बुधवार, 20 नवंबर 2013

साहेब, शहज़ादे....




क्या इस देश में कानून अंधा है...क्या हमारा संविधान किसी की भी निजी जिंदगी में झांकने का अधिकार देता है...क्या इस देश में निजता कानून के दायरे में सिर्फ खास लोग ही आते हैं..क्या चंद खास लोगों को ही राइट टू प्राइवेसी का इस्तेमाल करने का हक है....
इन सब मसलों का जिक्र इसलिए और जरूरी हो गया है क्योकि इस चुनावी मौसम में अचानक एक बहस छिड़ गई है...और हाल फिलहाल इस बहस की शुरुआत हुई ...एक बड़े साहेब, उनके एक मंत्री और एक लड़की की जासूसी की खबरों के साथ....
इस खबर पर तफ्सील से जाने के बजाय इस मुद्दे की गंभीरता पर बात होनी जरूरी है...आखिर ऐसा क्यों होता है कि जब किसी हाईप्रोफाइल शख्स का इस तरह का मामला सामने आता है..और बात से बात आगे बढ़ने लगती है तो कहा जाने लगता है कि ये किसी की प्राइवेसी का उल्लंघन हो रहा है...इस देश में कई ऐसे मामले है जहां सार्वजनिक जीवन में रहने  वाले लोग अचानक खुद को प्राइवेट समझने लगते हैं और इसी प्राइवेसी की दुहाई देकर खुद को खास बताते हुए आम लोगो से अलग साबित करने लगते हैं...
बीते कुछ दिनों में निजता का मसला सुर्खियों में है ... इसकी शुरुआत हुई है एक ऑडियो टेप के सामने आने से जिसमें एक लड़की के बारे में एक प्रदेश के मंत्री और आला अधिकारी की बातचीत है और अगर ये ऑडियो टेप सही है तो हैरान करता है ... इस टेप में रिकॉर्ड बातचीत के मुताबिक उस लड़की का चलना, उठना, बैठना, किसी के साथ मुलाकात करना जैसी हर बात का जिक्र है ...
अब इसी बात पर की बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं...आखिर क्यो समाज के एक खास तबके को इस बात का अहसास नहीं है कि इस देश में लागू हर कानून सबके लिए जरूरी है...आखिर क्यों जो राइट टू प्राइवेसी उनके लिए है वहीं राइट इस देश के हर खास ओ आम के लिए भी है...आखिर क्यों किसी व्यक्ति विशेष की बीमारी की जानकारी को उसकी निजता का अधिकार बताकर आम लोगों से छिपाया जाता है जबकि वो शख्श देश की सबसे ताकतवर राजनीतिक शख्सियत है..
कुछ और उदाहरणों का जिक्र करें तो ...मसलन एन डी तिवारी की अवैध संतान का मामला, नीरा राडिया और रतन टाटा की बातचीत के टेप का मामला, अमर सिंह और अभिषेक मनु सिंघवी की विवादित सीडी ... नारायण दत्त तिवारी को छोड़ दें तो इन सभी मामलों में अदालत ने सीडी को पब्लिक होने से बचा लिया ... मसला इन लोगों की निजता का था .. चाहे वो रतन टाटा हों, अमर सिंह हों या फिर अभिषेक मनु सिंघवी इन सभी लोगों ने अदालत का दरवाजा खटखटाकर अपनी निजता के उल्लंघन की बात कहकर सीडी पर स्टे ले लिया .. हालांकि एन डी तिवारी अपने बेहद निजी मामले पर खुद की छीछालेदर होने से नहीं बचा पाए ।
ऐसे में सवाल ये उठता है क्या भारत के हर आम नागरिक को ये अधिकार मिला हुआ है .. और अगर नहीं है तो कहां है निजता का अधिकार, कहां है समानता का अधिकार, क्या भारत का हर नागरिक संविधान के प्रीएम्बल की हर बात मानता है ? और ऐसे में क्या हम कह सकते हैं कि भारत में रूल ऑफ लॉ है क्या हम अपने लोकतंत्र का सम्मान करते हैं ... क्या जिस देश से हमने डेमोक्रेसी का आइडिया लिया क्या लोकतंत्र के मामले में हम उनकी तरह डेमोक्रेसी का सम्मान करते हैं ... .क्या प्राइवेसी के मामले में ऐसा नहीं लगता कि आम आदमी स्लेव डायनेस्टी में जी रहा है ... और मेडिएवल एरा में लौट गया है ..क्या हम ऐसे में गर्व से कह सकते हैं कि  हम दुनिया की सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में जीते हैं ?  

मंगलवार, 19 नवंबर 2013

अटल को भारत रत्न क्यों ?


रार नहीं ठानूंगा, हार नहीं मानूंगा
काल के कपाल पर, लिखता चला जाऊंगा...

मॉडर्न इंडिया में पंडित नेहरु और इंदिरा गांधी को छोड़ दें तो अटल बिहारी वाजपेयी ही एकमात्र ऐसे नेता हैं जिनकी स्वीकार्यता (acceptability) पार्टी लाइन, धर्म, जाति से हटकर हर दल हर वर्ग, हर उम्र के लोगों में है । अटल जी की शख्सियत में ये महत्वपूर्ण नहीं है कि वो प्रधानमंत्री रहे थे या इतने बड़े पद पर रहते हुए उन्होंने अपनी पार्टी के किसी नेता या फिर किसी भी विरोधी नेता के लिए कभी भी अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल नहीं किया । काफी लंबे समय तक विपक्ष में रहते हुए भी अटल बिहारी वाजपेयी में कभी भी अपने राजनैतिक विरोधियों के लिए भेदभाव या वैमनस्यता नहीं रही ।

विपक्ष के नेता के रूप में जब और जहां सत्तारूढ दल और उसके मुखिया की तारीफ करने की आवश्यकता महसूस हुई पंडित अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्मुक्त कंठ से तारीफ की, चाहे वो भारत पाक युद्ध का वक्त हो या और तमाम राष्ट्रीय आपदा की घटनाएं, अटल बिहारी वाजपेयी ने हमेशा स्टेट्समैनशिप की बेमिसाल मिसाल पेश की । भारत पाक युद्ध के दौरान अटल बिहारी वाजपेयी ने इंदिरा गांधी को दुर्गा कहा था ।

देश के प्रधानमंत्री के रूप में अटल जी की कार्यशैली उन्हें अपनी पीढ़ी के नेताओं से अलग पहचान देती है । गुजरात में हुए नरसंहार के बाद प्रधानमंत्री के रूप में अटल जी का गुजरात दौरा और अपनी ही सरकार के मुख्यमंत्री को राजधर्म का पालन करने की नसीहत देना उन्हें महापुरुषों की श्रेणी में ले जाकर खड़ा करता है । ठीक उसी तरह जैसे पंडित जवाहर लाल नेहरु ने प्रधानमंत्री के रूप में केरल की अपनी सरकार को संवैधानिक दायित्वों का पालन करने में विफल होने के आरोप में बर्खास्त कर दिया था । अटल और सोनिया जी के बीच में पॉलिटिकल केमिस्ट्री और वर्किंग अंडरस्टैंडिंग का आलम ये था कि केंद्र सरकार के तमाम फैसले सोनिया जी की लिखी चिट्ठी के आधार पर संशोधित किए जाते रहे और बदले जाते रहे ।

कहा तो ये भी जाता है कि प्रधानमंत्री के रूप में पंडित अटल बिहारी वाजपेयी ने सोनिया गांधी को एक सफल नेता प्रतिपक्ष के रूप में स्थापित होने में भरपूर मदद की। अटल जी की पार्टी के ही कुछ लोग उनकी इस कार्यशैली को लेकर कई बार अपना असंतोष भी जताते रहे हैं । कुछ लोग तो ये भी कहते थे कि वाजपेयी जी ने सोनिया गांधी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में प्रमोट करके पंडित नेहरु द्वारा पूर्व में उनके लिए किए गए राजनैतिक मदद की भरपाई की थी । वाजपेयी जी जब पहली बार चुनकर लोकसभा पहुंचे थे तो पंडित जवाहरलाल नेहरु ने उन्हें विदेश नीति पर बोलने का मौका दिया था, अटल बिहारी वाजपेयी के भाषण से पंडित नेहरु इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने कहा था कि वाजपेयी जी के अंदर देश का नेतृत्व करने के सारे गुण मौजूद हैं ।
पंडित अटल बिहारी वाजपेयी के व्यक्तित्व के अलग-अलग आयाम रहे हैं, आरएसएस के स्वयंसेवक के रूप में अटल, जनसंघ के राजनैतिक कार्यकर्ता के रूप में, आरएसएस के मुखपत्र राष्ट्रधर्म के संपादक के रूप में अटल, देश के सर्वोत्तम विशिष्ट पार्लियामेंटेरियन के रूप में अटल, नेता प्रतिपक्ष के रूप में अटल, विदेश मंत्री के रूप में अटल और प्रधानमंत्री के रूप में अटल ।

भारतीय विदेश नीति के जानकार भली भांति जानते होंगे कि भारत और पाकिस्तान के बीच विभाजन के बाद उपजी कड़वाहट में सबसे ज्यादा कमी अटल बिहारी वाजपेयी के विदेश मंत्री रहते हुए आई, अटल जी ने अपने कार्यकाल में भारत की पाकिस्तान के लिए वीजा नीति को शिथिल किया था ।  वो अटल बिहारी वाजपेयी जो आरएसएस के स्वंयसेवक थे, पंडित श्यामा प्रसाद मुखर्जी और दीन दयाल उपाध्याय की फिलॉसॉफी को मानते थे, बावजूद इसके उन्होंने पड़ोसी मुल्क के साथ आपसी मेल-जोल बढ़ाने की भरपूर कोशिश की ।

प्रधानमंत्री के रूप में भी अटल बिहारी वाजपेय़ी ने दोनों मुल्कों के बीच समझौता एक्सप्रेस और लाहौर बस सेवा की शुरुआत की, और ऐसा कर उन्होंने खुद के पंथनिरपेक्ष होने और इंसानी सोच का परिचय दिया । य़े अलग बात है कि पाक की तत्कालीन हुकूमत ने अटल जी के साथ विश्वासघात किया और जवाब में करगिल जंग थोप दिया । हालांकि अटल जी का व्यक्तित्व ऐसा है कि उनकी विश्वसनीयता और सम्मान पूरे इंडियन सब कॉन्टिनेंट में है, पाकिस्तान में भी अटल बिहारी वाजपेयी उतने ही लोकप्रिय हैं जितने भारत में है ।

अटल जी के व्यक्तित्व और कार्यशैली में पंडित दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानववाद (integral
humanism), पंडित जवाहर लाल नेहरु की स्टेट्समैनशिप और श्रीमती इंदिरा गांधी की दृढ़ता दिखाई देती है । इंदिरा जी के बाद जिस साहस और बहादुरी से अमेरिका के खुले विरोध के बावजूद पंडित अटल बिहारी वाजपेयी ने न्यूक्लियर बम का सफल परीक्षण(पोखरण) किया वो उनकी दृढ़ता और साहस का परिचायक थी। इंदिरा गांधी भी बतौर प्रधानमंत्री कभी भी दुनिया के  शक्तिशाली देशों के सामने कमजोर नहीं पड़ीं, चाहे वो परमाणु बम का परीक्षण हो या फिर बांग्लादेश के निर्माण के दौरान हुआ भारत-पाक युद्ध। भारत-पाक युद्ध के दौरान अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने इंदिरा गांधी पर युद्ध खत्म करने का दवाब बनाया था लेकिन इंदिरा ने बिना झुके बांग्लादेश के निर्माण तक युद्ध जारी रखा और रिचर्ड निक्सन को आधे रास्ते से अपना सातवां बेड़ा वापस बुलाना पड़ा । इंदिरा जी के बाद इतनी दृढ़ता अटल बिहारी वाजपेयी में ही नज़र आई ।

ऐसे में अटल बिहारी वाजपेयी जी के व्यक्तित्व के मद्देनज़र ये कहा जा सकता है कि वो किसी सम्मान के मोहताज नहीं है, अगर उन्हें देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया जाता है तो ये अटल जी का सम्मान नहीं होगा बल्कि इससे उस सम्मान और सरकार का ही गौरव बढ़ेगा।  

गुरुवार, 14 नवंबर 2013

राम नाम की लूट है...


राम और राजनीति एक दूसरे के पर्याय बनते जा रहे हैं। भारत में जब-जब चुनाव होते हैं, राम खुद-ब-खुद चर्चा में आ ही जाते हैं । राम के नाम का सहारा अपने-अपने ढंग से देश की लगभग सभी प्रमुख पार्टियां लेती रही हैं । ये अलग बात है कि राम नाम का सबसे ज्यादा राजनैतिक फायदा उठाकर सत्ता तक पहुंचने में भारतीय जनता पार्टी अपने सभी राजनैतिक विरोधियों को शिकस्त दे चुकी है । देश में धीरे–धीरे 2014 के आम चुनाव को लेकर राजनैतिक माहौल बनता जा रहा है और इस माहौल को देखते हुए एक बार फिर ‘’राम नाम’’ की लूट मची हुई है ।

दिलचस्प बात ये है कि राम के नाम का आधुनिक समाज के सांप्रदायिक, धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी विचारधारा की राजनीति करने वाले लोग अपने-अपने ढंग से इस्तेमाल करते रहे हैं । भारतीय माइथॉलॉजी पर अगर भरोसा करें तो रावण का राम से युद्ध करने का मकसद उनका साक्षात्कार करना था। रावण जानता था कि उसका वक्त आ चुका है, लेकिन वो चाहता था कि राम के हाथों ही उसे मुक्ति मिले ताकि उसे सीधे स्वर्ग का सुख मिले ।

राम के दर्शन का इस्तेमाल महान समाजवादी डॉ लोहिया ने भी किया था और अपने मुकाबले कांग्रेस जैसे सशक्त राजनैतिक विरोधी को शिकस्त देने के लिए उत्तर प्रदेश के अयोध्या से रामायण मेले के आयोजन की शुरुआत की थी।  डॉ लोहिया के राम समाजवाद के प्रतिमूर्ति थे, और डॉ लोहिया ने राम को समाज में गैर बराबरी मिटाने वाले नायक के रूप में देखा था ।

डॉ लोहिया से हटकर कांग्रेस पार्टी ने भी समय-समय पर राम के नाम का सहारा लिया लेकिन एक दौर ऐसा भी आया जब पूरे देश में राम के नाम पर भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस के खिलाफ राजनैतिक जनमानस तैयार कर लिया, तब उसको माकूल जवाब देने के लिए राजीव गांधी ने 1989 में आम चुनाव के लिए जनसभा की शुरुआत अयोध्या से की और रामराज्य स्थापित करने का अपना चुनावी नारा दिया। अब ये अलग बात है कि उस समय देश की जनता ने राजीव गांधी के रामराज्य स्थापित करने वाले वादे पर भरोसा नहीं किया और कांग्रेस को सत्ता से बेदखल होना पड़ा ।
राम नाम का सहारा लेकर भारतीय जनता पार्टी देश के कई राज्यों सहित केंद्र की सत्ता तक पहुंच गई हालांकि सत्ता सुख भोगते हुए भी वो अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण नहीं करा सकी । इसे अब राजनीति की विडंबना ही कहेंगे कि डॉ लोहिया के अनुयायी और समाजवाद के झंडाबरदार बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी कल तक अपने राजनैतिक मित्र रहे भारतीय जनता पार्टी के ही नक्शे कदम पर चलकर राम-नाम की राजनीति में सक्रिय हो गए हैं ।

ऐसा नहीं है कि नीतीश कुमार का राम प्रेम अचानक जागा है, इसके पीछे बहुत ही सोची-समझी रणनीति है । बिहार के राजनैतिक गठबंधन से बीजेपी के अलग होने के बाद एक सोच विशेष के लोगों के वोट की भरपाई के मकसद से नीतीश ने 13 नवंबर को अपने कुछ भरोसेमंद पूर्व अधिकारियों के जरिए पटना से 120 किलोमीटर दूर मोतिहारी के केसरिया में तकरीबन 200 एकड़ में विराट रामायण मंदिर के मॉडल का अनावरण किया ।
मॉडल के अनावरण के मौके पर आयोजित कार्यक्रम में जो मुख्य अतिथि बुलाए गए उसके पीछे एक राजनैतिक एजेंडा है। स्वामी स्वरुपानंद कांग्रेस के रिश्ते जगजाहिर है। नीतीश की नज़र 2014 के लोकसभा चुनाव के परिणामों के बाद बनने वाले राजनैतिक ध्रुवीकरण पर है । ये भी जगजाहिर है कि कांग्रेस के नए कर्णधार राहुल गांधी, लालू यादव के सामने नीतीश कुमार को ही तरजीह दे रहे हैं । इस मंदिर के मॉडल के अनावरण के साथ ही 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद देश में बनने वाले राजनैतिक ध्रुवीकरण या समीकरण का भी अनावरण हो गया है ।

यहां एक बात और जाननी होगी कि क्यों आज भी राम राज्य की बात होती है.. क्यों आज भी राम के नाम पर राजनीति होती है ... राम मर्यादापुरुषोत्तम हैं, जो भारतीय समाज के लिए आदर्श रहे हैं । राम को हम कितने रूप में जानते हैं , आज्ञाकारी अनुशासित शिष्य के रुप में जो गुरु के कहने पर आसुरी ताकतों से लड़ता है, गुरु के कहने पर बिना किसी संकोच और डर के शिवधनुष तोड़ता है, कि ये शिव का है और धनुष के टूटने से महाक्रोधी परशुराम का सामना करना पड़ सकता है । भारतीय समाज में जिस संयुक्त परिवार की मर्यादा निभाई जाती है, राम ने उसका भी संदेश दिया था जब वो अपने माता-पिता का ध्यान रखते थे और अपने छोटे भाइयों का ख्याल रखा था । जब राज्याभिषेक की तैयारी हो रही होती है तो अचानक अपने बुजुर्ग पिता के दिए गए वचन को पूरा करने के लिए राम सबकुछ ठुकराकर वनवास के लिए निकल पड़ते हैं । अपने वनवास के दौरान भी राम ने अपने हर कदम पर अपनी मर्यादा को निभाते दिखते हैं चाहे वो सबरी और निषाद के साथ वक्त बिताना हो या फिर जटायु (गिद्ध), हनुमान, सुग्रीव (बंदर) की मदद लेना हो । चाहे लंका तक जाने के लिए रास्ता देने के लिए आखिरी समय तक समंदर से अनुनय विनय करना हो या फिर ज़रूरत पड़ने पर अपनी ताकत का अहसास कराना हो । चाहे वो युद्ध टालने की हरसंभव कोशिश करना हो या फिर मर्यादा के उच्चतम स्तर को स्थापित करने के लिए युद्ध के अंत में लक्ष्मण को घायल पड़े रावण से जाकर शिक्षा लेने को कहना ।
ऐसे में सवाल ये उठते हैं कि जो लोग राम का नाम लेकर राजनीति करते रहे हैं क्या अपनी जिंदगी में उन्होंने राम की तरफ से स्थापित मर्यादा को उतारने की कोशिश की है ।  राम ने मर्यादा बचाने के लिए सत्ता को छोड़ना पसंद किया, अपनी सबसे प्रिय सीता को छोड़ना पसंद किया, लेकिन हमारे नेतागण सत्ता और धन के लिए मर्यादा की धज्जियां उड़ाना पसंद करते हैं ।

बुधवार, 13 नवंबर 2013

कुर्सी के लिए देशहित की बलि



श्रीलंका में हो रहे कॉमनवेल्थ सम्मेलन में ना जाने का फैसला करके भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक बार फिर अपनी सरकार बचाए रखने के लिए तमिलनाडु के एक क्षेत्रीय दल के सामने घुटने टेक दिए हैं । इससे पहले यूपीए की सहयोगी रहीं ममता बनर्जी के विरोध के चलते ही कुछ महीने पहले भारत-पाक बांग्लादेश के साथ होने वाला बहु-प्रतीक्षित तीस्ता रिवर समझौता ऐन वक्त पर ठंडे बस्ते में डाल दिया गया ।

मनमोहन सिंह निजी तौर पर भले ही अपने मान-सम्मान की चिंता ना करें और सत्ता में बने रहने के लिए किसी हद तक समझौता करते रहें लेकिन उनको नहीं भूलना चाहिए कि वो 120 करोड़ की आबादी वाले भारत के प्रधानमंत्री हैं और प्रधानमंत्री के रूप में किया गया उनका हर कार्य और फैसला इंडिया के सम्मान से जुड़ा है । दूसरी खास बात ये है कि कॉमनवेल्थ, नॉन एलाएन मूवमेंट और पंचशील पर चलने की नीतियां बनाने में भारत और खासकर पंडित जवाहर लाल नेहरु की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी । मनमोहन सिंह आज उसी कांग्रेस पार्टी के नुमाइंदे की हैसियत से युनाइटेड प्रोग्रेसिव एलाएंस की सरकार में प्रधानमंत्री हैं ।

इसीलिए, उनकी इस घुटनाटेकु नीति के चलते ये भारत के साथ-साथ उस 128 साल पुरानी कांग्रेस पार्टी का भी अपमान है । सवाल ये नहीं है कि मनमोहन सिंह ने श्रीलंका में हो रहे कॉमनवेल्थ सम्मेलन का बहिष्कार किया है, सबसे बड़ा सवाल ये है कि मनमोहन सिंह ने अपने प्रिय नेता राजीव गांधी की उस कुर्बानी का भी अपमान किया है जिन्होंने इंडियन सब कॉन्टिनेंट में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए, अपने ही तमिल भाइयों के खिलाफ, प्रधानमंत्री के रूप में इंडियन पीस कीपिंग फोर्स को भेज दिया था, और इस डिप्लोमैटिक फैसले की कीमत राजीव गांधी को लिबरेशन टाइगर ऑफ तमिल ईलम के हमले में अपना बलिदान देकर चुकानी पड़ी । 
वहीं लिबरेशन टाइगर ऑफ तमिल ईलम, जिसको शुरुआती दौर में भारत सरकार ने ही श्रीलंका में चल रहे सिविल वॉर में मदद की थी (ऐसा श्रीलंका का आरोप है)।
मनमोहन सिंह को भारत के संघीय ढांचे और इसके तहत केंद्र सरकार को प्राप्त अधिकार का भी इल्हाम होना चाहिए, डिफेंस, एक्सटरनल अफेयर और फाइनेंस से जुड़े मुद्दों पर क्षेत्रीय दलों की संकीर्ण राजनीति को नज़रअंदाज करते हुए राष्ट्रीय हितों की चिंता करनी चाहिए । मनमोहन सरकार की लचर विदेश नीति और कमजोर नेतृत्व के चलते पड़ोसी मुल्कों से भारत के रिश्ते पहले से ही खराब चल रहे हैं । चीन लगातार भारत की इस कुटनीतिक कमजोरी का राजनैतिक और स्ट्रैटिजिक फायदा उठाता रहा है । पाकिस्तान और श्रीलंका में जिस तेजी से चीन का पूंजी निवेश बढ़ रहा है वह आने वाले समय में भारत के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकता है ।
ऐसी स्थिति में महज़ कुछ महीने और अपनी सरकार बचाए रखने के मकसद से कभी ममता बनर्जी तो कभी एम करुणानिधि के सामने मनमोहन सिंह का आत्मसमर्पण करना किसी राष्ट्रद्रोह से कम गंभीर अपराध नहीं है ।

रविवार, 10 नवंबर 2013

मज़हब, संत और सियासत

'मंदिर मस्जिद बैर कराते..
मेल कराती मधुशाला'

ये लाइनें हिंदी के मशहूर साहित्यकार हरिवंश राय बच्चन की कविता मधुशाला से हैं और ये इस बात को ताकीद करती रही हैं कि मधुशाला में जाकर मजहब का भेदभाव मिट जाता है... लेकिन अब नया ट्रेंड साधू संतों कथावाचकों की राजनीति में बढ़ती दिलचस्पी और सत्ता- कॉरपोरेट घरानों के बीच में शुरु हुई लॉबिंग के खेल में उनकी सक्रियता के चलते पूरा का पूरा समीकरण बदलता दिखाई दे रहा है । 

 
यूपी के मुरादाबाद जिले में आयोजित कल्कि महोत्सव के मौके पर जुटे नेताओं, धर्मगुरुओं, कथावाचकों के बीच का मेल मिलाप एक नए ट्रेंड की तरफ इशारा कर रहा है । ये ट्रेंड है साधू संतों कथावाचकों की राजनीति में बढ़ती दिलचस्पी और सत्ता- कॉरपोरेट घरानों के बीच में शुरु हुई लॉबिंग के खेल में उनकी सक्रियता, जिसकी वजह से पूरा का पूरा समीकरण बदलता दिखाई दे रहा है ।

कल्कि महोत्सव के आयोजक आचार्य प्रमोद कृष्णम और कांग्रेस पार्टी के रिश्ते जगजाहिर हैं, भगवान कृष्ण और कल्कि भगवान के सामने भजन सुनाने वाले प्रमोद कृष्णम कांग्रेस पार्टी के टिकट से चुनाव भी लड़ चुके हैं .... इसके अलावा मालेगांव ब्लास्ट में भावेश पटेल की तरफ से किए गए खुलासे में दिग्विजय सिंह और प्रमोद कृष्णम के बीच की नजदीकियां जगजाहिर हो गए थे, भावेश पटेल ने कहा था कि उसने प्रमोद कृष्णम से मदद मांगी थी और उन्होंने उसे दिग्विजय सिंह से मिलवाया जिसके बाद उसे गिरफ्तार किया गया था ।



प्रमोद कृष्णम पिछले कई सालों से कल्कि महोत्सव का आयोजन करते रहे हैं और उनके इस आयोजन में राजनैतिक तौर पर एक दूसरे से 36 का रिश्ता रखने वाले नेतागण एक मंच पर दिखाई देते रहे हैं ... नेशनल कॉन्फ्रेंस के फारुख अब्दुल्ला, भारतीय जनता पार्टी की हेमा मालिनी, समाजवादी पार्टी के रामगोपाल यादव, गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री दिगंबर कामत और फिल्मी हस्तियां अपनी मौजूदगी से प्रमोद कृष्णम के बॉलीवुड से लेकर पॉलिटिक्स तक में बढ़ते वर्चस्व का प्रमाण पेश करती रही हैं । इसीलिए इस बार अगर दिग्विजय सिंह और विवादास्पद मौलाना तौकीर रज़ा एक मंच पर दिखाई दिए हैं तो ये उस बदलते सत्ता, राजनीति और मजहब के गठजोड़ और कॉकटेल का नतीजा ही माना जाना चाहिए। मौलाना तौकीर रज़ा और उनकी विचारधारा से लगभग पूरा रुहेलखंड और दिल्ली पूरी तरह परिचित है । समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के बाद बरेली में हुए सांप्रदायिक दंगे को भड़काने वालों में से एक का आरोप झेल रहे मौलाना तौकीर रज़ा को समाजवादी पार्टी की ही सरकार ने राज्यमंत्री का दर्जा दे रखा है, भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम चलाने वाले आम आदमी पार्टी के नेता दिल्ली विधानसभा के चुनाव में कामयाबी हासिल करने के लिए मौलाना तौकीर रजा से मिलकर उनसे समर्थन की अपील कर चुके हैं । इससे साफ है कि सत्ता के इस घिनौने खेल में राजनीति मजहब और कॉरपोरेट घरानों का गठजोड़ अहम भूमिका निभाता रहा है ।

अगर पिछले कुछ वर्षों के राजनैतिक और कॉरपोरेट घरानों के हालात पर नज़र डालें तो इन मजहबी नेताओं और कथावाचकों की बढ़ती सक्रियता हमारे देश के करोड़ों धर्मनिरपेक्ष और मासूम लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ है । पिछले दिनों दिल्ली में आयोजित भ्रष्टाचार विरोधी अन्ना के ऐतिहासिक आंदोलन का समापन भी प्रमोद कृष्णम सरीखे एक संत भैया जी की मध्यस्थता में ही हो सका । अन्ना हज़ारे ने देश की सर्वोच्च संस्था संसद, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति की अपील को ठुकरा दिया था लेकिन भैया जी के कहने पर अपना आमरण अनशन समाप्त करने का ऐलान कर दिया ।

बताया जाता है कि देश के सबसे बड़े कॉरपोरेट घराने रिलायंस इंडस्ट्रीज़ के मालिकों के बीच पैदा हुआ विवाद का निपटारा भी अंबानी परिवार के कुलगुरु और गुजरात के कथावाचक मोरारी बापू के बीच में पड़ने से ही हो पाया । संघ परिवार, वीएचपी और बीजेपी तो पहले से ही देश के हज़ारों साधू संतों का इस्तेमाल राममंदिर निर्माण की आड़ में अपना राजनैतिक लक्ष्य हासिल करने में करती रही है .. इसके लिए अब हम कह सकते हैं कि हरिवंश राय बच्चन ने भले ही मधुशाला को अलग अलग फिरकों और धर्मों को मानने वालों के लिए बेहतर मेलजोल का अड्डा माना हो लेकिन अब नया ठिकाना कल्कि महोत्सव जैसे कार्यक्रम और उसके आयोजकों जैसे लोगों के 'मैनेजमेंट' का हिस्सा है ।

शनिवार, 9 नवंबर 2013

सीबीआई के अस्तित्व पर संशय

देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी यानी सीबीआई के गठन को असंवैधानिक करार देने वाले गौहाटी हाईकोर्ट के फैसले पर देश की एपेक्स कोर्ट ने रोक लगा दी है, लेकिन इससे ये नहीं कहा जा सकता कि सीबीआई के गठन  पर खड़ा हुआ विवाद थम गया है ... दरअसल पहले अपनी कार्यशैली की वजह से ही विवादों में रही जांच एजेंसी पर नई बहस शुरु हो गई है ।
देश के ज्यादातर गैर कांग्रेसी राजनैतिक दल एक अरसे से सीबीआई की निष्पक्षता और उसकी कार्यशैली पर सवाल उठाते रहे हैं.. सुप्रीम कोर्ट ने ही कोलगेट घोटाले की जांच में हीलाहवाली से नाराज होकर उसे पिंजरे में  बंद तोता तक कह डाला था । इतना ही नहीं सीबीआई को कभी Compromise bureau of investigation तो कभी Congress bureau of investigation जैसे नाम भी मिलते रहे हैं । सीबीआई पर लगातार सत्तारूढ दल के दवाब में काम करने के आरोप भी लगते रहे हैं । ऐसे हालात में गौहाटी हाईकोर्ट का फैसला ऐसे तमाम राजनैतिक दलों और संगठनों के लिए स्वागत योग्य था , जो अलग अलग कारणों से और अलग अलग समय पर सीबीआई का दंश झेलते रहे हैं ।

सुप्रीम कोर्ट ने भले ही संवैधानिक व्यवस्था के तहत गौहाटी हाईकोर्ट के फैसले पर फिलहाल रोक लगा दी हो लेकिन सीबीआई के गठन और औचित्य पर शुरु हुई बहस लंबे समय तक चल सकती है ।

दरअसल गौहाटी हाईकोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सीबीआई के गठन पर ही सवाल खड़े कर दिए थे । गौहाटी हाईकोर्ट ने कहा था कि सीबीआई के गठन संबंधी गृह मंत्रालय का प्रस्ताव न तो केन्द्रीय कैबिनेट का फैसला था और न ही राष्ट्रपति की ओर से स्वीकृत कोई कार्यकारी निर्देश, ऐसे में इस प्रस्ताव को विभागीय निर्देश ही माना जा सकता है.. गौहाटी हाईकोर्ट ने कहा कि मामला दर्ज करने, आरोपियों को गिरफ्ताप करने
तलाशी लेने जैसी सीबीआई की कार्रवाई संविधान की धारा 21 का उल्लंघन है और ये असंवैधानिक करार दिए जाने लायक है।

सरकार ने गौहाटी हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट याचिका दाखिल की और सुनवाई के दौरान सीबीआई को बचाने के लिए मुख्य न्यायाधीश के सामने कई दलीलें दीं। अटॉर्नी जनरल जी ई वाहनवती ने कहा कि वर्तमान में सीबीआई के 9 हज़ार मामलों का ट्रायल चल रहा है, वहीं करीब 1000 मामले ऐसे हैं जिसकी जांच सीबीआई कर रही है । वाहनवती ने दलील दी कि हाईकोर्ट के फैसले का इन सभी मामलों पर असर पड़ेगा, इसके साथ ही पूरी कानूनी मशीनरी भी प्रभावित होगी । वाहनवती ने अपनी दलील में कहा कि सीबीआई का गठन Government of India (Transaction of Business) Rules के तहत किया गया है, और महज इसीलिए सीबीआई को असंवैधानिक करार नहीं दिया जा सकता, क्योंकि इसके गठन के लिए लाए गए प्रस्ताव में DSPE एक्ट 1946 का जिक्र नहीं किया गया है, और इसे राष्ट्रपति से स्वीकृति नहीं मिली है ।


सीबीआई की संवैधानिकता को लेकर कांग्रेस नेता मनीष तिवारी 2010 में संसद में प्राइवेट मेंबर बिल पेश कर चुके हैं । अपने इस बिल में मनीष तिवारी ने सीबीआई को वैधानिक दर्जा दिए जाने को जरूरी बताया था । इस बिल में मनीष तिवारी कह चुके हैं कि सीबीआई का गठन का गैरकानूनी है और इसीलिए इसे वैधानिक दर्जा दिया जाना जरूरी है लेकिन वर्तमान में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाल रहे मनीष तिवारी का कहना है कि वो सरकार के फैसलों से बंधे हुए हैं ।

वैसे तो मामले की अगली सुनवाई अब 6 दिसंबर को होगी लेकिन सत्ता और सीबीआई दोनों को अपनी कार्यशैली और अपनी छवि को और पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने की कोशिश करनी होगी । फिलहाल देश के कई बड़े नेताओं के खिलाफ सीबीआई जांच चल रही है, या फिर लंबित है। इनमें लालकृष्ण आडवाणी, मायावती, मुलायम सिंह यादव सरीखे दिग्गज नेता भी शामिल हैं । इनमें 1984 सिख विरोधी दंगों के आरोपी सज्जन कुमार भी हैं जिन्होंने गौहाटी हाईकोर्ट के फैसले को आधार बनाकर अपने खिलाफ की जा रही जांच को गैरकानूनी करार देने की मांग भी कर डाली है । इसके अलावा 2जी घोटाला, कोल आवंटन घोटाला जैसे कई अहम मामले हैं जिसकी जांच सीबीआई कर रही है और जिसमें कई दिग्गज लोगों की किस्मत का फैसला होना है । देश की राजनीति में अहम भूमिका निभा चुके लालू यादव तो इन दिनों सीबीआई जांच के आधार पर ही जेल की हवा खा रहे हैं ।

सोमवार, 4 नवंबर 2013

सेक्युलरिज्म जिंदा रहा तो मुल्क भी जिंदा रहेगा : मौलाना अरशद मदनी



सिर पर टोपी रख लेने भर से कोई मुस्लिम धर्म का जानकार नहीं हो सकता। यह कहना है जमीअत उलेमा-ए-हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी का। मदनी यह भी मानते हैं कि सेक्युलरिज्म जिंदा रहेगा तो ही मुल्क भी जिंदा रहेगा। मैंने देश में मुसलमानों के हालात, भारतीय राजनीति और सेक्युलरिज्म के मुद्दे पर मौलाना अरशद मदनी की राय जानने की कोशिश की
वासिंद्र मिश्र : मौलाना अरशद मदनी जमीअत उलेमा-ए-हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और अपने बेबाक विचारों के लिए जाने जाते हैं। मौलाना मदनी से हम यहां जानना चाहेंगे कि सरकारें बनती रहीं, गिरती रहीं, फिर बनती रहीं, लेकिन समय के साथ जो बदलाव दिखना चाहिए, कौम के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति में वो खास अंतर देखने को नहीं मिल रहा है।
मौलाना अरशद मदनी : ये सही बात है। जमीयत-ए-उलेमा तो हमेशा से यही बात कहती रही है, कोई नई बात नहीं है, एक तो ये कहना गलत होगा कि कारोबारी ऐतबार से पिछले 65 साल में मुसलमानों के हालात में कोई बदलाव नहीं हुआ है, तालीमी ऐतबार से भी मुस्लिम कहां से कहां पहुंच गया है। जातीय रहन-सहन में भी बहुत बड़ा फर्क आया है, लेकिन ये भी सही है कि कानूनी ऐतबार से जो हक यहां के हर बसने वाले को दिया गया है, उसमें मुसलमान बहुत पीछे है। हम तो इस बात को बहुत खुले अंदाज से कहते हैं कि मुल्क की आजादी के बाद से चाहे सरकार किसी भी पार्टी की रही हो, इत्तेफाक के तौर पर नहीं, बल्कि पॉलिसी बनाकर, हुकूमतों ने मुसलमानों को तरक्की के हर मैदान से बाहर निकालना चाहा है ।
वासिंद्र मिश्र : जी बिल्कुल, यही मेरे लिए सबसे चिंता की बात है, सबके लिए जो इस देश के नागरिक हैं, उनके लिए आप कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं।
मौलाना अरशद मदनी : यकीनन, ये सही है हर ज़माने में ऐसा होता रहा है। इसमें किसी गवर्नमेंट की कोई खुसूसियत (खूबी) नहीं है। जो लोग कुर्सी पर आकर बैठे हैं उन्होंने मुसलमान को धकेलना चाहा है। मेरा मानना है कि जो लोग अपने जेहन के ऐतबार से, अपने माइंड के ऐतबार से बीजेपी और आरएसएस के लोग थे, जनसंघ के लोग थे, जो मुसलमान को आगे नहीं बढ़ने देना चाहते थे, वो लोग हर पार्टी के अंदर हैं चाहे उसका दस्तूर, उसका किरदार कैसा भी हो, पार्टी ने उनको जगह दी है, उनको कुर्सी पर बिठाया है। वो अपने अपने माइंड और जेहन से काम करते रहे हैं, मुसलमानों को पीछे धकेलते रहे हैं, इसमें कोई शक नहीं है। इसको तो आप अपनी आंखों से देख सकते हैं और हम भी देखते हैं। उसमें भी जो सबसे बदतरीन चीज रही है, जिसने मुसलमान को पीछे धकेलने के लिए बड़ा भारी किरदार अदा किया है, वो है फसादात (दंगे)। सरकारों को देखिए, इतने मारने वालों और इतने कत्ल करने वालों में से अगर 50 हजार के कद में 2, 4, 5, 10 हजार कातिल भी अगर फांसी के तख्ते पर चढ़ जाता या उसे उम्रकैद की सजा दी जाती तो यकीनन ये फसादात का सिलसिला बंद हो जाता। लेकिन मैं अगर कहूं कि उनकी हिफाजत की गई, उनकी तरक्की की गई, तो ये गलत नहीं होगा।
वासिंद्र मिश्र : हम फसादात पर भी विस्तार से चर्चा करेंगे। हम लोग ये चर्चा कर रहे थे कि मुसलमानों की जो माली हालत रही है, जो शैक्षणिक स्थिति रही है, ठीक है उसमें चेहरे बदलते रहे हैं, लेकिन जहनी तौर पर दिमागी तौर पर, दिली तौर पर सभी दलों में उनकी घुसपैठ है। सरकार चाहे किसी भी दल की हो, मुसलमानों की जब तरक्की की बात आती है, उनकी हक और हुकूक की बात आती है, उनका वाजिब हक उनका वाजिब अधिकार उन्हें मिलना चाहिए, तो कहीं ना कहीं से अड़ंगेबाजी देखने को मिलती है। किसी ना किसी बहाने आपको नहीं लगता कि इसके लिए कौम के जो नेता हैं, जो कौम के नाम पर अलग-अलग दलों में मलाई खा रहे हैं, ये भी बराबर के जिम्मेदार हैं?
मौलाना अरशद मदनी : यकीनन, कौम के लोग इसके जिम्मेदार हैं, वो जिस अंदाज में कौम के मसलों को उठाना चाहिए, नहीं उठा पाते हैं। मैं तो ये कहता हूं कि देश की आजादी के बाद से किसी भी सूबे के अंदर इतनी बड़ी तादाद में लोग अपने घरों से निकलकर बाहर आ गए हों, जैसे असम के अंदर हुआ, यानी आप ये समझिए की साढ़े तीन लाख आदमी, इनके घरों को जला दिया गया और ये निकलकर बाहर आ गए, आप खुद असम के अंदर देख लीजिए कि असम के वो लोग जो असेंबली के अंदर बैठे हुए हैं, एक दिन मुसलमान जमा होकर असेंबली के बाहर बैठकर धरना दे देते तो हमारी कौम के साथ क्या हो जाता, आपको नज़र नहीं आता। आप ये यूपी के अंदर देख लीजिए, मुजफ्फरनगर के अंदर, ऐसा तो 1947 में नहीं हुआ और मुसलमान इतनी बड़ी तादाद में असेंबली के अंदर मौजूद हैं, चाहे वो किसी भी पार्टी का हो। अगर एक दिन भी मुसलमान धरना देता असेंबली के बाहर तो मैं कहता हूं, हालात बदल जाते। ये ना होते जो आज हालात हैं, तो इसके लिए मुसलमान जिम्मेदार हैं और एक ही आदमी बोला, जो आज़म खान ने बोला।
वासिंद्र मिश्र : उनको भी टारगेट कर लिया गया?
मौलाना अरशद मदनी : उनको निशाना बनाया गया। ये उनकी अपनी सख्ती और अहमियत की बात है कि वो अपनी जगह पर डटे रहे, लोगों ने तो अपने टेलीफोन उस जमाने के लिए बंद कर लिए थे। वो किसी से बात ही नहीं करते थे, सही है चलिए, ये लोग कुछ नहीं कर रहे हैं। सरकार की भी तो जिम्मेदारी थी, उन्होंने 50-60 फीसदी क्या, मुझे नहीं लगता कि उनमें से किसी ने 10-15 फीसदी भी काम किया हो। 
वासिंद्र मिश्र : अक्सर आरोप लगते हैं कि जब चुनाव आता है, तो उसी कौम के जो नेता हैं, कौम के मजहबी नेता हैं, वो कौम की सौदागिरी करके अपना उल्लू सीधा करते हैं।
मौलाना अरशद मदनी : नहीं, जो मजहबी नेता हैं उन बेचारों का क्या इसके अंदर दखल है।
वासिंद्र मिश्र : नहीं यूज हो जाते हैं। इस्तेमाल हो जाते हैं।
मौलाना अरशद मदनी : मैं नहीं समझता हूं, मजहबी लोगों का ये ना मैदान है, ना वो इस्तेमाल हो सकते हैं। मैं ये नहीं समझता हूं, हो सकता है कि एक-दो फीसदी कहीं किसी दूसरे कुछ लोग इस्तेमाल हो जाते हैं। सूबों के अंदर, क्योंकि मजहबी लोग तो चुनाव में हिस्सा नहीं लेते हैं। रह गए सियासी लोग तो वो अपनी सियासत करते हैं और हर कौम के लोग सियासत करते हैं। उसमें कोई मुसलमान मजहब की बात नहीं बल्कि हर कौम के लोग सियासत करते हैं। ये तो सियासत का नतीजा है कि मैनिफेस्टो में जो वादे किये जाते हैं, वो पूरे नहीं होते हैं, ये तो सियासती बाते हैं।
वासिंद्र मिश्र : सच्चर कमेटी से लेकर रंगनाथ मिश्रा कमेटी की जो सिफारिशें हैं वो आज भी वैसे ही पड़ी हैं।
मौलाना अरशद मदनी : हां, इसमें कोई शक नहीं है, अगर कुछ करने की कोशिश की भी गई है तो जो सरकारी मुलाजिम बैठे हैं, उन्होंने उसे आखिरी हद तक पहुंचने नहीं दिया है और वो चीज जो सरकार पहुंचाना चाहती थी, मुसलमानों तक नहीं पहुंच पाई, पहुंची भी तो बहुत कम पहुंची है।
वासिंद्र मिश्र : तो इसके पीछे सोच यही है कि कौम को जितना पीछे रखा जाए। उसके आधार पर राजनीतिक फायदा लिया जा सकता है?
मौलाना अरशद मदनी : राजनीतिक फायदा नहीं, बल्कि मुल्क के अंदर एक गिरोह है, एक तबका है और बड़ा ताकतवर तबका है जो पहले इतना ताकतवर नहीं था जितना कि अब है। जो ये पॉलिसी बनाता है कि मुसलमानों को हर मैदान से पीछे धकेला जाए, वो तबका आज इतना मजबूत है कि कांग्रेस और दूसरी सेक्युलर पार्टियों की आंख में आंख डालकर उनको मैदान से धक्का देकर बाहर निकाल रहा है। आज से 50 साल पहले वो इतना ताकतवर नहीं था, हम उस वक्त भी यही कहते थे कि ये लोग जो अभी ताकतवर नहीं हैं, उन्हें दूध ना पिलाओ, अगर इन्हें दूध पिलाओगे तो कल ये तुम्हे भी डसेंगे, हमारी बात को किसी ने गौर नहीं दिया।
वासिंद्र मिश्र : आपको नहीं लगता है कि जो आज फिरकापरस्ती का विरोध करने वाली पार्टियां हैं, अलग-अलग राज्यों में, अलग-अलग टाइम में ऐसी ताकतों को ऑक्सीजन देने में इनका अहम रोल रहा है?
मौलाना अरशद मदनी : हां-हां, बिल्कुल है। मैं समझता हूं इस बात को। अभी कल परसों यहां लोग जमा हो गए हैं, सत्ताधारी पार्टी के, हो सकता है यूपी के लोग ना जानते हों, लेकिन मैं तो जानता हूं, उनके साथ मैंने देखा कि एजीपी के महंत भी बैठे हुए हैं। अरे भाई, पिछले ही इलेक्शन के अंदर तो वो बीजेपी के साथ मिलकर के असम में उन्होंने इलेक्शन लड़ा था, आज वो सेक्युलर पार्टी को ताकत पहुंचाने के लिए हाथ से हाथ मिला रहे हैं।
वासिंद्र मिश्र : तो सवाल सेकुलरिज्म से ज्यादा सत्ता का है?  
मौलाना अरशद मदनी : मैं कहता हूं कि नीतीश को देखिए, अरे भई पिछले इलेक्शन में वोटिंग के बाद अभी नतीजा नहीं निकला था, वोट पड़ चुके थे, जो फायदा उनको हासिल करना था वो हासिल कर लिया। लेकिन आपको भी याद होगा और मुझे भी याद है, हिंदुस्तान का हर आदमी और बिहार का तो हर मुसलमान याद करता होगा कि वोटिंग के बाद पंजाब जाकर उन्होंने मोदी और बीजेपी के साथ हाथ मिलाकर हाथ उठाया था। यही तो चीज है, हमारा जो मसला है, हम जो फिरकापरस्ती की बात करते हैं, इसलिए नहीं कि कल किसके साथ हाथ मिलाया और आज किसके साथ। हम तो कहते हैं कि हमारी एक सोच है और एक नज़रिया है। मान लीजिए, आज मोदी हैं, मोदी को हटाकर आडवाणी जी आ जाएं या आज आडवाणी की जगह किसी को भी बिस्तर से उठा लाएं, हम जिस तरह आज मोदी के मुखालिफ हैं, कल उनके मुखालिफ होंगे। ये तो एक नजरिया है, एक माइंड है, मुल्क के अंदर सेकुलरिज्म होनी चाहिए या मुल्क के अंदर हिंदू स्टेट बनना चाहिए, ये अहम मसला है। हम ये जरूरी समझते हैं कि अगर सेक्युलरिज्म जिंदा रहेगा, तो मुल्क जिंदा रहेगा। अगर हिंदू स्टेट के अंदर तब्दील होगा तो ये मुल्क बर्बाद हो जाएगा। हमारी ये सोच है, हमें अफसरात से कोई बहस नहीं है, हम दूसरे लोगों को देखते हैं कि उनका ताल्लुक अफसरात से है। मान लीजिए कि अगर आज बीजेपी और आरएसएस मोदी को हटाकर आडवाणी को ले आए, नीतीश जी कोई एलर्जी नहीं आएगी?
वासिंद्र मिश्र : तो ये जो विरोध है व्यक्तिगत है, वैचारिक नहीं है?
मौलाना अरशद मदनी : ये कोई हकीकी विरोध नहीं है, मैं ये समझता हूं कि इसके अंदर कोई हकीकत है।
वासिंद्र मिश्र : मौलाना, आप काफी बड़े बुजुर्ग हैं, हम लोग तो अभी सीख रहे हैं आपके सामने, बहुत सारी चीजें, उत्तर प्रदेश का वाकया आपने छेड़ा तो एक बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी बनी थी। बाबरी मस्जिद के शहीद होने से पहले और उसके बाद एक कमेटी से दर्जनों कमेटियां बन गईं। जिसका नतीजा ये हुआ कि जो एक मजबूत आवाज थी, वो अलग-अलग हिस्सों में बंट गई। इधर कुछ दिनों से देखने को मिल रहा है कि आप के ही जमीयत ए इस्लामी से जुड़े हुए तमाम लोग, परोक्ष रूप से नरेंद्र मोदी की जो विचारधारा है, संघ की जो विचारधारा है, उसे सही ठहराने में लगे हैं, भले ही वो सीधे तौर पर कभी हिम्मत नही उठा पा रहे हैं। अगर गुजरात के दंगों की आप आलोचना कर रहे हैं, तो आपको नार्थ-ईस्ट के दंगों की भी आलोचना करनी चाहिए, आपको महाराष्ट्र के दंगों की भी आलोचना करनी चाहिए और आपको यूपी के दंगों की भी आलोचना करनी चाहिए।
मौलाना अरशद मदनी : आपने दो बातें कहीं, एक बात बाबरी मस्जिद के मसले की, तो बाबरी मस्जिद के मसले को लोग नहीं जानते हैं। सबसे पहले बाबरी मस्जिद के मसले के अंदर जो मैदान में आई थी, वो जमीयत ए उलेमा ही थी। ये सन 51-52 का मसला है, लेकिन हमने इस मसले को कभी भी गली कूचे में नहीं रखा। हम जानते थे कि इसके नुकसान क्या होंगे, हमने इस मसले को अदालत के सुपुर्द किया और बराबर जमीयत ए उलेमा पार्टी बनी रही। वो मसला चलता रहा, हम इसके मुखालिफ थे कि हम इस मसले को कभी गली कूचे के अंदर नहीं लाए, लोग लाए और एक्शन कमेटी बनी और उस वक्त भी जमीयत ए उलेमा ने इस सिलसिले में कोई हिस्सा नहीं लिया। जमीयत ये मानती थी कि एक मसला है जिसको हम अदालत के सुपुर्द करें और हम लाए, लेकिन बदकिस्मती से अदालत ने फैसला हमारे खिलाफ दे दिया। हमने ये फैसला किया कि हम अदालत के फैसले का सम्मान करते हैं, लेकिन हमें हिंदुस्तान के कानून ने ये हक दिया है कि अगर हम निचली अदालत में किसी चीज में नाकाम हो जाएं तो अगर लोअर कोर्ट है, तो हाईकोर्ट का दरवाजा नहीं तो सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएं। जमीयत ए उलेमा, मैं गया हूं और सुप्रीम कोर्ट में हमारा केस पड़ा हुआ है और हम समझते हैं कि जरूर निपटेगा वो केस। और जहां तक नरेंद्र मोदी की खुलकर मुखालफत करने का मसला है तो जो कुछ लोग हैं जो नरेंद्र मोदी की खुलकर मुखालफत नहीं कर रहे हैं, वो अपने तरीके से इधऱ उधर से मुखालफत कर रहे हैं। मैं इस सिलसिले में कुछ और बात नहीं कहूंगा, लेकिन मैं ये नहीं समझता हूं कि कोई समझदार आदमी ये कह सके कि नरेंद्र मोदी को लेकर उनकी राय के अंदर नरमी आई है, मैं नहीं समझता हूं कि ऐसी बात कोई समझदार आदमी कह सकता है।
वासिंद्र मिश्र : अलग-अलग दलों में जो सैद्धांतिक प्रतिबद्धता दिखाई देनी चाहिए, सो कॉल्ड सेकुलर लीडरशिप में, उसमें कहीं ना कहीं कमी आती जा रही है, लोग सत्ता के लिए एक मंच पर आते हैं और सत्ता मिल जाने के बाद जो फिरकापरस्त ताकतें हैं, उनके हाथ के खिलौना बनते दिखाई देते हैं। आपको लगता है, कौम इतनी जागरूक है कि चुनाव में अपने विवेक का इस्तेमाल करके अपने मताधिकार का प्रयोग करेगी।
मौलाना अरशद मदनी : मैं ये नहीं समझता हूं, देखिए, मौलाना या एक दीन का जानकार, सिर्फ लिबास पहन लेने से और सिर पर टोपी रख लेने से नहीं बनता है। कौम जानती है कि आलिम (जानकार) कौन है और किसके पीछे चलना चाहिए। जिसको आप कह रहे हैं कि एक बस के अंदर बैठकर दरवाजे-दरवाजे गए हैं और लोगों से ये कहा है कि उन्होंने सब कुछ कर लिया, उसके बावजूद कश्ती तो डूब गई, कामयाब तो नहीं हो सके, जनसंघ, बीजेपी तो खत्म हो गई। लोग गेरुए कपड़े पहन कर, लंबी टोपी पहन कर सामने आ जाए तो हो सकता था कि चालीस-पचास साल पहले ये जादू कर जाता, लेकिन अब तो आप खुद कह रहे हैं कि वो कामयाब नहीं हो सके हैं, इसलिए अब उसकी कोई अहमियत नहीं है। दूसरी बात आपने ये कही कि लोग इनडायरेक्टली मोदी के पक्ष में कह रहे हैं, मैं नहीं समझता कि ऐसा कोई मोदी के बारे में कहेगा और ना ही मैं ये समझता हूं कि किसी के कहने से, अब आज का वोटर बीजेपी की हिमायत करने लगेगा। मेरी समझ में ये बात नहीं आती है, ये बात बीजेपी के लोग कह चुके हैं कि हम आएंगे, वो तो मुसलमान की वोट की ताकत से घबरा रहे हैं, इसीलिए मुसलमानों को साथ लेने के लिए कहीं बुरके खरीदे जाते हैं, तो कहीं टोपियां खरीद करके लोगों को भेजा जाता है, ताकि वो मुसलमानों की राय को अपनी तरफ खींच सके और ये दिखा सकें कि मुसलमान हमारे साथ हैं। अगर खुदा ना खास्ता बीजेपी अपने बलबूते पर जिसकी कोई उम्मीद नहीं है, अगर मुल्क की सत्ता पर काबिज हो जाएगी तो सबसे पहले मुसलमान से वोट की ताकत को छीन लेगी। अगर ये ताकत मुसलमान के हाथ से निकल गई, तो मुसलमान का जो हाल बर्मा में है, उससे भी बदतर हालात मुल्क में होंगे। मैं तो कहता हूं कि हमें शिकवा हर जमात से है। हम तो कहते हैं कि हमें जो हक मिलना चाहिए था, वो नहीं मिला।
वासिंद्र मिश्र : लेकिन मौलाना, इस तरह का स्टैंड कहां तक जायज है कि एक बार नहीं बार-बार इस तरह की जो सो कॉल्ड सेकुलर ताकतें हैं, वो कम्युनल ताकतों से गोपनीय तरीकों से समझौता करके सत्ता में आती रही हैं और सत्ता चलाती रही हैं, इसलिए उनको ताकत दिया जाए की बीजेपी को रोकना है, ये कहां तक मुनासिब हैं?
मौलाना अरशद मदनी : अगर किसी पार्टी के बारे में ये बात साबित होती है कि वो फिरकापरस्त ताकतों के बलबूते सत्ता में आती है तो उस पार्टी से शिकायत होनी चाहिए और दोबारा उस पार्टी को सत्ता में नहीं आने देना चाहिए । बताइये वो कौन सी गोपनीय ताकतें हैं जो बीजेपी से हाथ मिला कर कुर्सी पर बैठती हैं, बताइए, हम उसकी मुखालफत करेंगे।
वासिंद्र मिश्र : अभी जब मुजफ्फरनगर का दंगा हुआ तो आपके तमाम करीबी और विरोधी दोनों खुले तौर पर आरोप लगा रहे हैं, चाहे वो कांग्रेस पार्टी हों या कोई और राजनीतिक दल कि इस दंगे के पीछे उत्तर प्रदेश की सरकार और बीजेपी के कुछ चुनिंदा नेता जिम्मेदार हैं और उसकी भूमिका दोनों ने मिलकर आपसी रजामंदी से बनाई है जिससे कि वोटों का ध्रुवीकरण किया जा सके उत्तर प्रदेश में।
मौलाना अरशद मदनी : आपने जो बात कही थी ये वो बात नहीं है। मैं ये नहीं समझता हूं कि मुलायम सिंह बीजेपी से हाथ मिलाकर कुर्सी पर आए हैं। यादव कुर्सी पर मुलायम सिंह को नहीं बैठा सकता, मुसलमान अगर मुलायम सिंह के साथ ना आता तो ना तो बीएसपी आती और ना ही समाजवादी पार्टी सत्ता में आ पाती। ये मसला अगर है तो सिर्फ जिले के अंदर है, ये हिंदू मुस्लिम फसाद नहीं है। ये सिर्फ जाट और मुस्लिम फसाद है। जाट के अंदर भी पूरी जाट बिरादरी शरीक नहीं है। ये लोग नहीं जानते हैं, उनका एक गोत्र है मलिक वो और मुसलमान आपस में भिड़ गए। दो कत्ल की अहमियत मुजफ्फरनगर जिले में क्या है? मुजफ्फरनगर जिले में तो रोजाना 4 से 10 कत्ल होते ही रहते हैं, कोई अहमियत इसकी नहीं थी, लेकिन वो आए और मुसलमानों के खिलाफ नारेबाजी करने लगे। उनके हाथों में हथियार थे, इसके बाद दोनों के दोनों भिड़ गए। इससे नुकसान मुसलमानों का ही हुआ। आप ये कहें कि यहां गठजोड़ हो गया, यहां के नेताओँ का दूसरी जमात के नेताओँ से गठजोड़ हो सकता है, लेकिन मैं नहीं समझता हूं कि मुलायम सिंह जिनकी सियासत का वजूद ही मुसलमान हैं वो खुद मुसलमान के कत्ल के लिए खड़े हो जाएंगे। मेरी समझ में ये बात आज तक नहीं आई।
वासिंद्र मिश्र : बहुत-बहुत धन्यवाद मौलाना हमसे बात करने के लिए।
मौलाना अरशद मदनी : जी, शुक्रिया।