शुक्रवार, 31 जनवरी 2014

प्रधानमंत्री पद की रेस में मोदी सबसे आगे हैं : डी पी त्रिपाठी

एनसीपी के नेता डीपी त्रिपाठी के साथ बातचीत के मुख्य अंश 

वासिंद्र मिश्र - डीपी त्रिपाठी जी, आप एनसीपी के राष्ट्रीय महासचिव हैं, और प्रवक्ता हैं..और भारतीय राजनीति के अगर हम कहें तो..कुछ चुनिंदा वरिष्ठ लोगों में आते हैं .. राजनीति की नब्ज को समझते हैं .....  त्रिपाठी जी इस समय जो देश के मौजूदा राजनैतिक हालात हैं.. लग रहा है कि पूरा का पूरा जो पॉलिटिकल सिस्टम है..बायपोलर होता जा रहा है... कह सकते हैं राहुल गांधी बनाम नरेंद्र मोदी... आप इससे कितना सहमत हैं... और एक हेल्दी डेमोक्रेसी की लिए ये कितनी अच्छी बात है ?

डीपी त्रिपाठी- मैं समझता हूं कि ये लड़ाई राजनीतिक मोर्चे पर चुनाव के..दो मोर्चों के बीच है....  यूपीए टू..जिसकी अभी डॉ.मनमोहन सिंह के नेतृत्व में सरकार चल रही है.....और एनडीए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ..जिसके नेता भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी हैं..तो इन दो मोर्चों के बीच मुकाबला हो रहा है । वो लोकतंत्र जो कि भारतीय संदर्भ में बहुलतावादी हो चुका है उसमें एक पार्टी का राज नहीं रहेगा..यानी किसी एक पार्टी को बहुमत मिलता तो नहीं दिख रहा है.. जिसे हम स्पष्ट बहुमत कहते हैं .... Simple Majority किसी एक राजनीतिक दल को नहीं मिल रही है... मिलेगी भी तो मोर्चे को मिलने की संभावना की बात की जा रही है... वह भी नहीं हो रहा है.. जो तमाम सर्वे और आंकलन कहते हैं.. उसके अनुसार वासिंद्र जी अगर जाइएगा..तो किसी मोर्चे को भी बहुमत नहीं मिल रहा.. हां...नरेंद्र  मोदी अवश्य प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी के रूप में आगे हैं..

वासिंद्र मिश्र - तो क्या ये माना जाए.. इस समय जो पूरी की पूरी राजनीति है.. उसमें क्षेत्रीय दलों की.. एक बार फिर महत्वपूर्ण भूमिका होने जा रही है ?

डीपी त्रिपाठी- निश्चित तौर पर.. मैंने कहा कि बहुलवादी राजनीति है..एक नहीं भारतीय राजनीति में अनेक हैं..और विभिन्न क्षेत्रीय दलों की भूमिका महत्वपूर्ण होने  जा रही है, और ये मुकाबला नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी इसलिये नहीं है कि कांग्रेस पार्टी ने अभी तक राहुल गांधी को अपना प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित नहीं किया है... और कांग्रेस पार्टी कहती है कि जब चुनाव हो जाएगा उसके बाद हमारा प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार तय होगा ...

वासिंद्र मिश्र - एक hypothetical सवाल ही सही... अगर कांग्रेस पार्टी राहुल गांधी को अपना Prime Ministerial candidate बनाती है चुनाव के पहले.. तो ऐसी स्थिति में एनसीपी क्या उस प्रस्ताव को मानेगी ?

डीपी त्रिपाठी- नहीं, उस पर हम विचार करेंगे.. पहले कांग्रेस पार्टी उम्मीदवार घोषित करे..अभी तो ये विचार कल्पना में है.. अभी तक कांग्रेस पार्टी ने कोई ऐलान नहीं किया है.. उनका प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार कौन होगा..इस पर उन्होंने विचार करके कोई घोषणा नहीं की है.. एक बार वो इसे तय करें..फिर हम विचार करेंगे...

वासिंद्र मिश्र - दूसरा सबसे बड़ा सवाल है कि एनसीपी और कांग्रेस के बीच में हर चुनाव के पहले देखा जाता है कि लव एंड हेट का रिश्ता दिखाई देता है .. चाहे वो महाराष्ट्र विधानसभा का चुनाव हों..या फिर देश का चुनाव हो.. इसके पीछे क्या कारण है..कहा जाता है कि आप और खास तौर से शरद पवार जी...और आप दोनों लोग कांग्रेस पार्टी को हमेशा tenterhooks पर रखना चाहते हैं...

डीपी त्रिपाठी- नहीं, ये बिल्कुल सही नहीं है..कांग्रेस पार्टी ही हमेशा अपने सहयोगी दलों के साथ हमेशा अनुचित व्यवहार करती है..
कभी भी उन्होंने गरिमामयी रिश्ता नहीं रखा.. आप देखिए यूपीए टू में भी हम.. लोगों ने बहुत मांग की..तब एक समन्वय समिति बनी...को-ऑर्डिनेशन कमेटी बनी..और उस को-ऑर्डिनेशन कमेटी की मीटिंग ही नहीं  होती है। कोई विषय जो को-ऑर्डिनेशन कमेटी में आना चाहिए... नीतिगत फैसलों पर इस कमेटी में विचार करने के बाद फैसले किए जाएं.. जिस पर कोई फिर ऐतराज नहीं करेगा ... उससे यूपीए-2  मजबूत होगा.. कांग्रेस पार्टी वो नहीं करती है ।  जहां तक alliance partner के साथ व्यवहार करने का प्रश्न है.. उसमें वो हमेशा हमको दबाने की कोशिश करते हैं... किस तरह एनसीपी को अलग-थलग रखा जाए.. किसी भी बड़े विषय पर उन्होंने हमसे विचार नहीं किया.. इस तरह व्यवहार करते हैं, जैसे एक पार्टी का राज हो, जबकि ये गठबंधन सरकार है ।  अपने से भी नहीं सीखते वो.. जैसे  केरल में यूडीएफ की सरकार है.. कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में बहुत अच्छी coalition सरकार चल रही है ... हम उसके खिलाफ हैं केरला में... लेकिन फिर भी गठबंधन चाहे वो यूडीएफ हो या फिर एलडीएफ हो.. दोनों गठबंधन केरल में बहुत तरीके से चल रहे हैं.. कांग्रेस उससे भी नहीं सीखना चाहती..

वासिंद्र मिश्र - आपको लगता है कि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस पार्टी गठबंधन की राजनीति करने में पूरी तरह विफल रही है ?

डीपी त्रिपाठी- गठबंधन के व्यवहार में पूरी तरह विफल रही है.. उसपर मुझे उर्दू की एक रूबाई याद आती है..कांग्रेस के साथ गठबंधन के व्यवहार पर...

 हूं न अहबाब दुश्मनों के कभी, मेरे नादान साथियों की तरह...
मुझको अपनों ने ही कुचल डाला, राजा पोरस के हाथियों की तरह...

कांग्रेस पार्टी हमेशा अपने सहयोगियों को दबाने की कोशिश करती रहती है..

वासिंद्र मिश्र - तो यही कारण है कि समय-समय पर आपके जो नेता हैं शरद पवार जी कभी एमएनएस से बात करते हैं, कभी उद्धव ठाकरे से बात करते हैं.. कभी सीनियर स्वर्गीय बाला साहेब ठाकरे से बात किया करते थे.. और अभी हाल में जो बयान आया है प्रफुल्ल पटेल जी का..कि गोधरा कांड के बारे में अब जो बयानबाजी हो रही है वो अब बंद होनी चाहिए...क्योंकि नरेंद्र मोदी को अदालत से क्लीन चिट मिल गई है..

डी पी त्रिपाठी- देखिए मैं दूसरी बात कहता हूं.. प्रफुल्ल  पटेल ने सर्वथा उचित बात कही है.. जब अदालत फैसला देती है, तो हर मामले में अदालत का फैसला हम मानते हैं.. तो नरेंद्र मोदी को क्यों अलग करके देखें.. जब अदालत का फैसला हर चीज़ में स्वीकार है.. तो नरेंद्र मोदी के मामले में  क्यों नहीं स्वीकार होना चाहिए.. अदालत ने एक फैसला दिया है.. उससे बड़ी बात मैं आपसे कहना चाहता हूं.. वासिंद्र जी.. कि पुराने घावों को कभी कुरेदना नहीं चाहिए.. जितना उसको भूला जा सके..भुलाया जा सके...उतना करना चाहिए.. जिससे जनता के बीच सामंजस्य बना रहे... विभिन्न समुदायों के बीच में आखिर 2002 के दंगों के बाद तो गुजरात में दंगे नहीं हुए.. तो कम से कम एक अच्छी बात है कि 12 वर्षों में दंगे नहीं हुए गुजरात में .. इसके लिए गुजरात की जनता का धन्यवाद करना चाहिए... सरकार का नहीं....

वासिंद्र मिश्र - त्रिपाठी जी4 बड़ी घटनाएं हुई हैं देश में.. बाबरी मस्जिद का ढांचा गिराया जाना.. गुजरात का दंगा..सिख दंगा..जो दिल्ली और देश के बाकी हिस्सों में हुए.. और अभी हाल में उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर में सांप्रदायिक दंगा हुआ....आपने अभी कहा कि जो पुराने जख्म है..उसको  कुरेदने से कोई फायदा नहीं है.. सद्भाव बनाने की कोशिश होनी चाहिए.. तो ये convenience की पॉलिटिक्स क्यों होती है... जो मुद्दे  वोट दिलाने में कामयाब हों.. उसे तो कुरेदा जाता है और जिससे लगता है कि इन मुद्दों से वोट नहीं मिलेगा उसे कवरअप कर दिया जाता है

डीपी त्रिपाठी - नहीं,नहीं,, वोट के लिए , वही तो मैं कह रहा हूं.. सिर्फ वोट के लिए ..राजनीतिक रूप से जनता के बीच जो भी भेद पैदा करने वाली चीज हैं... फूट पैदा करने वाली चीजे हैं...उसे नहीं उठाना चाहिए.. जाति की बात हो...धर्म की बात हो...क्षेत्र की बात हो..उसे नहीं उठाना चाहिए..हमें चुनाव और राजनीति के माध्यम से भी देश की एकता को मजबूत करने की कोशिश करनी चाहिए.. जो लोगों को एक करे..उनको साथ ले आए.. ऐसी नीतियों को प्रोत्साहित करना चाहिए.

वासिंद्र मिश्र - आपको लगता है कि आने वाले चुनाव में जो मुद्दे होंगे... उसमें इसी तरह के मुद्दों को ज्यादा तवज्जो दिया जाएगा ?

डीपी त्रिपाठी- मेरा ख्याल है कि राजनीतिक दल अगर ऐसा न भी करें.. जोकि लगता है कि नहीं करेंगे.. तो भी जनता अपने स्तर पर..एकता की ताकतों को मजबूत करेगी..

वासिंद्र मिश्र -  त्रिपाठी जी जो मौजूदा हालात हैं, जिस तरह polarisation हो रहा है, बहुत हाइटेक कैंपेनिंग देखने को मिल रही है... खासतौर से बीजेपी के उम्मीदवार की तरफ से... करोड़ों रुपया खर्च किया जा रहा है, उसके जवाब में कांग्रेस पार्टी भी पैसा बहाने में लगी है..आपको लगता है कि इतने महंगे चुनाव कैंपेन से कोई बहुत ज्यादा फायदा होने जा रहा है,  इन दलों को या इन प्रत्याशियों को ?
डी पी त्रिपाठी -  वासिंद्र जी आपने बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है... असल में ये प्रश्न पहली बार आप पूछ रहे हैं ... दुर्भाग्य की बात है, और लोगों को भी पूछना चाहिए था... पहली बात अगर आप मोदी की रैलियों को देखिए, और राजनीतिक रैलियों को देखिए.. तो एकदम जैसे corporate mobilisation होता है,  पूंजीवादी  तरीके से जनता को इकट्ठा करने की कोशिश होती है... ये वैसा ही है ... करोड़ों रुपये खर्च करके, अत्याधुनिक सुविधाओं के साथ ये रैलियां हो रही हैं..  इन सारी रैलियों को देखकर चुनाव की इस नई राजनीतिक तकनीक और व्यवस्था को देखकर मुझे हिन्दी के एक बड़े सुप्रसिद्ध कवि सरवेश्वर दयाल सक्सेना की 1972 में लिखी गई कविता की चार पंक्तियां याद आती हैं.... 
                  
                  अब लाठियों में तेल मलके आ रहा चुनाव
                   हत्याओं की गली से चलकर आ रहा चुनाव
                   बंदूक में उबल-उबल के आ रहा चुनाव
                   दौलत के संग उछल-उछल के आ रहा चुनाव...

तो जो चुनाव की ये नई प्रक्रिया शुरू हुई है राजनीतिक दलों के द्वारा वो अपने आप में महत्वपूर्ण भी है, और इसका नए तरीके से विश्लेषण करने की भी जरूरत है...

वासिंद्र मिश्र - तो जो लोग प्रायोजित कहें या लाई हुई भीड़ के दम पर बड़े-बड़े वायदे कर रहे हैं...  इस तरह की चुनावी रैलियों में करोड़ों अरबों रुपया खर्च करके गरीबों की बात कर रहे हैं... कह रहें की अगर उनको सत्ता मिलती है तो वो गरीबों के लिए नीतियां बनाएंगे, बेरोजगारों के लिए नीतियां बनाएंगे, आर्थिक व्यवस्था को गरीब और बेरोजगारों से जोड़कर चलाने की कोशिश करेंगे जो अर्थ नीति होगी देश की । आपको लगता है कि जब हम कारपोरेट घरानों की फंडिंग के दम पर, कई सौ करोड़ रुपया कारपोरेट घरानों से लेकर जब हम चुनावी सभाओं में खर्च कर रहे हैं,  तो ऐसे में हम accidently या कहें कि fortunately अगर सत्ता मिल भी जाती है... तो हम उस वर्ग का ध्यान रखकर नीति बना पाएंगे। या उन कार्पोरेट घरानों को ध्यान में रखकर नीतियां बनाएंगे जिन्होंने हमे फंडिंग की है चुनाव के दौरान ?

डीपी त्रिपाठी -  यही तो सबसे बड़ा अंतर्विरोध है वासिंद्र जी ... इसको समझने की कोशिश करनी चाहिए। पहली बार भारत के राजनीतिक पटल पर.. सही अर्थों में गरीब से भी गरीब आदमी सत्ता के शिखर पद का उम्मीदवार है...  नरेंद्र मोदी जिन्होंने स्वयं ट्रेनों में चाय बेची है.... संघर्ष और गरीबी को देखा है... आज वह गरीब आदमी सबसे धनी रैलियों के बीच बोल रहा है.. इस अंतर्विरोध को समझने की आवश्यकता है, और उसे समझने के साथ ही हम कुछ उस राजनीतिक निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं... जो आपके प्रश्न में निहित है, जब हम इन लोगों के बल पर अपने राजनीति के सारे इंतजामात करेंगे तो फिर जब निर्णय का अवसर हमारे हाथों में होगा तो क्या करेंगे... निश्चिय ही उनकी आकांक्षाओं के अनुरूप फैसले होंगे।

वासिंद्र मिश्र - त्रिपाठी जी, भारतीय इतिहास पर अगर नज़र डाले आप तो राजनीतिक विश्लेषक हैं और इतिहास के मर्मज्ञ हैं। गांधी, नेहरू, पंत से लेकर मौलाना आजाद तक जिनका हमलोग उदाहरण देते हैं हम अपने सार्वजनिक जीवन में उनकी सादगी का, उनके विजन का, उनकी फिलॉसफी का... जो उनकी लाइफ स्टाइल थी एक अमीर परिवार से रहते हुए भी उन्होंने गरीबी की तरफ ध्यान लगाया.. गरीबों के बारे में सोचा...  एक सादगी भरे जीवन की तरफ बढ़ने की कोशिश की, और सादगी भरा जीवन बिताने की कोशिश की... जो contradiction नरेंद्र मोदी, मायावती, लालू यादव की जीवन शैली में देखने को मिलती है.. एक तरफ ये लोग खुद को गरीब परिवार से बताते हैं कि बहुत नीचे तबके से उठकर ऊपर आए हैं राजनीति में.. ये उस वर्ग की सेवा करना चाहते हैं... लेकिन ज्योंही इनको सत्ता मिलती है, तो इनकी जीवन शैली है किसी भी राजा, महराजा या कुलीन वर्ग से ज्यादा lavish दिखाई देती है... ये क्या है ? विडंबना नहीं है हमारी भारतीय राजनीति की.. या hypocrisy नहीं है ?

डीपी त्रिपाठी -  बहुत बड़ी विडंबना है जो आप कह रहे हैं.. ये भी आपने बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है... इसको भी कोई देखने की कोशिश नहीं करता.. आप ये देखिए जिसे लोहिया द्विजवाद कहते थे ...दक्षिण भारत में तो समाप्त हो चुका है... राजनीतिक सत्ता, आर्थिक सत्ता, सामाजिक सत्ता कही भी दक्षिण भारत में द्विजवाद नहीं बचा है... उत्तर भारत में द्विजवाद के खिलाफ लड़कर जो पिछड़े आए वो अगड़ों से भी अगड़े राजाओं, महाराजाओं से भी ज्यादा धनिकों जैसा व्यवहार करते हैं ...विद्रूप रूप से धन और दौलत का प्रदर्शन कर रहे हैं।  चाहे उत्तर प्रदेश चाहे बिहार में या कहीं भी आप पिछड़े वर्ग के नेताओं को देखें जिनका जिक्र आप कर रहे हैं ... तो ये  परिवारवाद, धनवाद में और भोगवाद में भी ये विद्रूपता से ऊपर चले गए हैं। नीतीश कुमार को अगर आप छोड़ दें तो जितने भी पिछड़े वर्ग के नेता हैं... कोई भी सहज, सामान्य और सादगी भरा व्यवहार नहीं कर रहे हैं...

वासिंद्र मिश्र - तो जिन मूल्यों का ये लोग विरोध करके राजनीति में आए थे... जिन मूल्यों और नीतियों का विरोध करके उनलोगों ने राजनीति और सत्ता तक अपनी जगह बनाई। जब सत्ता में आ गए तो उन्होंने उसको वीभत्स और गंदे तरीके से उसको implement किया अपने निजी जिंदगी में और अपने पॉलिटिकल लाइफ में भी ....

डीपी त्रिपाठी - बिल्कुल...अभी भी कर रहे हैं... लगातार कर रहे हैं... उसकी तुलना में। अगर अभी भी आप कांग्रेस पार्टी में देखें तो तमाम लो, अगर आप एक बंगला छोड़ दीजिए तो अहमद पटेल बहुत सादगी से रहते हैं... मैं आपसे कह रहा हूं .. वो मेरी पार्टी में नहीं हैं... मैं उनकी पार्टी में नहीं हूं.. फिर भी कह रहा हूं अहमद पटेल बहुत सादगी से रहते हैं...   बंगला छोड़ दीजिए कि वो mother teresa crescent पर एक बंगले में रहते हैं, उसी में 1984 से रह रहे हैं..  वो बांग्ला भी नहीं बदला उन्होंने..  आप जनार्दन द्विवेदी को देख लीजिए, कैसे रहते हैं... कांग्रेस पार्टी के महासचिव हैं ...ये कोई एमपी का बंगला है ... उसके अलावा बाकी कोई अतिरिक्त सुविधा उनके यहां किसी भी धनाढ्य वर्ग जैसी नहीं दिखेगी ।  इलेक्ट्रॉनिक मीडिया दिखाता नहीं है... आप दिखा दीजिए एक बार, कांग्रेस पार्टी के महासचिव मोहन प्रकाश कैसे रहते हैं, और ये अरविंद केजरीवाल कैसे रहते हैं... अरविंद केजरीवाल इस जीवन में उस सादगी से नहीं रह सकते... जिस सादगी से मोहन प्रकाश रहते हैं।

वासिंद्र मिश्र- तो क्या पूरा गेम ब्रांड मार्केटिंग का है, पब्लिसिटी स्टंट है, और जो सच्चाई है उसको पर्दा डालते हुए अगर हम कहे कि hypocrites और hypocrisy को बढ़ावा देना है ?

डीपी त्रिपाठी - बिल्कुल, पूरी तरह

वासिंद्र मिश्र -  त्रिपाठी जी राजनीति में इस समय एक चर्चा चल रही है। कि हर दल अपनी तरफ से एक प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित कर रहा है, शरद पवार जी की काबिलियत की, उनके व्यक्तित्व की एनसीपी से ज्यादा दूसरे दलों के लोग तारीफ करते हैं समय-समय पर, कभी मुलायम सिंह यादव बोलते हैं, कभी कई बीजेपी के नेता भी कहते हैं, कि शरद पवार जी में जो प्रधानमंत्री के गुण होने चाहिए, वो सारी चीजें मौजूद हैं। क्या इस चुनाव में आप लोग मानते हैं कि शरद पवार जी को as a prime minister project किया जाना चाहिए ?

डीपी त्रिपाठी - नहीं...हमलोग अपनी सीमाएं समझते हैं... हम राष्टीय स्तर पर चुनाव आयोग द्वारा मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय दल हैं...  फिर
भी हम एक छोटी पार्टी हैं... हमारी सबसे बड़ी समस्या ये है कि हम एक बहुत बड़े नेता शरद पवार जी के नेतृत्व में हैं , लेकिन एक छोटी पार्टी हैं...  बड़ा नेता, छोटी पार्टी । महाराष्ट और कुछ अन्य राज्यों में हमारा प्रतिनिधित्व है, लेकिन हम अपनी सीमाओं को समझते हैं, इसलिए हम प्रधानमंत्री  पद पर अपने नेता की उम्मीदवारी की बात नहीं करते।

वासिंद्र मिश्र – Alliance को लेकर क्या है आपका प्लान ? राष्ट्रीय स्तर पर जो alliance चल रहा है आपका यूपीए-2 से वो सभी राज्यों में रहेगा सिर्फ महाराष्ट्र और दिल्ली के कुछ राज्यों में...

डीपी त्रिपाठी - सभी राज्यों में रहता... वो तो कांग्रेस पार्टी पर निर्भर है... कांग्रेस पार्टी alliance को मजबूरी समझती है... सहज राजनीतिक प्रक्रिया नहीं समझती... इसलिए वो अपने सहयोगी दलों को निरंतर कमजोर करने की कोशिश में लगे रहते हैं... हम यूपीए के सदस्य हैं.. हमने पिछले दस वर्ष में किसी भी सवाल पर सरकार के विरूद्ध कोई बात नहीं की.. हमेशा सरकार के प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह का समर्थन किया ।

वासिंद्र मिश्र - आपको लगता है कि महाराष्ट्र में आपकी पार्टी कांग्रेस के साथ मिलकर बेहतर करेगी ? या महाराष्ट्र में कोई अलग फॉर्मूला आजमाना पड़ेगा आपको

डीपी त्रिपाठी - नहीं अभी कोई अलग फॉमूले की बात नहीं है, मैंने कहा ये कांग्रेस के व्यवहार पर निर्भर करेगा । हमलोग चाहते हैं कि यूपीए सशक्त हो, यूपीए के सहयोगी दल कांग्रेस के साथ मिलजुल कर आगे बढ़ें ...

वासिंद्र मिश्र- आने वाले चुनाव में आपकी नजर में कौन मुद्दे होने चाहिए, जिस पर जनादेश हासिल होने की कोशिश होनी चाहिए राजनैतिक दलों की तरफ से ?

डीपी त्रिपाठी - सबसे बड़ा मुद्दा विकास के लिए समर्पित सरकार.... विभाजनकारी मूल्यों के विरूद्ध काम करने वाली राजनीति और मजबूत सरकार का मुद्दा ये तीन बातें चुनाव में प्रमुख रूप से आगे आनी चाहिए...


वासिंद्र मिश्र - बहुत-बहुत धन्यवाद त्रिपाठी जी..... हमसे बात करने के लिए, नमस्कार.....

गुरुवार, 30 जनवरी 2014

दंगों पर दंगल कब तक ?

साल 1984 – देश भर में सिख विरोधी दंगे
साल 1992 – देश भर में हिंदू-मुस्लिम दंगे
साल 2002 – गोधरा कांड, गुजरात दंगे
साल 2013 – मुज़फ्फरनगर हिंदू मुस्लिम दंगा

एक बार फिर देश के इतिहास के काले अध्यायों के पन्ने पलटे जा रहे हैं ... फिर एक बार कुछ लोगों में मानवता जाग गई है  और वो इन काले पन्नों की काली स्याही को कम करने की कोशिश में लग गए हैं .. लेकिन ये कोशिशें गाहे-बगाहे उन सालों में होती हैं जिनमें लोकसभा चुनाव होने को होते हैं ... कांग्रेस को अगर साल 2002 में गुजरात में हुए दंगे याद आ रहे हैं तो बीजेपी को साल1984 में हुए सिख विरोधी दंगे ... एक आम आदमी, जिसकी जिंदगी उसकी नौकरी और उसके परिवार के लिए उसकी जिम्मेदारियों के बीच कट रही है ...ऐसे में वो उन बीती बातों को कभी याद नहीं करना चाहता होगा भले ही वो इऩ काले अध्यायों का हिस्सा ही क्यों ना रहा हो,... उसके लिए उसकी आज की ज़िंदगी और आने वाले कल की चिंता ही सबकुछ है .. लेकिन शायद सियासी दल और नेताओं को उन काले अध्यायों की कालिमा इतनी पसंद है कि वो उससे अपने लिए लंबी लकीर खींचने में लगे हुए हैं .. ताकि विरोधियों की लकीरों को छोटा दिखाया जा सके .. 

हर चुनाव के पहले देश के सभी प्रमुख नेता और राजनीतिक दल बिजली, पानी, सड़क, रोज़गार, भ्रष्टाचार और गवर्नेंस की बातें करते हैं .. लेकिन जैसे-जैसे चुनाव प्रचार की सरगर्मी बढ़ने लगती है .. वैसे-वैसे सांप्रदायिक मुद्दे हावी होने लगते हैं । सभी राजनीतिक दल, नेता यहां तक कि देश की मीडिया भी इसमें बढ़-चढ़कर अपनी भागीदारी निभाने लगती है .. 120 करोड़ की आबादी वाले इस देश में क्या ये मुमकिन नहीं है कि देश के लिए होने वाले चुनाव में इन मुद्दों को दरकिनार कर positive issues और आम जनता की जिंदगी से जुड़े मुद्दों को लेकर जनता के बीच में जाया जाए..

एक तरफ हमारे देश में सभी political parties और नेता नौजवानों की बढ़ती भागीदारी, बेरोज़गारी की बढ़ती तादाद, भ्रष्टाचार का बढ़ता प्रभाव और poor governance  की बातें करते है, दूसरी तरफ घूम-फिर कर हर चुनाव में बज चुके उन्हीं cassettes को बजाने लगते हैं । क्या हमारे नेताओं को इस बात का भरोसा नहीं है कि देश के जागरुक मतदाता उनको positive issues पर वोट देंगे  अगर ऐसा होता तो सैम पित्रोदा से लेकर नरेंद्र मोदी, मुलायम सिंह यादव और मायावती सरीखे नेताओं को बार-बार अपनी जाति का हवाला क्यों देना पड़ता... देश के बड़े नेताओं ने महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरु, सरदार वल्लभ भाई पटेल, इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी को कभी भी अपनी जाति बताकर जनता से वोट नहीं मांगा था । डॉ लोहिया, आचार्य नरेंद्र देव, मधु लिमए, आचार्य कृपलानी, मधु दंडवते सरीखे नेताओं की जात के बारे में ज्यादातर लोगों को पता भी नहीं होगा । Statesman बनने की ख्वाहिश और देश की सरकार चलाने का मंसूबा रखने वाले नेताओं को इतिहास पुरुषों की जीवनी से सबक लेना चाहिए और जाति-धर्म रूपी ट्रंप कार्ड से दूर रहते हुए 2014 का चुनाव Positive issues के आधार पर लड़ने की कोशिश करनी चाहिए  

सेक्युलर हैं अटल बिहारी वाजपेयी : शोभा ओझा

महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष शोभा ओझा के साथ बातचीत के मुख्य अंश

वासिंद्र मिश्र – शोभा ओझा .... कांग्रेस पार्टी जो लगातार जनता के बीच में जाती है तो women empowerment की बात करती है, लेकिन जब महिलाओं के वाजिब हक़ और भागीदारी की बात आती है, तो उनको कानूनी दांवपेंच में उलझा के रख दिया जाता है ...

शोभा ओझा – देखिए... मैं ये बिल्कुल मामने को तैयार नहीं हूं... अगर महिला सशक्तिकरण की बात किसी ने सोची और उसे किया तो वो कांग्रेस है ... आजादी के पहले महिलाओं को आजादी के मूवमेंट में involve किया गांधी जी ने , और आजादी के बाद लगातार चाहे इंदिरा जी रही हों, चाहे राजीव जी रहें हों , सोनिया जी रही हों अब राहुल जी, सबने महिलाओ को सशक्त किया है । जो राजीव जी का सपना था 33 फीसदी आरक्षण का, उस सपने को कांग्रेस की सरकार ने पूरा किया । स्थानीय निकायों में 33 फीसदी आरक्षण महिलाओं को मिला , और जो महिलाएं घूघंट में रहती थी जो कभी बाहर निकलने की सोच नहीं सकती थीं, वो पंचायत राज्य के माध्यम से इस आरक्षण के माध्यम से, गवर्नेंस में आईं, सरकार में आई .. उन्होंने अपने गांव का अपने क्षेत्र का विकास किया ..
वासिंद्र मिश्र – शोभा जी... राजीव जी का जो सपना था  women empowerment का ,ड्राफ्ट तैयार कराया था मौजूदा गवर्नर मारग्रेट अल्वा जी ने... women empowerment डॉफ्ट में जो सिफारिशें थीं, उसके बाद 33 फीसदी रिजर्वेशन की बात आई, लेकिन जो व्यवहारिक रूप में देखने को आता है जहां सही मायने में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए उसमें आप की कांग्रेस पार्टी भी सिर्फ लिप सर्विस करते हुए दिखाई देती है ..
शोभा ओझा – ये बिलकुल भी मानने को तैयार नहीं हूं...  स्थानीय स्तर पर 33 फीसदी आरक्षण को पिछली सरकार ने, सोनिया जी  के कहने पर 50 फीसदी कर दिया । विश्व में ऐसा कोई देश नहीं है जहां स्थानीय निकायों के चुनावों में 50 फीसदी आरक्षण है .....जो कि हमारी बहुत बड़ी ताकत है । जहां आप बात कर रहे है विधानसभा और लोकसभा में आरक्षण की तो वो बिल पेंडिग है और अगर कांग्रेस की सरकार MAJORITY में होती तो वो पास भी हो जाता..
वासिंद्र मिश्र – कांग्रेस की नीति और नीयत पर इसलिए शक पैदा होता है, क्योंकि कांग्रेस पार्टी की इच्छा रहती है तो वो Coalition की सरकार हो या अकेले बहुमत की सरकार हो, बिल पास हो जाता है । महिला बिल कई दशकों से पेंडिग है, और 10 साल से लगातार आप की सरकार है, न्यूक्लियर डील हो जाती है, आरटीआई आप पास करा लेते है, मनरेगा से लेकर रोजगार गारंटी , फूड सिक्योरिटी बिल आप पास करा लेते है, लेकिन जब महिला बिल पास कराने की बात आती है कहीं ना कहीं आप लोग इसे उलझा देते है, कहते हैं विपक्ष साथ नहीं है...  
शोभा ओझा – नहीं...नहीं मैं इसे बिलकुल मानने को तैयार नहीं हूं । कांग्रेस की नीयत बिल्कुल साफ है आप याद कीजिए इस देश को  पहली महिला प्रधानमंत्री कांग्रेस ने दिया, पहली महिला राष्ट्रपति, पहली महिला स्पीकर भी कांग्रेस ने ही दिया, आप आंकड़े देख ले कहीं के भी, कांग्रेस बिना आरक्षण के भी महिलाओं को सबसे ज्यादा चुनाव लड़ाती है । जहां तक आरक्षण बिल का सवाल है, विपक्षी पार्टियां इसके लिए राजी नहीं थी, धीरे-धीरे दूसरी पार्टियों ने मन बनाया पर कुछ अभी-भी विरोध में खड़ी है । कुछ कह रही है कि इसमें ओबीसी का अलग कोटा होना चाहिए, लेकिन कांग्रेस महिला आरक्षण बिल के मूल स्वरूप पर अड़ी हुई है । कई विपक्षी पार्टियों के विरोध के बावजूद हमने इसे राज्यसभा में पारित करा दिया ।
वासिंद्र मिश्र – आप की पार्टी महिला आरक्षण को मुद्दा बनाकर कितने चुनाव लड़ेगी ?
शोभा ओझा – - नहीं ...नहीं  मुद्दा बिल्कुल नहीं बनाती कांग्रेस, वही कहती है, जो वो करती है।  आसमानी, सुल्तानी कोई वादे कांग्रेस नहीं करती। लोकसभा के फरवरी में होने वाले सेशन में महिला आरक्षण बिल फिर टेबल होगा और मुझे पूरा विश्वास है कि इस बार ये पास हो जाएगा ... राजीव जी ने सोचा था, सपना देखा था...वो अधिकार हमें अवश्य मिलेगा ।
वासिंद्र मिश्र – एक बहुत महत्वपूर्ण बात... आपने चर्चा के दौरान कही है।  कांग्रेस पार्टी महिलाओं को सबसे ज्यादा टिकट देती है लेकिन एक आरोप लगता है समान्य तौर पर.... कांग्रेस पार्टी उन सीटों से चुनाव लड़ाती है जो वो मान बैठी रहती है कि ये हारने वाली सीटें है वो महिलाओं को दे दो...कहने के लिए हो जाएगा कि women representation भी हो गया, और credibility भी नहीं प्रभावित हुई ...
शोभा ओझा महिला सशक्तिकरण को लेकर सबसे ज्यादा कोई संवेदनशील है,  सबसे ज्यादा कटिबद्ध कोई है, तो वो कांग्रेस पार्टी है, इसमे कोई दो राय नहीं, कोई शक नहीं, और हिन्दुस्तान की महिलाओं ने कांग्रेस का साथ देकर समय समय पर ये prove किया है कि उनका विश्वास कांग्रेस पार्टी पर है ।
वासिंद्र मिश्र  आधी आबादी आप लोगों का समय-समय पर साथ दे रही है, लेकिन आप लोग आधी आबादी का सिर्फ राजनैतिक इस्तेमाल कर रही हैं?
शोभा ओझा – ये बिल्कुल भी मानने को तैयार नहीं हूं मैं... कांग्रेस कि वजह से ही आज हमारी बहनें गांवों में, ठेठ कस्बों में, कहीं नगरपालिका अध्यक्ष बनकर बैठी है तो कहीं मेयर बनकर बैठीं है, तो कहीं जिला पंचायत अध्यक्ष बनकर बैठी हैं, कहीं मंडी में बैठी है, तो कहीं सरपंच बनकर बैठी है, और काम कर रही है। ये कांग्रेस की ही सोच हो सकती है।, राजीव जैसे अच्छे नेता की सोच हो सकती थी, और अब राहुल जी ने वही बीड़ा उठाया है उन्होंने इतना तक कहा है कि वो चाहते हैं कि आने वाले समय में इस देश के आधे राज्यों में महिला मुख्यमंत्री बने ।
वासिंद्र मिश्र – शोभा जी  लेकिन क्या कारण है कांग्रेस रुल्ड स्टेट्स में महिलाओं के विरुद्ध जुर्म, ज्यादती, आत्याचार की घटनाएं ज्यादा होती हैं ?
शोभा ओझा – -  अगर आप आंकड़े उठा के देखें तो मध्यप्रदेश कांग्रेस रुल्ड नहीं है,  पिछले दस साल से मध्यप्रदेश महिला आत्याचार के मामलों में नंबर एक पर है। मैं समझ रही हूं, आपका आशय दिल्ली की शीला दीक्षित जी की सरकार थी, उसको लेकर कह रहे होंगे.. क्योंकि दिल्ली राजधानी है इसलिए यहां जो कुछ होता है तो उसका असर पूरे देश में जाता है, और हंगामा पूरे देश में होता है। जब शीला दीक्षित जी की सरकार थी तब जो आप पार्टी सबसे ज्यादा कूदती थी कि महिला आत्याचार बहुत है, निर्भया केस में सबने बहुत ज्यादा शोर मचाया लेकिन आज देखने में आ रहा है कि आप की सरकार है, तब भी वो सारी घटनाएं हो रही हैं .... उन्होंने कई वादे किए थे, इतना इतना गन्दा नारा दिया कि अगर आप भ्रष्टाचारियों को वोट देंगे तो आप रेप को ज्यादा बढ़ावा देंगे, ऐसे पोस्टर तक उन्होंने दिल्ली में लगाए थे लेकिन चुनाव के दौरान और आज क्या ऐसे मामलों में कमी आई है कहीं... कोई कमी नहीं आई है। शीला जी की सरकार में जितने रेप और आत्याचार महिलाओं के साथ हुए थे, आज भी हो रहे हैं, इसलिए ये मानने को तैयार नहीं हूं ।
वासिंद्र मिश्र लेकिन दिल्ली में जो कानून व्यवस्था कि जिम्मेदारी है वो तो आपके केंद्र सरकार के हाथ में है, तो आप ये मानती है ना कि जितना दुराचार, दुर्व्यवहार शीला जी के टाइम में दिल्ली में हुआ वो अभी भी बरकरार है,  क्योंकि दिल्ली में आपकी सरकार है केंद्र में ?
शोभा ओझा – - देखिए इसमें महिला अत्याचार को हम किसी भी सीमाओं में  न बांधे, मैं हमेशा ये कहती हूं कि महिला आत्याचार एक ऐसा मुद्दा है, जहां पूरे समाज को सजग होने की जरूरत है । सिर्फ नियम कानून बनाने से नहीं होगा, कानून तो हमने बनाए हैं, कुछ हमारे देश में पहले से ही हैं, महिला आत्याचार के खिलाफ, डोमेस्टिक वायलेंस के खिलाफ रेप के खिलाफ कानून रहे हैं...पर कानून लागू करने वाली  इम्पलीमेंटिंग एजेन्सीज जो हैं, चाहे वो पुलिस हो, समाज हो.. दोनों को सजग होने की जरुरत है। साथ ही पुलिस अगर अपना दायित्व नहीं निभा रही है तो उसे सज़ा दी जाए... आज हम देखते हैं कि थानों में रेप हो जाते हैं, महिला थाने में रेप के एफआईआर दर्ज नहीं होते, पुलिस सजग नहीं है इसलिए भी रेप होते हैं , कई एरियाज में जहां पुलिस को ड्यूटी पर होना चाहिए वो नहीं होती...  बहुत जरूरी है कि हम पूरे समाज को सजग करें।
वासिंद्र मिश्र इससे हटकर और एक अहम मसला है आपके जो विरोधी हैं, वो अक्सर आरोप लगाते हैं कि कांग्रेस पार्टी में जो महिलाएं राजनीति में हैं, वो बड़े अमीर elite क्लास की महिलाएं हैं, गांव-गरीब किसान परिवारों से जो महिलाएं हैं उन्हें कांग्रेस पार्टी में कोई जगह नहीं मिलती है... इसका क्या  कारण है?
शोभा ओझा – - नहीं...ये आरोप गलत हैं
वासिंद्र मिश्र – आप पांच नाम बताइए? जो मिडिल क्लास, लोअर मिडिल क्लास से उठकर आईं हैं, आपके संगठन में ऊंचे पदों पर हैं, सिर्फ पांच नाम बताइए ...
शोभा ओझा – - पांच नाम...देखिए मैं खुद एक मिडिल क्लास फैमली की हूं.. तो ना मेरी...
वासिंद्र मिश्र अगर शोभा जी मीडिल क्लास की हैं, तो शोभा जी के जो हम कह सकते हैं फादर इन लॉ जो थे वो जज थे, शोभा जी के जो पति है वो बिजनेस मैन हैं, अगर ये मिडिल क्लास है तब तो मोटेंक सिंह अहलूवालिया का प्लानिंग कमीशन का जो डेटा है... उसको फिर नए सिरे से पैरामीटर तय करने पड़ेगा ।
शोभा ओझा – - नहीं ..नहीं... अच्छा ठीक है आप मुझे न माने भले...वैसे मैं मानती हूं कि मैं मिडिल क्लास की हूं, देखिए जज होने का मतलब ये नहीं कि आप इलीट क्लास में पहुंच गए, जज अगर इमानदार है तो मिडिल क्लास में ही रहता है जीवन भर, मिडिल क्लास के संघर्षों से ऊपर नहीं उठ पाता, दूसरी बात है कि आप मीनीक्षी नटराजन को देखिए, सर्विस क्लास घर की लड़की, जिनका परिवार राजनीति में नहीं है.. जो Independent खड़ी हुईं हैं.....
 वासिंद्र मिश्र – बडे पदों पर हैं आपके संगठन में... मिनाक्षी के अलावा और कोई नाम ?
शोभा ओझा – - मीनाक्षी के अलावा मैं आपकों ढेरों ...मध्यप्रदेश में ....
वासिंद्र मिश्र  चार नाम और बता दीजिए
शोभा ओझा – - बिल्कुल आपको नाम गिना देती हूं....इसी तरह से आपको मैं एक ज्ञानवती सिंह का बता रही हूं.. जो जिला पंचायत अध्यक्ष रहीं है मध्यप्रदेश में... ट्राइबल लड़की है... एकदम गरीब परिवार की
वासिंद्र मिश्र वो तो रिजर्वेशंस के नाते... उनको बनाना पड़ा होगा आपको...
शोभा ओझा – - वो एक नेता बन गई थीं...वो एक बड़ी... मतलब जिला पंचायत अध्यक्ष तीन बार जीतीं
वासिंद्र मिश्र –मैं संगठन में महिलाओं की मौजूदगी के बारे में पूछ रहा हूं आपसे...
शोभा ओझा – - संगठन में ही वो जिला अध्यक्ष रहीं महिला कांग्रेस की ...
वासिंद्र मिश्र  जिला पंचायत अध्यक्ष हैं ना ...
शोभा ओझा – - जिला पंचायत अध्यक्ष भी रहीं... जिला अध्यक्ष कांग्रेस की भी रहीं वो.... इसी तरह मैं आपको पूरे राज्यों में दिखाउं तो आपको... दिल्ली में कई महिलाएं... ऐसा कहना बिल्कुल गलत होगा... क्योंकि हमारा संगठन शहर में है, तो गांव में भी हमारा संगठन है... हमारा संगठन पंचायत लेवल तक भी है... तो हमारा संगठन नीचे से लेकर ऊपर तक है... इसलिए तो मुझे हंसी आ रही है इस आरोप पर आपके
वासिंद्र मिश्र –जो महिलाओं की स्थिति है देश में... लोकसभा चुनाव देश के सामने खड़ा है... आपके प्रिय नेता राहुल गांधी ने ढेर सारे वायदे कर डाले हैं.. अभी पिछले तीन-चार दिन के दौरान...  तो ऐसे में किस तरह से महिलाओं को आगे ले जाने के बारे में सोचना है..... हमलोग बात कर रहे थे महिलाओं की जो माली हालत है... महिलाओं की जो राजनीतिक स्थिति है, महिलाओं की जो आर्थिक स्थिति है... इसके बारे में आपने बताया... राहुल गांधी जी के बारे में जो उनके विचार है.. वो भी आपने संक्षिप्त में बताया..सबसे जो बड़ा सवाल है Women Empowerment का.. वो है कि चाहे वो dowry केस हो या फिर महिलाओं के खिलाफ violence की घटनाएं... उसमें रुकावट नहीं आ रही है.. तमाम कोशिशों के बावजूद.. इसके पीछे आप किन ताकतों को जिम्मेदार मानती हैं?
शोभा ओझा – - देखिए भाईसाहब...पुरुष प्रधान देश है, और पुरुष प्रधान इस देश में महिलाएं दोयम दर्जे की नागरिक हैं.. पर अब 21वीं शताब्दी में बदलाव आ रहे हैं , सरकार के द्वारा बहुत सारे ऐसे initiative लिए गए हैं... जहां महिलाओँ को सशक्त करने की बात ही नहीं हुई... प्रयास हुए । राहुल जी, और सोनिया जीं की साफ सोच है कि अगर महिलाओं को हम आर्थिक रूप से सशक्त नहीं करते हैं, तो कहीं ना कहीं महिला सशक्तिकरण की परिभाषा अधूरी रह जाती है, और उसी सोच के रहते भारतीय महिला बैंक की शुरूआत अभी कांग्रेस के initiative पर पिछले दिनों हुई, जिसमे  महिलाओं को ज्यादा से ज्यादा लोन देकर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा किया जाएगा । स्वंयसेवी सहायता समूह के माध्यम से महिलाओं को ताकत देने की कोशिश की जा रही है । महिला कोष भी पहले था, जिसके माध्यम से भी गांव से लेकर शहर तक की महिलाओं को लोन और सुविधाएं दी जाती थी अब तो महिला बैंक की स्थापना कर दी गई है ...जिससे  बहुत बड़ी ताकत महिलाओं को मिलेगी, तो एक तरफ महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त करने की बहुत ज्यादा जरूरत है। आर्थिक रूप से सशक्त रहेंगी तो उससे उनकी अपनी ताकत बढ़ेगी, वो किसी भी अत्याचार के खिलाफ खड़ी हो पाएंगीं,  लड़ाई कर पाएंगी।
वासिंद्र मिश्र – आपकी पार्टी की अगुवाई में अभी जो सरकार चली है.. लगभग साढ़े नौ साल... उसमें अक्सर पॉलिसी पैरालिसिस देखने को मिला है । दिल्ली में हुई घटना के बाद आपकी सरकार ने निर्भया फंड का  ऐलान किया .. लेकिन उसको फंक्शनल बनाने में एक साल से ज्यादा का वक्त लग गया.... इसीलिए कहा जाता है कि आप लोग घोषणाएं तो बड़ी-बड़ी करते हैं, लेकिन वो घोषणाएं महज तभी तक रहती है..जब तक जनता का आक्रोश बरकरार रहता है आपके खिलाफ, और उसमे कहीं ना कहीं रेड टेपज्म, पॉलिशी परालिसिस दिखती है ...  हम कह सकते हैं कि नीयत हमेशा doubtful दिखती है
शोभा ओझा – - नहीं बिल्कुल भी नहीं भाई साहब... हमने जितने भी अधिकार दिए, जितने भी कार्यक्रम बनाए.. चाहे मनरेगा देखें आज वहां भी 30 फीसदी आरक्षण महिलाओँ को दिया है... हमारी ग्रामीण महिलाओं के लिए आज वो एक बड़ी ताकत है।  हमने राइट टू एजुकेशन इसलिए बनाया था कि शिक्षा का अधिकार हमारी बच्चियों को मिले...  हमारे समाज में देखा जाता है कि बेटे को तो पढ़ने भेज देते हैं.. पर बेटियों को पढ़ाने में कहीं ना कहीं कंजूसी करते हैं.. या तब माता-पिता को लगने लगता है कि हम afford नहीं कर सकते... इतना पैसा नहीं है कि हम बेटियों को पढ़ा सके.. ऐसे में बेटियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए और वो अच्छे  स्कूल में पढ़ सके हम राइट टू एजुकेशन लेकर आए .. सरकारी स्कूल में तो मुफ्त सुविधा है पढ़ाई की... पर प्राइवेट स्कूलों तक में उनको अच्छी शिक्षा मिल सके इसका अधिकार कांग्रेस की सरकार, कांग्रेस की सोच ने ही दिया है , फिर राइट टू ......
वासिंद्र मिश्र – अब थोड़ा सा महिलाओं से हटकर बात करते हैं, आपके जो स्टार कैंपेनर है आने वाले चुनाव के लिए और आपकी पार्टी के हम कह सकते हैं कि नए राजनैतिक उत्तराधिकारी राहुल गांधी... आपको लगता है कि राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी का मुकाबला कर पाने में सक्षम हैं पॉलिटिकली...?
शोभा ओझा देखिए...राहुल गांधी जी और नरेंद्र मोदी की कोई तुलना नहीं है .. मैं कहती हूं कि राहुल गांधी जी कहां हैं और नरेंद्र मोदी जी कहां? कोई तुलना नहीं है?
वासिंद्र मिश्र – बिल्कुल यही हम भी कह रहे हैं यही पब्लिक भी कह रही है
शोभा ओझा – - नहीं... बिल्कुल मैं ये कहूंगी राहुल गांधी एक सच्चे व्यक्ति हैं, राहुल गांधी एक युवा है, और उसकी एक युवा सोच है, और वो इस देश को आगे बढ़ना चाहते हैं। एक अच्छी सोच के साथ देश को आगे बढ़ाना चाहते हैं। एक ऐसा व्यक्ति जिसका एक विजन है, एक अच्छी, पॉजीटिव सोच है, और वो एक ऐसी पार्टी को रिप्रेजेन्ट कर रहे हैं, जिसने इस देश को आजादी के साथ विकास की राह पर चलाया। राहुल गांधी उस राजीव गांधी के बेटे हैं जिसने इस देश को आज 21वीं शताब्दी में पहुंचाया .. अगर आज हिंदुस्तान विश्व के किसी मैप में दिखाई दे रहा है तो वो राजीव जी की सोच थी, और उसी सोच को आगे बढ़ाने का काम राहुल जी कर रहे हैं ...
वासिंद्र मिश्र – राजीव जी जब राजनीति में आए थे, तब एक हादसे के बाद आए थे, और उनकी जो इमेज थी मिस्टर क्लीन की इमेज थी... लेकिन सरकार के पांच साल पूरा होते-होते उनकी जो मिस्टर क्लीन की इमेज थी.. वो एक टेंटेज लीडर की इमेज बन गई और देश की जनता ने वीपी सिंह की बात पर भरोसा किया.. राजीव जी को सत्ता से बाहर जाना पड़ा... राहुल गांधी के बारे में आप लोग कह रहे है... वो सबसे दिल से बात करते हैं...नौजवान उनके साथ है ... आपको लगता है कि राजनीति में बगैर छल-कपट के कोई नेता कामयाब होता है ?
शोभा ओझा – - देखिए...राजीव जी की मिस्टर क्लीन की इमेज थी, और आखिरी में वीपी सिंह जी और उनकी चौकड़ी ने उनकी छवि खराब करने की कोशिश की लेकिन आज आप देखिए राजीव जी को किस तरह से देश याद करता है.. आज राजीव जी को याद करते हैं... पंचायती राज के लिए, आज राजीव जी को याद करते हैं हम टेलीकम्यूनिकेशन के लिए... आज राजीव जी को याद करते हैं हम कंप्यूटराइजेशन के लिए..  आज देश वहां खड़ा नहीं होता। अगर राजीव जै    सी फॉस्ट साइटेट विजनरी लीडर हमारे बीच नहीं होता, और वीपी सिंह को किस तरह से हम याद करते हैं। वीपी सिंह और उनकी चौकड़ी ने जो भी किया आज इस हिन्दुस्थान का दस प्रतिशत आबादी ये नहीं कह सकती... ये नहीं बता सकती कि वीपी सिंह जी हैं, या नहीं है?

वासिंद्र मिश्र – तो आप मानसिक रूप से तैयार हैं कि आने वाला जो लोकसभा का चुनाव है....?
शोभा ओझा जो सच्चा व्यक्ति होता है उसको फरेब की जरूरत नहीं, उसे कोई तिकड़म की जरूरत नहीं, उसको कोई तोड़फोड़ की जरुरत नहीं। उसकी नीयत साफ है, उसकी इस देश के लिए नीयत साफ है, और इसके लिए देश उसे हमेशा याद करता है, यही राहुल जी और मोदी जी में फर्क है ....
वासिंद्र मिश्र – माने तो आप लोग मानसिक रूप से तैयार हैं ?
शोभा ओझा – - बिल्कुल तैयार हैं, राहुल जी सच्चे व्यक्ति हैं, और इस देश कि एकता, अखंडता को बनाते हुए, इस देश के फाइबर को समझते हुए inclusive politics में विश्वास रखते हैं, हर हाथ शक्ति, हर हाथ उन्नति देना चाहते हैं ।  वहीं मोदी जी की क्या इमेज है, किसी को बताने की जरूरत नहीं, क्या गुजरात में फासीज्म का राज है, किस तरह से उनके ही पार्टी के लोग घुटन महसूस कर रहे हैं, चाहे केशु भाई हों ... गुजरात के अंदर केशुभाई की क्या स्थिति हुई ...  संजय जोशी की क्या स्थिति हुई ...  उनके पार्टी के जो नेता गुजरात में रहे, उनकी क्या स्थिति हुई ... मोदी ने उनकी स्थिति गुजरात के अंदर क्या की यही कहना काफी है .. मोदी का गुजरात का राजपाट दिखाता है कि किस तरह के फासीज्म उनके राज्य में है .. वो किस तरह के autocrat हैं .. संविधान में उनका कितना विश्वास है...  ये सब गुजरात के उनके राज से लगता है...
वासिंद्र मिश्र – आपको लगता नहीं कि जो इस समय देश की आंतरिक स्थिति है उसमे एक सशक्त मजबूत, committed, visionary, leadership की जरूरत है ?
शोभा ओझा – - बिल्कुल जरुरत है..
वासिंद्र मिश्र – और वो चीज जनता मोदी में देख रही है...?
शोभा ओझा – - बिल्कुल भी नहीं .. पहली बार हिन्दुस्तान में एक व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनने के लिए इतनी मेहनत करनी पड़ रही है...  हिन्दुस्थान में प्रधानमंत्री अपने आप चुने हैं कोई भी इसके पहले इतिहास उठाकर देख लीजिए... कोई व्यक्ति ने डेढ़-दो साल कैंपेन नहीं किया ... अपनी इमेज बिल्डअप करने की कोशिश नहीं की, अपना भाषण कैसा होना चाहिए? कपड़े कैसे पहनने चाहिएं ? उनको किसी एजेंसी को बताने की ज़रूरत नहीं पड़ी है ... इसके पहले भी इस देश में प्रधानमंत्री बने है । मैं कहती हूं इस देश का मतदाता बहुत जागरूक है... और वो इस देश की अनेकता में एकता की जो ताकत है उसे बचाए रखना चाहता है...  इसलिए आडवाणी जी जैसे कट्टर व्यक्ति को इस देश ने नकारा... तो मुझे पूरा विश्वास है, कि मोदी की कट्टरता को भी ये देश नकारेगा । अगर हम विपक्ष की बात करें आरएसएस, बीजपी की विचारधारा की बात करें तो केवल अटल जी को इस देश ने accept किया, क्योंकि उनका एक सेक्युलर फेस था,  वो बीजेपी के जरूर थे। पर उसके बावजूद उनका एक सेक्युलर फेस था इसलिए उनकी....
वासिंद्र मिश्र – अटल जी के प्रति आपका बड़ा सॉफ्ट कॉर्नर है, इसलिए नहीं कि वो आपके होम स्टेट के हैं?
शोभा ओझा नहीं...मैं कहूंगी वो ठीक है ... वो बीजेपी के थे... वो उस विचारधारा के थे लेकिन उनका एक सेक्युलर फेस था । पर जहां तक आडवाणी जी या मोदी जी की बात है, उनके चेहरे को सब जानते हैं। कुछ बताने की जरूरत नहीं, जितना कम बोला जाए उनके बारे में, उतना अच्छा है... तो मैं समझती हूं कि देश का मतदाता बहुत जागरूक है,  वो सही निर्णय लेगा...
वासिंद्र मिश्र – शोभा जी लगता है कि 2014 के बजाय आप लोग 2019 के चुनाव की तैयारी कर रहे हैं ?
शोभा ओझा – -  बिल्कुल भी नहीं...हम 2014 की ही तैयारी कर रहे हैं, और बहुत अच्छा है कि अभी जो एक...AAP पार्टी आई थी,  लोगों को बड़ी उम्मीदें थीं .. क्या हाल हो रहा है ये जनता भी देख रही है ... इसी तरह मोदी जी आए..  बड़ी-बड़ी बातें कीं ...  बड़े-बड़े वादे करे...  बड़े-बड़े क्लेम किए पर समय आने  पर सबको पता लग जाएगा कि इस देश का हितैषी कौन है, और किस तरह का नेतृत्व इस देश को चाहिए... वो देश की जनता चुन लेगी...  
वासिंद्र मिश्र....बहुत-बहुत धन्यवाद... हमसे बात करने के लिए...