शनिवार, 28 दिसंबर 2013

स्टैच्यु ऑफ युनिटी का मकसद






भारतीय जनता पार्टी एक बार फिर देशव्यापी मूवमेंट के जरिए एक मोमेंटम बनाने की कोशिश कर रही है। इस आंदोलन का नाम स्टैच्यू ऑफ युनिटी रखा गया है। स्टैच्यू ऑफ युनिटी कैंपेन के जरिए बीजेपी की कोशिश देश में वैसी लहर पैदा करने की है जैसी राम मंदिर आंदोलन की वजह से हुई थी। देश का एक बड़ा तबका बीजेपी से जुड़ गया था और बीजेपी इतना जन समर्थन पाने में कामयाब हो गई थी कि केंद्र में सरकार बना ले, लेकिन सवाल ये उठते हैं कि क्या सचमुच इस कैंपेन के जरिए बीजेपी देश में एक बार फिर वैसी लहर बनाने में कामयाब हो पाएगी?

नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने के साथ ही बीजेपी ने स्टैच्यू ऑफ युनिटी कैंपेन को उसी राम मंदिर आंदोलन जैसा आकार देने की कोशिश की है। उस वक्त राम मंदिर के शिला पूजन के लिए ईंटें जमा करने का आंदोलन चलाकर संघ परिवार ने देश भर में एकता बनाने की कोशिश की थी, अब नरेंद्र मोदी सरदार पटेल की सबसे ऊंची प्रतिमा बनाने के लिए लोहा मांगने का आंदोलन चला रहे हैं। 15 दिसंबर को सरकार पटेल की पुण्यतिथि पर देश भर में रन फॉर युनिटी के तहत दौड़ का आयोजन किया जाना भी मोदी का मोमेंटम बनाने की कैंपेन का हिस्सा ही है। 

रन फॉर युनिटी कैंपेन, राम मंदिर आंदोलन जैसी लहर बना पाएगी या नहीं, बीजेपी को एक बार फिर कामयाबी मिलेगी या नहीं, इन सवालों का जवाब ढूंढने से पहले इन आदोलनों का फर्क समझना ज़रूरी है। राम मंदिर आंदोलन आस्था और अस्मिता का आंदोलन था, इससे संघ परिवार के हर रैंक और हर प्रोफाइल के लोग जुड़े थे। जो लोग आस्था या धर्म से दूर थे उनके लिए ये आंदोलन सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का था। संघ परिवार ने राम जन्मभूमि शिलान्यास को राष्ट्र के शिलान्यास का नाम दिया था, मंदिर की स्थापना को राष्ट्रीय सम्मान की पुर्नस्थापना का सवाल बताया था। आंदोलन के केंद्र में मर्यादा पुरुषोत्तम राम थे, आंदोलन का मकसद सत्ता पाना नहीं था, लिहाजा इस आंदोलन से वो लोग भी जुड़े जिन्हें धर्म, संप्रदाय और राजनीतिक दल से कोई लेना-देना नहीं था। इस आंदोलन के जो अगुआ थे उनकी नीति और नीयत पर कोई सवाल खड़े नहीं कर सकता था, क्योंकि शिलादान के पीछे सत्ता की ललक नहीं दिखाई देती थी, लेकिन स्टैच्यू ऑफ युनिटी का मुद्दा पहले दिन से ही विवादों में है। 

इस आंदोलन के केंद्र में सरदार पटेल हैं और आंदोलन के अगुआ हैं नरेंद्र मोदी। सरदार पटेल कांग्रेस से जुड़े हुए थे और संघ के विरोधी थे। इससे दो बातें सामने आती हैं, पहली तो ये कि जिन सरदार पटेल की विरासत को आगे बढ़ाने के नाम पर नरेंद्र मोदी आंदोलन को धार देने में लगे हैं वो संघ के विरोधी थे तो संघ में भी उनको लेकर अलग-अलग राय थी ऐसे में नरेंद्र मोदी के इस आंदोलन को संघ का पूरा समर्थन मिलना मुश्किल है, और ऐसे में बीजेपी में भी दो राय बननी स्वाभाविक है। 



दूसरी बात ये है कि आंदोलन के अगुआ नरेंद्र मोदी का लक्ष्य भी साफ है और वो है सत्ता। देश में सरदार पटेल की विरासत को संभालने के लिए जिस कैंपेन की शुरुआत की गई है वो नरेंद्र मोदी के लिए है जिसमें सरदार पटेल को एक प्रतीक के रूप में लिया गया है। ऐसे में राम मंदिर शिलान्यास के लिए चलाए आंदोलन और स्टैच्यू ऑफ युनिटी कैंपेन को एक जैसा आंकना भूल होगी। राम मंदिर शिलान्यास के आंदोलन के अगुआ उसे राष्ट्रवाद से जोड़ने में कामयाब रहे थे, उन्होंने सत्ता की बात नहीं की थी, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात करके धर्म से दूर रहने वाले लोगों को जोड़ना उनकी बड़ी कामयाबी थी, लेकिन रन फॉर युनिटी में ना तो राष्ट्रवाद है ना ही इसकी नीयत साफ है।

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें