मंगलवार, 24 सितंबर 2013

वोटबैंक और भारतीय राजनीति 

भारत में एक बार फिर आम चुनाव 2014 का शंखनाद हो चुका है, इस चुनावी महासमर के लिए सभी राजनैतिक दलों की तरफ से अपनी-अपनी तैयारियां लगभग पूरी कर ली गई हैं । सत्ता में बैठे राजनैतिक दलों की कोशिश अपनी सरकार की उपलब्धियों को लेकर जनता में जाने की है तो विपक्ष की राजनीति कर रहे लोगों की तैयारी सरकारी काम-काज की खामियों को उजागर करके वोट हथियाने की है ।
अभी तक जो संकेत मिल रहे हैं उससे साफ है कि देश में ये चुनाव अभी एक बार फिर यूपीए बनाम एनडीए होने जा रहा है। इसका मतलब यह नहीं है कि क्षेत्रीय दलों की भूमिका नगण्य होगी, राजनैतिक ध्रुवीकरण के साथ-साथ सामाजिक और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कवायद भी तेज हो गई है । शायद, इसीलिए देश के दोनों राष्ट्रीय दलों भारतीय़ जनता पार्टी और कांग्रेस के साथ-साथ कुछ क्षेत्रीय़ दलों के बीच में मुस्लिम मतों पर एकाधिकार बनाने की कोशिशें भी तेज हो गई हैं ।
सबसे दिलचस्प बात ये है कि हिंदुत्व का मसीहा बनाकर नरेंद्र मोदी को पेश करने वाली भारतीय जनता पार्टी और उसका पेरेंट ऑर्गेनाइजेशन आरएसएस भी मुसलमानों को अपने साथ जोड़ने की हरसंभव कोशिश में दिखाई दे रहा है । आरएसएस की तरफ से वरिष्ठतम पदाधिकारी इंद्रेश जी को इस मुहिम की कमान सौंपी गई है, और अब इंद्रेश जी गुजरात के बाहर होने वाली प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की जनसभाओं में मुसलमानों को जुटाने का काम कर रहे हैं ।
इसका एक नमूना बीते 10 सितंबर को राजस्थान के जयपुर में हुई नरेंद्र मोदी की जनसभा में देखने को मिला था । अगर इंद्रेश जी के दावे पर भरोसा किया जाए तो अब नरेंद्र मोदी मुसलमानों के बीच में घृणा के पात्र नहीं रहे । नरेंद्र मोदी की स्वीकार्यता हिंदुओ के अलावा मुसलमानों में भी लगातार बढ़ रही है । उस नरेंद्र मोदी की जिनको गुजरात में आयोजित एक कार्यक्रम में एक मुसलमान की तरफ से ऑफर की गई टोपी को पहनने से ऐतराज़ हुआ करता था । शायद नरेंद्र मोदी भारतीय राजनीति के भीष्म पितामह कहे जाने वाले अटल बिहारी वाजपेयी के नक्शे कदम पर चलने की कोशिश में लग गए हैं । संभवत: उनको इस बात का एहसास हो गया है कि देश का नेतृत्व करने के लिए समाज के सभी वर्गों का सहयोग और समर्थन जरूरी है ।
पंडित अटल बिहारी वाजपेयी के नक्शेकदम पर चलने की कोशिश तो कट्टर हिंदुत्व की छवि वाले लाल कृष्ण आडवाणी ने भी की थी, जब उन्होंने उप प्रधानमंत्री रहते हुए पाकिस्तान दौरे पर जाकर मुहम्मद अली जिन्ना को सेक्युलर कहकर खुद को विवादों में फंसा लिया था । इसके बाद भारत लौटते ही आडवाणी को संघ परिवार से लेकर भारतीय जनता पार्टी के करोड़ों कार्यकर्ताओं की नाराजगी का शिकार होना पड़ा था । कहा जाता है कि सार्वजनिक जीवन में लिया गया एक गलत फैसला ताउम्र की गई तपस्या और बलिदान और तपस्या को धूलधुसरित कर देता है । आडवाणी जी के साथ भी कमोबेश यही हुआ, तभी तो उनको संघ परिवार से लेकर पार्टी तक में हाशिए पर ढकेल दिया गया ।
अब एक बार फिर नरेंद्र मोदी, संघ परिवार, भारतीय जनता पार्टी और मुस्लिम प्रेम की चर्चा जरूरी है। जिस तरह की तैयारी उनके रणनीतिकारों की तरफ से चल रही है, वह अपने आप में कई तरह के विवादों को जन्म दे रहा है । मसलन, मुसलमानों के छद्म वेश में हिंदु समाज के लोग, उनकी रैलियों में लाए जा रहे हैं ।
दिग्विजय सिंह ने बीजेपी पर आरोप लगाया है कि 25 सितंबर को भोपाल में होने वाली मोदी की रैली के लिए बुर्के पर करीब 40 लाख रुपए खर्च किए गए हैं । बीजेपी की तरफ से इस आरोप का चाहे कितना भी खंडन किया जाए, दिग्विजय सिंह के खिलाफ मानहानि का मुकदमा किए जाने की बात की जाए, लेकिन एक बात तो तय है कि बुर्के के लिए कोटेशन मंगवाया गया था । ऐसे में सवाल ये है कि भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस के पास, जो तुष्टीकरण और मुस्लिम वोट बैंक का विरोध करके हिंदु समाज को पोलराइज करता रहा, आखिर क्या मजबूरी है कि कांग्रेस और गैर बीजेपी दलों के नक्शेकदम पर चलने को उतारु दिखाई दे रही है । भारतीय जनता पार्टी में भी अन्य राजनैतिक दलों की तरह अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ का अस्तित्व शुरु से रहा है और ऑर्नामेंटल तौर पर सिकंदर बख्त, आरिफ बेग, नजमा हेपतुल्ला, शहनवाज़ हुसैन और मुख्तार अब्बास नक़वी सरीखे चेहरे हमेशा से रहे हैं, लेकिन ना तो संघ और ना ही भारतीय जनता पार्टी की तरफ से इतना अधिक महत्व इसके पहले कभी दिया गया ।
पिछले दिनों संघ की तरफ से राष्ट्रीय मुस्लिम मोर्चा के बैनर तले मुसलमानों को लामबंद करने की जिम्मेदारी निभा रहे इंद्रेश जी ने एक बातचीत के दौरान स्वीकार किया था कि मुसलमानों को समाज की मुख्यधारा में लाना संघ की प्राथमिकताओं में से एक है । अब अगर इन तथ्यों का राजनैतिक विश्लेषण किया जाए तो फिर चाल, चरित्र और चेहरे की बात करने वाली, पार्टी विद डिफरेंस का नारा देने वाली भारतीय जनता पार्टी और गैर बीजेपी राजनैतिक दलों की कार्यशैली में क्या फर्क रहा जाता है ?

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