सोमवार, 30 दिसंबर 2013

सिद्धांत, सियासत और सत्ता

देश की राजनीति ने इस साल एक ऐतिहासिक बदलाव देखा है.. परंपरागत राजनीति से परे उसूलों के सहारे परिवर्तन की राजनीति ने राजधानी दिल्ली की सत्ता पर पिछले 15 साल से काबिज 128 साल पुरानी पार्टी को बाहर का रास्ता दिखा दिया । हो सकता है कि ऐसा बदलाव लेकर आने वाली आम आदमी पार्टी के पास सिद्धांत ना दिखें लेकिन क्या ऐसा पहली बार हो रहा है कि राजनीति में बिना सिद्धांतों के सहारे आने वाली पार्टी सत्ता में आई हो ...
कांग्रेस के महासचिव जनार्दन द्विवेदी कहते हैं कि बिना विचारधारा के कोई पार्टी आगे नहीं बढ़ सकती और अगर कोई पार्टी नारों के सहारे सत्ता पर काबिज होती है अराजकता, अव्यवस्था फैलेगी, अब सवाल ये उठते हैं कि जनार्दन द्विवेदी जी सियासत के किन सिद्धांतों की बात कर रहे हैं ... वो सिद्धांत जिनके सहारे कांग्रेस और बीजेपी आज तक सियासत करती आई है ?
सियासत में अक्सर दिलचस्प वाकये नज़र आते हैं । शख्स पार्टी बदलता है तो उसकी शख्सियत बदल जाया करती है इत्तेहादे मिल्लत काउंसिल के तौकीर रज़ा जब मुलायम सिंह यादव के साथ होते हैं तो उन्हें दंगाई समझा जाता है लेकिन जब वो किसी और पार्टी का झंडा बुलंद करने लगते हैं तो वो ईमानदारी,  विकास और बदलाव की राजनीति करने लग जाते हैं । जनार्दन द्विवेदी वैसे लोगों के लिए क्या कहेंगे जो बाबरी विध्वंस के दौरान बीजेपी और संघ की कटु आलोचना कर रहे थे लेकिन बाद में बीजेपी के टिकट पर ही चुनाव लड़ते नज़र आए और वो कौन सी विचारधारा की राजनीति थी कि बाबरी विध्वंस के आरोपी गैर बीजेपी दलों से जा मिले । तब किस विचारधारा की राजनीति हो रही होती है जब भ्रष्टाचार के आरोपी जब तक साथ रहते हैं तो ठीक रहते हैं और जब साथ छोड़ देते हैं तो भ्रष्ट नज़र आने लगते हैं ।
सच तो ये है कि देश के दोनों बड़े राष्ट्रीय दल विचारधारा और सिद्धांत की बात सिर्फ जनता को गुमराह करने के लिए करते हैं, इनकी विचारधारा की राजनीति दिखावे की राजनीति है । इनका सिर्फ एक मकसद है, वो है सत्ता हासिल करना, इसके लिए विचारधारा से समझौता करना तो बहुत छोटी बात है, वो इसके लिए कुछ भी करने और किसी भी हद तक जाने को तैयार नज़र आते हैं । सच तो ये है कि महात्मा गांधी, दीनदयाल उपाध्याय, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और डॉ केशव बलिराम हेडगेवार के आदर्शों की बात करने वाले, उनके सिद्धातों की सियासत करने वाले दोनों राष्ट्रीय दल इन महापुरुषों के आदर्शों की तिलांजलि दे चुके हैं ।
देश के दोनों राष्ट्रीय दलों के राजनैतिक इतिहास पर नज़र डालें तो इनके द्वारा सैकड़ों बार मूल्यों, सिद्धांतों की बलि दी जाती रही है । इन्होंने सत्ता हासिल करने के लिए, सत्ता में बने रहने के लिए हर समझौते किए हैं । शिबू सोरेन, सुखराम, तसलीमुद्दीन सरीखे नेता, पं अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बनी एनडीए की सरकार, मनमोहन सिंह और एचडी देवेगौड़ा के नेतृत्व नें चली कांग्रेस की सरकार में सम्मानित पदों पर रहे हैं ।
देश की दो बड़ी पार्टियों के सिद्धांत और सियासी समझौते की कई बानगी देश के इतिहास में मौजूद हैं । ज़रूरत पड़ने पर भिंडरावाले को मान्यता देने और नक्सली आंदोलन चलाने वालों से सांठगांठ करके सत्ता हथियाने के आरोप भी कांग्रेस पर लगते रहे हैं। कांग्रेस की ही सरकार थी जब झारखंड मुक्ति मोर्चा घूस कांड सामने आया । वहीं पहली बार टेलीकॉम घोटाला सामने आने पर नरसिम्हा राव के कार्यकाल में जिस बीजेपी ने कई दिनों तक संसद नहीं चलने दी बाद में उसी पार्टी को इस घोटाले के जनक सुखराम की पार्टी हिमाचल विकास कांग्रेस के साथ हिमाचल में सरकार बनाने में बीजेपी को कोई गुरेज नहीं रहा ।
देश के इतिहास में पहली बार डेढ़ दर्जन अपराधियों और दागियों को कल्याण सिंह के मुख्यमंत्री रहते उस वक्त बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष रहे राजनाथ सिंह की पहल पर उत्तर प्रदेश के मंत्रिमंडल में जगह दी गई । जो मुलायम सिंह यादव खुद को सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ बताते आए हैं, जिन्होंने सेकुलरिज्म का नारा बुलंद किया हुआ है उन्होंने भी कभी परोक्ष को कभी सीधे-सीधे बाबरी विध्वंस के नायक कल्याण सिंह से गठबंधन किया है । क्षेत्रीय दलों की स्थिति तो पहले से बेहद विवादास्पद रही है । DMK, ADMK, INLD, अकाली दल और वाईएसआर कांग्रेस के तमाम नेताओं के विरुद्ध पहले से ही आर्थिक और प्रशासनिक भ्रष्टाचार के मामले देश की अलग-अलग अदालतों में लंबित हैं ।
ऐसी स्थिति में भ्रष्टाचार, कुशासन का विरोध करके महज एक साल पहले पैदा हुई AAP के हाथों दिल्ली चुनाव में शर्मनाक हार का सामना कर चुकी कांग्रेस और बीजेपी किस मुंह से आम आदमी पार्टी से सिद्धांत और मूल्यों की राजनीति की अपेक्षा कर रही है । राजनीति में जिस तरह से Ideology की बात जनार्दन द्विवेदी कर रहे हैं उससे ऐसा लगता है कि वो दिल्ली युनिवर्सिटी के क्लासरूम में हैं, क्योकि इस तरह की बातें क्लासरूम में ही अच्छी लगती हैं । एक वक्ता के रूप में तो सियासत में विचारधारा को लेकर उनके ये विचार अच्छे लग सकते हैं लेकिन एक राजनीतिक पार्टी के महासचिव के रूप में नहीं । विचारधाराओं को ताक पर रखने वाले सैकड़ों सियासी तालमेल के गवाह बन चुके जनार्दन द्विवेदी ये बयान देकर राजनीति के मंझे हुए लोगों के बीच हंसी के पात्र बनकर रह गए हैं ।
ये सच है कि जो आम आदमी पार्टी बनी है उसके पास सांप्रदायिकता, आर्थिक नीति, विदेश नीति को लेकर कोई स्पष्ट राय नहीं है, लेकिन करीब साल भर पुरानी पार्टी से इतनी अपेक्षा क्यों ? 128 पुरानी कांग्रेस पार्टी, विचारधारा के मसले पर कांग्रेस से अलग होकर भारतीय जनसंघ, फिर बीजेपी बनने वाली पार्टी और क्षेत्रीय दलों के पास भी देश से जुड़े कई अहम मुद्दों पर कोई स्पष्ट राय नहीं है तो आम आदमी पार्टी से इतनी अपेक्षा क्यों ?
जो लोग खुद को भारतीय राजनीति के पुरोधा, दर्शनशास्त्री समझते हैं उनको एक बार बीएसपी के इतिहास पर भी नज़र डाल लेनी चाहिए । जब कांशीराम ने वामसेफ, डीएस4 (दलित शोषित समाज संघर्ष समिति) और फिर बहुजन समाज पार्टी का गठन किया था तब उस पार्टी के पास भी विचारधारा नहीं थी, उन्होंने भी मुद्दों से राजनीति की शुरुआत की, और बीएसपी भी ऐसी इकलौती पार्टी नहीं है । ऐसे में जनार्दन द्विवेदी जी को अपने देश के राजनैतिक इतिहास में झांकना चाहिए । क्या जनता द्वारा चुनी गई आम आदमी पार्टी को अराजक कहना संविधान का अपमान नहीं है ? क्या ये जनादेश का अपमान नहीं है ? क्या ये दिल्ली की डेढ़ करोड़ जनता का अपमान नहीं है ? जिस कांग्रेस पार्टी ने सरकार बनाने में आम आदमी पार्टी को जनादेश की दुहाई देकर समर्थन दिया है उस पार्टी के महासचिव जनार्दन द्विवेदी आखिर इस तरह के बयान देकर कहना क्या चाहते हैं ?

शनिवार, 28 दिसंबर 2013

स्टैच्यु ऑफ युनिटी का मकसद






भारतीय जनता पार्टी एक बार फिर देशव्यापी मूवमेंट के जरिए एक मोमेंटम बनाने की कोशिश कर रही है। इस आंदोलन का नाम स्टैच्यू ऑफ युनिटी रखा गया है। स्टैच्यू ऑफ युनिटी कैंपेन के जरिए बीजेपी की कोशिश देश में वैसी लहर पैदा करने की है जैसी राम मंदिर आंदोलन की वजह से हुई थी। देश का एक बड़ा तबका बीजेपी से जुड़ गया था और बीजेपी इतना जन समर्थन पाने में कामयाब हो गई थी कि केंद्र में सरकार बना ले, लेकिन सवाल ये उठते हैं कि क्या सचमुच इस कैंपेन के जरिए बीजेपी देश में एक बार फिर वैसी लहर बनाने में कामयाब हो पाएगी?

नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने के साथ ही बीजेपी ने स्टैच्यू ऑफ युनिटी कैंपेन को उसी राम मंदिर आंदोलन जैसा आकार देने की कोशिश की है। उस वक्त राम मंदिर के शिला पूजन के लिए ईंटें जमा करने का आंदोलन चलाकर संघ परिवार ने देश भर में एकता बनाने की कोशिश की थी, अब नरेंद्र मोदी सरदार पटेल की सबसे ऊंची प्रतिमा बनाने के लिए लोहा मांगने का आंदोलन चला रहे हैं। 15 दिसंबर को सरकार पटेल की पुण्यतिथि पर देश भर में रन फॉर युनिटी के तहत दौड़ का आयोजन किया जाना भी मोदी का मोमेंटम बनाने की कैंपेन का हिस्सा ही है। 

रन फॉर युनिटी कैंपेन, राम मंदिर आंदोलन जैसी लहर बना पाएगी या नहीं, बीजेपी को एक बार फिर कामयाबी मिलेगी या नहीं, इन सवालों का जवाब ढूंढने से पहले इन आदोलनों का फर्क समझना ज़रूरी है। राम मंदिर आंदोलन आस्था और अस्मिता का आंदोलन था, इससे संघ परिवार के हर रैंक और हर प्रोफाइल के लोग जुड़े थे। जो लोग आस्था या धर्म से दूर थे उनके लिए ये आंदोलन सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का था। संघ परिवार ने राम जन्मभूमि शिलान्यास को राष्ट्र के शिलान्यास का नाम दिया था, मंदिर की स्थापना को राष्ट्रीय सम्मान की पुर्नस्थापना का सवाल बताया था। आंदोलन के केंद्र में मर्यादा पुरुषोत्तम राम थे, आंदोलन का मकसद सत्ता पाना नहीं था, लिहाजा इस आंदोलन से वो लोग भी जुड़े जिन्हें धर्म, संप्रदाय और राजनीतिक दल से कोई लेना-देना नहीं था। इस आंदोलन के जो अगुआ थे उनकी नीति और नीयत पर कोई सवाल खड़े नहीं कर सकता था, क्योंकि शिलादान के पीछे सत्ता की ललक नहीं दिखाई देती थी, लेकिन स्टैच्यू ऑफ युनिटी का मुद्दा पहले दिन से ही विवादों में है। 

इस आंदोलन के केंद्र में सरदार पटेल हैं और आंदोलन के अगुआ हैं नरेंद्र मोदी। सरदार पटेल कांग्रेस से जुड़े हुए थे और संघ के विरोधी थे। इससे दो बातें सामने आती हैं, पहली तो ये कि जिन सरदार पटेल की विरासत को आगे बढ़ाने के नाम पर नरेंद्र मोदी आंदोलन को धार देने में लगे हैं वो संघ के विरोधी थे तो संघ में भी उनको लेकर अलग-अलग राय थी ऐसे में नरेंद्र मोदी के इस आंदोलन को संघ का पूरा समर्थन मिलना मुश्किल है, और ऐसे में बीजेपी में भी दो राय बननी स्वाभाविक है। 



दूसरी बात ये है कि आंदोलन के अगुआ नरेंद्र मोदी का लक्ष्य भी साफ है और वो है सत्ता। देश में सरदार पटेल की विरासत को संभालने के लिए जिस कैंपेन की शुरुआत की गई है वो नरेंद्र मोदी के लिए है जिसमें सरदार पटेल को एक प्रतीक के रूप में लिया गया है। ऐसे में राम मंदिर शिलान्यास के लिए चलाए आंदोलन और स्टैच्यू ऑफ युनिटी कैंपेन को एक जैसा आंकना भूल होगी। राम मंदिर शिलान्यास के आंदोलन के अगुआ उसे राष्ट्रवाद से जोड़ने में कामयाब रहे थे, उन्होंने सत्ता की बात नहीं की थी, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात करके धर्म से दूर रहने वाले लोगों को जोड़ना उनकी बड़ी कामयाबी थी, लेकिन रन फॉर युनिटी में ना तो राष्ट्रवाद है ना ही इसकी नीयत साफ है।

बुधवार, 18 दिसंबर 2013

घुटनाटेकू भारत !

अमेरिका में डिप्लोमैट देवयानी के साथ किए गए बर्ताव पर भारत में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली है ... सड़क से लेकर संसद तक इस मसले पर सब इस वाकये को भारत के सम्मान पर हमला बता रहे हैं .. और एक बार फिर ये बहस शुरु हो गई है कि क्या भारत को अपनी विदेश नीति बदल लेनी चाहिए
क्या अमेरिका किसी और देश के राजनयिक के साथ इस तरह के मामले में यही हरकत करता या फिर भारत की सॉफ्ट स्टेट की छवि हमारे डिप्लोमैट्स के लिए मुश्किल और कभी कभार अपमानजनक साबित हो रहा है ..
ये वो सवाल हैं जो हर बार अमेरिका की दादागिरी और भारत को टेकेन फॉर ग्रांटेड लेने वाली हरकतों के बाद जेहन में आते हैं ....  देश में चाहे यूपीए की सरकार हो या फिर एनडीए की आखिर क्यों भारत अमेरिका के सामने घुटनाटेकू नीति अपनाता है ... आखिर क्यों हम अमेरिका के इन हथकंडों का जवाब नहीं दे पाते ...
ये सारे सवाल इसीलिए क्योंकि कई बार ऐसे मौके आए हैं जब  अमेरिका ने भारत के जाने माने लोगों के साथ इस तरह का बर्ताव कर दुनिया भर में भारत की छवि खराब की है और दुख की बात ये है कि भारत  की सरकार ने ऐसे मामलों में चुप्पी साध ली ...
देवयानी के मसले पर भारत की सरकार ने जरूर अमेरिकी एम्बेसी से सुरक्षा हटाने जैसे कदम उठाकर अपना विरोध जताया है लेकिन इससे पहले चाहे बोस्टन में देश के सबसे बड़े राज्य के कैबिनेट मिनिस्टर आज़म खान के साथ हुई बदसलूकी का मामला हो या फिर भारत के पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के साथ हुई बदसलूकी हो ... हर बार अमेरिका ने इस बदसलूकी को सुरक्षा जांच का नाम दिया है...और हर बार भारत अपना सॉफ्ट प्रोटेस्ट दर्ज कराकर खुश हो जाता है ... नतीजा सबके सामने है अमेरिका ने एक बार फिर भारत के सम्मान को ठेस पहुंचाई है ...
आपको साल 2010 में अमेरिका में भारत की राजदूत मीरा शंकर के साथ हुआ वाकया भी याद होगा .. जब मिसीसिपी में साड़ी पहने हुए मीरा शंकर को लाइन से बाहर कर उनकी चेकिंग की गई थी ... जबकि राजदूतों को इस तरह की जांच से छूट मिली हुई है ...
अपनी फिल्म के प्रोमोशन के लिए अमेरिका गए शाहरुख खान भी इस तरह के वाकये से दो चार हो चुके हैं ...नेवार्क एयरपोर्ट पर रोके गए शाहरुख खान को भारतीय दूतावास के दखल के बाद ही छोड़ा गया था ...
दरअसल भारत के लोगों के लिए अमेरिका का ये रवैया एक दो दिनों में नहीं बना है ... भारत के सॉफ्ट अप्रोच ने अमेरिका को इतनी छूट दे दी है कि सुरक्षा जांच या कानून के नाम पर वो भारत के पूर्व राष्ट्रपति, रक्षा मंत्री, नेताओं, डिप्लोमैट्स और कलाकारों के साथ ऐसा बर्ताव करने से बाज़ नहीं आता ...
हम जिन घटनाओं का जिक्र कर रहे हैं ये सारी मनमोहन सिंह के कार्यकाल में हुई हैं लेकिन क्या हुआ भारत के सॉफ्ट विरोध जताने पर कभी अमेरिका ने माफी मांगी तो कभी उल्टे भारत पर ही अपनी आंखें तरेर दीं .. लेकिन सिलसिला कभी रुका नहीं
यही हाल NDA के कार्यकाल में भी हुआ था .. उस वक्त के रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीज़ की अमेरिका में दो बार कपड़े उतारकर तलाशी ली गई जिसमें से एक बार तो वो अमेरिका के ही आधिकारिक दौरे पर थे..लेकिन इस पर भी अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली भारत सरकार अमेरिका को करारा जवाब नहीं दे पाई..
उन्हीं दिनों करगिल युद्ध में  भी भारत पर अमेरिका का दवाब दिखा था ... युद्ध की शुरुआत में कई भारतीय सैनिक मारे गए थे .. लेकिन बाद में भारतीय सेना उन पर हावी हो गई थी और कई पाक सैनिकों को घेर लिया गया था लेकिन उस वक्त के अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिटंन के दवाब में भारत उन पर कोई कार्रवाई नहीं कर पाया और उन्हें सेफ पैसेज दे दिया गया ..
अब याद कीजिए वो वक्त जब अमेरिका और इराक के बीच युद्ध चल रहा था और देश में कांग्रेस विपक्ष की भूमिका में थी .. लेकिन राजीव गांधी के विरोध की वजह से भारत ने इस युद्ध में अमेरिकी प्लेन्स को ईंधन मुहैया कराने से मना कर दिया था ...
इसी अमेरिकी सुपरपावर को 1971 में भारत पाक युद्ध के दौरान इंदिरा गांधी ने करारा जवाब दिया था.. इंदिरा गांधी के तेवर की वजह से अमेरिका को अपना सातवां बेड़ा वापस बुलाना पड़ा .. जो अमेरिका ने पाकिस्तान के पक्ष में युद्ध लड़ने के लिए भेजा था ...
क्या आज भी हम अमेरिका को ऐसा जवाब नहीं दे सकते ... दरअसल भारत में राजीव गांधी के बाद ऐसा कोई प्रधानमंत्री नहीं आया जिसने अमेरिका को इतना कड़ा जवाब देने की हिम्मत दिखाई हो ... जवाब देने के नाम पर हमेशा भारत विरोध जताता आया है वो भी तभी तक जब तक अमेरिका की तरफ से प्रतिक्रिया ना आ जाए .. लेकिन इस नीति की वजह से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हम अपनी वो साख गंवा चुके हैं ... इसी का नतीजा है कि भारत में आज भी अमेरिकी काउंसलेट से मिलने के लिए पुलिस को परमिशन लेनी होती है लेकिन अमेरिका में पुलिस सरेआम किसी भारतीय काउंसलेट को हथकड़ियां पहना सकती है ... जिसे स्टैंडर्ड प्रोसीजर का नाम देकर अमेरिका अपनी हरकतें जारी रखता है ...

शनिवार, 14 दिसंबर 2013

'आप' की 'असलियत'

सियासत की महफिल में नए नए तशरीफ लाए अरविंद केजरीवाल पुराने जमे हुए लोगों के लिए मुश्किलें पैदा कर रहे हैं ... वो भी तब जब सियासत में माहिर लोग उन्हें बिना शर्त समर्थन देने को तैयार है ... एक कहावत है कि दूध का जला छाछ भी फूंककर पीता है लिहाजा लोकपाल बिल के मसले पर सियासतदानों से अपना हाथ जला चुके अरविंद केजरीवाल इस बार फूंक फूंक कर कदम रख रहे हैं .. तभी उन्हें दिल्ली में सरकार बनाने के लिए बिना शर्त समर्थन की पेशकश ने पसोपेश में डाल दिया है...
दरअसल दिल्ली में चल रहा है माइंडगेम .. अब सवाल ये है कि आखिर इस माइंडगेम का मकसद क्या है ? .. दिल्ली की सियासत इस वक्त तीन पॉलिटिकल पार्टीज़ के इर्द गिर्द घूम रही है .... आम आदमी पार्टी के अलावा इसमें देश की दोनों बड़ी पार्टियां कांग्रेस और बीजेपी शामिल है ... ये दोनों पार्टियां लंबे अरसे से सियासत करती आई हैं और सत्ता का स्वाद भी जानती हैं ऐसे में दोनों पार्टियां आम आदमी पार्टी को भी एक बार सत्ता का स्वाद चखाना चाहती हैं ताकि उसे एक्सपोज़ किया जा सके ... उन वादों को एक्सपोज़ किया जा सके जिसके दम पर आम आदमी पार्टी ने पॉलिटिक्स में धमाकेदार एंट्री की है ... केजरीवाल को भी इन बातों का अंदाज़ा तो होगा ही लिहाजा वो भी खुद को बचाने की कोशिश में लगे हुए हैं .. ऐसे में जो सियासी हालात बन रहे हैं उसमें एक बार फिर चुनाव होना तय माना जा रहा है .... और कोई भी नेता सरकार बनाकर एक और चुनाव करवाने का आरोप अपने सिर नहीं लेना चाहता ... वहीं केजरीवाल भी लोकसभा चुनावों तक आम आदमी के मन में उठे बदलाव की लहर को बचाए रखना चाहते हैं ताकि लोकसभा के चुनावों में दिल्ली जैसा समर्थन पार्टी को देश के दूसरे राज्यों में मिल सके .. ऐसा दिल्ली में सरकार बनाने के बाद आसान नहीं रह जाएगा .... केजरीवाल दिल्ली में बिजली के दाम आधे कर देने, जनलोकपाल बिल 15 दिन में लेकर आने जैसे अव्यवहारिक वादे किए हैं ... केजरीवाल भी जानते हैं कि इन्हें अमली जामा पहनाना कितना मुश्किल है ... लिहाजा आम आदमी पार्टी समर्थन लेने की हालत में शर्तों का पुलिंदा लेकर आई है ...जिसमें दिल्ली से वीआईपी कल्चर खत्म करने, MLA और काउंसलर फंड ख़त्म करने, फंड सीधे जनता को दिए जाने, लोकपाल बिल पास किए जाने, दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने, बिजली बिल 50 फीसदी से ज्यादा कम किए जाने और  दिल्ली में रिटेल में FDI लागू नहीं करने जैसी 18 शर्तें शामिल हैं ।
 

दरअसल अरविंद केजरीवाल की ये शर्तें अपने followers को बचाए रखने की मुहिम है ... हर पार्टी सादगी , इमानदारी, पारदर्शिता और खर्चे कम करने का दम भरती है ... हर पार्टी की संविधान के प्रति जिम्मेदारी भी होती है.... इसके साथ ही विधायकों के पास संविधान प्रदत्त अधिकार भी होते हैं ... जिन्हें ऐेसे ही त्म नहीं किया जा सकता .. ... ऐसे में लगता है कि अरविंद केजरीवाल की हालत उस प्रेमी की तरह है जो अपनी प्रेमिका को खुश करने के लिए चांद तारे लाने जैसे वादे करने से भी नहीं हिचकिचाता लेकिन बाद में जब ये वादे पूरे नहीं होते तो मन उचटना स्वाभाविक है .. अब केजरीवाल के सामने वो जनता है जिसने उन्हें अर्श तक पहुंचाया है ... जनता के इस रिस्पॉन्स के पीछे वो वादे भी हैं जो आने वाले वक्त में अरविंद केजरीवाल के गले की फांस बन सकते हैं ... जनता रूपी जो अरविंद केजरीवाल की जो माशूका  है वो वादे पूरे नहीं कर पाने पर उन्हें अर्श से फर्श तक भी ला सकती है ।
दरअसल लोकलुभावन वादे कर लक्ष्य हासिल करना और इतिहास रचने में फर्क होता है । राजनीति दो तरह से की जाती है पहली ये कि राजनीति .. राजनीति की तरह की जाए या फिर जनता की भावनाओं को लुभावने वादों का जाल बुनकर अपने पक्ष में कर लिया जाए .. दूसरी तरह से राजनीति करने वालों को सफलता मिलती और कभी-कभार जब वो दुर्घटनावश सत्ता के करीब पहुंच भी जाते हैं तो उन्हें बाद में दिन में तारे नज़र आने लगते हैं .. यही काम एक वक्त में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने भी किया था, ढ़ेर सारे वादे करके वो सत्ता में भी आ गए थे लेकिन युनाइटेड फ्रंट की सरकार 11 महीने ही चल पाई थी ।
उत्तर प्रदेश में क्या हुआ , वर्तमान सत्तारूढ़ पार्टी जब चुनाव प्रचार के लिए निकली तो तमाम ऐसे वादे किए जिन्हें पूरा करना उनके अधिकार क्षेत्र में था ही नहीं ... चाहे वो एक वर्ग विशेष को आरक्षण देने का मामला हो या फिर उस वर्ग विशेष के कुछ युवकों के संगीन अपराधों में जेल में बंद होने का मामला हो .. पार्टी ने वादे किए और जीत हासिल की लेकिन फिर क्या हुआ धीरे धीरे जनता के  सामने हकीकत आ रही है । केजरीवाल ने भी अपने वादों में लोकपाल बिल लाने का वादा किया है क्या वो बता पाएंगे कि जिस दिल्ली को आज तक संपूर्ण राज्य का दर्जा नहीं मिला उसके पास कानून बनाने का पावर कब आया ?
जनता से इस तरह के वादे करने वालों को इतिहास से सबक लेना चाहिए ये वही जनता है जो दिल्ली में 15 साल तक राज करने वाली पार्टी को धूल चटा सकती है, ये वही जनता है जो उत्तर प्रदेश में कई साल बाद बीएसपी को पूर्ण बहुमत दे सकती तो 5 साल बाद हरा भी सकती है, ये वही जनता है जिसने उत्तर प्रदेश में पहली बार समाजवादी पार्टी को रिकॉर्ड बहुमत दिया है ... ऐसे में नेताओं को ये समझना होगा कि वो जनता को गुमराह नहीं कर सकते ना ही लंबे समय तक उनकी भावनाओं से खेला जा सकता है ।


शुक्रवार, 13 दिसंबर 2013

संस्कृति, सियासत और 377


देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस इन दिनों समाज में गे और लेस्बियन संबंधों को कानूनी मान्यता देने के पक्ष
में मुखर नज़र आ रही है ... ऐसी मुखरता तो महंगाई और भ्रष्टाचार जैसे आम आदमी से जुड़े मुद्दों पर भी नज़र नहीं आई  ... सेक्शन 377 पर हाईकोर्ट के जवाब मांगने पर भी कांग्रेस में इतना उत्साह नज़र नहीं आया था जितना सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद नज़र आ रहा है .. 2008 में दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से इस मसले पर राय जानने की कोशिश की थी .. उस वक्त केंद्र सरकार का जवाब था कि गे संबंध पूरी तरह अनैतिक हैं और इससे सामाजिक मूल्यों की हानि होगी ... केंद्र सरकार की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में भी पहले इसे अनैतिक ही करार दिया गया था .. हालांकि बाद में केंद्र सरकार ने अपना स्टैंड बदल लिया .. अब  जब सुप्रीम कोर्ट सेक्शन 377 को संवैधानिक करार देते हुए गे संबंधों को गैरकानूनी करार दे चुकी है तो केंद्र सरकार के नुमाइंदे अपने बदले हुए स्टैंड के तहत इसे गलत करार देने में लगे हुए हैं .. इससे ये अंदाजा लगाना ज्यादा मुश्किल नहीं है कि कांग्रेस में इस मसले को लेकर ज़बरदस्त CONFUSION है .. अचानक गे संबंधों को कानूनी करार देने के लिए मानवाधिकार की बातें की जाने लगी है .. दरअसल माजरा थोड़ा सा सियासी है .. वास्तव में राहुल गांधी और सोनिया गांधी का मानवाधिकार प्रेम, दिल्ली में आम आदमी पार्टी के जरिए मिली शर्मनाक हार का परिणाम है .. इस हार के दवाब के चलते आने वाले लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र देश की सबसे पुरानी पार्टी देश के सामाजिक मूल्यों के साथ खिलवाड़ करने को भी तैयार है ..

सेक्शन 377 का विरोध करने वाले लोगों को एक बार ये सोचना चाहिए कि इसका  भारत के सामाजिक ताने बाने पर क्या असर पड़ेगा .. कई देशों में प्रॉस्टीट्युशन गैर कानूनी नहीं माना जाता लेकिन भारत में है .. भारत में प्रॉस्टीट्युशन गैरकानूनी होते हुए भी रेड लाइट एरियाज़ बंद नहीं हुए हैं ... ऐसे में क्या इसे कानूनी तौर पर मान्यता दी जानी चाहिए ? ठीक वैसे ही भारतीय समाज में ऐसे संबंधों में जीने वाले लोग हमेशा से हैं तो क्या इनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई होती है ? दरअसल राज्यों के हिसाब से कई कानून को कई बार लचीला बना दिया जाता है और सेक्शन 377 भी उन्हीं कानूनों में से एक है जिस पर हमेशा लचीला रवैया अपनाया गया है .... ऐसे में आईपीसी से सेक्शन 377 को हटाने की जरूरत ही क्यों है ? आखिर क्यों इसे भी ignore नहीं किया जा सकता ? क्यों इस बात पर बहस की जा रही है कि गे और लेस्बियन संबंधों को कानूनी मान्यता दे दी जाए ? क्या ये सच नहीं है कि इसे कानूनी दर्जा मिलने के बाद समाज में इसे बढ़ावा मिलेगा ? क्या इससे सामाजिक संतुलन नहीं बिगड़ेगा? क्या समय बीतने के साथ इससे लिंगानुपात पर असर नहीं पड़ेगा ?  ऐसा तो एनिमल सोसायटी में भी नहीं होता .. वैसे भी इस पर राजनीतिक से ज्यादा सामाजिक बहस की ज़रूरत है ..और इस बहस में शॉर्ट टर्म फायदे, राजनीतिक स्वार्थ को जगह नहीं मिलनी चाहिए ।
कांग्रेस पार्टी के 127 साल के इतिहास पर नज़र डालें तो पार्टी अपने अब तक के सबसे बुरे,  सबसे ज्यादा confusion के दौर से गुजर रही है ... ऐसा लगता है कि पार्टी में किसी भी विषय पर फैसला लेने का सामर्थ्य खत्म हो गया है ... पार्टी में leadership, ideological, moral bankruptcy है... पार्टी के लिए इतना बुरा वक्त तो इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की अचानक हत्या के बाद भी नहीं आया था .. पार्टी के सबसे कमजोर माने जाने वाले अध्यक्ष सीताराम केसरी के कार्यकाल में भी पार्टी की ऐसी हालत कभी नहीं हुई ... यहां तक कि नरसिंह राव ने जब पार्टी की कमान संभाली तब भी पार्टी इससे बेहतर हालात में थी ।
 जिस तरह से कांग्रेस पार्टी धारा 377 को लेकर अपना स्टैंड बदलती रही है ... लोकपाल बिल पर भी कांग्रेस का रवैया जनता के मूड के अनुसार बदलता रहा .. पहले कांग्रेस लोकपाल बिल की मांग को  INSIGNIFICANCE बताकर टालती रही लेकिन जब इस बिल से जनभावना जुड़ी तो लोकपाल लाने के लिए कांग्रेस ने गंभीरता दिखानी शुरु कर दी ...
लोकपाल बिल तो एक नज़ीर है, कांग्रेस पार्टी का कमोबेश यही नज़रिया देश के हर बर्निंग इशु पर नज़र आता है ... बड़े-बड़े घोटालों का पर्दाफाश करने वाली रिपोर्ट्स को कांग्रेस ने शुरुआती दौर में नकारा लेकिन बाद में जब हो हल्ला मचा और कांग्रेस को लगा कि जनता इस मसले पर उसके खिलाफ हो सकती है तो आनन-फानन में जांच हुई और कई नेता जेल चले गए ... भ्रष्टाचार से लोग परेशान तो थे ही लेकिन महंगाई, बेरोजगारी जैसे मसलों पर भी कांग्रेस का रवैया शर्मनाक, अफसोसजनक और टालमटोल वाला ही रहा है .. पार्टी ऐसे मुद्दों पर अक्सर जनता को गुमराह करने की कोशिश करती ही नज़र आई है ... लेकिन सेक्शन 377 पर अपना पक्ष रखने में कांग्रेस ने जरा भी देर नहीं की और पहली कतार के सभी नेता एक सुर में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर अफसोस जताने लगे .. वो भी तब, जब सुप्रीम कोर्ट ने मौजूदा कानून की व्याख्या मात्र की है ।
जिस महात्मा गांधी का नाम लेकर कांग्रेस पार्टी राजनीति कर रही है उन्होंने  कभी भी भारतीय संस्कृति और मूल्यों से समझौता नहीं किया ... महात्मा गांधी ने हमेशा सत्य, अहिंसा, शुचिता के रास्ते पर चलते हुए देश के लिए लड़ाई लड़ी ... महात्मा गांधी हमेशा भारतीय मूल्यों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध थे... लेकिन महात्मा गांधी के नाम की राजनीति करने वाली कांग्रेस पार्टी मानवाधिकार के नाम पर ऐसी सामाजिक बुराई को कानूनी और सामाजिक मान्यता दिलाने पर आमादा है जिसे कांग्रेस पार्टी के संस्थापक रहे लोगों ने कभी तरजीह नहीं दी ।

रविवार, 8 दिसंबर 2013

कांग्रेस पर भारी 'मोदी फैक्टर' ?

जो चुनाव परिणाम आ रहे हैं इन परिणामों ने मंडल-कमंडल, जाति और संप्रदाय की राजनीति करने वाले राजनैतिक दलों को करारा जवाब दिया है, इन परिणामों से जाहिर है कि अब देश के मतदाताओं को जज्बाती, सांप्रदायिक और जातीय मुद्दों को उछालकर गुमराह नहीं किया जा सकता ना हीं ऐसे मुद्दों पर वोट हासिल किया जा सकता है .... इन राज्यों के परिणाम गुड गवर्नेंस, स्वच्छ प्रशासन और डेवलपमेंट की ज्यादा तस्दीक करते हैं । देश में बढ़ती महंगाई भ्रष्टाचार और कुशासन के चलते कांग्रेस पार्टी को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा है .... अब जब पार्टी को इसका अहसास भी हो चुका है तो पार्टी मंथन करने के बारे  में सोच रही है ... तो वहीं बीजेपी पहले ही बड़ी सावधानी से अपनी रणनीति में बदलाव कर चुकी है, पार्टी कमंडल की राजनीति से दूर सुशासन के मुद्दे को लेकर सत्ता की राह पर है ।
कांग्रेस पार्टी जो अभी तक समाज को जातियता, सांप्रदायिकता, क्षेत्रीयता के खांचों में बांटकर सत्ता के शीर्ष तक पहुंचती रही है, उसे अब इन परिणामों से सबक लेकर 2014 की अपनी चुनावी रणनीति का निर्धारण करना होगा । दिल्ली विधानसभा का चुनाव परिणाम देश के दोनों राष्ट्रीय दलों के लिए खतरे की घंटी हैं , इन परिणामों ने भ्रष्टाचार, पूअर गवर्नेंस और राजनैतिक-सामाजिक जीवन में पारदर्शिता के मुद्दों को पॉलिटिकल एजेंडे में सबसे ऊपर ला दिया है... महंगाई के दंश ने समाज के 90% लोगों को इस हद तक प्रभावित किया है कि उसकी प्रतिक्रिया के रूप में दिल्ली के मतदाताओं ने कांग्रेस पार्टी का सूपड़ा साफ करके ज़ाहिर कर दिया है । उम्मीद है कि कांग्रेस पार्टी का शीर्ष नेतृत्व और मनमोहन सिंह की सरकार लोकसभा चुनाव में जाने से पहले इस कड़वी सच्चाई को समझकर आने वाले समय के लिए अपना पॉलिटिकल एजेंडा तय करेंगे ...

दिल्ली के चुनाव परिणामों ने भारतीय जनता पार्टी को भले ही नंबर एक की पार्टी बना दिया हो लेकिन आम आदमी पार्टी की शानदार कामयाबी ने इसके लिए भी मजबूत चुनौती पेश की है ... जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण आंदोलन के बाद अन्ना हज़ारे की अगुआई में सबसे बड़ा जनआंदोलन कुछ साल पहले दिल्ली में देखने को मिला था ... और इस आंदोलन की अपज अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी दिल्ली की जनता के मन में अपनी विशेष जगह बनाने में कामयाब रही है .. इससे लगता है कि देश की जनता रोटी-रोजी, विकास, स्वच्छ प्रशासन सरीखे मुद्दों को ज्यादा तरजीह देने का मन बना चुकी है ..
मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की जीत का श्रेय नरेंद्र मोदी से ज्यादा शिवराज सिंह चौहान को मिलना चाहिए.. शिवराज सिंह चौहान ने जिस सादगी, साफगोई और सहज सुलभता के रास्ते पर चलकर दस साल तक अपनी सरकार चलाई उसी का नतीजा है कि उस राज्य की जनता ने उनको तीसरी बार भी सरकार बनाने का जनादेश दिया है  । शिवराज सिंह चौहान ने इतनी शानदार कामयाबी के बावजूद अपनी सादगी का परिचय दिया है .. साथ ही उन्होंने 2014 की चुनौति को स्वीकार करते हुए दावा किया है कि दिल्ली में जब बीजेपी के नेतृत्व में सरकार बनाने की स्थिति होगी तो अनुपात के आधार मध्यप्रदेश से लोकसभा की सर्वाधिक सीटें जीतकर देंगे ।

वहीं छत्तीसगढ़ में सत्तारूढ़ बीजेपी को कांग्रेस की कड़ी चुनौती मिली है ...  लेकिन छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की मजबूती उस सहानुभूति का परिणाम मानी जा रही है जो जीरम घाटी में प्रदेश कांग्रेस के काफिले पर हुए वहशियाना हमले से उपजी थी ।

मंगलवार, 3 दिसंबर 2013

सियासत की धारा-370



आर्टिकल 370 को लेकर खड़ा हुआ बवाल नया नहीं है .. भारतीय जनता पार्टी और संघ परिवार हमेशा 3 मुद्दों पर अलग से अपनी अलग राय रखता रहा है... बीजेपी हमेशा से यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने, आर्टिकल 370 हटाने और अयोध्या में रामजन्मभूमि निर्माण का वादा करती रही है ... समय-समय पर ज़रूर बीजेपी ने सत्ता के दवाब के चलते NDA के एजेंडे को मंजूर किया है और NDA के एजेंडे को आगे बढ़ाती रही है लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि बीजेपी अपने इन 3 मुद्दों से हट गई हो ... ये और बात है कि बीजेपी की तरफ से इन मुद्दों पर सबसे ज्यादा आवाज़ चुनाव के पहले ही उठाई जाती रही है ।
इस बार भी आर्टिकल 370 पर चर्चा का मसला छेड़कर नरेंद्र मोदी ने बीजेपी के उस एजेंडे को ही आगे बढ़ाया है ..यहां सबसे पहले ये जानना ज़रूरी है जिस आर्टिकल 370 पर चर्चा की बात कर रही है उस आर्टिकल में है क्या ..आर्टिकल 370 की वजह से कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा मिला हुआ..  जिसके तहत  यहां देश की संसद रक्षा, विदेश और संचार से जुड़े मामलों को छोड़ कर किसी दूसरे मुद्दे पर बिना राज्य की सहमति के कानून लागू नहीं करवा सकती.. साथ ही राष्ट्रपति के पास राज्य के संविधान को बर्खास्त करने का भी अधिकार नहीं है. धारा 370 की वजह से ही 1976 का शहरी भूमि कानून भी जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होता... जिसका मतलब ये कि जो जम्मू कश्मीर का निवासी नहीं है वो जम्मू-कश्मीर में ज़मीन नहीं खरीद सकता .... साथ ही दूसरे राज्य के निवासी से शादी करने वाली जम्मू कश्मीर की महिलाएं भी यहां ज़मीन नहीं खरीद सकती हैं... इसके अलावा भारतीय संविधान की धारा 360 जिसमें देश में वित्तीय आपातकाल लगाने का प्रावधान है, वो भी जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होती।
अब एक बार फिर लोकसभा चुनाव होने वाले हैं... और बीजेपी की कोशिश नरेंद्र मोदी को आगे कर संघ और अपनी पार्टी के मूल एजेंडे को आगे बढ़ाने की है ... पार्टी चाहती है कि नरेंद्र मोदी की अगुआई में देश में अकेले दम पर सरकार बनाई जाए और शायद इसी रणनीति के तहत एक बार फिर धीरे-धीरे इन 3 मुद्दों को प्रमुखता से उठाया जा रहा है ।  ऐसा नहीं है कि नरेंद्र मोदी बगैर किसी राजनैतिक Calculation के इस तरह के अतिसंवेदनशील और विवादास्पद मुद्दों को उछालते रहे हैं ... इसके पीछे देश में मौजूद संघ, हिंदुत्व और प्रखर राष्ट्रवाद की विचारधारा से प्रभावित करोड़ों लोगों को लामबंद करके दिल्ली की सत्ता पर काबिज होना है ...
सत्ता हर कीमत पर.. के रास्ते पर चल रहे नरेंद्र मोदी और उनके पीछे खड़ा संघ परिवार उन सभी राजनैतिक हथकंडों को अपनाकर भारतीय जनता पार्टी को शीर्ष पर ले जाना चाहता है ...इसके लिए मोदी अपनी रैलियों में ऐसे तमाम मुद्दों को उठा रहे हैं जो ना केवल कांग्रेस पार्टी को चुभती हैं बल्कि चुनाव आयोग तक इन बयानो को लेकर आंखे तरेर चुका है...लेकिन मोदी हैं कि मानने को तैयार ही नहीं.... मोदी के बयान जैसे कि 


शहजादे क्या जाने गरीबी क्या होती है
कांग्रेस वंशवाद की राजनीति छोड़े, मैं शहजादा कहना छोड़ दूंगा
कांग्रेस के खूनी पंजे से बचकर रहना होगा
कांग्रेस ने देश को बर्बाद कर दिया
आर्थिक बदहाली के लिए कांग्रेस जिम्मेदार है
रुपया और कांग्रेस दोनों में नीचे गिरने की होड़ लगी है
कांग्रेस को शहीदों की फिक्र नहीं है
महंगाई के मुद्दे पर कांग्रेस चुप्पी साध जाती है

 वक्त वक्त पर सियासी हंगामा खड़ा करते रहे हैं...इनकी फेहरिस्त काफी लंबी है...लेकिन नजीर के लिए इतना ही काफी है...और ये बयान मोदी का एजेडा साफ जाहिर करते हैं...मोदी अपनी प्रशासनिक क्षमता और बोलने की कला के दम पर भारतीय इतिहास, उससे जुड़ी घटनाओं और महापुरुषों को भी अपने अलग ढंग से पारिभाषित करते रहे हैं .. 

सिकंदर गंगा के किनारे आया तो हार गया
बिहार में नालंदा और तक्षशिला दो विश्वविद्यालय थे
चीन अपनी जीडीपी में से 20 फीसदी शिक्षा पर खर्च करता है
श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मौत 1930 में लंदन में हुई थी।
जब हम गुप्तवंश के बारे में सोचते हैं तो जेहन में चंद्रगुप्त मौर्य का नाम आता है...
पटेल के अंतिम संस्कार में नेहरु शामिल नहीं हुए थे...

मोदी विरोधी भले ही उनके कम ऐतिहासिक ज्ञान का मज़ाक उड़ाते हों लेकिन ऐसा लगता है कि नरेंद्र मोदी का हर दांव उस कहावत को सच साबित करने में लगा है कि राजनीति और युद्ध में सब कुछ जायज़ है और दोनों का लक्ष्य सिर्फ विजय हासिल करना है ...

बुधवार, 20 नवंबर 2013

साहेब, शहज़ादे....




क्या इस देश में कानून अंधा है...क्या हमारा संविधान किसी की भी निजी जिंदगी में झांकने का अधिकार देता है...क्या इस देश में निजता कानून के दायरे में सिर्फ खास लोग ही आते हैं..क्या चंद खास लोगों को ही राइट टू प्राइवेसी का इस्तेमाल करने का हक है....
इन सब मसलों का जिक्र इसलिए और जरूरी हो गया है क्योकि इस चुनावी मौसम में अचानक एक बहस छिड़ गई है...और हाल फिलहाल इस बहस की शुरुआत हुई ...एक बड़े साहेब, उनके एक मंत्री और एक लड़की की जासूसी की खबरों के साथ....
इस खबर पर तफ्सील से जाने के बजाय इस मुद्दे की गंभीरता पर बात होनी जरूरी है...आखिर ऐसा क्यों होता है कि जब किसी हाईप्रोफाइल शख्स का इस तरह का मामला सामने आता है..और बात से बात आगे बढ़ने लगती है तो कहा जाने लगता है कि ये किसी की प्राइवेसी का उल्लंघन हो रहा है...इस देश में कई ऐसे मामले है जहां सार्वजनिक जीवन में रहने  वाले लोग अचानक खुद को प्राइवेट समझने लगते हैं और इसी प्राइवेसी की दुहाई देकर खुद को खास बताते हुए आम लोगो से अलग साबित करने लगते हैं...
बीते कुछ दिनों में निजता का मसला सुर्खियों में है ... इसकी शुरुआत हुई है एक ऑडियो टेप के सामने आने से जिसमें एक लड़की के बारे में एक प्रदेश के मंत्री और आला अधिकारी की बातचीत है और अगर ये ऑडियो टेप सही है तो हैरान करता है ... इस टेप में रिकॉर्ड बातचीत के मुताबिक उस लड़की का चलना, उठना, बैठना, किसी के साथ मुलाकात करना जैसी हर बात का जिक्र है ...
अब इसी बात पर की बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं...आखिर क्यो समाज के एक खास तबके को इस बात का अहसास नहीं है कि इस देश में लागू हर कानून सबके लिए जरूरी है...आखिर क्यों जो राइट टू प्राइवेसी उनके लिए है वहीं राइट इस देश के हर खास ओ आम के लिए भी है...आखिर क्यों किसी व्यक्ति विशेष की बीमारी की जानकारी को उसकी निजता का अधिकार बताकर आम लोगों से छिपाया जाता है जबकि वो शख्श देश की सबसे ताकतवर राजनीतिक शख्सियत है..
कुछ और उदाहरणों का जिक्र करें तो ...मसलन एन डी तिवारी की अवैध संतान का मामला, नीरा राडिया और रतन टाटा की बातचीत के टेप का मामला, अमर सिंह और अभिषेक मनु सिंघवी की विवादित सीडी ... नारायण दत्त तिवारी को छोड़ दें तो इन सभी मामलों में अदालत ने सीडी को पब्लिक होने से बचा लिया ... मसला इन लोगों की निजता का था .. चाहे वो रतन टाटा हों, अमर सिंह हों या फिर अभिषेक मनु सिंघवी इन सभी लोगों ने अदालत का दरवाजा खटखटाकर अपनी निजता के उल्लंघन की बात कहकर सीडी पर स्टे ले लिया .. हालांकि एन डी तिवारी अपने बेहद निजी मामले पर खुद की छीछालेदर होने से नहीं बचा पाए ।
ऐसे में सवाल ये उठता है क्या भारत के हर आम नागरिक को ये अधिकार मिला हुआ है .. और अगर नहीं है तो कहां है निजता का अधिकार, कहां है समानता का अधिकार, क्या भारत का हर नागरिक संविधान के प्रीएम्बल की हर बात मानता है ? और ऐसे में क्या हम कह सकते हैं कि भारत में रूल ऑफ लॉ है क्या हम अपने लोकतंत्र का सम्मान करते हैं ... क्या जिस देश से हमने डेमोक्रेसी का आइडिया लिया क्या लोकतंत्र के मामले में हम उनकी तरह डेमोक्रेसी का सम्मान करते हैं ... .क्या प्राइवेसी के मामले में ऐसा नहीं लगता कि आम आदमी स्लेव डायनेस्टी में जी रहा है ... और मेडिएवल एरा में लौट गया है ..क्या हम ऐसे में गर्व से कह सकते हैं कि  हम दुनिया की सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में जीते हैं ?