गुरुवार, 31 अक्तूबर 2013

करप्शन का मेन सोर्स है इलेक्शन: एस वाई कुरैशी

वासिंद्र मिश्र : कुरैशी साहब देश के मुख्य निर्वाचन आयुक्त रहे हैं...और आज हम उनसे जानने की कोशिश कर रहे हैं कि निर्वाचन प्रणाली में किस तरह के सुधार की आवश्यक्ता है...देश के पांच राज्यों में जो चुनाव चल रहे हैं उसमें फ्री और फेयर इलेक्शन संपन्न हों उसके क्या और सावधानियां बरतनी चाहिए.. समय- समय पर आवाज उठती रही है कि जो मौजूदा चुनाव प्रणाली है..जो पीपुल रिप्रेजेंटेशन एक्ट हैं उसमें बदलाव की बहुत आवश्यक्ता है...तो बदलाव क्यों नहीं हो पा रहा है इन सब सवालों पर उनकी राय जानने की कोशिश करेंगे .. कुरैशी साहब बहुत बहुत स्वागत है आपका, क्या वजह है इतनी कोशिशों के बाद भी आज तक बदलाव नहीं हो पाया, परेशानी कहां है ?
 
एसवाई कुरैशी- देखिए हमें भी ये हैरानी होती है कि इतना विरोध, इतनी उदासीनता क्यों है, 20 साल से इलेक्शन रिफॉर्म्स के लिए जो हमारे सुझाव हैं, पहले से दिए गए प्रपोजल्स भी हैं, हर साल दो साल में कुछ न कुछ नए प्रपोजल्स आते हैं, हम सरकार को लिख-लिख कर थक गए हैं, लेकिन उस पर कुछ एक्शन नहीं होता, एक ही जवाब मिलता है कि आम सहमति नहीं बन पा रही इसकी वजह से चुनाव सुधार में देरी होती जा रही है, लेकिन इस दौरान आप देखेंगे कि जनता की निगाह में नेताओं की इमेज बड़ी खराब होती जा रही है । ये देश की डेमोक्रेसी के लिए अच्छी चीज नहीं है । अब तक हमारे 25 प्रपोजल्स पेंडिंग हैं इनमें से दो काफी Important हैं,  पहला मसला है क्रिमिनल्स इन पॉलिटिक्स का, इन्हें कैसे राजनीति से दूर रखा जाए, दूसरा है पॉलिटिकल फंडिंग की ट्रांसपेरेंसी ... मतलब ये कि सबको पता हो कि राजनीतिक पार्टियों के पास पैसा कहां से आया, किस तरह खर्च हो रहा है । ताकि किसी किस्म का पीछे से कोई लेन देन ना हो । हमारा कहना है कि रेप , डकैती, मर्डर, किडनैपिंग जैसे गंभीर अपराध करने वाले जिसके लिए पांच साल से ज्यादा की सजा होती हो, उन्हें आप इलेक्शन लड़ने से रोकिए । इस पर जवाब ये आता है कि साहब ये तो कानून के खिलाफ होगा, जब तक कोई दोषी करार नहीं दिया जाता तब तक वो इनोसेंट है । हम कहते हैं कि इनोसेंट तो 2 लाख 68 हजार वो लोग हैं जो आज जेलों में हैं । 4 लाख में से 2 लाख 68 हजार हिंदुस्तान की जेलों में मौजूद लोग आज तक दोषी करार नहीं दिए गए । हमने इसके लिए तीन सेफगार्ड्स का सुझाव दिया, हम ने हीं नहीं लॉ कमीशन ने भी, पहला छोटे मोटे अपराध छोड़ दीजिए, गंभीर अपराध करने वालों को रोकिए, दूसरा ये कि केस इलेक्शन से कम से कम 6 महीने पहले फाइल हो गया हो, तीसरा अदालत ने उनके खिलाफ चार्जेज फ्रेम कर लिए हों ।अब अदालत तो इंडिपेंडेंट अथॉरिटी है,  अगर उन्होंने माइंड बना लिया और ये कहा कि ये चार्जेज बनते हैं, शुरुआती ही सही तो उस हालत में अपराधियों को चुनाव लड़ने से वंचित कर देना चाहिए। इन सबको लागू करने को लेकर जो सुस्ती हो रही है वो नुकसानदेह है...
वासिंद्र मिश्र :  इलेक्शन सबसे बड़ा भ्रष्टाचार का एक जरिया है, चुनाव के दौरान तमाम तरह के अवैध पैसों का लोग चुनाव में इस्तेमाल करते हैं, लेकिन साथ में महंगाई को देखते हुए ये भी आलोचना होती रहती है कि खर्च की लिमिट बढ़ाई जानी चाहिए, अगर आप उस भ्रष्टाचार को रोकना चाहते हैं कि कालेधन का प्रयोग ना हो तो आपको एक रैशनल तरीके से सोचना पड़ेगा, एक तालमेल बनाकर चलना पड़ेगा,  इस पर आपका क्या नज़रिया है ?
एस वाई कुरैशी-  अब आपने बिल्कुल वही कहा है जो मैंने कहा था .. ये ठीक है कि इलेक्शन करप्शन का सबसे बड़ा सोर्स बन चुका है। ऐसा कहने के पीछे मेरा मतलब ये था कि इलेक्शन में जितना पैसा खर्च होता है, लोग पांच-पांच, दस-दस करोड़ रुपए खर्च करते हैं, अब 10 करोड़ रूपये खर्च करके जो आदमी जीत के आता है, वो आते ही अपने अफसरों को बुलाएगा कि इलेक्शन में मेरे 10 करोड़ खर्च हो गए या 15 हो गए मुझे आप मंथली पैसा देना शुरू कर दो,  मुझे पैसे लौटाने हैं, अब पॉलिटिशियन और ब्यूरोक्रैसी में सांठ-गांठ  हो गई है, पॉलिटिशियन ने करप्शन की इज़ाजत दे दी बल्कि इन्वाइट कर लिया कि मुझे पैसे चाहिए, ऐसे में अफसर को मौका मिल जाता है भ्रष्टाचार का,  इसीलिए ज़रूरी है कि इलेक्शन में पैसे के खर्च की रोकथाम की जाए । यही वजह है कि कानून ने एक लिमिट तय की है , वरना कानून कहता कि जितना भी पैसा खर्च करना है कर लो, ताकि एक ही स्तर पर मुकाबला हो दूसरा अगर ज्यादा धन जुटाने के लिए गलत तरीकों का इस्तेमाल होगा तो नेता फिर किसी ना किसी से तो पैसा लेंगे, किसी क्रिमिनल से लेंगे, कोई पैसा मुफ्त में तो मिलेगा नहीं, वो अगर आफको पैसा देगा तो वो बाद में फायदा उठाएगा,  इसीलिए कानूनी तौर पर एक खर्च की एक लिमिट तय की गई है। आपने जो दूसरा इश्यू उठाया है कि लिमिट कितनी होनी चाहिए, इस पर बहस होती रहती है और होनी चाहिए। एक तो इसका निर्धारण इलेक्शन कमीशन नहीं करती, ये मिनिस्ट्री तय करती है, सरकार करती है । पिछली बार हमारे सुझाव पर इन्होंने लिमिट 10 लाख से बढ़ाकर 16 लाख कर दी थी विधानसभा के लिए और पार्लियामेंट के लिए 25 से बढ़ाकर 40 लाख । कई पार्टीज़ को इस पर भी ऐतराज होता है कि लिमिट क्यों बढ़ाई गई, लेफ्ट पार्टीज़ खासतौर पर कहती हैं कि इससे नुकसान होता है, इससे तो सिर्फ अमीर लोग ही चुनाव लड़ पाएंगे, इसलिए लिमिट तय करने का कोई साइंटीफिक फिगर नहीं है, इसलिए ये याद रखिए जितनी हायर लिमिट होगी उतना ही अमीर आदमी इलेक्शन लड़ पाएगा और गरीब आदमी इलेक्शन नहीं लड़ पाएगा,  ये हमारी दुविधा है ।
वासिंद्र मिश्र :  पिछले चुनाव में पेड न्यूज को लेकर बहुत सख्त विचार थे, उस पर आपने तमाम तरह की कार्रवाई भी करने की कोशिश की थी, फिर चुनाव हो रहा है, जगह जगह से खबरें आने लगीं हैं कि पेड न्यूज चल रहा है, कुछ लोग कह रहे हैं कि सोशल मीडिया का दुरुपयोग हो रहा है, तो इसको किस तरह से रेग्युलेट किया जा सकता है ।
एसवाई कुरैशी-  देखिए आपने दो महत्वपूर्ण बातें कहीं, एक तो पेड न्यूज, पेड न्यूज हमारे लिए, देश के लिए एक कलंक है, बहुत खतरनाक हालात हैं, डेमोक्रेसी में मीडिया का बहुत बड़ा रोल है, इसको तो फोर्थ पिलर ऑफ डिमोक्रेसी कहते है, अगर वो पिलर ही ढीला हो जाए या यूं कहें कि नुकसान पहुंचाने लगे, पैसे लेकर खबरें दिखाने लगे, ये जनता के साथ विश्वासघात है । इसके खिलाफ हमने अभियान चलाया था और करीब दो-ढाई हजार के करीब नोटिस भी दिए और मजे की बात ये है कि ज्यादातर लोगों ने उसको एडमिट किया, उन लोगों ने ये भी माना कि उन्होंने उस पेड न्यूज़ का खर्चा अपने खाते में नहीं दिखाया था और नोटिस के बाद उसे अपने खाते में दिखाया । ये मामला केवल एकाउंटिंग में दिखाने का या खाते में दिखाने का मामला ही नहीं था, धोखेबाजी का था । फ्री एंड फेयर इलेक्शन के साथ ये धोखेबाजी है, रूकावट है, ये अन फेयर प्रैक्टिस है तो इसे रोका जाना जरूरी है । दूसरी चीज, आपने सोशल मीडिया की बात कही,  सोशल मीडिया की इंपोर्टेंस दो कंटेक्स्ट में है, एक तो इस पर होने वाला खर्च, जिसकी हम अभी बात कर रहे थे, एसएमएस भी सोशल मीडिया में गिना जाता है,  बाकी ट्विटर है, फेसबुक है, यू-ट्यूब वगैरह, सोशल मीडिया भी तो मीडिया ही है । इसलिए इस पर आप खर्च करते हैं तो इस खर्चे को भी एकाउंट में दिखाइए । इस पर इलेक्शन कमीशन ने जब ऑर्डर दिया तो उसपर बड़ा जनता में एक रोष शुरू हो गया कि साहब इलेक्शन कमीशन सेंसरशिप करने जा रही है । ये बिल्कुल गलत धारणा है, आम लोगों से इलेक्शन कमीशन का इसमें कोई लेना-देना ही नहीं था, ये तो उनका रिट चलता है सिर्फ पॉलिटिकल पार्टीज पर, कैंडिडेट पर, पॉलिटिकल पार्टीज और कैंडिडेट को अगर ये कहा जाता है कि वो मीडिया पर, सोशल मीडिया पर जो खर्चा करते हैं उसको अकाउंट में दिखाएं तो इसमें किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए । दूसरा इसमें मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट है कि किसी भी पॉलिटिकल पार्टी का कैंडिडेट हेट स्पीच, किसी को भड़काने की बात, किसी मजहब के नाम पर, जाति के नाम पर अपील करने लग जाएं, तो इसकी इजाज़त नहीं है, ये भी एक अजीब बात है कि कि अगर अखबार में, टीवी चैनल में, पब्लिक प्लेस पर गाली दूं तो आप कानूनी कार्रवाई करेंगे, मगर सोशल मीडिया पर मैं जरूर गाली दे सकता हूं आपको, इसका क्या मतलब है ? कानून तो सब पर लागू होता है । इसलिए सोशल मीडिया पर कंट्रोल जरूरी है कि कोई भी नेता, कोई पॉलिटिकल पार्टी भड़काने वाली बातें नहीं करेगी, पर्सनल अटैक नहीं करेगी तो ये तो राजनीति को साफ सुथरा करने के लिए, और इलेक्शन को साफ सुथरा करने के लिए है ।
वासिंद्र मिश्र : जो मौजूदा कानून है उसमें किसी फुलप्रूफ एक्शन का प्रावधान नहीं है । खास तौर से सोशल मीडिया को लेकर साइबर क्राइम के तहत मुकदमे दर्ज होते हैं, लेकिन अपराधी तुरंत छूट भी जाते हैं । हाल के दिनों में देश की जनता को दो तरह का आंदोलन देखने को मिला है, एक अन्ना हजारे का आंदोलन था, जिसके बारे में बाद में पता चला कि वो पूरी तरह प्रायोजित था, पेड था । उस आंदोलन के कर्णधार लोगों ने एजेंसीज हायर कीं थीं, बकायदा पैसे देकर मैसेजेज डाले जाते थे । आम नागरिक शुरू में इसे समझ नहीं पाया, आंदोलन जब खत्म हुआ तब पता चला । दूसरा, अब बीजेपी की तरफ से कैंपेन चल रहा ह, उनके प्राइमिनिस्ट्रीयल कैंडिडेट नरेंद्र मोदी जी की तरफ से, अभी हाल में आपने देखा होगा कि नरेंद्र मोदी जी ने सोशल मीडिया और अखबारों के जरिए एक बयान दे दिया कि सरदार पटेल की शवयात्रा में पंडित जवाहर लाल नेहरू नहीं गए थे, इतिहास को इतने गलत तरीके से पेश करना वो भी उस शख्स की तरफ से  जो प्रधानमंत्री पद का दावेदार है, अगर इस तरह तथ्यों से खिलवाड़ करने वाले बयान दिए जा रहे हैं सोशल मीडिया के जरिए, संचार माध्यमों के जरिए तो आपको नहीं लगता है कि इसके लिए सख्त से सख्त कानून बनना चाहिए ?
एसवाई कुरैशी- देखिए पॉलिटिकल चीजों पर तो मैं कमेंट नहीं करता हूं, लेकिन सोशल मीडिया बहुत पावरफुल मीडियम है, इसके जरिए देश में आग भी लगाई जा सकती है । आपने देखा कि किस तरह असम के बारे में एक सोशल मीडिया कैंपेन हुआ  और सारे आसामी लोग, बैंगलोर समेत कई जगहों से हजारों की तादाद में वापस चले गए, इससे सोशल मीडिया की पावर का अंदाजा होता है । अब ये निर्भर करता है कि आप पावर का पॉजिटिव इस्तेमाल करते हैं या निगेटिव, इसलिए मीडिया में जो कहना होता है उसपर लगाम लगाने के लिए देश में बहुत सारे कानून हैं, जैसे आप किसी की मानहानि करें या देश विरोधी बातें करें, तो कानून काम करेगा ।  बेशक जंतर-मंतर पर बैठ कर आपको फ्रीडम ऑफ एक्प्रेशसन है, आपको जो कहना है आप कहिए ।  लेकिन जिस कानून ने फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन दिया है, उसी कानून ने, उसी आर्टिकल 19 में  फ्रीडन ऑफ एक्सप्रेशन पर  कई रीजनेबल रिस्ट्रिक्शन भी  लगाए हैं, मसलन, आप देश विरोधी बातें नहीं कर सकते, भड़कावे वाली बात नहीं कर सकते । लेकिन लोग फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन की बातें करते वक्त उस रीजनेबल रेस्ट्रिक्शन की बात करना भूल जाते हैं ।
वासिंद्र मिश्र :  इलेक्शन फंडिंग स्टेट के जरिए होनी चाहिए, आपको लगता है कि अगर स्टेट के जरिए इलेक्शन फंडिग की व्यवस्था हो जाए तो जो ब्लैक मनी का इस्तेमाल होता है चुनावों में जो करप्शन आप भी मानते हैं..इलेक्शन के जरिए बहुत ज्यादा करप्शन को बढ़ावा मिलता है..उस पर काफी हद तक रोक लगाई जा लकती है..
एसवाई कुरैशी- जी नहीं मैं इसके बिल्कुल खिलाफ हूं और जब भी किसी नेता ने या किसी ने भी इसका जिक्र किया है तो मैंने उनका पुरज़ोर विरोध किया है ।  इसके पीछे वजह ये है कि इलेक्शन में होने वाली बेइमानी खत्म होनी चाहिए । लेकिन स्टेट फंडिंग से सुधार हो जाय तो जरूर कर लीजिए, लेकिन मुझे नहीं लगता कि ऐसा हो पाएगा । ये मान कर चलिए कि जो 16 लाख रूपये विधानसभा में खर्च होते हैं या 40 लाख लोकसभा में, तो उसमें एक प्याली चाय का हिसाब भी होता है । हमारी समस्या तो ब्लैक में खर्च होने वाले 4-5 करोड़ या 10 करोड़ रुपए है । स्टेट फंडिग तो वो ही होगी ना कि जो 40 लाख आप खर्च कर रहे हैं चलिए सरकार से ले लीजिए, ये तो नहीं होगा कि जो 5 करोड़ रूपये आप बेइमानी के लिए, रिश्वत के लिए खर्च कर रहे हैं वो भी हमसे ले लीजिए । पांच करोड़ की जो बेइमानी है, वो चलती रहेगी बल्कि वो पांच करोड़ 40 लाख हो जाएगी, जो 40 लाख आपने बचाए, सरकार से लिए वो भी इसमें डाल दीजिए, तोस्टे ट फंडिंग ऑफ इलेक्शन गलत है। ऑफ्टर ऑल पॉलिटिकल पार्टीज चंदा लेती हैं, किससे लेती हैं, कुछ पता नहीं, किसी बड़े बिजनेस हाउस ले लेंगी तो उसको फायदा पहुंचाने की कोशिश रहेगी, ब्लैक मनी या टेंटेड मनी लेंगे तो उसका उल्टा असर होगा, हम लोगों को पार्टी को ऐसे अंकुश से निकालना होगा । हर वोट जो पार्टी को मिले उसके बदले में पार्टी को सौ रूपये स्टेट से मिल जाएगा। पांच-सात सौ करोड़ रूपये जो हर साल हर पार्टी रेज़ करती है वो उसको ऑन द बेसिस ऑफ परफॉर्मेंस कि जितने वोट आए थे उसके मुताबिक आपको कैश मिल जाए, 5-7 सौ करोड़ रूपये कोई पार्टी अगर रेज़ कर लेती है तो क्रिमिनल पर डिपेंडेंसी उसकी खत्म हो जाएगी, बिजनेस हाउस पर उसकी डिपेंडेस खत्म हो जाएगी, वो एक सिस्टम ऐसा है जिस पर जरूर गौर करना चाहिए ।
वासिंद्र मिश्र : लेकिन अभी हॉल में सजेशन कहें या रूलिंग कहें आया था चीफ इलेक्शन कमिश्नर का और उसमें उन्होंने बोला था कि जो आरटीआई में सवाल पूछे जाते हैं, कि पॉलिटिकल पार्टीज को फंडिंग कहां से आ रही है तो इसको सार्वजनिक करना चाहिए, इसका लगभग सबने विरोध कर दिया था । क्या अगर इस बात को ईमानदारी से लागू कर दिया जाए तो भ्रष्टाचार कम करने में कुछ मदद मिल सकती है ?
एसवाई कुरैशी- इलेक्शन कमीशन के कई प्रपोजल में एक प्रपोजल ये भी था कि पॉलिटिकल फंडिंग ट्रांसपेरेंट होनी चाहि, यानि पैसा कहां से आया, किन चीजों पर खर्च हुआ ये सब जनता को पता होना चाहिए, हमारी एक एक सिंपल सी डिमांड रही कि आप सारे ट्रांजेक्शन चेक से कीजिए, फिर आपने सुना होगा कि सारी पार्टियां कहने लगीं कि ये आरटीआई कहां से आ गया हम तो इलेक्शन कमीशन के अंडर में हैं । हम जब कहते थे तो आपने सुनी नहीं, अब आपको इलेक्शन कमीशन बचाने वाला दिख रहा है । हम तो ये भी नहीं कहते थे कि हम सुबह शाम आपसे सवाल जवाब करेंगे, हमें कोई सवाल जवाब का शौक नहीं है, आप साल में एक बार ऑडिट कराके पब्लिक डोमेन में डाल दीजिए, चाहे तो चुनाव आयोग से बात तक मत करिए । अब आरटीआई में सुबह से शाम तक रोजाना 200 सवाल आ जाया करेंगे । लोग इसका गलत इस्तेमाल भी करने लगे हैं । बहुत अच्छी चीज है आरटीआई लेकिन इसका एक डार्क साइड है ।  एक टीवी चैनल पर डिस्कशन चल रहा था, सुभाष अग्रवाल जिन्होंने ये याचिका दी थी, वो भी थे और मैं भी था, उन्होंने कहा कि पॉलिटिकल पार्टीज ने अगर इलेक्शन कमीशन की बात मान ली होती तो मेरे दिमाग में तो ये पीटीशन डालने का ख्याल भी नहीं आता ।
वासिंद्र मिश्र : आप हरियाणा कैडर के सिविल सर्वेंट रहे, हरियाणा और खास तौर से उत्तर प्रदेश, बिहार में एक आम राय है कि यहां के नेता अपने हिसाब से पूरी ब्यूरोक्रैसी को चलाना चाहते है, अगर वो कई बात कहते हैं तो सिविल सर्वेंट को ये काम करना होता है और अगर कोई भी सिविल सर्वेंट नहीं करना चाहता तो बहुत बुरा मान जाते हैं । आपने वहां रहते हुए किस तरह से बैलेंस किया ? हरियाणा में अलग अलग टेंपरामेंट और अलग अलग पर्सनैलिटी नेता थे, आपने लगभग सबके साथ काम किया, आप कैसे उस काम को बैलेंस कर पाए ?
एसवाई कुरैशी- बड़ा दिलचस्प सवाल है आपका, ये फैक्ट है कि जब मैं हरियाणा में आया तो बंसीलाल जी की सरकार थी उसके बाद देवीलाल जी आ गए, उनके साथ बीजेपी भी शामिल थी, चौटाला साहब की सरकार आई फिर भजनलाल की सरकार बनी, इन सबके साथ मेरे ताल्लुकात अच्छे रहे, इसका मतलब ये नहीं है कि वो जो चाहते थे मैं कर देता था, इसके बावजूद मैं रहा मेरी ये इमेज बन गई कि ये आदमी ठीक काम करेगा, गलत हमारे लिए भी नहीं करेगा और हमारे दुश्मनों के साथ मिलकर भी गलत नहीं करेगा । मेरा अनुभव है, कि नेता को ये चिंता तो होती है कि ये अफसर मेरे कितना काम आ सकता है लेकिन उससे ज्यादा ये फिक्र होती है कि कहीं मेरे किसी विरोधी से तो नहीं मिल जाएगा, उसके कहने से मेरी जड़ तो नहीं काटेगा, इसकी चिंता इन्हें ज्यादा होती है ।  तो ऐसे अफसर जिनकी रेप्युटेशन ये हो जाए कि ये फेयर है, तो बीच-बीच में उसको किसी अच्छी पोस्ट पर न लगा कर, दांए-बाएं भी लगाते हैं, लेकिन उससे घबरा कर आदमी माथा टेक दे तो वो गलत होगा । मेरी साथ भी ऐसा हुआ लेकिन बजाय हताश होने के मैं  उन पोस्टिंग्स से भी मैं खुश होता था कि चलो अब मुझे वो काम करने का मौका मिल गया जो नहीं कर पाता था, जैसे लिखने-पढ़ने का, कुछ और सुधार करने का । मेहनत करने के बाद कुछ वैसा भी तो चाहिए होता है कि आपको रेस्ट मिल जाए । और एक जो सबसे दिलचस्प बात है, जिसका कभी किसी के सामने जिक्र नहीं आया, मैं मिस्टर चौटाला का प्रिंसिपल सेकेट्री था, लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी की किन हालात में मैं उनका प्रिंसिपल सेक्रेट्री बना ।  क्योंकि, देवीलाल जी के जमाने में मैं हरियाणा का डायरेक्टर पब्लिक रिलेशन था, चौटाला साहब की फैमिली से, पूरे परिवार से जान-पहचान अच्छी थी । इस परिवार से मेरे अच्छे ताल्लुकात रहे, लेकिन जब उन्होंने मुझे प्रिंसिपल सेक्रेट्री बनाया, उस जमाने में उनसे बातचीत भी नहीं थी । उन्होंने मेरा सलाम लेना भी बंद कर रखा था, क्योंकि एक आध कोई ऐसे डिसिजन, असल में ब्यूरोक्रैट्स ही होते हैं जो गलत काम कराते हैं, कि किसी से ये करा लो, वो करा लो तो वो मैंने नहीं किया, बार-बार कहने पर नहीं किया तो नाराज़गी हो गई । लेकिन मुझे उससे कोई परेशानी नहीं हुई क्योंकि मैं तो इस किस्म के मौके की तलाश में रहता था कि सरकार मुझसे नाराज हों और मुझे साईडलाउन करें ताकि मैं रेस्ट कर लूं, कुछ अपनी लिखाई-पढ़ाई कर लूं, तो उस हालात में जब मेरे पास चौटाला साहब का फोन आया कि मैं आपको अपना प्रिसिपल सेक्रेट्री बनाना चाहता हूं, मैंने कहा साहब सोच लीजिए, तो उन्होंने कहा कि कोई चीफ मिनिस्टर अपना प्रिंसिपल सेक्रेट्री बगैर सोचे समझे बनाएगा क्या । इसके बाद मैंने उन्हें अपनी स्ट्रेंथ और वीकनेस बता दीं तो उन्होंने कहा कि यही चीजें मुझे पसंद हैं तुम्हारी और ये कि तुम साफ बात करते हो, इसलिए मैंने ये देखा की नेता भी इन द हार्ट ऑफ हार्ट, ईमानदार अफसर को, फ्री एंड फेयर डिसिजन देने वाले को ही पसंद करता है ।
वासिंद्र मिश्र : धन्यवाद

सोमवार, 28 अक्तूबर 2013

संघ की साफगोई ...

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने एक बार साबित कर दिया है कि राष्ट्रीय महत्व और दैवीय आपदा के मसलों पर संघ राजनीति से अलग हटकर काम करता रहा है। मुजफ्फरनगर हिंसा और आईएसआई के सवाल पर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी का बचाव करके आरएसएस ने एक बार फिर अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की है।

मुजफ्फरनगर हिंसा मामले में राहुल गांधी के दिए बयान पर आरएसएस ने बीजेपी की ओर से प्रधामंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी से अलग रुख अपनाया है। आरएसएस के सह सरकार्यवाह दत्तात्रय होसबाले ने कहा है कि इंदौर की चुनाव रैली में राहुल गांधी का बयान एक हद तक ठीक है और केंद्र की यूपीए सरकार को ऐसी प्रवृतियों के खिलाफ कड़े कदम उठाने की जरुरत है।

संघ का ये रुख प्रधानमंत्री पद के बीजेपी के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के उस बयान से अलग है जिसमें मोदी ने कहा था कि कांग्रेस को उन युवकों के नाम बताने चाहिए वरना राहुल को अपने बयान के लिए माफी मांगनी चाहिए। गौरतलब है कि राहुल गांधी ने एक सभा के दौरान कहा था कि मुजफ्फरनगर हिंसा के बाद ISI के एजेंट पीड़ित युवकों से संपर्क बनाने की कोशिश में हैं।

साफ है कि संघ ने एक बार फिर साबित कर दिया कि राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर और दैवीय आपदा के वक्त उसकी सोच राजनीति और राजनीतिक फायदे से ऊपर की है। सबको पता है कि आरएसएस के दवाब में ही बीजेपी की तरफ से नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया गया और नरेंद्र मोदी ने राहुल गांधी के आईएसआई वाले बयान की आलोचना की थी और इस आलोचना के पीछे नरेंद्र मोदी का मकसद था अपनी मुस्लिम विरोधी छवि को ठीक करना और मुस्लिम युवाओं की हमदर्दी हासिल करना लेकिन आरएसएस नरेंद्र मोदी की इस राय से इत्तेफाक नहीं रखता है और शायद यही वजह है कि संघ ने इस मुद्दे पर मोदी से अलग लाइन लेने में कोई परवाह नहीं की।

इतिहास गवाह है कि देश पर जब-जब दैवीय आपदा आई है, आरएसएस के स्वयंसेवकों ने आगे बढकर देश की सेवा की है। चाहे वो महाराष्ट्र में भूकंप की त्रासदी हो या उत्तराखंड पर आई प्राकृतिक आपदा, संघ के स्वयंसेवकों ने जरुरत के वक्त आगे बढ़कर लोगों की सहायता की। इतना ही नहीं, जब भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध चल रहा था और भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बांग्लादेश निर्माण की प्रक्रिया की शुरुआत करा दी थी और इस दौरान जब इंदिरा गांधी पर जबर्दस्त अंतर्राष्ट्रीय दवाब था, उस वक्त भी आरएसएस ने राजनीति से परे हटते हुए इंदिरा गांधी के समर्थन की अपील की थी। संघ के लोगों ने तो इंदिरा के समर्थन में वोट तक दिए थे।

प्याज़, पावर और पॉलिटिक्स


आखिरकार प्याज़ के दाम 100 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गए लेकिन देश के जिन मंत्रियों पर इसकी कीमत को काबू में रखने की जिम्मेदारी थी वो सिर्फ संवेदनहीनता व्यक्त कर रहे हैं बल्कि लोगों के जख्मों पर नमक छिड़कने वाले बयान भी दे रहे हैं। पहले पवार ने कहा कि उन्हें नहीं पता कि प्याज के दाम क्यों बढ़ रहे हैं। फिर उन्होंने कह दिया कि उन्हें नहीं पता कि दाम घटेंगे कब। अब खाद्य मंत्री केवी थॉमस ने कहा है कि हमें जितना कहना है, हम कह चुके हैं। कीमतें क्यों बढ़ रही हैं, ये पता लगाना पत्रकारों का काम है। प्याज की कीमतों ने देश की सियासत पर अपना बड़ा असर डाला है। प्याज की कीमतों की वजह से कई बार तो तख्ता पलट तक हो गया।
कांग्रेस का जो मौजूदा नेतृत्व है, उसे इतिहास से सबक लेते हुए अपने राजनीतिक विरोधियों पर आरोप लगाने से बचना चाहिए। जिस तरह से सरकार को चलाने वाले लोग गैर जिम्मेदाराना बयान दे रहे हैं, उसका राजनैतिक नुकसान आने वाले चुनावों में कांग्रेस पार्टी को उठाना पड़ सकता है।
 इतिहास गवाह है कि जब कभी भी जनता को Taken For Granted लिया गया है और सरकारें जनभावना के खिलाफ जाकर काम करती रही है। तब तब सत्तारुढ़ दलों को नुकसान उठाना पड़ा है।
देश ने वो दैौर भी देखा है जब संपूर्ण विपक्ष एक सुर से इंदिरा गांधी को सत्ता से बेदखल करने की कोशिश में लगा था, तो उस वक्त इंदिरा गांधी ने सिर्फ एक नारा दिया था, गरीबी हटाओ और उस एक नारे ने देश के राजनैतिक समीकरण को बदल दिया था और इंदिरा गांधी को दोबारा देश की सत्ता मिल गई थी। एक और दौर आया था 1980 में जब इंदिरा ने कहा था कि जिस सरकार का कीमत पर जोर नहीं, उसे देश चलाने का अधिकार नहीं। और पूरे देश में हुई जनसभाओं में इंदिरा गांधी प्याज की माला पहनकर घूमी थीं। जनता पार्टी की सरकार में प्याज की बढ़ी कीमतों को इंदिरा गांधी ने चुनावी मुद्दा बनाया और इसका उन्हें फायदा भी मिला। इसी फॉर्मूले को दिल्ली में शीला दीक्षित ने भी आगे चलकर अपनाया था। जब सुषमा स्वराज दिल्ली की मुख्यमंत्री थीं और प्याज़ की कीमतों में बढ़ोत्तरी हुई थी। कांग्रेस ने इसे चुनावी मुद्दा बनाया और सुषमा सरकार को हार का सामना करना पड़ा।
लेकिन आज के दौर में कांग्रेस के जो सरकार चलाने वाले लोग हैं, उनको शायद इतिहास की इस कड़वी सच्चाई का अंदाज़ा नहीं है या फिर वो इस कड़वी सच्चाई को देखना नहीं चाहते, समझना नहीं चाहते और ये लोग जनता को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं और प्रशासनिक जिम्मेदारी से बचना चाहते हैं।

मोदी का मेकओवर प्लान.....

मिशन 2014 के लिए बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का मेकओवर प्लान अब धीरे धीरे परवान चढ़ता दिखाई दे रहा है...वो मोदी जिनको कुछ दिनों पहले तक अपने ही कार्यक्रम में मुसलमानों की ओर से दी गई टोपी पहनने से एतराज हुआ करता था...वो मोदी जिनका पीछा कई साल पहले हुए गोधरा कांड के कलंक से नहीं छूट रहा है....वो नरेंद्र मोदी जिनको राज धर्म का पाठ तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को पढ़ाना पढ़ा था....वही मोदी अपनी चुनावी जनसभाओं में भ्रष्टाचार कुशासन, बिगड़ती कानून व्यवस्था के साथ साथ मुसलमानों के साथ  हो रही नाइंसाफी को भी उठाते दिखाई दे रहे हैं.....
मोदी की भाषा, विचारधारा और चुनावी मुद्दों की प्राथमिकताओं में मुसलमानों का मुद्दा जुड़ना अचानक नहीं है दरअसल ये आरएसएस की सोची समझी चुनावी रणनीति का एक अहम हिस्सा है...संघ परिवार समय की आवश्यकता और देश के मिजाज को देखते हुए भारतीय जनता पार्टी के लिए राजनैतिक एजेंडा परोक्ष रुप से तय करता है....जिस समय बीजेपी की राजनीतिक कमान अटल बिहारी वाजपेयी और आडवाणी के हाथों में थी उस समय अटल बिहारी वाजपेयी को लगातार उदारवादी नेता के रुप में प्रोजेक्ट किया जाता रहा ...गुजरात में जब तक मोदी को एक कट्टर हिंदू नेता प्रोजेक्ट करने की आवश्यकता महसूस की गई तक तक मोदी आडवाणी के मुकाबले ज्याद प्रभावी और प्रखर हिंदुत्व के पोषक माने जाते रहे और अब जब देश की कमान मोदी को सौंपने की कोशिश है तब उनकों एक उदारवादी नेता के तौर पर प्रोजेक्ट किया जा रहा है....
आरएसएस की तरफ से एक अलग प्रकोष्ठ बनाया गया है जिसकी जिम्मेदारी श्री इंद्रेश जी को सौंपी गई थी....इंद्रेश जी को ही मोदी की जनसभाओं में मुसलमानों को जुटाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है...और इसकी बानगी राजस्थान के जयपुर और मध्यप्रदेश के भोपाल की जनसभा में देखने को मिली....जब कई मुस्लिम चेहरे भी इन जनसभाओं में नज़र आए...
 बीजेपी से अल्पसंख्यकों को खास तौर पर मुसलमानों को जोड़ने  की कोशिश अटल बिहारी वाजपेयी के शासन काल में ही शुरू हो गई थी...देश के चुनिंदा शायरों को इकट्ठा करके एक कौमी कारवां निकाला गया था...लेकिन इसमें पार्टी को खास कामयाबी नहीं मिल पाई...लेकिन अब फिर एक बार चुनाव के मद्देनजर इस प्रयोग को इस्तेमाल में लाया जा रहा है....अब देखना होगा कि लोकसभा चुनाव और पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में आरएसएस के मोदी मेकओवर प्लान का कितना फायदा बीजेपी को मिलेगा..

शनिवार, 26 अक्तूबर 2013

मोदी बनाम राहुल

अब इमोशनल कार्डका सहारा !  
भारत में सियासत भावनाओं का खेल है। सियासतदान ये अच्छी तरह जानते हैं कि उन्हें कब क्या बोलना है और कितना बोलना है। हालांकि चीजें इस पर निर्भर करती हैं कि कैसे बोला गया। इसे समझना थोड़ा आसान हो जाएगा अगर आप राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी के हाल ही में दिए गए भाषणों पर नज़र डालेंगे।       
पांच राज्यों में चुनाव की घड़ी है, विधानसभा चुनावों को लेकर पार्टियां अपने-अपने तरीकों से वोटर्स को लुभाने में लगी हैं । विधानसभा चुनाव की बिसात पर लोकसभा चुनाव के सियासी दांवपेंच की बुनियाद खड़ी की जा रही है । इन सबके बीच देश की दो मुख्य पार्टियों के दो बड़े नेताओं की धड़ाधड़ रैलियां हो रही हैं । इन रैलियों में खास है इनका भाषण।  नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी दोनों नेता अपनी परंपरागत स्टाइल से हटकर भाषण दे रहे हैं । हाव-भाव नहीं बदले हैं, लेकिन भाषण में मुद्दों की जगह इमोशन ने ले ली है । कल तक विकास की,  युवाओं की बात करने वाले राहुल गांधी आजकल भावनाओं में बहते हुए दिख रहे हैं, वहीं नरेंद्र मोदी भी इमोशन का सहारा ले रहे हैं, लेकिन परोक्ष रूप से ।
याद कीजिए 2012 का विधानसभा चुनाव और उस वक्त के राहुल गांधी के तेवर। कभी एक कागज के पुर्जे को एसपी का प्रतीकात्मक घोषणापत्र जताते हुए फाड़कर फेंकना तो कभी भट्टा पारसौल से अलीगढ़ के टप्पल तक की पदयात्रा करना। हालांकि इसका जो नतीजा हुआ वो भी आपके सामने है, एसपी का घोषणापत्र ही उसके काम आया और सत्ता मिल गई । जिस अलीगढ़ तक राहुल ने पदयात्रा की, वहां की रैली में भी भीड़ जुटाने में स्थानीय कांग्रेसियों के पसीने छूट गए ।  ये सब इसीलिए कि क्या गुजरे दौर के इन्हीं वाकयों ने राहुल को समझदार बना दिया है, या फिर राहुल भावनात्मक वार करके कुछ और साधना चाहते हैं राहुल की बदली रणनीति का मतलब क्या है ?
राहुल गांधी ने अपनी रणनीति बदल ली है, उनके भाषण इस बात की तस्दीक कर रहे हैं । अलीगढ़ और रामपुर की रैलियों में राहुल ने खाद्य सुरक्षा बिल पर चर्चा के दौरान सोनिया गांधी की बीमारी की बात की तो चुरु में एक कदम आगे बढ़कर खुद की जान को खतरा बता दिया । इंदौर में परिवार की चर्चा करने से बचे तो भावनाओं की रौ में बहने से खुद को नहीं रोक पाए। वहां उन्होंने पाकिस्तानी एजेंसी ISI के मुजफ्फरनगर के दंगा पीड़ित युवकों के लगातार संपर्क में होने की बात कह डाली। अपने इस बयान से भले ही राहुल गांधी विरोधी पार्टी पर देश की छवि खराब करने और गलत रणनीतियों से देश की सुरक्षा को खतरे में डालने का आरोप लगाना चाहते थे, लेकिन उनके इस बयान ने विरोधियों को उन पर कई आरोप लगाने का मौका दे दिया है ।
ऐसे में सवाल ये उठते हैं कि क्या राहुल और उनके रणनीतिकारों को ऐसे सियासी हमलों का अंदाजा नहीं है? दरअसल ऐसा सोचना सही नहीं होगा । चुनावी मुहिम के लिए ये राहुल की नई रणनीति है, जिसमें परिवार की दुहाई भी है, कुर्बानी की दलीलें भी हैं, सुरक्षा का आश्वासन भी है, और गांधी परिवार की विरासत की हनक भी है । मुजफ्फरनगर हिंसा को लेकर राहुल का बयान भी इसी की एक मिसाल भर है। हालांकि राहुल के भावनाओं से भरे ये बयान भी विरोधियों को रास नहीं आ रहे । विरोधी पार्टियां देश में गरीबी, महंगाई, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों की दुहाई देते हुए राहुल के भावुक बयानों की बखिया उधेड़ रहे हैं, लेकिन क्या सियासत में जनता को खुद से जोड़ने के लिए भावनाओं का घालमेल सिर्फ शहज़ादे’  यानि राहुल गांधी ही कर रहे हैं ?

झांसी में नरेंद्र मोदी खुद को पिछड़े वर्ग का और चायवाला बताकर क्या आम लोगों की भावनाओं से जुड़ने की कोशिश नहीं कर रहे । क्यों नरेंद्र मोदी राहुल से कह रहे हैं कि किसी कौम पर इल्जाम लगाने के लिए उन्हें माफी मांगनी चाहिए या फिर क्यों नरेंद्र मोदी सिख दंगों के आरोपियों को बचाए जाने की दुहाई दे रहे हैं । यहां ये भी याद रखना होगा कि ये वही नरेंद्र मोदी हैं जिनके हाईटेक भाषणों में जीडीपी, पर कैपिटा इनकम, ग्रोथ रेट और इन्फ्रास्ट्रक्चर जैसी चीजों की बात हुआ करती थी । क्या ये भावनाओं के आधार पर परोक्ष रूप से वर्ग विशेष की दुखती रग को सहलाने की कोशिश नहीं है ?

ऐसा नहीं है कि भावनात्मक आधार पर राजनीति सिर्फ गांधी परिवार या कांग्रेस पार्टी ही करती है । भारत के करोड़ों भावुक लोगों के जज्बातों से खेलने में भारतीय जनता पार्टी सहित बाकी दल भी पीछे नहीं हैं । ये सच है, कि आज़ादी के बाद गांधी परिवार से हटकर अगर किसी राजनेता के प्रति आम जनता में, दलीय भावना से ऊपर उठकर सर्वाधिक सम्मान और श्रद्धा रही है तो वो अटल बिहारी वाजपेयी के प्रति रही है। भारतीय जनता पार्टी के कर्णधारों को इस सच्चाई का भरपूर अहसास है और शायद इसीलिए दिली तौर पर उनके अपमान का अरमान पाले बीजेपी के तमाम बड़े नेता, खुले तौर पर अपनी जनसभाओं में अटल बिहारी वाजपेयी की फोटो लगाकर जनता से समर्थन की गुहार लगाते दिखाई दे रहे हैं । बीजेपी के इतिहास और मौजूदा कद्दावर नेताओं के पुराने बयानों पर नज़र डालें तो अटल जी की आलोचना पार्टी के अंदर रहते हुए भी कई बार देखने और पढ़ने को मिली थी लेकिन चुनावी मौसम में जब साख, छवि, स्टेट्समैन और कुशल प्रशासक के धनी व्यक्ति की जरूरत पड़ती है, तो अटल जी के बगैर बीजेपी का काम नहीं चल रहा ।

शुक्रवार, 25 अक्तूबर 2013

मोदी मंत्र


बीजेपी की तरफ से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने के बाद से नरेंद्र मोदी एक के बाद एक रैलियां करते जा रहे हैं । इन रैलियों में दिए उनके भाषणों के जरिए उनकी रणनीति सामने आने लगी है । एक खास बात और है नरेंद्र मोदी  भाषण चाहे कहीं दे, उनकी बातें पैन इंडिया ही होती हैं । झांसी में नरेंद्र मोदी का भाषण अपने आप में उस फिल्म की तरह था जिसमें हर विधा की चीजें मौजूद होती हैं अब चाहे वो एक्शन हो,कॉमेडी हो या फिर इमोशन से भर देने वाले सीन।
नरेन्द्र मोदी ने खुद को गरीबी से जोड़ा, उन दिनों की याद दिलाई जब वो ट्रेन में चाय बेचा करते थे । मोदी ने कहा कि ये बीजेपी की महानता है कि एक चाय बेचने वाला व्यक्ति आज प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार है । मोदी ने ना सिर्फ इस बयान के जरिए सियासत में परिवारवाद पर निशाना साधा बल्कि उस हर गरीब के दिल में जगह बनाने की कोशिश की जो मेहनत-मजदूरी कर बड़े होने के ख्वाब देखता है । इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत में ऐसे ही लोगों की तादाद ज्यादा है ।
इस रैली में शायद पहली बार मोदी ने लाखों लोगों के सामने खुद को पिछड़ा वर्ग का बताया । झांसी में मोदी ने ये बात यूं हीं नहीं कही, दरअसल बुंदेलखंड का वो इलाका ऐसा है जहां पिछड़े वर्ग के लोगों की तादाद ज्यादा है । मोदी बोले कि वो पिछड़ा वर्ग से आते हैं ताकि पिछड़े वर्ग के तमाम लोग उन्हें अपना रहनुमा समझ सकें । ये बुंदेलखंड के लिहाज से खासा महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां की सियासी बिसात पर पिछड़े वोंटो का अहम योगदान है । इस रैली में मंच पर नेताओं की मौजूदगी भी सियासत के इसी गणित के हिसाब से थी । मंच पर राजनाथ के बगल में कल्याण सिंह को जगह दी गई जो लोध जाति से हैं और बुंदेलखंड में लोध जाति के वोटर्स ज्यादा है । मंच पर इसके अलावा उमा भारती और विनय कटियार नज़र आए ।   
नरेंद्र मोदी अपने भाषण में राहुल गांधी के उस बयान का जिक्र करना नहीं भूले जिसमें उन्होंने अपनी दादी की हत्या के बारे में कहा था । राहुल गांधी के इस बयान के बहाने नरेंद्र मोदी ने 84 में हुए सिख विरोधी दंगों की चर्चा की । कांग्रेस की भूमिका पर सवाल खड़े किए और एंग्री यंग मैन की तरह सवाल किया कि क्या इसी गुस्से की प्रतिक्रिया के तौर पर सिख विरोधी दंगे हुए, और आज तक गुनहगारों को सजा नहीं मिली । मोदी ने अपने इस बयान से ना सिर्फ कांग्रेस पर सवाल खड़े किए बल्कि सिख धर्म के लोगों को ये जताने की कोशिश भी की कि बीजेपी उनकी हमदर्द है । दरअसल इसके जरिए नरेन्द्र मोदी ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में सिख वोटों को बीजेपी के पक्ष में मोड़ने की कोशिश की है ।  
नरेंद्र मोदी ने बुंदेलखंड के विकास के लिए अक्सर पैकेज के ऐलान को मुद्दा बनाकर लखनऊ और दिल्ली की सरकार पर भी सवाल खड़े किए । मोदी ने बताया कि पैकेज का जो हिस्सा मध्यप्रदेश में गया उससे विकास हुआ, उत्पादन 3 गुना बढ़ा और सारी व्यवस्था बेहतर हुई, लेकिन यूपी में पड़ने वाले बुंदेलखंड के हिस्से से दिल्ली और लखनऊ में बैठे लोगों की जेबें गर्म हुईं । इस मुद्दे के बहाने मोदी ने मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार की जमकर तारीफ की साथ ही बुंदेलखंड में पड़ने वाले 13 जिलों के मतदाताओं के दिलों में भी जगह बनाने की कोशिश की ।
मोदी ने अपने भाषण में शायद पहली बार, भले ही परोक्ष रूप से, मुस्लिम युवकों को भी ये बताना चाहा कि वो उनके हमदर्द हैं ।  मुद्दा बना राहुल का बयान, जिसमें राहुल ने मुजफ्फरनगर और ISI  कनेक्शन की बात की थी । मोदी ने कई सवाल उठाए, मसलन, एक सांसद को इंटेलिजेंस इतनी महत्वपूर्ण बातें क्यों बताता है ? अगर मुजफ्फरनगर वाली बात सही है तो कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है ? और अगर ऐसा नहीं है, तो उन नौजवानों को बदनाम क्यों किया जा रहा है ? दरअसल मोदी ने ये बात यूं हीं नहीं कही, मोदी ने इसके जरिए एक साथ दो निशाने साधे, राहुल और इंटेलीजेंस एजेंसी पर सवाल खड़े किए ही, बिना सीधे तौर पर कहे मुज़फ्फरनगर के पीड़ित नौजवानों को भी ये जता दिया कि बीजेपी उनके साथ है, इसके साथ ही मोदी ने खुद पर गोधरा मामले में अल्पसंख्यक विरोधी होने के दाग को धोने की कोशिश भी की । 
मोदी ने झांसी के इस मंच पर अंग्रेजों के अत्याचार की तुलना कांग्रेस के अत्याचार से की । मोदी ने कहा कि 1857 में जो नारा झांसी की वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई ने दिया था वही नारा आज भी लोगों को देना चाहिए ... लक्ष्मीबाई ने कहा था नहीं देंगे, नहीं देंगे, अपनी झांसी नहीं देंगे, आज लोगों को कहना चाहिए नहीं देंगे, नहीं देंगे, देश बेइमानों को नहीं देंगे । मोदी ने कहा- हम आंसू बहाने नहीं पोंछने आए हैं, जनता ने देश को 60 साल कांग्रेस के हाथ में सौंपा है अब 60 महीने के लिए हमें दे, हम आपकी तकदीर और देश की तस्वीर भी बदल देंगे ।