शुक्रवार, 17 सितंबर 2021

दुर्बल नाथ जी

दिल्ली के मुख्य मंत्री अरविंद केजरीवाल ने आज अख़बारों में महान संत दुर्बल नाथ जी के सम्मान में एक इश्तहार छपवाया हैं ।
दुर्बलनाथ जी ने खटिक समाज की बुराइयों को दूर करने के लिए सामाजिक सुधार आंदोलन चलाया था ।
लेकिन उत्तर भारत के ज़्यादातर लोग दुर्बल नाथ जी के बारे में नहि जानते थे ।देश के कई राज्यों में चुनाव होने वाले हैं ।लगभग सभी पार्टियाँ जाति की राजनीति करने में जुट गयी हैं ।
पारदर्शिता गुड governance और करप्शन फ़्री प्रशासन देने का दावा करके सत्ता में आए केजरीवाल की पार्टी भी चुनाव मैदान में हैं।शायद इसीलिए उन्होंने खटिक समाज के महापुरुष दुर्बल नाथ जी को आज याद किया है ।
कमोबेश इसी तरह के कार्य मायावती ने भी सत्ता में आने के बाद किया था ।श्री पेरियार जी से लेकर छात्रा पति शाहू जी की मूर्तियाँ लगवाई थी ।अभी कुछ दिनो पहले जाट समाज के राजा के नाम से एक विश्व विद्यालय बनाने के लिए शिलान्यास भी हुआ है ।
राजनीति और  चुनाव के मौक़े पर सब जायज़ है ।

मंगलवार, 7 सितंबर 2021

farm laws

अल्लाह हु अकबर और हर हर महादेव के उद्घोष से सम्पन्न किसान आंदोलन आने वाले विधान सभा चुनावों में जाति और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण से खुद को बचा पाएगा ?
देश के राजनैतिक दल चुनावों में इन हथकंडो का खुले आम इस्तेमाल करते हैं।
किसान नेता स्वर्गीय महेंद्र सिंह टिकैत और ग़ुलाम मोहम्मद इन नारों को लगवाया करते थे ।ग़ुलाम मोहम्मद आज भी इन नारों को लगाते हैं।85 वर्षीय ग़ुलाम मोहम्मद आज भी हिंदू मुस्लिम और किसान एकता के पछ्धर हैं।
मुज़फ़्फ़र नगर में हुए किसान पंचायत में सभी नेताओं ने किसानो को साम्प्रदायिक ताक़तों से सतर्क रहने की अपील की ।
हम सबको 2013 ke Mujaffarnagar में हुए साम्प्रदायिक दंगे की विभीषिका याद है ।
दंगे के बाद हज़ारों की तादाद में लोगों ने शरणार्थी शिविरों में शरण लिया था ।
इस बार फिर देश के कई राज्यों में चुनाव हैं ।
किसानो को पता है की राज नेता एक बार फिर दंगे करा कर राजनैतिक लाभ उठाने की कोशिस करेंगे ।
शायद इसीलिए बार बार सावधान रहते हुए किसान एका की अपील की गयी ।कृषि क़ानूनों को लेकर जारी आंदोलन के और लम्बे वक्त तक चलने की सम्भावना है ।दूसरी तरफ़ केंद्र सरकार भी अड़ी हूयी है ।सरकार तीनो क़ानूनों को रद्द करने के मूड में नहि है ।

सोमवार, 6 सितंबर 2021

Role of Governors?

देश में इस समय अलग ही नजारा देखने को मिल रहा है ।सामविधानिक पदों पर कार्यरत लोग सक्रिय राजनीति में व्यस्त लोगों की तरह  कार्य कर रहे हैं।वयानबाज़ी कर रहे हैं।
सामान्यतया राज्यपालों से राज नेताओं की तरह बयानबाज़ी से बचने की अपेक्छा की जाती है ।लेकिन मेघालय , केरल और वेस्ट बेंगॉल के राज्यपालों ने तो संबिधानिक मान्यताओं और परम्पराओं की सारी हदें पर कर दी हैं।

राज्यपालों की भूमिका को लेकर पहले भी विवाद होता रहा है ।सरकारिया आयोग का गठन भी इस विवाद के चलते हुआ था ।लेकिन विवाद घटने के  बजाय वड़ता जा रहा है ।
केरल के राज्यपाल आरिफ़ मोहम्मद खान विद्वान हैं ।देश की लगभग सभी प्रमुख राजनैतिक दलों में रह चुके हैं ।शाह बानो केश  मामले में सामविधान संसोधन के विरोध में राजीव गांधी मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा दे दिया था ।वी पी सिंह , मायावती के साथ भी रह चुके हैं ।
उनके परिवार और रिस्तेदार भी सभी दलों के अलावा कारपोरेट घरानो की नौकरी करते रहे है ।आरिफ़ साहेब इस समय राज्यपाल रहते हुए भी देश के मुसलमानो को संघ परिवार से जोड़ने की कोशिस में जुटे हैं।
सबसे दिलचस्प मामला तो केरल के राज्यपाल सत्यपाल मलिक का है ।सत्यपाल मलिक जाट हैं । कुछ साल पहले उनको पहले बिहार फिर कश्मीर और अब मेघालय का राज्यपाल बनाया गया था ।
बताया जाता है की वे कृषि क़ानूनों को लेकर केंद्र सरकार से नाराज़ हैं ।इसीलिए हर मौक़े पर वे किसानो के आंदोलन का समर्थन करते दिखायी दे रहे हैं ।उनको इस बात का भरपूर एहसास है की राज्यपाल पद से हटने के बाद उनको उसी समाज के बीच में जाकर रहना है जो इन क़ानूनों का विरोध कर रहा है ।
सत्यपाल मलिक जी को अपनी बात कहने का बेशक अधिकार है ।लेकिन सामविधानिक पद पर रहते हुए अपनी ही सरकार द्वारा बनाए गए क़ानूनों का विरोध मुनासिब नहि है ।अगर वे सचमुच किसानो के हमदर्द हैं तो उनको राज्यपाल पद से त्याग पत्र देकर राजनीति करनी चाहिए ।
वेस्ट बेंगॉल के राज्यपाल की भूमिका और आचरण तो जगज़ाहिर है।अगर उनका बस चले तो वेस्ट बेंगॉल में किसी दूसरे ही दल की सरकार बन जायँ ।
लिखने का मक़सद साफ़ है ।कांग्रिस के सत्ता में रहते हुए जिन दलों ने राज्यपालों की भूमिका पर सवाल उठाया थाउनमें  से ज़्यादातर सत्ता में आने के बाद राज्यपालों के ज़रिए वैसे ही काम कर रहे हैं जैसा कोंग्रेस के वक्त में होता था ।यह ट्रेंड अछे लोकतंत्र के लिए अच्छा नहि है । सरकार में वैठे लोगों को सरकारिया आयोग की सिफ़ारिशों को फिर से पड़ना और उसपर गौर करना चाहिए ।

शनिवार, 28 अगस्त 2021

Afghanistan crisis and Taliban

देश में इन दिनों दो मुद्दों पर बहस छिड़ी हुई है
पहला है हमारे पड़ोसी देश अफगानिस्तान में तालिबान शासन। 
दूसरा भारत में सरकार द्वारा सार्वजनिक संपत्तियों को बेचने या निजीकरण का।
इन दोनों मुद्दों पर देखिए खास बात चीत 
भारत सरकार के पूर्व सचिव विजय शंकर पाण्डेय और वरिष्ठ पत्रकार वासिंद्र मिश्र के बीच

‘‘भारत को तालिबानियों से डरने या वार्ता की जरूरत नहींः विजय शंकर पाण्डेय
भारत को अपनी सेनाओं की ताकत बढ़ाने पर देना चाहिए ध्यानः विजय शंकर पाण्डेय
हमें अपने देश, अपने लोग और कश्मीर की सुरक्षा अपने दम पर करनी चाहिएः पूर्व सचिव
भारत को अपनी वैश्विक ताकत दिखानी चाहिएः पूर्व सचिव
कमजोर देशों को हमेशा अन्याय और अत्याचार सहना पड़ाः विजय शंकर पाण्डेय
‘‘वास्तव में कोई भी देश किसी दूसरे देश का मित्र नहीं होता’’ 
‘‘इंटरनेशनल लेवल पर सभी देश अपने हितों को देते हैं प्राथमिकता’’
‘‘अमेरिका का अफगानिस्तान छोड़ने का तरीका सही नहीं था’’
‘‘अफगानिस्तान संकट से भारत नहीं रह सकता अछूता’’
’’भारत का अफगानिस्तान में करीब 250 बिलियन डालर का निवेश’’
’’दुर्भाग्य से भारत अपनी शक्ति दिखाने में रहा पीछे’’
’’दुनिया में अनुरोध से कभी कुछ नहीं हुआ’’
’’सरकार की रक्षात्मक नीति से भारत को आंखें दिखा रहे पड़ोसी देश’’
’’पाकिस्तान से वार्ता नहीं तो उसके पिट्ठू तालिबान से वार्ता क्यों’’
’’किसी आतंकी संगठन के साथ को समझौता भारत की नीति के खिलाफ’’ 
’’पाकिस्तान ने ही तालिबान को जन्म दिया और पालन पोषण किया’’ 
’’अपने दम पर पाकिस्तानियों और तालिबानियों का सामना करे भारत’’
’’सार्वजनिक संपत्तियों को बेचना या निजीकरण गलत नहीं’’
’’संपत्तियों को बेचने या निजीकरण के नाम पर होने वाली लूट गलत’’
‘’भारत में संपत्तियों को बेचने या निजीकरण में हमेशा की गयी लूट‘’
‘’सीमेंट मिल, चीनी मिल, बीएसएनएल और शिवाय होटल के प्राइवेटाइजेशन में हुई लूट‘’
‘’केन्द्र सरकार के पास पैसों की कोई कमी नहीं‘’
‘’चीन की आर्थिक प्रगति से सबक क्यों नहीं लेता भारत‘’
‘’सरकारी नीतियों का अनुचित लाभ उठा रहे कुछ औद्योगिक घराने‘’ 
‘’कौड़ी के दाम पर जनता की संपत्ति बेचने वालों के खिलाफ हो कार्रवाई‘’
‘’परियोजनाओं में लागत से दो से तीन गुना ज्यादा का बनता है बजट‘’
‘’सरकारी कामों व परियोजनाओं में चोरी, लूट रोकने से सुधरेंगे हालात‘’
‘’भ्रष्टाचार ने हमारे देश की जड़ें साफ कर कर दी हैं‘’
‘’उत्तर प्रदेश में सभी राजनीतिक दलों को बारी-बारी से मिला सत्ता‘’
‘’जनता की समस्याओं के लिए सब एक-दूसरे पर फोड़ रहे ठीकरा‘’
‘’लूट-खसोट कर खूब बनाए अपने बैंक-बैलेंस, रिपोर्ट कार्ड रहा जीरो‘’
‘’काले धन में पूरी तरह डूब चुकी है भारतीय राजनीति‘’

गुरुवार, 12 अगस्त 2021

come back of Mandal

मंडल राजनीति की वापसी 
————-
मंडल बनाम ओ बी सी 
——————————

इंदिरा गांधी द्वारा गठित  मंडल कमिशन , विश्व नाथ प्रताप सिंह द्वारा लागू किए गए मंडल कमिशन की सिफ़ारिशों को कमंडल की राजनीति से ध्वस्त करने में विफल भाजपा को भी अब obc की राजनीति करने पर मजबूर होना पड़ा है ।
वास्तव में पिछड़ों की राजनीति की शुरुआत डॉक्टर राम मनोहर लोहिया ने की थी ।बाद में तमाम समाजवादियों ने इसका समर्थन किया ।पिच्छड़ों को उनका हक़ दिलाने के लिए संघर्ष किया ।
वदते राजनैतिक दबाव के चलते इंदिरा गांधी ने  बी पी मंडल की अध्यछता में एक आयोग बना दिया लेकिन आयोग की सिफ़ारिशों को लागू नही किया ।
कई साल बाद वी पी सिंह भाजपा और वाम मोर्चा समाजवादियों की मदद से प्रधान मंत्री बन गए ।प्रधान मंत्री बनने से पहले वी पी सिंह   कहा करते थे की politics is the management of contradictions.
वी पी सिंह प्रधान मंत्री बनने के पहले यह भी कहते थे की he will be disaster if he made prime minister.
वी पी सिंह के ये दोनो बयान बहुत चर्चा में रहे 
ख़ास तौर से जब उन्होंने भाजपा के प्रभाव को निषप्रभावी करने के लिए आनन फ़ानन में मंडल कमिशन की सिफ़ारिशों को लागू कर दिया था ।प्रतिक्रिया में पूरे देश में हिंसा और आगज़नी हुई थी ।वी पी सिंह की सरकार गिर गयी थी ।
लालू मुलायम नीतीश राम विलास उसी राजनीति के पुरोधा है ।वी पी सिंह के उस मंडल कार्ड को शिकस्त देने के लिए आडवाणी जी उग्र हिंदुत्व के अजेंडा को लेकर चलना पड़ा ।रथ यात्रा निकाल कर सम्पूर्ण हिंदू समाज को लामबंद करना पड़ा ।
आडवाणी जी की उसी रथ यात्रा का परिणाम है की आज भाजपा की देश और तमाम राज्यों में सरकारें हैं ।
दूसरी तरफ़ मंडल समर्थकों को भी राजनैतिक लाभ मिला ।या हम कह सकते हैं की इसका सरबाधिक राजनैतिक लाभ मंडल और कमंडल की राजनीति करने वालीं को मिला और सरबाधिक  घाटा कांग्रिस और वाम दलों को हुआ ।
आज एक बार फिर कमंडल के ऊपर मंडल की राजनीति भारी पड़ती दिखायी दे रही है ।कल तक सम्पूर्ण हिंदू समाज की एका की दुहाई देने वाले obc के ज़रिए जातीय राजनीति को महत्व दे रहे हैं ।
इतिहास के जानकारों का कहना है कि नक़ल की राजनीति लम्बे समय तक लाभकारी नहि रह सकती ।mandal forcess ने जातीय आधारित census की बात करके obc की पॉलिटिक्स करने वालों के सामने चुनौती पेश कर दी है ।

रविवार, 1 अगस्त 2021

Economic justice for all

तेजस्वी यादव के मुताबिक़ अब सामाजिक न्याय का कार्य पूरा हो चुका है ।
अब आर्थिक न्याय दिलाना ज़रूरी है ।कमजोर तबके को आर्थिक न्याय दिलाने के लिए कार्य होना। चाहिए ।
कांशी राम ने तो कई दशक पहले सत्ता में आने पर सवर्णो को reservations देने का ऐलान किया था 
वे अपनी जनसभाओं में कहा करते थे की सत्ता में क़ाबिज़ होने पर हम लोग अगाड़ी जातियों को न्याय दिलाएँगे ।
बाद में यही बात राम विलास पासवान , चिराग़ पासवान और मायावती कहती रही हैं ।
अब तेजस्वी यादव के बयान से लगता है की देश में सामाजिक न्याय का चक्र पूरा हो गया है ।
ऐसा लगता है की जाति की राजनीति करने वालों की नज़र upper caste पर है और वहीं दूसरी तरफ़ भाजपा और congress अभी भी दलित और obc वोट बैंक को अपने पाले में लाने की जुगत में जुटे हैं ।
राजनैतिक सोच के मामले में इन छेत्रिय नेताओं का नज़रिया नैशनल पार्टियों के नेताओं से ज़्यादा साफ़ और दूरगामी है ।
आज सही मायने में असली मुद्दा भूख बेरोज़गारी एजुकेशन स्वास्थ्य और महंगाई हैं।
जाति की राजनीति करने वाले कार्ल मार्क्स गांधी और दीन दयाल उपाध्याय का नाम लिए बग़ैर उन्ही के आर्थिक दर्शन को अपना कर आगे वड़ने की कोशिस में लगे है ।और दूसरी तरफ़ खुद को इन युग पुरुषों के स्वाभाविक उत्तराधिकरी समझने वाले उनके सिधांतों को तिलांजलि देकर आगे जाने की कोशिस में लगे हैं।

रविवार, 11 जुलाई 2021

Bjp vs opposition

भाजपा के मुक़ाबले विपछ की जुमलेबाज़ी ।
—————————————————

देश के राजनैतिक दल और उसके नेता प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी से राजनैतिक तौर पर लड़ने में फिस्सडी साबित हो रहे हैं ।वे चाहते हैं की मीडिया और न्याय पालिका उनकी राजनैतिक लड़ाई भी लड़े।
अपनी राजनैतिक लड़ाई की विफलता के लिए वे मीडिया और न्यायपालिका को ज़िम्मेदार ठहराने में लगे हैं।
देश की ज़्यादातर ग़ैर भाजपा पार्टियाँ तथा उसके नेता समय समय पर सत्ता में आती रही हैं लेकिन उन्होंने अपने संगठन को मजबूत करने उसके लिए ज़मीनी स्तर तक कार्यालय बनाने के बजाय अपनी निजी सम्पत्ति जुटाते रहे हैं।
नतीजा सबके सामने हैं। पार्टियाँ कंगाल होती गयीं और उसके नेता मालामाल ।भाजपा ने अपने लगभग सात साल के शासन में पूरे देश में ज़िला स्तर तक अपना कार्यालय बना लिया है ।आख़िर दूसरे दलों को किसने रोका था ।
देश के ज़्यादातर भाजपा विरोधी नेता भ्रष्टाचार के गम्भीर आरोपों से घिरे हैं । जाँच के डर से सरकार के ख़िलाफ़ बोलने से डर रहे हैं ।उनका आरोप है की मौजूदा सरकार  जाँच agencies का दुरुपयोग कर रही है ।
तो सवाल ये उठता है की क्या पिछली सरकारों ने ऐसा नहि किया था ?इस तरह के आरोप तो पहले भी लगते रहे है ।आज का विपछ सिर्फ़ जुमले बाज़ी कर रहा है । और चाहता है की उसकी राजनैतिक लड़ाई जनता न्यायपालिका और मीडिया लड़े ।