॉलिटिकल पार्टीज़ करप्ट हैं और सेक्युलरिज्म का दिखावा करती हैं, लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए । ये पार्टीज़ और इनके लोग सेक्युलर नहीं हैं. बल्कि ये देश सेक्युलर है, ये सोसायटी सेक्युलर है, बाइनेचर इंडिया की सोसायटी सेक्युलर है । नेता और पार्टियां उस मजबूरी में सेक्युलरिज्म का लबादा ओढ़ती हैं. और सेक्युलरिज्म की बात करती हैं, वरना इनका मकसद न सेक्युलरिज्म है और न सेवा है न इमानदारी है.. इसीलिए नरेंद्र मोदी ने भी अब सेक्युलरिज्म की और बहुत सारी ऐसी बातें करनी शुरू की हैं... जिसे लोग पॉजिटिव बदलाव की शक्ल में देख रहे हैं लेकिन वो उनकी मजबूरी है, उनका शौक नहीं है, उनका इरादा नहीं है, क्योंकि इरादा होता तो जहां मजबूरी नहीं थी वहां नहीं किया उन्होंने, जहां मजबूरी हुई बस वहां चेंज की बात की...

वासिंद्र मिश्र :तो देश का नेता वही होगा जो सेक्युलर होगा?

मौलाना महमूद मदनी :हम तो यही चाहेंगे कि जैसा हमारा देश है वैसे ही हमारे नेता हों... हम कह रहे हैं कि हमारे देश के डीएनए में सेक्युलरिज्म है तो नेता भी वैसा होना चाहिए. तरक्की सिर्फ सड़कों, बिल्डिंग, बिजली, कारखानों और जीडीपी ग्रोथ का नाम नहीं है, अगर ऐसी तरक्की बगैर इंसाफ के हो, तो उस तरक्की का कोई फायदा नहीं. इंसाफ के साथ ये सारी तरक्की जुड़ी हुई हो तो मज़ा आ जाए...

वासिंद्र मिश्र :तो माने आप ये कहना चाहते हैं कि विकास का मतलब सिर्फ जीडीपी और प्लानिंग कमीशन के आंकड़े नहीं हैं ?

मौलाना महमूद मदनी :नहीं बिल्कुल नहीं, कभी नहीं

वासिंद्र मिश्र :विकास का मतलब ऑलराउंड डेवलपमेंट होना चाहिए, ह्यूमन डेवलपमेंट होना चाहिए ?

मौलाना महमूद मदनी :Exactly...लोगों को equal opportunity होनी चाहिए, इंसाफ होना चाहिए, लॉ एंड आर्डर ठीक होना चाहिए....

वासिंद्र मिश्र :मौलाना हर चुनाव के पहले आप भी पढ़ते होंगे, देखते होंगे ये जो सो कॉल्ड सेक्युलर पार्टियां हैं, कहने लगती हैं कि रंगनाथ मिश्रा कमेटी की सिफारिशें लागू करेंगे. सच्चर कमेटी की सिफारिशें लागू करेंगे...

मौलाना महमूद मदनी :सब झूठे वादे करते हैं...

वासिंद्र मिश्र :और एससी-एसटी, बैकवर्ड क्लास मुस्लिम में जो हैं उनको हम रिज़र्वेशन देंगे, चुनाव खत्म हो जाता है, तो फिर सिफारिशें धरी की धरी रह जाती हैं, इसके पीछे क्या मकसद है। आपको लगता है कि अगर इन सिफारिशों को लागू कर दिया जाए तो मुसलमानों की जो माली हालत है जो अल्पसंख्यकों की माली हालत है, जो सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक स्थिति है उसमें कोई सुधार हो सकता है ?

मौलाना महमूद मदनी :देखिए अगर इमानदारी से कोशिश की जाए तो बहुत बदलाव आ सकते हैं... लेकिन दो नुकसान हो जाते हैं, इनके तरह के ऐलान करने की वजह से एक नुकसान ये होता है क्योंकि कि हमारे जैसे लोग उम्मीद करने लगते हैं कि अब बहुत कुछ होगा. और जब उम्मीदें पूरी नहीं होतीं तो लोग निराश हो जाते हैं .. किसी एक शख्स का नहीं बल्कि पूरी कौम का । इसके बहुत सारे long term impact होते हैं । दूसरा ये होता है कि जो पार्टी ये कर रही होती है उसकी विरोधी पार्टियां दूसरे सेगमेंट को attract करने के लिए कहने लगती हैं कि फलां पार्टी एक खास वर्ग का तुष्टीकरण कर रही है .. इसका अंजाम ये होता है कि दोनों कौमों के बीच में खाई बढ़ने लग जाती है.... बजाय इसके कि वो कम हो । नौजवानों के दिल में खटक पैदा हो जाती है कि यहां कुछ फायदा नहीं होगा ऐसे में डबल नुकसान हो जाता है ....खासतौर से मुसलमानों का, एक तरफ उम्मीद पैदा हो जाती है उम्मीद पूरा न होने की वजह से मायूसी पैदा होती है, उधर रिएक्शन में लोगों को नाराज़गी हो जाती है । मुसलमानों के आने-जाने, ताल्लुकात इस सबमें फर्क पड़ता है । एक रेग्युलर काम हो रहा है और रेग्युलर उसका काउंटर प्रोडक्शन हो रहा है तो मैं यही कहता हूं ऐलान करने वाली पॉलिटिकल पार्टीज़ से कि खुदा के लिए कोई ऐलान मत करो, कोई वादा मत करो, जितना करना है उतना करो. और जो नहीं करना है उसके बारे में वादा मत करो, और अगर वादा किया है और पूरा नहीं किया है तो तुम्हें हिसाब देना पड़ेगा...

वासिंद्र मिश्र :मौलाना आपको नहीं लगता कि मुसलमानों के सबसे बड़े दुश्मन जो हैं वो ये मज़हबी नेता हैं जो अलग-अलग पॉलिटिकल पार्टीज़ के पक्ष में चुनाव के ठीक पहले अलग-अलग तरह की अपीलदारी करने लगते हैं ?

मौलाना महमूद मदनी :देखिए एक बात ये है कि अगर कोई रहनुमा मजहबी हो, लेकिन वो एक इंसान भी है ना, एक सिटीजन भी है तो उसकी एक राय हो सकती है, मेरी एक राय हो सकती है, आपकी एक राय हो सकती है. आप एक प्रोफेशनल हैं, एक जर्नलिस्ट हैं सीनियर, अपनी एक राय आप बयान करते हैं, तो एक religious leader चाहे वो किसी भी मजहब से तालुक रखता हो, वो अपनी राय क्यों नहीं दे सकता, और उसकी राय को चाहे कोई सुने या ना सुने वो उनकी अपनी मर्जी है.

वासिंद्र मिश्र :मौलाना आप भी इस बात के गवाह हैं कि हमारे देश के कुछ राजनैतिक दलों ने या नेताओं ने कई चुनाव बाबरी मस्जिद बचाने और बाबरी मस्जिद गिराने के नाम पर लड़ा है, जीता है और हारा है... उसके बाद गुजरात दंगों के नाम से कई चुनाव हुए। गुजरात, सूरत, नासिक, मुंबई ये सब, अब मुजफ्फरनगर दंगा है इसकी काफी चर्चा है और आंकड़े बताते हैं कि इतनी बड़ी तादाद में भारत पाकिस्तान विभाजन के वक्त भी मुसलमान कैंप में नहीं गए थे... जितने मुजफ्फरनगर दंगों के बाद गए हैं ....

मौलाना महमूद मदनी :अब तो वो कैंपों पर बुलडोजर चलाए जा रहे हैं...

वासिंद्र मिश्र :अब तो वहां बुलडोजर चलाए जा रहे हैं. पहले कैंप लगवाए गए, अनऑथराइज्ड उन्हें हर तरह से बैकडोर से fecilitate किया गया और कहा जा रहा है कि वो illegal कैंप्स थे, इसलिए हम भी demolish कर रहे हैं और इसके आगे भी सरकार जाकर बोलती है कि उन कैंपों में तो पार्टी विशेष के कार्यकर्ता रह रहे हैं. इसलिए ये प्रॉब्लम है...

मौलाना महमूद मदनी :देखिए यूपी गवर्नमेंट इस मसले पर जो कुछ भी कर रही है वो बहुत तकलीफदेह है, अफसोसनाक है। पता नहीं इनकी अक्ल पर शायद पत्थर पड़ गया है। आपने भी कहा अनऑथराइज्ड... तो ऑथराइज्ड और अनऑथराइज्ड क्या होता है ये भी समझना पड़ेगा कि कौन सी चीज़ ऑथराइज्ड मानी जाएगी और कौन सी अनऑथराइज्ड... लोगों ने या डर की वजह से या घटना की वजह से अपने गांवों को खाली किया, खाली करके जहां उन्हें सिर छुपाने की जगह मिली, जहां उन्हें खाली जगह नजर आई वो वहां बैठ गए, बैठ गए का मतलब ये नहीं है कि वो वहां हमेशा रहने के लिए आ गए हैं, अब गवर्नमेंट को बजाए इसके कि हालात सामान्य करे, दोनों कौमों के बीच कॉन्फिडेंस बिल्डिंग यानि विश्वास बहाली करे, इसके लिए कम्युनिटी लीडर्स को बुलाए ....इसको छोड़ दिया, इसके ऊपर कोई तवज्जो नहीं दी और अब जबरदस्ती इस बात को साबित कर रहे हैं कि यहां रिलीफ कैंप है ही नहीं । वहीं रिलीफ कैंप में 40 बच्चे मर गए। आप कह रहे हैं 40 बच्चे मर गए, सरकार कह रही है 34 बच्चे मर गए... उन्होंने सोचा न मर्ज रहेगा न मरीज़ रहेगा. तो सीधा कैंप्स को ही खत्म कर दो कि यहां दो मरे या पांच मरे. कैंप ही नहीं है तो कौन मरेगा, मरेगा तो मरेगा ... अपने घर जाकर मरेगा, ये तो सोचिए घर कहां जाएगा ? ऐसे में लोग क्या कर रहे हैं, उन्हें जहां भी 10/10 या 15/15 की जगहें मिल रही हैं, वहीं रह जा रहे हैं ... वहां से भी उठाए जाएंगे तो कहां जाएंगे वो ? तो बजाए इसके कि सरकार मदद करती और बजाय इसके कि ऐसा माहौल बनाते कि लोग वापस जाएं, सुरक्षा की व्यवस्था करते कम से कम temporary तौर पर ही ... ताकि लोग एक मर्तबा घर चले जाएं ... तो दो चार दिन में पुराने हालात लौट आते ...हो सकता था कि कहीं-कहीं कुछ शरारत होती लेकिन उसे रोकने का इंतजाम किया जाता ... ऐसे में ज्यादातर लोग आराम से अपने घर चले जाते लेकिन सरकार ने ऐसा ना कुछ किया ना ही कर रही है ....

वासिंद्र मिश्र :तो माने इसके पीछे भी वही मानसिकता काम कर रही है जिसको लेकर आप बार-बार आगाह कर रहे हैं, समाज को और खास तौर पर अल्पसंख्यकों को, कि भय दिखाकर जो वोट हथियाने की जो strategy रही है ?

मौलाना महमूद मदनी:ये तो समाजवादी पार्टी के लिए बहुत नुकसानदेह होगा.... ये attitude, ये तरीका.. मैं जाती तौर पर, अपने उसूलों के हिसाब से किसी पॉलिटिकल पार्टी का विरोध अपने आप नही करता ... और न ही समझता हूं, समाजवादी पार्टी के भी बहुत से अच्छे काम हो सकते हैं, मौका आने पर उसकी तारीफ भी की जा सकती है. लेकिन जो रवैया इन्होंने इस वक्त अपनाया है वो तो यही साबित करता है कि ये अपने अंजाम से बेखबर हैं. इनको सख्त नुकसान होगा इस चुनाव में

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