रविवार, 29 सितंबर 2013

मोदी मीडिया की देन हैं : तारिक अनवर



तारिक अनवर
वासिंद्र मिश्र
: तारिक अनवर साहब का एक लंबा पॉलिटिकल अनुभव रहा है..
सीता राम केसरी से लेकर नरसिंह राव के साथ काम करने का अनुभव और राजीव गांधी के बेहद करीबी रहे तारिक भाई से जानने की कोशिश करेंगे इस समय जो देश की राजनीति है कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस के साथ सेक्युलर पॉलिटिक्स करने वाले जो लोग हैं वो कितना सहज  महसूस कर रहे है,  उनके जो नए सहयोगी है और उनके जो नेता है शरद पवार जी उनके साथ तारिक भाई का क्या समीकरण है और मौजूदा राजनीतिक ध्रुवीकरण में एनसीपी या शरद पवार जी की क्या भूमिका होने जा रही है। तारिक भाई सबसे पहले तो हम यही चर्चा करेंगे कि जब आप लोग राजनीति में आए थे.. 85-86 के दौर से तो कम से कम हम आप को जानते है... उस जमाने में राजीव गांधी ने सेवा दल का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया था  तब सेवा दल भी खूब चर्चा में था.. कह सकते है कि आप की अगुवाई में.. लगता था कि सेवा दल का जो महत्व था वो जो मेन कांग्रेस पार्टी थी और एक आकर्षण था कि सेवादल से जुड़ना सीधे पार्टी हाईकमान से जुड़ना.... आज क्या है न तो सेवा दल दिख रहा है न कांग्रेस पार्टी दिख रही है... ठीक है सरकार चल रही है 8-9 साल से सरकार है.. लेकिन वो प्रभाव वो आकर्षण वो एक जो आदर्शवादिता को लेकर विश्वास है, कही ना कही कम होता दिख रहा  है... क्या कारण दिख रहा है आपको ?
तारिक अनवर:  देखिए वैसे तो मेरा राजनीतिक करियर शुरू हुआ 1970 में और थाना कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष के रूप में शुरूआत की थी पटना से और फिर इंडियन यूथ कांग्रेस का प्रेसिडेंट बना फिर राष्ट्रीय अध्यक्ष बना और जैसा आप ने कहा कि मुझे सेवा दल की जिम्मेदारी दी गई राजीव गाँधी जी के द्वारा... मेरा ख्याल है कि उन्होंने जब बुलाकर कहा कि सेवादल की जिम्मेदारी दी जा रही है तो थोड़ी मुझे भी घबराहट हुई थी क्योंकि पहले सेवादल से मेरा कोई वास्ता नहीं था कभी काम नहीं किया था लेकिन उन्होंने कहा कि  मैं चाहता हूं कि सेवा दल के  द्वारा कांग्रेस के द्वारा जो युवा पीढ़ी आ रही है उसको एक तरह का प्रशिक्षण दिया जाए और साथ ही साथ कांग्रेस विचारधारा से उनको पूरी तरह से लैस किया जाए तो मैने वो काम शुरू किया, फैकल्टी बनाई और तमाम ट्रेनिंग प्रोग्राम शुरू हुआ और फिर ये तय़ हुआ कि जितने भी लोग 40 साल से नीचे है चाहे वो सांसद हो चाहे विधायक हो किसी भी पद पर हो कांग्रेस के अंदर उन सबको सेवा दल की ट्रेनिंग से गुजरना पड़ेगा । और उसके बाद सेवा दल की एक शक्ल और सूरत बनी... लोग आने लगे और फिर हमने काफी हद तक प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं की सेना तैयार की । उसमें काफी हद तक मुझे सफलता भी मिली । तो आप ने कहा है कि आज में उस समय में अंतर यही है कि अभी जो कैडर बिल्डिंग का काम है किसी भी राजनीतिक दल में मेरा ख्याल है नहीं चल रहा है कांग्रेस में भी नहीं चल रहा है दूसरी पार्टियों में भी नहीं चल रहा है आज जो लक्ष्य है कि किसी तरह सत्ता तक पहुंचा जाए.. विधायक बन जाएं सांसद बन जाएं.. कोई भी शार्ट कट रास्ता अपनाया जाए ....पार्टी तो लोग इस तरह से बदल रहे है जैसे कपड़े बदल रहे है 

वासिंद्र मिश्र: ये जो बाद का दौर शुरू हुआ है जिसमें मनमोहन अवधारणा माफ करिएगा ये यूज कर रहे है  देखने को मिल रहा है रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट्स, रिटायर्ट इंजीनियर जब तक नौकरी में रहते है तब तक गलत कामों में लिप्त रहते है नौकरी से हटते है नैतिकता की बात करने लगते है.. जितने महत्वपूर्ण पद है जो अनुभव के आधार पर मिलना चाहिए था इस तरह के नौकरशाहों की तैनाती हो जा रही है वो एक कारण आप को नहीं दिख रहा है कि वैचारिक प्रतिबद्धता की मिसिंग लिंक दिख रहा है इसका एक सबसे बड़ा कारण ये भी है जब ब्यूरोक्रेटस और पॉलीटिशएन आ रहे है उनका वो कमिटमेंट आम जनता से नहीं है जो एक जमीन से उठकर आता था कार्यकर्ता ....
तारिक अनवर:जैसा मैंने कहा  सभी दलों में राजनीतिक कार्यकर्ताओं की उपेक्षा हो रही है इससे इनकार नहीं किया जा सकता है.. आप का कहना ठीक है जो रिटायर्ड ब्यूरोक्रेटस है जब इनका काम खत्म हो जाता है तब वो राजनीति में आते है और फिर जो उनका बैक ग्राउंड होता है उनका लाभ उठाने की कोशिश करते है ये आप ने बहुत हद तक सही कहा है पहले जो है हमी लोग जब किसी को किसी से बढ़ाना होता था पदाधिकारी या कोई जिम्मेदारी की पद देना होता था या विधायक बनाने की बात होती थी तो हम लोग उनका बैक ग्राउंड देखते थे पार्टी के अंदर क्या योगदान है ..
 
वासिंद्र मिश्र: आपने राजीव जी के साथ काम किया आपने सीता राम केसरी के साथ काम किया और नरसिंह राव जी के साथ भी काम किया उस दौर के नेता हुआ करते थे अब उनके मुकाबले भारतीय जनता पार्टी में अटल जी जैसा नेतृत्व था जो कभी भी positive issue को लेकर परहेज नहीं किया करते थे सत्ता रूढ़ दल की तारीफ नहीं करेंगे अगर देश हित में फैसला होता था तो सार्वजनिक रूप से एतमाद करते थे उसकी तारीफ करते थे आज वो चीजे कहां आपको मिसिंग दिख रही है आज के नेतृत्व में ....
तारिक अनवर: पहले और आज में नेताओं की सोच में बहुत फर्क हुआ है.. वैचारिक मतभेद होना कोई बुरी बात नहीं है लेकिन  वो अब व्यक्तिगत मतभेद में तब्दील हो गया है अब हम लोग character पर आरोप प्रत्यारोप लगाते है और ये पहले नहीं था पहले जो बहस हुआ करती थी वैचारिक बहस हुआ करती थी पार्लियामेंट के अंदर हो पार्लियामेंट के बाहर हो.. इश्यू उठाए जाते थे और उसकी एक गरिमा हुआ करती थी ...आज वो नहीं है उसकी कमी है ....

वासिंद्र मिश्र: तारिक भाई देश के सामने जनता के सामने पॉलिटिकल क्रेडिबिलिटी का सवाल सबसे बड़ा सवाल बनकर सामने आ रहा है और एक जो क्राइसिस दिख रही है कि जो पॉलिटिक सिस्टम से... पॉलिटिशियन के प्रति आम जनता में अविश्वास पैदा हो रहा है अगर वो चाहे  यहां तक पानी में खड़े होकर बोले कोई सच भी बोले तो जनता को संदेह हो रहा है कि इसके पीछे भी कोई राजनीति होगी ।
तारिक अनवर:देखिए जहां तक क्रेडिबिलिटी का सवाल है.. किसकी क्रेडिबिलिटी है अगर राजनीतिक लोगों की नहीं है तो ब्यूरोक्रेस की है यहां तक की न्यायालय की है? या किसी भी क्षेत्र में आप ले लीजिए बिजनेसमैन हो कुछ भी हो गिरावट तो ओवरऑल सभी जगह आया है....हमसब एक ही समाज के हिस्से है अलग अलग जिम्मेदारी हमलोगों की है तो उसी तरह से हर जगह गिरावट है मीडिया में भी बहुत तरह की बात आती है कि पेड न्यूज छपते है.. उस प्रकार मैनेज किया जाता है प्रेस को मीडिया को तो मेरे कहने का अर्थ ये है कि जहां सब जगह गिरावट होगी तो आप ये नहीं सोच सकते कि राजनीतिक लोगों में गिरावट नहीं आएगी उनमें भी आई है और ये बात सही है कि चूंकि हम और हमेशा हमारे पर या पॉलिटिशियन पर जनता की नज़र रहती है ..ध्यान रहता है .....मीडिया का ध्यान रहता है  इसलिए हम फोकस में रहते है हमेशा इसलिए   कोई छोटा से छोटा गलत काम होता है तो पहले ही वो सामने आ जाता है लेकिन आपका कहना ठीक है कि इसको सही करने की आवश्यकता है चूकि हम सार्वजनिक जीवन में है लोग हम से अपेक्षा करते है कि हम साफ सुथरे रहे हमारे पर किसी प्रकार का कोई दाग ना हो 

वासिंद्र मिश्र: इस समय देश में दो तरह की मॉडल ऑफ पॉलिटिक्स दिखाई दे रही है.. एक जिसकी रहनुमाई नरेंद्र मोदी  कर रहे है सोशल मीडिया के जरिए फेसबुक, ट्विटर इन सब हथकंड़ो के जरिए .. किस तरह से अपनी इमेज बिल्डिंग की जा रही है पीआर एंजेसी के जरिए....दूसरी पॉलिटिक्स हो रही है जिसमें शरद पवार जी है, आडवाणी जी है, मुलायम सिंह यादव है.. इस तरह के तमाम सीनियर पॉलिटिशियन है.. देश में भले ही अलग अलग दलों की राजनीति कर रहे है आप को लगता है कि जो मोदी की राजनीति है.. जो कल्ट है मोदी का उसका मुकाबला...अलग अलग रह कर आज आनेवाल चुनाव में आप लोग कर पाएंगे ..
तारिक अनवर:देखिए हमको ऐसा लगता है कि नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व को कुछ ज्यादा ही इनलार्ज करके जनता के सामने पेश किया जा रहा है.. आज ही निकला है कि एक तरफ तो  गुजरात के विकास की बात करते है गुजरात के मॉडल की बात करते है लेकिन जो आज राजन कमेटी की रिपोर्ट आई है उसके अनुसार गुजरात भी पिछड़े राज्यों में है और उनकी आर्थिक व्यवस्था और विकास की दर है कह सकते है कि सही ढंग से नहीं है ये जो बातें जनता के बीच में कही जा रही है और एक प्रोपेगेंडा हो रहा है ये मैं समझता हूं कि भ्रम आगे चलकर टूटेगा  । 

वासिंद्र मिश्र: चाहे मनमोहन सिंह की सरकार हो ...नरेंद्र मोदी की सरकार हो इन सरकारों पर आरोप लगते रहते है कि इनकी जो नीतियां है वो समाज के अमीर तबके के लिए बनाई जाती है उनको ध्यान में रखकर बनाते है गांव गरीब किसान जो पिछड़े है तबका उसके बारे में फोकस नहीं है चाहे वो मनमोहन सिंह का मॉडल हो या नरेंद्र मोदी का मॉडल हो वही दूसरी तरफ शिवराज सिंह चौहान बीजेपी के ही मुख्यमंत्री है रमन सिंह बीजेपी के ही मुख्यमंत्री है इन लोगों का कामकाज का तरीका है.. नरेंद्र मोदी और मनमोहन सिंह में फर्क है ...शरद पवार जी अपने बेबाक बयान के लिए अक्सर विवादों में रहे है पिछले 9 वर्षों से हम देख रहे है आज की आर्थिक स्थिति को देखते हुए.. आपको लगता है कि जो POLITICAL MESS दिखाई दे रहा है , ECONOMIC MESS बना हुआ है देश के सामने इसे उबारने में शरद पवार जी का नेतृत्व ज्यादा कारगार साबित होगा आपकी नजर में....

तारिक अनवर: देखिए शरद पवार जी .. उनकी कुशलता में  उनकी योग्यता में.. उसका कोई...मैं समझता हूं कि बहुत कम राजनीतिक.. ऐसे राजनितिक नेता होंगे इस देश में लेकिन कड़वी सच्चाई है वो ये है कि एनसीपी का नंबर गेम जो हम कहते है लोकतंत्र में अभिव्यक्ति से ज्यादा नंबर का खेल होता है आपके पास बहुत काबलियत हो...लेकिन आपके पास नंबर नहीं है तो आप कुछ नहीं कर सकते है.. तो ये बात पवार साहब ने स्वीकार किया है हमारी पार्टी की न क्षमता है.. ना हमारी पार्टी की ताकत है कि हम पीएम  पद के दावेदार हो सकते है लेकिन इतना जरूर कह सकते है कि उनका एक लंबा अनुभव है और एक बैलेंस वे में वो राजनीति करते है जैसे आपने कहा कि कॉरपोरेट सेक्टर और बड़े उद्योगपति या दूसरी तरफ कमजोर वर्ग, किसान, मजदूर की बात तो ये दोनों की बात बैलेंस करने की क्षमता उनके अंदर है.. मैं समझता हूं कि आज देश को दोनों की आवश्यकता है.. 

वासिंद्र मिश्र: आप मानते है कि political मेस.. इकोनॉमिक मेस.. देश के सामने है इसको देखते हुए और वैचारिक प्रतिबद्धता के भी आप कायल रहे है शायद आपने राजनीति भी शुरू की राजनीति में आये तो एक political commitment था, एक ideological commitment था... आपको नहीं लगता है कि जो आपने कांग्रेस से अलग हटकर राजनीति की है.. अब दौर आ गया है कि एक साथ मिलकर नरेंद्र मोदी और इस तरह के लोग जो कि देश या समाज के 80 फीसदी गरीब लोगों की बात नही सोचते है उनके मुकाबले को करने के लिए उनको मजबूत टक्कर देने के लिए एक मजबूत POLITICAL FRONT बनाया जाए.. इसके लिए कांग्रेस के साथ मिलना जरूरी है आपको नहीं लगता है ...
तारिक अनवर: कांग्रेस के साथ मिलकर हम अभी भी सरकार चला रहे है.. MERGER संभव इसलिए नहीं है कि भारत की राजनीति का स्वरूप जो बना है वो स्वरूप ऐसा बना है कि किसी एक पार्टी का वर्चस्व नहीं हो सकता है कांग्रेस हो बीजेपी हो कोई भी पार्टी हो.. आज के दौर में हर राज्य में रीजनल पार्टियां आगे बढ़ी है हर जगह दूसरी विचारधारा के लोग आगे बढ़े है और उसमें जैसा मैंने कहा कि एक पार्टी चाहे कि सरकार बना लेंगे.. हम मिल भी जाएं तो नहीं हो सकता है तो ये जो दौर चल रहा है कि गठबंधन का .....और उस गठबंधन में वैचारिक प्रतिबद्धता होनी चाहिए उसके अंदर एकजुटता होनी चाहिए ऐसा न हो कि वैचारिकता एक न हो सिर्फ सरकार बनाने के लिए मिल जाए तो फिर सरकार चलाना मुश्किल होगा जो धर्म निरपेक्षता पर विश्वास करते है लोकतंत्र पर विश्वास करते है समाजिक सद्भभाव में विश्वास करते है..तमाम पार्टियां एकजुट होकर सरकार बनाती है गठबंधन की सरकार भी बनती है MINIMUM PROGRAMM भी बनाते है तो उसके आधार पर सरकार चले तो मैं समझता हूं कि उसमे कोई अंतर नहीं पड़ेगा.....

वासिंद्र मिश्र: भानूमति का कुनबा दिखाई दे रहा है... उत्तर प्रदेश में माया और मुलायम का साथ आना उनके लिए बेहद मुश्किल है । आपके बिहार में नीतीश जी और लालू जी में आपसी जो टकराहट है, वो कोई भी ALLIANCE PRE-ELECTION बनने की गुंजाइश नहीं दे रहा है, वेस्ट बंगाल में वाम मोर्चा और ममता बनर्जी का आपसी कलह है, POLITICAL और PERSONAL, वो किसी भी मोर्चे को बनाने में सबसे बड़ा व्यवधान खड़ा कर रहा है । इन सारी परिस्थितियों को देखते हुए आपको लगता है कि DEVIDED HOUSE के रूप में आप लोग नरेंद्र मोदी का जो आश्वमेध  घोडा निकला है.. आप लोग उसको रोक पाएंगे ...
तारिक अनवर: देखिए बिलकुल रुक जाएगा..ऐसा कुछ नहीं है और आप देखिए जहां-जहां लोकतंत्र है वहां लगभग परिस्थिति एक जैसी है किसी एक पार्टी का वर्चस्व नहीं है और बहुत कम ऐसी जगह है कि जहां दो पार्टी सिस्टम हो ..हर जगह मल्टी पार्टी सिस्टम है और सभी पार्टियां मिलकर देश चला रही  है.. हुकूमत कर रही है.. उसकी कमियां भी है हम कह सकते है.. इसके दो पह़लू है.. एक पहलू ये है गठबंधन में रहने से एक अंकुश भी रहता है, उसमें एक पार्टी की जो तानाशाही है वो नहीं रहती है, उसमें कहीं न कहीं वो अंकुश लग जाता है. वो रुकावट हो जाती है, लेकिन दूसरी तरफ ये भी आपका कहना सही है कि अलग-अलग पार्टियां होती हैं.. जो प्रोग्राम्स होते हैं उनको इम्पलीमेंट करने में प्रॉब्लम होती है, लेकिन जैसा मैने कहा कि हम मिनिमम प्रोग्राम बनाकर अगर प्री पोल  एलाय़ंस करते हैं.. अगर प्री पोल भी पूरी तरह से नहीं हो पाता है पोस्ट एलेक्शन भी अगर एलायंस होता है, सरकार बनती है, तो कम से कम मिनीमम प्रोग्राम बनना चाहिए जो यूपीए वन में बना था, क्योंकि एक पार्टी का अगर वर्चस्व हो जाएगा तो फिर इस देश में मैं समझता हूं कि जो राजनीति है वो किसी एक पार्टी या एक व्यक्ति की बपौती बन जाएगी। 

वासिंद्र मिश्र: ये एक परिवार विशेष की बपौती बन जाएगी ?
तारिक अनवर: बपौती बन जाएगी, इसलिए बेहतर ये है कि इस तरह का एरेंजमेंट होना चाहिए कि इसमें बैलेंस होना चाहिए....

शुक्रवार, 27 सितंबर 2013

मनमोहन सरकार के खिलाफ राहुल का हल्ला बोल

 

दागी नेताओं की मेंबरशिप बचाने के लिए भेजे गए ऑर्डिनेंस के प्रस्ताव का विरोध कर राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनकी सरकार के सत्ता में बने रहने के संविधानिक स्थिति पर सवाल खड़ा कर दिया है। राहुल गांधी का बयान कांग्रेस पार्टी का नज़रिया है और इस बयान से एक बात बिल्कुल तय हो गई है, कि मनमोहन सिंह और उनकी कैबिनेट ने ऑर्डिनेंस का जो मसौदा तैयार करके राष्ट्रपति के पास भेजा था, उसका समर्थन कांग्रेस पार्टी अब नहीं करती है। मनमोहन सिंह यूपीए-2 की सरकार में कांग्रेस पार्टी की नुमाइंदगी करते हैं और अगर कांग्रेस का उनसे भरोसा हट गया है, तो ऐसे में उनका और उनके मंत्रिपरिषद का अपने पद पर बने रहने का सांविधानिक अधिकार नहीं रह जाता है । अगर इसके बाद भी मनमोहन सिंह और उनका मंत्रिपरिषद अपने पद पर बना रहता है, तो ये खुद-ब-खुद एक बड़ा सांविधानिक संकट पैदा करता है ।
राहुल गांधी ने भले ही बाद में ये कहकर कि ये विचार उनके निजी विचार हैं, स्थिति की गंभीरता को कम करने की कोशिश की हो, लेकिन नेहरु-गांधी परिवार की कार्यशैली से परिचित लोगों का ये साफ मानना है कि यह परिवार कभी भी गलत फैसलों की जिम्मेदारी खुद पर नहीं लेता । पंडित जवाहरलाल नेहरु से लेकर सोनिया गांधी तक इस परिवार के सभी नेता अलग-अलग समय में, ज़रूरत पड़ने पर अपने करीबी से करीबी नेताओं से किनारा करते रहे, जब भी उनको ऐसा लगा कि उनके करीबियों के काम-काज का नकारात्मक असर उनकी छवि और उनकी इंटिग्रिटी पर पड़ सकता है। इंदिरा जी का कामराज प्लान हो या सोनिया जी का बोलकर मामले में नटवर सिंह का कांग्रेस से छुट्टी, सीताराम केसरी को बेइज्जत कर पार्टी अध्यक्ष पद से हटाने का मामला हो या जेएमएम घूसकांड के आरोप में फंसे नरसिंह राव से किनारा करना । कांग्रेस पार्टी के लगभग 108 साल पुराने राजनैतिक इतिहास में इस तरह के नमूने बार-बार देखने को मिलते रहे हैं ।
मनमोहन सरकार के अध्यादेश पर लिए फैसले के विरोध की शुरुआत गांधी परिवार के करीबी दिग्विजय सिंह, शीला दीक्षित और मिलिंद देवड़ा सरीखे नेताओं ने 26 तारीख को ही शुरु कर दी थी । इस मुहिम को हवा देने में इंडिया के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी सक्रिय भूमिका निभाई । गांधी परिवार से प्रणब मुखर्जी का बहुत ही घनिष्ठ रिश्ता रहा है और इसके ठीक उल्टा केंद्रीय मंत्रिमंडल में सदस्य के रूप में प्रधानमंत्री और प्रणब मुखर्जी के बीच का मतभेद भी जगजाहिर रहा है । 26 सितंबर की प्रणब मुखर्जी की सक्रियता पर नज़र डालें तो ऐसा लगता है कि मनमोहन सिंह और उनकी सरकार की बखिया उघेड़ने की जो पटकथा तैयार की गई थी उसमें कहीं ना कहीं प्रणब मुखर्जी की सकारात्मक भूमिका रही ।
भारतीय जनता पार्टी के प्रतिनिधिमंडल से मिलने के तुरंत बाद केंद्र सरकार के तीन वरिष्ठतम मंत्रियों को बुलाकर बातचीत करना और उसके एक दिन बाद राहुल गांधी का अचानक दिल्ली स्थित प्रेस क्लब में जाकर प्रस्तावित अध्यादेश के खिलाफ सार्वजनिक तौर पर बयानबाजी करना, मनमोहन सिंह के प्रति कांग्रेस पार्टी के भावी नज़रिए को दर्शाता है । अब यह मनमोहन सिंह और उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगियों को तय करना है कि वे नैतिकता और सत्ता के बीच में किसको ज्यादा महत्व देते हैं ?

गुरुवार, 26 सितंबर 2013

विकृत मानसिकता है हॉरर किलिंग ! 
 
पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान के कुछ इलाकों में अभी भी खाप पंचायतों का अहम रोल है । पिछले कुछ साल में खाप पंचायत की इमेज डिक्टैट की हो गई है जो संस्कृति के नाम पर ऐसे फैसले देते हैं जिससे समाज का एक बड़ा वर्ग सहमत नहीं होता और ज्यादातर जगहों पर उसकी आलोचना की जाती है । बावजूद इसके, ना तो आम लोग, ना ही इन इलाकों के जनप्रतिनिधि खुलकर इसके विरोध में आते हैं। खाप की शुरुआत समाज में होने वाले आपसी छोटे-बड़े विवादों के निपटारे के लिए हुई थी । इससे गांव के लोगों को सालों-साल कोर्ट के चक्कर लगाने से छुटकारा मिल गया था। लिहाजा खाप पंचायतों का देश के कुछ हिस्सों में खासा रोल होता था, लेकिन अब इन पंचायतों से कई विवाद जुड़ गए हैं, खासकर प्रेमी जोड़ों को मार डालने के इनके फैसलों से। पहली बार 2007 में करनाल की एक खाप की तरफ से एक प्रेमी जोड़े को मार डालने के फरमान के बाद देश-विदेश में इस तरह की पंचायतों पर सवाल खड़े हो गए थे। तब से अब तक हॉरर किलिंग के कई मामले सामने आए हैं, ऐसा नहीं है कि सिर्फ किसी खाप पंचायत के फैसले के बाद इस तरह की घटनाएं सामने आती हैं। ये दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन करनाल जैसे वाकये इन इलाकों में एक नज़ीर की तरह पेश हुए हैं और देश की राजधानी दिल्ली से महज 25-30 किलोमीटर के दायरे में ही समाज का दकियानूसी चेहरा उभर कर सामने आया है । जहां एक गोत्र, एक गांव में शादी करने के लिए समाज मौत की सज़ा देता है । ऐसा ही हाल में हरियाणा के रोहतक में हुआ जहां एक प्रेमी जोड़े को अपनी मर्जी से शादी कर लेने की सज़ा मौत के रूप में मिली । क्यों आज तक खाप के ऐसे फैसलों पर लगाम नहीं लग पाई है? इज्जत के नाम पर किसी अपने की बेरहमी से हत्या करने के पीछे कैसी मानसिकता होती है ?  क्या कहते हैं इन इलाकों में लंबे समय तक कानून व्यवस्था संभालने और हॉरर किलिंग के खिलाफ काम करने वाले पुलिस अधिकारी ?  मैंने बात की हरियाणा के पूर्व डीजीपी वी एन राय से, पेश है उनसे की गई बातचीत के मुख्य अंश

वासिंद्र मिश्र - वीएन राय साहब आप हरियाणा में डीजी लॉ एंड ऑर्डर रह चुके हैं और अपने कार्यकाल में ऑनर किलिंग की घटनाओं को रोकने के लिए आपने काफी प्रयास किए थे । आपसे जानना चाहेंगे कि ऑनर किलिंग कि घटनाएं आखिर रूक क्यों नहीं रहीं, और तमाम प्रयासों के बावजूद खासतौर से हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस तरह की घटना आए दिन सुनने और देखने को मिल रही हैं, आखिर ये किस तरह की साइकोलॉजी है ? ऐसी वारदातों को अंजाम देने के पीछे किस तरह की सोच काम करती है ?
वीएन राय- देखिए काफी विकृत मानसिकता है ये, हम ये कह सकते हैं कि लोग ये मानते हैं इस समाज में लड़की को अपने फैसले लेने का हक नही है, उनके फैसले हमें लेने हैं।  जब भी कोई लड़की अपने जिंदगी के फैसले लेती है तो समाज पूरी तरीके से गोलबंद हो जाता है । ये काफी विकृत मानसिकता है। मैं समझता हूं कि जबसे मैंने हरियाणा ज्वाइन किया, तबसे लगातार ये चीजें रही हैं । अब आजकल हम कह सकते हैं मीडिया के प्रभाव से ये चीजें बाहर आने लगी हैं । पहले ऐसी घटनाएं बाहर नहीं आ पाती थीं, लोग ये मानते थे कि समाज ही लड़कियों से जुड़े फैसले लेगा ।
वासिंद्र मिश्र- इसके पीछे किस तरह की साइकोलॉजी काम करती है । इकोनॉमिक डिसपैरिटी, शिक्षा की कमी है या फिर कास्ट सिस्टम इतना ज्यादा मजबूत है, जो हावी रहता है ?
वीएन राय- नहीं इसमें इकोनॉमिक डिसपैरिटी की बात नहीं है । इसके लिए कास्ट सिस्टम भी इतना ज़िम्मेदार नहीं है । इसमें मुख्य बात है खाप का सिस्टम, गोत्र का सिस्टम, वो ये मानते हैं कि एक गोत्र में आपस में शादियां नहीं होनी चाहिए । पुराने ज़माने में जब मोबिलिटी नहीं थी लोग बाहर नहीं जाते थे, इतनी एज्युकेशन नहीं थी, लड़कियां बाहर नहीं निकलती थी तब ये चीजें संभव थीं। आज के जमाने में जब मूवमेंट इतना बढ़ गया है, काफी मेल मुलाकात लड़के-लड़कियों की होती है । उसी गांव के लड़के-लड़कियां उसी गांव में नहीं रहते हैं बल्कि वो बाहर जाते हैं पढ़ने के लिए, उनकी आपस में मुलाकात होती ,है दोस्ती होती है और स्वाभाविक रूप से दोस्ती कई बार प्यार में बदल जाती है । इस तरह की चीजें चलती रहती हैं। बच्चे मां-बाप से शेयर नहीं करते, अगर वो शेयर करें तो भी मां-बाप उनको सुनेंगे नहीं । इसलिए एक दिन वो अचानक घर छोड़कर चले जाते हैं । 

वासिंद्र मिश्र - जहां तक गोत्र का सवाल है, इस तरह की व्यवस्था तो पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में भी है। वहां भी एक गोत्र में शादी अच्छी नहीं मानी जाती, अब भी कोई शादी तय होती है, तो उसमें लड़के-लड़की दोनों का गोत्र देखा जाता है, और कोशिश होती है कि शादी एक गोत्र में ना हो, तो सिर्फ गोत्र के नाते इस तरह की हिंसक वारदात होती है या कोई और कारण है ? एक प्रशासनिक अधिकारी के रूप में जो आपने देखा आपको क्या लगता है ?
वीएन राय- देखिए एक लड़की को हिदुस्तानी समाज में दो तरह की हिंसा का सामना करना पड़ता है । एक लैंगिक हिंसा, जिसे हम जेंडर वायलेंस कहते हैं, दूसरा सेक्सुअल वायलेंस और वास्तव में सबकी जड़ में तो लैंगिक हिंसा ही है । बचपन से ही चाहे वो चाहे पूर्वी उत्तर प्रदेश हो या पश्चिमी उत्तर प्रदेश या फिर हरियाण, हर जगह लड़कियां कई चीजों से वंचित रहती हैं ।  हमेशा कहा जाता है कि तुम्हें घर से बाहर ही जाना है । इस घर में जो भी एसेट्स हैं उसमें तुम्हारी कोई हिस्सेदारी नहीं है, वगैरह-वगैरह । आप ये कह सकते हैं कि यहां पर जो कृषक समाज है जो कृषि आधारित जो इकोनॉमी है उसमे ये चीजें काफी मैटर करती हैं । किसानों के लिए ज़मीन बहुत मायने रखती है, इसीलिए वो कोशिश करते हैं कि लड़की की शादी करो और बाहर भेजो... 

वासिंद्र मिश्र - तो जैसे हरियाणा है, पश्चिमी उत्तर प्रदेश है, अगर देखा जाय तो एनसीआर का जो हिस्सा है, वो दुनिया के कुछ बड़े विकसित शहरों में से आता है, चाहे वो शिक्षा का सवाल हो, फैशन का सवाल हो, इंडिविजुअल फ्रीडम का सवाल हो, लाइफस्टाइल हो । क्या कारण है कि इसके 25 किलोमीटर के दायरे में आने वाले दिल्ली में इस मानसिकता की चीजें देखने को कम मिलती हैं, और 25 किलोमीटर के रेडियस में ये चीजें बहुत ज्यादा हैं, क्या दिल्ली के विकास का असर इस 25 किलोमीटर के रेडियस में नहीं पड़ रहा है ?
वीएन राय- नहीं विकास का जीवन के तमाम क्षेत्रों में असर तो पड़ ही रहा है, देखो एक बहुत बड़ा गैप हमारे समाज में क्या है, हमारे यहां सेक्सुअल एक्सपोजर तो बहुत तगड़ा हुआ है, लेकिन सेक्स एज्युकेशन नहीं है । दोनों के बीच में बहुत बड़ा गैप है । परिवार में आप पाएंगे कि इन विषयों पर बात ही नहीं होती है, स्कूलों में भी बात नहीं होती है, और कोई प्लेटफॉर्म नहीं है जहां इस तरह की बातें होती हों, लड़के-लड़कियां अपने इस फ्रीडम में या तो उनके पास ऑप्शंस अवेलबल हैं...उसका वो इस्तेमाल भी करते हैं, गलतियां भी करते हैं । जो महानगर हैं वहां काफी हद तक चीजें बदल चुकी हैं मूवमेंट ज्यादा है, तो चलता रहता है, लेकिन आप ठीक कह रहे हैं जैसे ही इंटीरियर इलाके में जाते हैं चाहे वो दिल्ली से 40-50 किलोमीटर ही दूर क्यों ना हो, वहां समाज अभी इन चीजों से काफी अछूता है । 

वासिंद्र मिश्र- राय साहब जब आप नौकरी में थे तो आपने इस तरह की घटनाओं को देखते हुए हरियाणा में सेफ हाउसेज बनाने का प्रपोजल रखा था और उसको शायद वहां की सरकार ने और बाद पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने भी एनडोर्स किया था कि आपका निर्णय सही है । आज उन सेफ हाउसेज की क्या स्थिति है ?
वीएन राय- देखिए पुलिस विभाग की तरफ से इस तरह के काफी केसेज आते थे, हाईकोर्ट में भी ऐसे काफी मामले पहुंचने लगे थे कि कई जोड़े जान का डर जताते थे, उसमें समस्या ये होती थी कि उनको आप प्रोटेक्शन कैसे दें, इसलिए ये सोचा गया कि सेफ हाउसेज बनाए जाएं ।  हमने ये कहा था कि पुलिस लाइन में एक क्वार्टर जो है उसको अलग से रख लेते हैं, क्योंकि पुलिस लाइन एक सेफ जगह है, फिर कुछ दिनों में जब मामला ठंडा हो जाए तो वो अपनी जगह जा सकें । कई मामलों में मां-बाप उस कदर शामिल नहीं होते हैं जितना कि उनको समाज शामिल कर लेता है । मां-बाप चाहते हैं कि बच्चे किसी तरह शांति से रह सकें, लेकिन समाज उनके पीछे लगा ही रहता है । कई बार मामला महीने 10 दिन, 15 दिन में शांत हो जाता था, हमने ये भी पाया कि ये जोड़े अगर गांव में वापस ना जाएं तो कई मामलों में बात आई गई हो जाती है । इस लिहाज से सेफ हाउसेज चलाए गए थे अब तो एक तरह से सरकार ने ही उनको ले लिया है । उनके आंकड़े भी हैं और सभी जगह कुछ न कुछ लोग आते-जाते रहते हैं । लेकिन सभी वहां नहीं पहुंचते ये समस्या है, जैसे हाल का रोहतक वाला मामला । वो सेफ हाउस में नहीं पहुंचे और बहला-फुसला कर उन्हें गांव में वापस ले जाया गया और मार दिया गया ।

वासिंद्र मिश्र- राय साहब जिस खाप की बात की जाती है, कई बार खाप का समाज में बहुत पॉजिटिव रोल भी सामने आता है । खासतौर से उन इलाकों में जहां इस तरह की परंपरा है। आपसी विवाद, तमाम जीवन से जुड़े हुए फैसले खाप के जरिए तय हो जाते हैं और उनको कोर्ट-कचहरी तक नहीं जाना पड़ता। आपको नहीं लगता है इस तरह की जो ऑनर किलिंग के फैसले हैं, उनके पीछे भी कोई राजनीति काम कर रही है ?
वीएन राय-  इसके पीछे पॉलिटिकल तो कुछ नहीं हो सकता है । दरअसल पॉलिटिशियन किसी भी
स्टेट के हैं वो इससे बचना चाहते हैं, वो इसकी ओर देखना ही नहीं चाहते हैं । ठीक वैसे ही जैसे कमरे में हाथी है और आप हाथी को देखना ही नहीं चाहते हैं । वैसे आपने ठीक कहा कि एतिहासिक रूप से खाप पंचायतों ने काफी अच्छे काम भी किए हैं । वो एक तरीके की एक ऐसी पंचायत है जो काफी मामलों में आपको सुलभ जस्टिस या सुलभ निर्णय दे दिया करती हैं, लेकिन ये मेल डोमिनेटेड होती हैं । शायद अब कुछ छूट दे दी हो, नहीं तो पहले महिलाओं का पंचायत घर में जाना भी संभव नहीं होता था । अब तो खैर रिजर्वेशन आ गया है तो महिलाओं की सीट भी हो गई है । खाप की भूमिका कई मामलों में अच्छी रही है, लेकिन आज के दिन वो कोई ऐसी भूमिका अदा कर पा रहे हैं ऐसा नहीं है।

वासिंद्र मिश्र- यानि आपके मुताबिक आपका जो अनुभव रहा है, उसमें खाप का रोल महज इस तरह के फैसलों तक सीमित रह गया है कि अगर लड़का और लड़की अपनी मर्जी से शादी करना चाहते हैं और एक ही गोत्र के हैं, तो उनको सजा सुनाना खाप अपनी शान समझता है, इसके अलावा और जो सामाजिक बुराई है, राजनैतिक बुराई है उसके मामले में खाप की दखलअंदाजी या रोल नहीं के बराबर है?
वीएन रॉय- हां मतलब ऐसा कोई पॉजिटिव रोल नहीं है, जैसे गांव-गांव में शराब की दिक्कतें हैं, अक्सर लोग इसकी शिकायत करते हैं, लोग शराब पीते हैं, महिलाओं के साथ छेड़खानी और दुर्व्यवहार होता है, मैं तो नहीं पाता कि कहां भी खाप इसमें दखल दे पाता हो और भी कुछ चीजें हैं जिनमें खाप दखल नहीं दे पाता, समाज की बुराइयों को रोकने में सकारात्मक रोल नहीं रख पाता । 

वासिंद्र मिश्र- तो क्या ये माना जाए कि जिन इलाकों में खाप बहुत ज्यादा प्रभावी है उन एरिया में कोई रूल ऑफ लॉ नहीं है, या जो लोग सरकार में हैं, प्रशासन में है । वो लोग ऐसी ताकतों के सामने घुटने टेके हुए हैं, अपने राजनैतिक स्वार्थ के चलते, वोट की राजनीति की वजह से ?
वीएन रॉय- नहीं खाप हर क्षेत्र में प्रभावी भी नहीं है, हम ये नहीं मान सकते कि खाप हर क्षेत्र में प्रभावी है औऱ ऐसा भी नहीं है कि पॉलिटिक्स या एडमिनिस्ट्रेशन ने उनके सामने घुटने टेके हों मुख्य चीज ये है कि ऐसे मुद्दों पर पॉलिटिशियन, या एडमिनिस्ट्रेटर स्किप करना चाहता है वो उधर- देखना भी नहीं चाहता । 

वासिंद्र मिश्र- इसके पीछे मकसद तो राजनति है ना ?
वीएन रॉय- नहीं इसके पीछे मकसद सीधा है, मकसद ये है कि जो फीमेल जेंडर है वो बहुत कमजोर है । देखो इसका सॉल्यूशन भी यही है कि आपको फीमेल जेंडर को एम्पॉवर करना पड़ेगा आपको तरीके ढूढने पड़ेंगे जिससे कि फीमेल जेंडर एम्पॉवर हो । 

वासिंद्र मिश्र- जो भी कानून है वो तो पूरे देश के लिए है, देश के बाकी हिस्सों में इस तरह की प्रॉब्लम देखने को नही मिल रही है ?
वीएन रॉय- नहीं देश के तमाम हिस्सों में ऐसी प्रॉब्लम है, आप साऊथ में जाइए, वेस्ट में जाइए, ईस्ट में जाइये, जिसे आप ऑनर किलिग कहते हैं, ऐसी इक्का दुक्का वारदातें हर जगह होती हैं, यहां पर ज्यादा होती हैं । 

वासिंद्र मिश्र- यहां चाहे तो इसे परंपरा कहें या फिर शान की परिभाषा, इसके लिए तो जो लोग सत्ता में हैं वो जिम्मेदार है, जो प्रशासन में हैं वो जिम्मेदार हैं ?
वीएन रॉय- असल में इसमें जिस तरह के रिफॉर्म चाहिए, जैसे हमें जो ज्यूडिशियल रिफॉर्म चाहिए वो
नहीं हुए हैं । लॉ एंड ऑर्डर मशीनरी है, न्याय व्यवस्था की मशीनरी है जिसमें अदालतें भी शामिल है, पुलिस भी शामिल है अगर उनको वो टूल्स ही नहीं देगें,  जिनके मार्फत वो ऑनर किलिंग को प्रभावी कार्रवाई कर सकते हैं, तो वो क्या करेंगे ?  आपको वही पैरामीटर्स लाने पड़ेंगे जो दूसरे अपराधों के हैंउन पैरामीटर्स को लाने में दिक्कत ये है कि जो ओरल एविडेंस है जो तमाम लोगों को आकर के अपने बयान देने हैं, बताना है कि कैसे इंसीडेंट हुआ, क्या हुआ वो चीजें इसमें संभव नहीं हैं,  क्योंकि कोई भी आगे आकर कहता नहीं है । इसके लिए हमको थोड़ा बहुत बदलाव लाना पड़ेगा जैसे हमने वर्मा कमेटी बनाई थी सेक्सुअल वायलेंस के खिलाफ, वैसी ही एक कमेटी बननी चाहिए जेंडर वायलेंस के खिलाफ, जो बकायदा ये तय करे कि सिद्ध करने की जिम्मेदारी किसकी है रोहतक वाले मामले को देखिए, अगर कोई लड़का-लड़की संदिग्ध परस्थितियों में मारे गए और उनकी कोई रिपोर्ट नहीं दी गई, तो ऐसे में उनके मां-बाप से पूछा जाए कि आप बताइये कि किन परिस्थितयों में उनकी मौत हुई, फिर उनके ऊपर जिम्मेदारी होनी चाहिए बजाय कि प्रासिक्यूशन के ऊपर जिम्मेदारी हो, और ये माना जाए कि आप इसमें इन्वॉल्व हैं, आपने कुछ ना कुछ इसमें गड़बड़ की हुई है ।

वासिंद्र मिश्र- तो क्या ये मानें कि विल पॉवर की कमी है ? जो लोग सत्ता में हैं उनमें, जिनके हाथ में कानून व्यवस्था कि जिम्मेदारी है उनमें विल पॉवर की कमी है ?
वीएन रॉय- हमारे प्रोटोकॉल बदलने चाहिएं, अगर हमको बदमाशों को सज़ा देनी है और सजा का कोई असर होना है आजकल क्या होता है, वो समझते हैं कि हमने ये कर दिया है और हमारा कुछ होना भी नहीं है । जो ज्यूडिशियल प्रोटोकाल्स हैं, जो प्रासिक्यूशन के प्रोटोक़ल्स हैं वो बदलने पड़ेंगे

वासिंद्र मिश्र - तो इसकी शुरूआत कहां से होगी, प्रशासन की तरफ से ?
वीएन रॉय- इसकी शुरूआत तो प्रशासन की तरफ से होनी चाहिए, लॉ कमीशन है हिंदुस्तान में । जब आप देख रहे हैं केस के बाद केस छूटते जा रहे हैं, जब हम पा रहे हैं कि एक केस के बाद दूसरा भी केस हो रहा है, चौथा भी केस हो रहा है, दसवां भी हो रहा है, बीसवां भी हो रहा है, तो उसको रोकने के लिए जो संस्थाएं बनी हुई हैं, उन संस्थाओं को विचार करना चाहिए और वैसा प्रोटोकॉल देना चाहिए । क्योंकि, ये संभव नहीं है कि केस के बाद केस छूटते जाएं और आप उम्मीद करें कि इस पर काबू हो जाएगा, ऐसा मुमकिन नहीं है । अगर सजा मिलेगी तो उसका जो असर हो सकता है वो भी होगा, लेकिन सजा के साथ जागरुकता फैलाना भी बहुत जरूरी है, जब तक लोगों को जागरुक नहीं किया जाएगा, तब तक उन्हें समझ में नहीं आएगा कि वो क्या बेवकूफियां कर रहे हैं, और उनके समाज पर इसका क्या असर हो सकता है

वासिंद्र- रॉय साहब हमसे महत्वपूर्ण जानकारियां शेयर करने के लिए शुक्रिया
वीएन राय- थैंक यू